प्रसंग // कर्त्तव्यपरायणता // राजेश माहेश्वरी // प्राची - फरवरी 2018

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क बार बचपन में मुझे अपने पितामह स्व. गोविंददास जी के साथ जो कि तत्कालीन लोकसभा के सदस्य थे, सड़क मार्ग द्वारा भोपाल जाने का अवसर प्राप्त हुआ. रास्ते में एक स्थान पर रेलवे फाटक बंद होने के कारण हमें वहां रुकना पड़ा. लगभग आधा घंटा व्यतीत हो गया और गाड़ी नहीं आने से फाटक नहीं खुला तो वे गाड़ी से उतरकर फाटक पर तैनात कर्मचारी के पास गये और उससे पूछा कि इतनी देर पहले से फाटक क्यों बंद कर दिया गया है. इससे लोगों को तकलीफ होने के साथ-साथ समय भी बेवजह नष्ट हो रहा है. जब रेलगाड़ी आने में विलंब है तो इसे जनसुविधा के लिए खोल क्यों नहीं देते.

वह कर्मचारी उन्हें जानता था. उसने हाथ जोड़कर बहुत ही विनम्र वाणी में कहा कि सेठ जी आप तो स्वयं ही लोकसभा के सदस्य हैं और आप लोगों के माध्यम से ही यह नियम बनाया गया है कि रेलगाड़ी आने के आधे घंटे पहले से फाटक बंद कर दिया जाए. रेलवे के नियमों के अनुसार जब तक गाड़ी निकल नहीं जाती, मैं फाटक खोलने में असमर्थ हूं. मैं एक शासकीय कर्मचारी हूं और नियमों का पालन करना मेरा कर्तव्य है. मैं आपसे क्षमा चाहता हूं कि आपका समय व्यर्थ नष्ट हो रहा है परंतु मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ हूं. यह सुनकर पितामह को मन ही मन रेलवे के ऐसे नियमों के प्रति काफी खीज हो रही थी और साथ ही उस रेलवे कर्मचारी की कर्तव्यपरायणता देखकर चेहरे पर मुस्कुराहट भी आ रही थी।

कुछ समय पश्चात् उन्होंने इस संबंध में रेल मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से संपर्क किया और इस समस्या का निवारण करवाकर फाटक बंद होने के समय को कम करवा दिया. इसके साथ ही साथ उस कर्त्तव्यपरायण कर्मचारी को भी सम्मानित किया गया.

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