लघुकथा -सामंजस्य // सदाशिव कौतुक // प्राची - फरवरी 2018

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शर्माजी आर.टी.ओ. में दलाली का काम करते थे. एक दिन वर्माजी लायसेंस बनवाने शर्मा जी के ऑफिस गये. उन्होंने वर्मा से जरूरी कागजात लिये और पूछा- उन्हें ठीक से दिखाई तो देता है ना? वर्माजी की आयु करीब पचास वर्ष दर्शायी गयी थी. वर्माजी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘भाई शर्माजी मैं साफ-साफ बता देना चाहूंगा कि मुझे अपनी आंखों से कम दिखाई देता है.’

इतना सुनते ही शर्माजी के ज्ञान-चक्षु खुल गये. वे ईमानदारी का चोला पहनकर बोले, ‘देखो भाई, नये साहब जो आये हैं बड़े सख्त हैं, आप जानते हैं कि सख्त अधिकारी बहुत ईमानदार होता है. वे सारी बातें जांच परख कर ही लायसेंस पर हस्ताक्षर करते हैं. इसलिए आपका लायसेंस बनना मुश्किल लग रहा है.’

वर्माजी को लायसेंस बनवाना जरूरी था. उन्होंने शर्माजी द्वारा बतायी फीस से तिगुने रुपये टेबल पर रखे और पूछा ‘अब तो बन सकता है?’

शर्माजी नोटों की गड्डी पर अंगुलियां थिरकाते हुए  मधुर मुस्कान के साथ बेहिचक बोले, ‘वाह वर्माजी आपने तो देश का नक्शा ही पलट दिया. इतनी बड़ी राशि में तो हमारे साहब अंधे का भी लायसेंस बना देंगे. आप तो बेफिक्र होकर जाइये लायसेंस कल ही आपके घर आ जायेगा.’

सम्पर्कः 1520, सुदामा नगर, इन्दौर

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