समीक्षा // ‘नमन भारत भारती’ में असीम राष्ट्रभक्ति के दर्शन // हरभजन सिंह मल्होत्रा // प्राची - फरवरी 2018

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वि हरीलाल ‘मिलन’ कर्मठ, जुझारू, दृढ़ी और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के मालिक है. इनके साहित्य पर अगर चर्चा की जाय तो उसके लिए एक वृहद् ग्रन्थ तैयार हो जाएगा. इनकी रचनाओं में इनका स्वभाव तो झलकता ही है, बहुआयामी व्यक्तित्व का रचना-संसार भी विस्तृत रूप से परिलिक्षित होता है जो अपने में अनेक रंगों को समेटे हुए है. प्रस्तुत पुस्तक ‘नमन भारत भारती’ इसका उदाहरण है. राष्ट्रप्रेम से अभिभूत इनकी रचनाओं का अनूठा काव्य-संकलन है यह. मुझे ऐसा प्रतीत भी नहीं होता कि इससे पहले कभी कोई ऐसा प्रयास किया गया हो. विविध रंगों के फूलों से सजे गुलदस्ते से अलग-अलग आती पुष्पगंध, एक होकर अलौकिकता में तब्दील हो गई हो, ऐसी ही अनुभूति होती है ‘नमन भारत भारती’ के पठन से.

निःसन्देह यह पुस्तक अद्भुत है. गीतों में असीम राष्ट्रभक्ति के दर्शन ही नहीं होते, बल्कि सप्तवीणा सदृश पाठकों की उरतन्त्री के तार-तार झंकृत हो उठते हैं. चाहे वह ‘संविधान-गीत’ ही क्यों न हो. हर गीत में पूर्ण निष्ठा से समर्पित दीखते हैं हरीलाल ‘मिलन’- नैतिक मूल्यों को सहेजते हुए.

‘जयति जयति जय भारत माता’ गीत में जिस राष्ट्र की कल्पना मिलन जी ने की है, उसमें विषाद, अभाव व अलगाव नहीं है. बल्कि उसमें है धन-धान्य से सम्पन्न राष्ट्र जिसका एक-एक प्राणी नैतिक मूल्यों व उसूलों की बंदिशों का कायल है. उसके पास सद्भावना का वह ग्रन्थ है जिसमें मानव एवं मानवता समाहित है जिसमें राम-रहीम एक ओंकार है. ऐसी है हमारी भारत मां. ऐसे देश की कल्पना की है मिलन जी ने ‘नमन भारत भारती’ में जहां एक ही घाट पर गाय और शेर साथ-साथ पानी पीते हैं.

असम, बंग, गुजरात, हिमाचल

गंगा-यमुना शुचि श्वेतांचल

गीता, ग्रन्थ, कुरान, बाइबल

पंथ अनेक, एक है मंजिल

सबका मानवता से नाता,

जयति-जयति जय भारत-माता.

‘कदम मिला के चलो’ गीत की पंक्तियां- कभी हताश न हो. कभी उदास न हो. तिरंगा साथ रहे. और खिलखिला के चलो. कदम मिला के चलो- बरबस मैथिलीशरण गुप्त की ‘नर हो न निराश करो मन को. कुछ काम करो, कुछ काम करो. जग में रहकर कुछ नाम करो’ पंक्तियों की याद दिला जाती है.

प्रकृति-चित्रण में भी मिलन जी पीछे नहीं रहे. राष्ट्र की स्तुति में प्राकृतिक-सौन्दर्य इस प्रकार आया है जैसे श्रृंगार-रस की कविता हो. उदाहरणार्थ- ‘हवाएं गुनगुनाती हैं, प्रकृति स्वयं आरती उतारती है. झील, झरने, तालाब और नदियों में किरणें कलाएं करती हैं, चांदनी झिलमिलाती है, रात्रि में चन्द्रमा और भोर में सूर्य स्नान करते हैं, ऐसे भारत एवं भारत की सन्तति का नमन है.’ मिलन जी की अनूठी प्रतिभा का इससे बढ़कर सशक्त उदाहरण और कौन हो सकता है-

रश्मियां करतीं कलाएं

चांदनी भी झिलमिलाए,

रात में चंदा उतरता

भोर में सूरज नहाए.

झील, निर्झर, ताल, तटनी

रम्य धरणी धारती.

नमन भारत भारती.

मिलन जी के गीतों के विविध आयाम है. ‘पुकारता है युग नया’ जहां नये सृजन का आह्वान है. वहीं ‘बधिक रे मत पंछी को मार’ एक टीस है. ‘आपस में टकराना क्या’ और ‘कहां तक रोकेंगे हम जंग? जैसे गीत साम्प्रदायिक-सद्भावना से प्रेरित हैं. देश के प्रति सजग रहने के लिए कवि ने जहां चेताया है, वहीं फटकार भी लगाई है. भुखमरी, राजनैतिक प्रपंच, आर्थिक विषमता, दिग्भ्रमित युवा आदि ऐसे कई पहलू हैं जिन पर राष्ट्र-प्रेम को लक्ष्य करते हुए समस्याओं से रूबरू कराया है मिलन जी ने. इस गीत-संकलन के हर गीत में देश-भक्ति कूट-कूट कर भरी दिखती है. इनकी प्रस्तुति में गहराई है. कोई लाग-लपेट नहीं है. थोथा उपदेश नहीं है. आदर्शवाद की मिसाल है ‘नमन भारत भारती’.

मिलन जी का ‘राष्ट्रभाषा-गान’ भी अप्रतिम है जो उत्कृष्टता के चरमोत्कर्ष को छू गया है. इस गान का व्याख्यान डॉ. सूर्य प्रकाश शुक्ल ने जिस श्रम से किया है वह अतुलनीय और शिरोधार्य है. निःसंदेह देश-प्रेम से ओत-प्रोत मिलन जी का ‘नमन भारत भारती’ गीत-संग्रह अपने आप में अनूठा प्रयास है जो पाठकों के मन में गहराइयों तक अपनी पैठ बना लेगा.


कृति : नमन भारत भारती

रचनाकार : हरीलाल ‘मिलन’

पृष्ठ : 107

प्रकाशक : ज्ञानोदय प्रकाशन, गांधीग्राम

मोबाइल : 9935299939

मूल्य : 200/-


प्रकाशक : ज्ञानोदय प्रकाशन, गांधीग्रम, जी.टी. रोड, कानपुर-208012

समीक्षक का पता : 390/3, श्रमिक बस्ती,

शास्त्री नगर, कानपुर महानगर

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