रामानुज श्रीवास्तव की 25 ग़ज़लें

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20180227_070157

(01)
खोर खोर में ढूंढो जाओ पूछो मिट्टी कंकर से।
फटे पैरहन के बाजू से पूछो अस्थिपंजर से।

मन में दृढ़ विश्वास सहेजे चलो अँधेरी नगरी तक,
सभी बात का करो खुलासा बम बम भोले शंकर से।

अज़ब गज़ब मायावी चेहरे बैठे ठाले दिखते हैं,
कोई पकड़े चिमटा भाला कोई सज्जित ख़ंजर से।

सब नदियों को खाने वाला बेशक होगा गहरा,
आदि अंत का पता कहेगा पूछो दुष्ट समंदर से।

आँखों देखा नहीँ, सुना है, लेकिन सच ही होगा,
के बाहर जो उज्जर लागे काला होता अंदर से।

मुर्दों की तस्वीर बनाकर टीले ऊपर टांक गये,
ऊपर से इक और तमाशा नाचे कूदे बन्दर से।

मुँह में भारी रोष लिये है हाथ पांव सूखे सूखे,
जंग जुवां के बल करता है योद्धा और धुरंधर से।
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(02)
जब भी भीतर शोर हुआ है।
बिना जगाये भोर हुआ है।

क्या कर लेगा टोपी वाला,
जब पाजामा चोर हुआ है।

छाना  जितना  दूध मलाई,
उतना मन कमज़ोर हुआ है।

कानी कुतिया नहीँ भूँकती,
जब से मुँह चौकोर हुआ है।

जितना भीतर भरा अँधेरा,
बाहर दिखा अज़ोर हुआ है।

नापा जब भी आसमान को,
फीता कतरन कोर हुआ है।

बाहर से  जो लागे कोमल,
भीतर वही कठोर हुआ है।

अनुज दुक्ख छाती में पसरा,
सुख चादर का छोर हुआ है।
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(३)

और कितनी बार कागज को मरोड़ा जायेगा।
चीखते शब्दों से कितना सत निचोड़ा जायेगा।

शहर वाले डर गये हैं, ख़बर पढ़ अखबार की,
गांव की मधुमक्खियों को शहर छोड़ा जायेगा।

घास बेशक है हरी पर ये अभी तक तय नहीं,
नास्ते  में  सुबह  पहले  कौन  घोड़ा जायेगा।

आदमी दौड़े कहाँ तक और फिर गिनती गिने,
एक  ऐसा  कायदा  घुटने  से जोड़ा जायेगा।

कागज़ी  फूलों  तुम्हारे  दिन सुहाने लद गये
सुन  रहे  हैं  सूंघकर  के फूल तोड़ा जायेगा।

आँख चाहे जिस तरह हो, काम में ली जायेगी,
अब नयी तकनीक से आँसू निचोड़ा जायेगा।

आदमी  सब  अधमरे  है  और  ऊपर  से डरे,
अनुज लगता है इन्हें जिंदा न छोड़ा जायेगा।
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(4)
बात का कद बढ़ न जाये इसलिये सोते नहीँ।
और कोई मर न जाये इसलिये रोते नहीं।

चाँद का चेहरा लगाकर रात मत निकला करो,
आजकल अच्छी नज़र के आदमी होते नहीं।

वे सभी  पक्षी  वही है सिर्फ पिंजड़े है नये,
फर्क बस इतना दिखा है, पालते तोते नहीं।

खाद पानी न लगे औ फ़सल भी अच्छी पके,
खेत ऐसे हल चलाकर आज तक जोते नहीं।

फायदे दैरोहरम से अब भी मिलता है जिन्हें,
आदमी अक्सर वही सीधे  खड़े  होते नहीँ।

धूप  से भयभीत  होकर पैर सर में मत रखो,
सफ़र में निकले मुसाफिर हौसले खोते नही।

फूल सारे गुलशनों के क्यूँ न अंधे हों "अनुज"
वे सुबह की शीत से आँखें कभी धोते नहीँ।
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(5)
कुछ करम ऐसे बने कि जिंदगी हैरान हो।
तन भले कंकाल सा हो मन बहुत बलवान हो।

आज तक तरसे रहे जो प्यार के सानिध्य को,
चाहते है उन दिलों में प्यार का तूफ़ान हो।

नौ दिनों के ब्रत नियम से तन भले ही पाक हो,
किंतु अन्तस पाक होगा जब ह्दय स्नान हो।

जिन घरों में वक्त से चूल्हे नहीं सुलगे कभी,
उन घरों में कौन चाहेगा कि कन्यादान हो।

आँख में पट्टी लगाकर तय सफर कैसे करें,
और ऊपर से हुकम है हाथ में सामान हो।

मुफ़लिसी की आंच में जब पेट भी जलने लगे,
तब यही उठता है मन में जंग का ऐलान हो।

आँख जब जैसे भी रोई दिल भी रोया है "अनुज"
जाँचना हो जिस किसी को साथ अंतर्ध्यान हो।
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(6)

दर्द चाहे कम भले हो अश्क बहना चाहिए।
दूर से ही चोट का मुँह लाल दिखना चाहिए।

होश में हम भी नहीँ हैं होश में तुम भी नहीं,
इसलिए दोनों तरफ से हाथ उठना चाहिए।

इन तमाशेबाज़ लोगों की बुरी आदत यही,
खेल चाहे जिस तरह हो खेल चलना चाहिए।

देखकर परछाइयों को जो बहुत घबरा गया,
उस अकेले आदमी को साथ रखना चाहिए।

वो मुझे बीमार कर के खुश भले हो ले अभी,
किंतु उसका भी जनाज़ा साथ उठना चाहिए।

कौन  देगा  जिंदगी  को कौन देगा मौत को,
फर्क इतना आँख वालों को समझना चाहिए।

नींद से उठकर अकेले चाँद तक जाओ "अनुज"
चाँदनी से इस तरह ही रात मिलना चाहिए।
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  (07)
उल्टा सीधा पांव बढ़ाकर उन तक आना जाना क्या।
साँस खींचकर भैंस के आगे सुर में बीन बजाना क्या।

मुँह में  जिनके नाक नहीं  है वे क्या जाने खुशबू को,
उनके घर के  कोने  कोने  चन्दन पेड़ लगाना क्या।

पूछ रहे हैं पीने वाले मुझसे क्या क्या मत पूछो,
उन्हें घूंट भर दूध पिलाकर सच्चाई बतलाना क्या।

सब पोशाक पुरानी छोड़ो कल तक की ओढ़ी पहनी,
वस्त्रहीन हो घूमो भागो अब जग से शर्माना क्या।

भरी दोपहर उल्टे मुंह से सांस खींचना जब बेहतर,
एक रात कि चकाचौंध से दिल अपना बहलाना क्या।

कोण बदलकर फूट गई जब आँखें गहरी नीली,
तब काजल का आँख छोड़कर गालों में रुक जाना क्या।

इधर  उधर सब घूमो भागो लेकर बोरिया बिस्तर,
यहाँ अनुज पूछोगे किससे साहब जी पहचाना क्या।
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  (08)

कौन आँखें सुखा के लाल करे।
कौन पानी से जुदा खाल करे।
 
क्या हकीमों से जा दवा मांगें,
रोग सीने को जब हलाल करे।

कोई नुस्खा अचूक हो लिखना,
जिंदगी दिल की देखभाल करे।

जो भी कहना बहुत सही कहना,
कोई दिल से भले मलाल करे।

किस तरह बात में असर लायें,
बिना नजरों का इस्तेमाल करे।

तुम नुमाइश अज़ीब करते हो,
कौन  कैसे भला  कमाल करे।

चोट करते हो हर तरफ गिनकर
आदमी किस तरफ कपाल करे।
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(09)
मत निहारो चाँद को हद से बड़ा होगा नहीँ।
आसमाँ का पैर धरती से जुड़ा होगा नहीँ।

रातरानी, तू भी सो जा रात भी सोयी पड़ी,
अब तुम्हारी महक से मुर्दा खड़ा होगा नहीं।

खूब देखो पक्षियों को, खूब कर लो दोस्ती,
किंतु इतना याद रक्खो के उड़ा होगा नहीँ।

जान सांसत में रिसालों की पड़ेगी एक दिन,
एक पन्ना जब किसी से यूँ पढ़ा होगा नहीं।

वे भले कुछ भी कहे पर सच मुझे मालूम है,
चोंच में सुरखाव के सोना मढ़ा होगा नहीँ।

हाथ कैसे समझ पायें पैर की तकलीफ को,
हाथ कोई आज तक पर्वत चढ़ा होगा नहीं।

पीठ में ख़ंजर चलाकर वो करे घायल हमें,
सामने आकर किसी से तो लड़ा होगा नहीं।

देखकर दो चार आँसू साथ मत रोना "अनुज"
ताकि कोई ये न समझे दिल कड़ा होगा नहीं।
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  (10)
उड़ गया छत से परिन्दा जिंदगी का मोलकर।
अब नहीँ दिल बेचना है आदमी को तोलकर।

शाम से जब शख्स कोई होश में होगा नहीं,
दूर से मिलना पड़ेगा बात आधी गोल कर।

सोचते है एक दिन हम भी तुम्हारे सँग उड़े,
चोंच में चुग्गा दबाकर पंख पूरे खोलकर।

आँख की गुस्ताखियों से दिल बुरा माने भले,
गम बहाना भी गलत है,आंसुओ में घोलकर।

वायदों के रूप में हर बार जब धोखे मिले,
भूख को कैसे छिपाएं पेट से क्या बोलकर।

हम जिसे चाहे नहीं थे वे ही ठहरे रात को,
जख्म भी अच्छे बनाये पैर टेढे छोलकर।

वो हमें अच्छा कहे या न कहे मर्जी "अनुज"
जिंदगी हम काट देंगे स्वयं से हँस बोलकर।
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: (11)

यार ऐसा क्या किया है, के हंगामा.हो गया।
इस अमावस की निशा में कारनामा हो गया।

किस तरह का दीप जलता आज देहरी में रखा,
दिल तिमिर का बैठ करके अर्द्ध कामा हो गया।

हम जिसे माथा समझकर अदब से जाना किये,
बिन बतायें आज वो भी खानसामा हो गया।

कल तलक के वस्त्र पहने आज प्यारे छोड़ दो,
अब सभी के पास में तो पायजामा हो गया।

रौशनी इस बार की सच्ची नहीं लगती मग़र,
झूठ भी कैसे कहें जब हलफनामा हो गया।

किस कदर अंग्रेजियत का भूत सर में है चढा,
कृष्ण कृष्णा हो गया है राम रामा हो गया।

क्या करोगे बोलकर के, रात आधी जब बची,
आज के निस्बत भी वैसे खूब ड्रामा हो गया।

हाथ ख़ाली चल पड़े हैं यार से मिलने 'अनुज"
कृष्ण चाहे न मिले, पर मन सुदामा हो गया।
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: (12)
जब भला आता नहीँ है तो बुरा ही काम कर।
रात के आने के पहले रात को बदनाम कर।

हुस्न की चादर बिछाकर सो गये फ़नकार जब,
बेसुरा क्यों बज रहा है जा कहीँ आराम कर।

सब यहाँ से जा चुके है मुट्ठियों में रेत भर,
तू खड़ा क्या देखता है खंग ले संग्राम कर।

धूप का विस्तार थोड़ा और होगा फिर नही,
वक्त से ही शाम आयेगी नयन को श्याम कर।

सब हदें हम तोड़ देगें, रात में निकलो सही,
जिंदगी से अलबिदा हो जां तुम्हारे नाम कर।

पत्तियां सब झड़ गई है, ठूँठ अब केवल बचा,
जा दुकानों में सज़ा दे हड्डियों के दाम कर।

अक्ल इतनी तेज पाकर क्या किया तुमने अनुज,
पूछते है अक्ल वाले, अक्ल को नीलाम कर।
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(13)

थोड़ी बहुत उदासी अच्छी।
आँखें प्यासी प्यासी अच्छी।

दावत उनकी तुम्हें मुबारक,
अपनी रोटी बासी अच्छी।

सूरज  बड़े  घरों  में  ठहरे,
अपनी  पूरनमासी  अच्छी।

कोयल सुन्दर क्यूँ न गाये,
अपनी  बारहमासी अच्छी।

गला फाड़कर गाने वालों,
तुमसे  मेरी  खांसी अच्छी।

वक्त मुक़र्रर नहीँ अंत का,
वैसे उम्र पचासी अच्छी।

भूल गये है रस्मो उल्फ़त,
मत दीजै शाबासी अच्छी।
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(14)

फूल जो कल तक हँसे थे आज देखे रो रहे।
बाग़ के रखवार सारे हाथ मैले धो गये।

फूल उगना जिस जगह था उस जगह काटे उगे,
बीज़ कैसा आजकल ये गुलशनों में बो गये।

जंग के मैदान का हम हाल देखा क्या कहें,
तीर औ तलवार वाले बेंच घोड़े सो गये।

बुज़दिलों के साथ रह के सूरमा कैसे बने,
जो रहे उस्ताद मेरे दांव में ही खो गये।

झूठ ने दे दी गवाही और सच ने मान ली,
अब करें फ़रियाद किससे फैसले भी हो गये।

इस तरह का खेल देखा न सुना होगा कभी,
चोर सारे हँस रहे थे साहू सारे रो गये।

साँस वालों को अहमियत कौन अब देगा 'अनुज"
आजकल बिन साँस वाले आदमी भी हो गये।
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(15)

जो कभी होता नहीं था आजकल होता है क्यों।
रात जिसको भूंकना था रात में रोता है क्यों।

जब तुम्हें मालूम है कि अब बचा वह दम नहीं,
पीठ के बल बोझ इतना यार तू ढोता है क्यों।

कल तलक खामोश थे पर आज उत्तर चाहिये,
बीज जब बोना नहीं था खेत को जोता है क्यों।

पूछने के वक्त में सब ओंठ सीकर रह गये,
आज फिर क्यूँ पूछते है ये धुंआ होता है क्यों।

देख जाओ ठाट उसके हो अगर फुर्सत तुम्हें,
पूछना फिर बिन अघाये हाथ वो धोता है क्यों।

प्यार की बातें भली हैं जब तलक हैं दिन भले,
शाम बीते कौन पूछे दिल जला रोता है क्यों।

क्या कभी सोचा किसी ने या कभी पूछा "अनुज"
जिस शहर में मौत जागे आदमी सोता है क्यों।
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  (16)

चल निकाले साथ में गम दिल्लगी हो जाए न।
साँस को भीतर न रोको ख़ुदकुशी हो जाए न।

हम किसी के काम लायक आदमी जब हैं नहीं,
छोड़ दो दामन हमारा फिर हँसी हो जाए न।

प्यार जब खुद से नहीं तो खौफ़ क्या है मौत से,
खौफ केवल रूह से है, आदमी हो जाए न।

चाँद तारों को लिए हम धूप से कब तक बचे,
है सफर मुश्किल भरा ये आखिरी हो जाए न।

बात कहने की सनक में और कि न सुन सके,
डर यही लगता कही सब अनकही हो जाए न।

जिस्म पूरा ढांक कर के रात में निकला करो,
यूँ विखरकर रूप उजला चाँदनी हो जाए न।

रोज़ ही मिलते रहो कुछ वक्त ले खुद से "अनुज"
ताकि घर का आइना ये अज़नवी हो जाए न।
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  (17)
वह बुरा लगता नहीँ है पर बुरा कहते है लोग।
आदमी सी शक्ल है पर देखकर डरते है लोग।

हो सके दो फूल महके इस गली में छोड़ दो,
इस गली के पास आने को मना करते है लोग।

बात कहने के समय तक बोलना सीखे न थे,
आज जो कहते बना है तो नहीं सुनते है लोग।

जान अपनी कौन देगा सर कटाकर बात पर,
शक्ल अच्छी देख के जब आजकल मरते है लोग।

नब्ज़ छूकर हाथ से जब हाल मालुम कर लिये,
शह्र में बीमार लेकर व्यर्थ ही फिरते हैं लोग।

इल्म से तकरार का अब खात्मा मुमकिन नहीँ,
क्योंकि अपने आइने से रात भर लड़ते है लोग।

मशवरे भी काम लायक अब नहीं देता कोई,
सब पुरानी बात के ही तर्जुमा करते है लोग।

जिंदगी में धूप यदि है छांव भी होगी 'अनुज"
बेसबब  ही घर उठाये रास्ता चलते है लोग।
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: (18)

साँस बस चलती रहेगी जिंदगी होगी नहीं।
खूब आयेगी हँसी पर वो हँसी होगी नहीं।

चाँद सूरज भी चलेंगे सफर करने साथ में,
किंतु पहले सी सुहानी यामिनी होगी नहीं।

लील जायेगा समन्दर एक दिन बरसात को,
इससे बढ़कर और कोई त्रासदी होगी नहीं।

हो भले जाये सबेरा किन्तु यह बारात थी,
भोर से पहले किसी के घर लगी होगी नहीं।

तुम हमें अच्छा कहो या न कहो ये और है,
पर हमारे बीच दिल से दोस्ती होगी नहीं।

झूठ जो कहने की आदत पड़ गई सो पड़ गई,
अब क़सम खाने खिलाने से कमी होगी नहीं।

एक दिन नीलाम होना है "अनुज" बाजार में
पर हमारी कीमतें हद से बड़ी होगी नहीं।
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: (19)
तानपुरा आजकल नाशाद सा रहता है क्यूँ।
सात सुर का साज़ होकर आह तू भरता है क्यूँ।

कुछ खराबी हो गले में तो तसल्ली से बता,
नासमझ तू रागदारी से खफा रहता है क्यूँ।

सब बड़ी उम्मीद लेकर साज़ का दर्जा दिये,
और तू कहता फ़िरे है आदमी जलता है क्यूँ।

तू कभी सोता नहीं था आज फिर क्यूँ सो रहा,
उठ सजग हुंकार भर ले राग से डरता है क्यूँ।

आशकी तेरी रही है दम उठाती मुरर्कियो से,
मौशिकी से यूँ खफ़ा ऐ हमनवा रहता है क्यूँ।

एक दिन ऐसा न हो के हम रहें न तुम रहो,
और दुनिया भी रहे न ये नहीं लगता है क्यूँ।

तार टूटे जोड़ करके हम "अनुज" कितना बजें,
साथ में आओ बजेंगे बेसुरा बजता है क्यूँ।
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(20)
ख्वाब् सभी दीवाने निकले।
कुछ अंधे कुछ काने निकले।

जिनको गाना गीत ग़जल था,
वही लोग चिल्लाने निकले।

झाड़ू   पोंछा   जूता  चप्पल,
घर की नींव हिलाने निकले।

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं,
मूंगफली  में  दाने  निकले।

राग  भैरवी  के  कोठे  से,
फूहड़ फ़िल्मी गाने निकले।

इनके उनके झगड़े लेकर,
अपनी जान गंवाने निकले।

उन्हें "अनुज" क्या लेना देना,
लेकिन रस्म निभाने निकले।
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  (21)
सूरज नहीँ जगा है दुनिया तो उठ पड़ी है।
पूरब मे जा के देखो ये कैसी गड़बड़ी है।

बच्चों ने रोटियों को देखा नहीं है कल से,
देहरी में भूखी कुतिया लालच लिए खड़ी है।

तोते से पूछती है नज़दीक आ के मैना,
सोने से चोंच तेरी किसने औ कब मढ़ी है।

बेहोश हो गये हैं फूलों को सूंघ कर सब,
माली समझ रहा है मदिरा इन्हें चढ़ी है।

क्या वक्त कह रहा है पूछे बिना बता दे,
हर कोई रखना चाहे ऐसी अगर घड़ी है।

जलवा दिखाये ऐसा पत्थर को मोम कर दे,
जादू की ऐसी कोई होती नहीं छड़ी है।

बातें बना के हँसना सीखे नहीं "अनुज" हम,
वैसे भी पूरी दुनिया लाठी लिये खड़ी है।
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(22)
आ छिपे हैं उस जगह में जिस जगह कोना नहीं है।
भूख कितनी भी बढ़े पर चाटना दोना नहीं है।

वक्त कैसा भी पड़े पर आज हम भी तय किये,
जान दे मर जायेंगे पर आदमी खोना नहीं है।

दूध का सैलाब चाहे हर गली में घर करे,
दूध पीकर जानते हैं अब बड़ा होना नहीं है।

ख्वाब झूठे आ गये सब सच भी आयेगें अभी,
जब तलक आते नहीं है आँख भी धोना नहीं है।

चाँद सूरज कुछ कहे या आसमाँ माने बुरा,
हम भी ऐसी जिद किये हैं रात से रोना नहीं है।

बीज जो पेड़ो से पाये वे ही असली बीज हैं,
बीज़ नकली कोठरी के खेत में बोना नहीँ है।

हम "अनुज" वो शेर है जो आज तक खामोश थे,
आज सब बातें कहेंगे अब कोई सोना नहीं है।
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  (२३)
वो साज नहीं सरगम होगा।
जो तन्हा छोड़ा दम होगा।

तुम जिसे अमावस समझ रहे,
वो आसमान का गम होगा।

वे स्वेद नहीं आंसू कण है,
या कोई और वहम होगा।

मत रातें काटो गिन गिन के,
अब प्राची में परचम होगा।

नज़दीक रहो जितना दिल के,
उतना ही छोटा तम होगा।

मत छीनो उसकी लिखी ग़जल,
मर जायेगा वह गम होगा।

रात "अनुज" भी रोयी होगी,
देखो  बिस्तर नम होगा।
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: (24)

ख़ुदकुशी हमने किया था साथ में क्यूँ मर रहे।
एक तारा टूटते ही आसमाँ तुम डर रहे।

क्यूँ हंगामा कर रहे हो जंग के मैदान में,
तुम हमें जैसा कहे थे हम वही तो कर रहे।

अब पुरानी चाहतों का जिक्र मत करना कभी,
घाव जो तुमने दिए थे अब सभी जब भर रहे।

पेट को कितना दबाकर कूदते मैदान में,
घास जितनी नज़र आई घास उतनी चर रहे।

स्वांग भरने के लिए हम वो बने जो थे नहीं,
जो घड़े भरते नहीं थे हम उन्हें ही भर रहे।

तुम बुरा कहते रहे पर हम नहीं माने बुरा,
बिन बुलाये ही हमेशा हम तुम्हारे घर रहे।

दिल्लगी दिल से करो तो साथ में हँस दे "अनुज"
न हँसी होगी हमारी, न तुम्हारी कर रहे।
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  (25)
उन पैरों से हाल न पूछा जो मिट्टी से सने मिले।
उल्टा ये इलज़ाम लगाया घर में भूने चने मिले।

दौड़ धूप किस्मत में जिनके वे कैसे रुक सकते थे,
भले कहें दीवाने उनके दिन भी उनसे गिने मिले।

वही रात में मरे मिले थे जिन्हें मारना था दिन में,
गली गली में कानाफूसी दिल में पत्थर हने मिले

सबका दिल बहलाने लायक बाते कहनी थी लेकिन,
बात सुनाये किसको कैसे सब पत्थर से जने मिले।

आना जाना रहा जहाँ पर मिले आज अनजाने से,
झुककर हाथ मिलाने वाले आज मिले तो तने मिले।

जिन्हें उठाया कूड़े से था वे सोने के हुये "अनुज"
जिन्हें बनाया मिट्टी से था वे चांदी के बने मिले।
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(रामानुज श्रीवास्तव अनुज)

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