व्यंग्य // साहित्य जगत के मठाधीश // विनोद कुमार विक्की // प्राची - फरवरी 2018

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साहित्य जगत की एक अद्भुत एवं अद्वितीय विधा है व्यंग्य। यह कटु सत्य है कि व्यंग्य को समझ पाना हर किसी के बूते की बात नहीं।

जिस प्रकार व्यंग्य हर किसी के खोपड़ी में घुसती नहीं उसी प्रकार व्यंग्यकारों के चाल चलन (व्यवहार) को समझ पाना भी विशेष दैवीय कृपा से ही संभव है या फिर व्यंग्य को समझ पाने का सौभाग्य एक्सट्रा जीबी मेमोरी वाले मनुष्यों को ही प्राप्त होता है।

व्यंग्य मायानगरी में अलग-अलग मठ-मठाधीश हैं तो अलग-अलग सुमिरन करने वाले उनके समर्थक, चेला-चपाटी एवं अनुयायी भी है।

‘व्यंग्य अनंत व्यंग्यकार अनंता’ के भव सागर में ऊपर ऊपर तैरने वाला मैं अकिंचन प्राणी आज व्यंग्यकार के एक विशेष प्रजाति पर अल्प विवेचना करने का दुस्साहस कर रहा हूँ। यदि मेरे द्वारा वर्णित गुण चरित्र किसी व्यंग्यकार से मेल खाते हैं या हू-ब-हू मिलते हैं तो इसे महज संयोग ना मानकर कफंर्म हो जाएं कि मेरी इस व्यंग्य प्रशस्ति के नायक, बाहुबली आप ही हैं।

व्यंग्य जगत में इनके अक्खड़ व खड़ुंस व्यवहार के लिए इन्हें व्यंग्य जगत का ‘नाना पाटेकर’ या ‘किम जोंग ऊन’ कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

ये व्यंग्यकार हास्य रस से विपन्न, वचनवीर गंभीर होते हैं। इनके पास शब्द भेदी मिसाइल होता है जिसका प्रयोग विसंगतियों पर करने की बजाय साथी संगियों पर ही कर बैठते हैं। इनकी स्थिति शादी ब्याह में बेवजह मुंह फुलाए फूफा या बहनोई वाली होती है जो नाराज तो दिखते हैं किंतु नाराजगी की वजह क्या है ये बता पाना बेजान दारूवाला के भी बस की बात नहीं है।

इन्हें महज अपनी ही रचनाओं पर प्रशंसा सुनना, पुरुस्कार लेना, समीक्षा प्रतिक्रिया आदि अच्छा लगता है।

‘एकोहम द्वितीय ना अस्ति’ के वायरल इन्फ्लूएंजा से ग्रसित ये जनाब दूसरे की रचनाओं पर टीका टिप्पणी करने से गुरेज करते है। दूसरों की कृति, रचना या साहित्य पर महिमा मंडन कर अनमोल शब्दों को जाया नहीं करते। जाहिर सी बात है जितने समय में ये महाशय शब्दों के माध्यम से दूसरों की कृति का गुणगान करेंगे, उतने समय में एक नए व्यंग्य को लांच कर लेंगे।

मजाल है कि कोई नवोदित साहित्यकार इनसे कोई साहित्यिक सहयोग या जानकारी हासिल कर ले। जिज्ञासु व्यंग्यकार यदि किसी पत्र-पत्रिका का ईमेल आईडी भी इनसे मांग ले तो मानों उन्होंने महाशय से गुर्दा मांग लिया हो। अंततः जिज्ञासु को निराशा ही हाथ लगती है।

अमां यार नवोदित या जिज्ञासु को तो छोड़िए व्यंग्य क्षेत्र के वरिष्ठ व स्थापित भी इनसे हड़कंप रहते हैं। जनाब कब अपने आलोचनात्मक अभद्र अव्यावहारिक शब्दों से वरिष्ठ व्यंग्य गुरूओं की खाट खड़ी कर दें, ये समझ पाना भी असंभव है।

साहब की तुनकमिजाजी बड़े बड़े व्यंग्यकारों पर भारी पड़ती है। इन्हें ना वरिष्ठजनों के आशीर्वाद की और ना ही नवोदितों के शुभकामनाओं की आवश्यकता है। आखिर साहब अपने में ही सम्पूर्ण जो हैं।

यदि फेसबुक पर कोई साहित्यकार दूसरे साहित्यकार की रचना पर तारीफ कर दे तो जनाब को उस सम्मान, प्रशंसा या उत्साहवर्धक वाक्यों में चापलूसी की गंध आती है।

प्रकाशक के मेहर से यदि इस महाशय की एकाध पुस्तक छप गई फिर तो जनाब स्वयं को हरिशंकर परसाई, शरद जोशी के समकक्ष समझ आत्मुग्ध होने लगते है। इन्हें एक समय के बाद व्यंग्यजगत में किसी गॉडफादर की जरूरत नहीं होती क्योंकि अब तक इनके पास समजात रूप-गुण वाले साहित्यकारों का एक विशेष समर्थक वर्ग होता है जो साहब के अन्य व्यंग्यकारों से होने वाले वाक्युद्ध या मनमुटाव में साहब के समर्थन में लाइक व कमेंट्स के खाद पानी से ‘मुंह मियाँ मिट्ठू’ रूपी पौधों को सिंचित करने में भरपूर योगदान देता है। और साहब चढ़ जाते हैं ताड़ के झाड़ पर। फिर क्या गुरु और कौन सा चेला महाशय लग जाते है आरोप-प्रत्यारोप लगाने।

समर्थक वर्ग में भी अलग-अलग मुंडी अलग-अलग विचार वाले तथाकथित शुभचिंतक व समर्थक बुद्धिजीवी होते हैं जो वीर रस के इस व्यंग्यकार महोदय के अक्खड़पन, बदसलूकी व तुनकमिजाजी की समीक्षा सपाटबयानी, स्पष्टवादिता व गुटनिरपेक्ष व्यक्तित्व के रूप में करते हैं।

व्यंग्य दुनिया के ये नाना पाटेकर अभद्र शब्दों से ‘कब किस वरिष्ठ या समकालीन व्यंग्यकारों की ले लेंगे’ ये सोचकर ही ढेरों व्यंग्यकार इनसे परहेज करते हैं।

साहित्य प्रदेश के ये किम जोंग अमन चैन वाले साहित्य या व्यंग्य जगत में आपसी प्रेम से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विसंगतियों पर कुठाराघात करने की बजाय गुटबाजी एवं वैमनस्यता से व्यंग्यकारों से ही वाकयुद्ध करने पर आमादा है।

सम्पर्कः द्वारा श्री ओमप्रकाश गुप्ता

महेशखूंट बाजार, जिला-खगड़िया-

851213 (बिहार)

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // साहित्य जगत के मठाधीश // विनोद कुमार विक्की // प्राची - फरवरी 2018"

  1. उपहास की परिधि में ही चक्करियाती एक तात्कालिक कहन

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