समीक्षा // भारतीय संस्कृति के संवेदनात्मक ख्वाब से उपजी पहचान // पाक प्रवासी कविता कृति ‘यह कश्मीर है’ // डॉ. मधुर नज्मी // प्राची - फरवरी 2018

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हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती और अंग्रेजी की मानक, ऊर्जस्वल कवयित्री, संयमित, अनुभव-सम्पन्ना समीक्षिका, डॉ. अंजना संधीर मूलतः भारत से हैं. कोलम्बिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क एवम् स्टोनी ब्रुक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद पर रहीं. डॉ. अंजना संधीर, साहित्य में अलहदा सोच की स्वामिनी हैं. अपनी दरवेशी-दृष्टि के चलते साहित्य में खास पहचान और मर्तबा रखती हैं. उत्तर प्रदेश के रूड़की जनपद की निवासिनी (अब उत्तरांचल में) डॉ. संधीर ने विदेश में रहते हुए भारतीय प्रवासियों को जोड़कर, अनेकशः साहित्यिक कृतियों का संपादन किया और हिन्दी को कीर्तिमानी अस्मिता से मालामाल किया. डॉ. अंजना संधीर की मौलिक काव्य-कृतियों में, ‘बारिशों का मौसम’, ‘धूप-छांव और आंगन’, ‘मौजे-सहर’, ‘तुम मेरे पापा जैसे नहीं हो’, ‘अमेरिका हड्डियों में जम जाता है’, ‘संगम’, ‘अमेरिका एक अनोखा देश’, ‘लर्न हिन्दी एण्ड हिन्दी फिल्म संसार’, ‘हिन्दी में बोलो- स्पीक इन हिन्दी सी.डी. के साथ’, ‘टॉक इन इंग्लिश अंग्रेजी में बात करो’, दूरदर्शन के लिये ‘स्त्री-शक्ति’ सीरियल का निर्माण किया. प्रवासी भारतीयों की अमेरिका में डॉ. संधीर द्वारा संपादित कृतियों में ‘प्रवासी हस्ताक्षर’, ‘सात समुन्दर पार से’, ‘ये कश्मीर है’, ‘प्रवासिनी के बोल’, ‘प्रवासी आवाज’, ‘विश्व-मंच पर हिन्दी नये आयाम’, ‘अमेरिकी हिन्दी साहित्यकार-कोष’, ‘स्वर्ण-आभा-गुजरात की सौ कवयित्रियों की कविताएं’ आदि हैं जो अपने तरीके की नायाब, शीर्षस्थ कृतियां हैं. डॉ. अंजना संधीर का अवदान अनुवाद में भी श्रेष्ठ हैं. ‘आंख ये धन्य हैं’ वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गुजराती कविताओं का अनूदन, उनकी भाषाई पकड़ का संयमित नमूना है. अनुवाद कुछ ऐसा संभव हो सका है कि लगता है अनुवाद न होकर एक पुरअसर कृति का मौलिक रूप हो. ‘इजाफा’, ‘यादों की परछाइयां’ (उर्दू से हिन्दी), ‘कृष्णायन’, ‘द्रौपदी’ (गुजराती से हिन्दी अनुवाद), ‘भूकम्प और भूकम्प’ (भूकम्प-केन्द्रित गुजराती कहानियों का अनुवाद), ‘एक सौ हिन्दी फिल्म-गीतों का अंग्रेजी अनुवाद’ आदि कृतियां साहित्य की अक्षर धरोहर हैं. देश-विदेश के अनेकशः पुरस्कारों-सम्मानों से समादृत डॉ. अंजना संधीर भारतीय संस्कृति और हिन्दी-भाषा की अदबी शिनाख्त हैं. बच्चों को भारतीय अस्मिता और संस्कृति की शिक्षा देने के लिए अमेरिका को अलविदा कहकर अहमदाबाद में भारतीय भाषा-संस्कृति संस्थान गुजरात विद्यापीठ गुजरात में अध्यापन कर रही हैं, जबकि उनके पति अभी भी अमेरिका की नागरिकता के साथ वहां सेवारत हैं.

सम्मान्या डॉ. अंजना संधीर से इस पंक्तिकार का तकरीबन 30-35 वर्षों का लेखकीय संबंध हैं. भारत में रहते हुए हिन्दी-उर्दू काव्य-मंच की अ-समान्तर शीर्षस्थ कवयित्री के रूप में उनकी पहचान बनी जो आज भी उसी ऊर्जा-संवेदनात्मक स्थान को प्रभावान्विति के साथ कायम है. अहमदाबाद (गुजरात) की साहित्यिक गतिविधियों की केन्द्रियता डॉ. अंजना संधीर के आस-पास आज परिक्रमारत है. साहित्य की सर्जनात्मक अग्निमा को डॉ. संधीर के माध्यम से पहले भी गति मिलती रही है और आज भी सारस्वत गति मिल रही है. लेखन से लेकर सारस्वत संपादन तक की विस्तृति और लेखकीय जुनून उन्हें मति-मती आधार-फलक प्रदायित कर रहा है. बगैर ‘जुनून’ और अध्यात्मिक साधना के साहित्य में कुछ भी संभव नहीं हो पाता. यह ‘जुनून’ साहित्यकार के हक में ज्यादा अनिवार्य है. इस ‘अनिवार्यता’ को डॉ. संधीर प्राथमिकता के साथ अपनी सीमाओं में स्वरित कर रही हैं. अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीय कृतिकारों से रचनाएं प्राप्त करके, साग्रह लिखवा करके, डॉ. अंजना संधीर की संपादित कृति ‘ये कश्मीर है’ का प्रथम संस्करण अमेरिका में प्रकाशित होकर आया था. कृति की निरंतर बढ़ती हुई मांग के मद्देनजर उसी कृति का दूसरा संस्करण ज्ञान गीता प्रकाशन दिल्ली से अभी हाल में आया है. ‘ये कश्मीर है’ अंजना संधीर के नजरिये को उनकी दृष्टि से कुछ ऐसे समझा जा सकता है, ‘ये कश्मीर है’ काव्य-संग्रह का दूसरा संस्करण आप के हाथों में सौंप रही हूं लेकिन हालात आज भी वैसे ही भारत-पाकिस्तान की युद्ध की स्थिति से भरे हुए हैं, फर्क इतना है कि उस वक्त मैं अमेरिका में थी और आज भारत में हूं. सन् 2001 में यह संग्रह संपादित किया था, तब भारत पल-पल याद आ रहा था और हम सब ये प्रार्थना करते थे कि युद्ध न ही करो’ कि हमारा तो संसार भारत में है. चाहे हम अमेरिका में रहते हैं लेकिन आज स्थिति और भी भयानक हो चुकी है, हमारे जवान शहीद हो रहे हैं, आम आदमी परेशान है और दुनिया भारत के सब्र के इम्तिहान को देख रही है. कश्मीर और भी बदतर स्थिति में पहुंच गया है. ‘कश्मीर में शान्ति की उम्मीद के नाम’ ये संग्रह जब प्रकाशित हुआ था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को यह संग्रह भेजा गया था और उनका पत्र आशीर्वाद रूप में प्राप्त हुआ था और उन्होंने अपनी ‘संवेदना’ सी.डी. मुझे भेजवाई थी, जिसमें उनकी रचनाओं को मशहूर गजल सिंगर स्वर्गीय जगजीत सिंह ने गाया है. मेरा सौभाग्य है कि उसी मंच पर मुझे भी कविता-पाठ का अवसर प्राप्त हुआ, जिसका संचालन स्वर्गीय कन्हैया लाल ‘नन्दन’ कर रहे थे. न्यूयॉर्क के मैनहटन सेण्टर में यह कार्यक्रम आयोजित था. जिसमें स्वर्गीय कमलेश्वर जी, स्वर्गीया इंदिरा गोस्वामी (असमिया लेखिका) स्व. मनोहर श्याम जोशी, गुलजार साहब, पद्मा सचदेव, श्री विश्वनाथ सचदेव, प्रो. गोपी चंद नारंग, बशीर बद्र, निर्मला जैन, निर्मल वर्मा, शशि थरूर, रघुवीर चौधरी, प्रो. के. सच्चिदानन्दन तथा कई मशहूर लेखक-लेखिकाएं शामिल थे. वहां कमलेश्वर जी ने जब यह संग्रह देखा तो बोले ‘मुझे इसकी एक प्रति चाहिये क्योंकि भारत में भी सिर्फ कश्मीर पर कविताएं हो ऐसा कोई संग्रह नहीं छपा है. यह तुमने बेशकीमत काम किया है. अमेरिका से हिन्दी में वह भी कश्मीर पर कविताएं, अंजना, अभिनन्दनीय काम है ये. मैं इसे भारत ले जाऊंगा और इस पर लिखूंगा.’

वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार कमलेश्वर के इस अभिमत में सच्चाई ‘भारत में भी सिर्फ कश्मीर पर कविताएं हों’ ऐसा कोई संग्रह नहीं छपा है.’ डॉ. अंजना कश्मीर के दिलकश मंजर उनकी पारमिता प्रज्ञा को आंदोलित करते रहे हैं. जिसका सारस्वत परिणाम है’ ये कश्मीर है’ की प्रस्तुति. ‘कश्मीर’ की सौन्दर्य बोधी कश्मीरियत ने हर किसी को प्रभावित किया है. अरसा पहले भारत के शायर स्व. एहसान एम.ए. ने वहां के दृष्टि का अपनी गजल के इस शेर में बयान किया हैः-

‘बर्फ के जिस्म से उठ रहा है धुआं

आज नफरत के शोलों में कश्मीर है.’

कश्मीर की स्थितियां दिन-ब-दिन बदतरीन होती जा रही हैं. ‘यह कश्मीर है’ कृति में अमेरिका में बसे, प्रवासी भारत के कवियों-कवयित्रियों की रसगर-दमगर कविताएं जो कश्मीर को केन्द्र में रखकर आयी हैं, उनमें डॉ. अंजना सुंधीर, आदिल मंसूरी, कल्पना सिंह चिटनिस, गुलाब खण्डेलवाल, धनंजय कुमार, प्रीतिसेन गुप्ता, प्रतिभा सक्सेना, पुष्पा मल्होत्रा, बिन्देश्वरी अग्रवाल ‘बिन्दू’, रानी नगिन्दर, राकेश खण्डेलवाल, रेखा रस्तोगी, रेणु राजवंशी, ललित अहलूवालिया, वेद प्रकाश सिंह ‘अरुण’ सरोजिनी शर्मा, सुषम वेदी तथा सुषमा मल्होत्रा के नाम प्रमुख हैं. प्रेमचन्द साहित्य के मर्मज्ञ, सुख्यात साहित्यकार-समीक्षक डॉ. कमलकिशोर गोयनका ने ‘ये कश्मीर है’ पर टिप्पणी करते हुए दैनिक जागरण नयी दिल्ली के संस्करण में विगत् 14 सितंबर 2009, पेज 17 पर लिखा है, ‘यह कश्मीर है’ कविता-संग्रह कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है. प्रवासी भारतीय कवियों का इस विषय पर पहला कविता-संग्रह है. इस संकलन से इन कवियों की राष्ट्र-भक्ति का परिचय मिलता है और उन संवेदनाओं का जो उनकी स्मृति में कश्मीर को लेकर बसी है... अमेरिका की सुख-सुविधा और वहां के तनावों के बीच अपने अंतर्मन में कश्मीर को जीवित रखना उनकी सृजनात्मक प्रतिभा का प्रतीक है.’

‘द्वितीय संस्करण पर दो शब्द’ संज्ञक आलेख में डॉ. अंजना अपनी छात्रा जेनिफर के हवाले से अपनी बात व्यथित मन से कहती हैं, ‘...परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे और अटल जी ने उनकी भारत-यात्रा पर ‘रेड कारपेट’ बिछाकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था. क्या इनाम दिया उन्होंने सबको पता है. आज की स्थिति उससे भी खराब है. सीमा पर हमारे जवान मर रहे हैं, आम आदमी का जीवन बद् से बद्तर हो गया है, कश्मीर का अब कारोबार ठण्डा-ठप्प पड़ा है, देश का भविष्य बनाने वाला बच्चों के स्कूलों में आग लगायी जा रही है, महीनों से बच्चे घरों में बैठे हैं, आतंकवादियों का गढ़ हो गया है कश्मीर. सेना, बी.एस. पर पत्थर बरसायी जा रहे हैं, क्यों? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बधाई देते हैं और उन्होंने नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन की बधाई में सैनिकों की शहादत परोस दी? सर्जिकल स्ट्राइक करनी पड़ती तो सवाल ही कहां से खड़ा होना चाहिए. आज एकजुट होकर देश के लिए खड़ा होने की जरूरत है.’

अमेरिका में रहते हुए अपने देश की सांस्कृतिक संचेतना का ध्वज फहराने वाली डॉ. अंजना संधीर ने वहां विश्व हिन्दी-सम्मेलन, काव्य-समारोहों सेमिनारों का आयोजन करके अपने देश की अस्मिता को ऊर्जस्वित किया. भारत में वापस आने पर भी वही सिलसिला निरंतर बनाये हुए हैं. गुजरात की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों की सूत्रधार डॉ. संधीर का महत्तम साहित्यिक योगदान साहित्य के सरोकारियों के लिए अनुकरणीय और विचारबोधी हैं. ‘कश्मीर’ पर पड़ोसी राष्ट्र से संधियों के सिलसिले पहले भी रहे हैं और कमोबेश आज भी हैं किंतु अब तक सभी ‘फेक’ साबित हुए हैं. इससे आहत होकर अपनी कविता में डॉ. अंजना संधीर कहती हैं, ‘कितनी संधियां और करोगे? हर संधि युद्ध की तैयारी के लिये मांगा हुआ शान्तिपूर्ण समय है/... जब मुद्दे प्रतिष्ठा बन जाते हैं/ तो प्रेम खत्म हो जाता है/ भर जाती है नफरत की आग/ कश्मीर ऐसा ही मुद्दा है/ हमारी बातचीत, संधि का सपना युद्ध के लिये मांगा हुआ शांतिपूर्ण सपना है.’ कश्मीर की दिलआवेज सुषमा आज भी डॉ. अंजना संधीर को आकर्षित करती हैं किंतु स्थितियां संवेदना के ताप को पोर-पोर तोड़ रही हैं. गौरतलब है कश्मीर पर उनकी कविता का अंश ‘ये नजारे, ये चीजें, सब आज वैसी ही वैसी हैं/ लेकिन दहशत का जहर इनमें फैल गया है/ केसर के खेतों में सड़ रही हैं लाशें/ गड़रियों के गीतों में भरी गयी है आहें/ चुभने लगी हैं चिनार की छांव/ कोई नहीं आता. खुशी से गांव/ कि होने लगी है अब यहां बंदूकों की खेती/ बंटने लगी है अब यहां बहू और बेटी/ चप्पे-चप्पे में फैली है उदासी/ ऐसा तो नहीं था मेरा कश्मीर/ किसने चलाये हैं नफरत के तीर/ क्यों जलने लगा सारा कश्मीर/ तुम भी सोचो हम भी सोचें.’

‘यह कश्मीर है’ को पढ़ते और लिखते हुए सुख्यात गजलकार महेश ‘अश्क’ की काव्य-पंक्तियां याद आती हैं जो पुस्तक संरचना को लेकर लिखी-कही गयी हैं, ‘इन्हें छेड़ों जहां से बोलती हैं/किताबें आदमी को खोलती हैं.’ कृति में पहली कविता आदिल मंसूरी की है. छोटी-छोटी चार कविताओं में, पहली कविता एक व्यथा-पूरित दास्तान है ‘कश्मीर’ की. कल्पना सिंह ‘चिटनिस’ की पांचों मिनी समकालीन कविताएं, एक मासूम बेटी की व्यथा का बयान करती हैं. वरिष्ठ कवि गुलाब खण्डेलवाल की कई-कई कविताएं कश्मीर के हालात को समझने में किसी की मदद करेंगे. धनंजय कुमार एक सधे हुए काव्यकार हैं ‘कश्मीर’ को एक बेवा की नजर से देखते हैं. उनकी कविता के खटाक से एक बेवा के अन्तर्मन के भाव उजागर होते हैं. प्रीतिसेन गुप्ता की कविता का कैनवास, सोच का दायरा काफी विस्तृति लिये हुए है. डॉ. प्रतिभा सक्सेना के लिये शब्द मंत्र-विद्ध हैं. उनका भाषा का मर्म सहेज्य है. पुष्पा मल्होत्रा की कविताएं ऐतिहासिक संबुद्धता की मिसाल हैं. डॉ. विन्देश्वरी अग्रवाल ‘बिन्दु’ ने ‘कश्मीर’ के समाधान की ललक से पूरिता कवयित्री हैं. राकेश अग्रवाल और रानी नगिन्दर के गीत और समकालीन कविताएं प्रभावशाली हैं. डॉ. रेखा रस्तोगी का ‘जागरण गीत’ अच्छा है. हां, गजलों में व्याकरण संबंधी कई खामियां हैं.

हां, कश्मीर की महिला सूफी संत पर डॉ. रेखा रस्तोगी की कविताएं काफी असरकारी हैं. रेणु राजवंशी गुप्ता की कविताएं, ललित अहलूवालिया की कविताएं कश्मीर की आत्मा को रेखांकित-रूपांकित करती हैं. वेद प्रकाश बटुक ‘कारगिल के बाद’ एक क्रम से तीनों कविताएं ‘श्रेष्ठ’ हैं. वेद प्रकाश सिंह ‘अरुण’, सरोजिनी शर्मा, डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शनी, डॉ. सुभाष ‘काक’, सुरेन्द्र तिवारी, डॉ. सुरेश राय, सुषम बेदी, सुषमा मल्होत्रा की कविताएं अपने-अपने अंदाज की दरदार प्रस्तुतियां हैं.

भारत से अमेरिका और अमेरिका से अब भारत में आकर डॉ. संधीर वही मध्यम अवदान से साहित्य को आपूरित कर रही हैं जिसकी इब्तिदा उन्होंने 30-35 वर्ष पूर्व यहां की थी. विश्वास है ऐसे ‘लीजेण्ड’ पहचान-एक और भी शीर्षस्थ साहित्यिक कार्य डॉ. अंजना संधीर द्वारा सृजनाकृति पायेंगे. उनकी साहित्यिक अस्मिता, उनकी वतनपरस्ती, उनकी दरवेशी दृष्टि, उनके अदबी मर्तबा को तहेदिल से साधुवाद. इस पंक्तिकार की गजलिया शाइरी का यह शेर डॉ. संधीर की अदबी शख्सियत नाम संभवतः मुनासिब होगाः-

‘जहां में आती हैं’ मुश्किल से हस्तियां ऐसी-

कि जिनकी फिक्रो-नजरियात से सदी महके.’

कविता कृति : ‘यह कश्मीर है’

संपादिका : डॉ. अंजना संधीर

प्रकाशक : ज्ञानगीता प्रकाशन ‘एफ-7’, गली नं. 1, पंचशील गार्डेन एक्स., नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

मूल्य : 495

समीक्षक सम्पर्क : ‘काव्यमुखी साहित्य अकादमी’

हफीज कॉलोनी, आदर्श नगर, गोहना-मोहम्मदाबाद, जिला-मऊ (उ.प्र.)

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