संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 51 // संस्मरणात्मक कहानी - क्षमा // निधि जैन

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प्रविष्टि क्र. 51

क्षमा

-निधि जैन

शाम से ही तेज हवा के साथ बारिश हो रही थी। बार-बार जोर से बिजली कड़कती और मैं अन्दर तक डर जाती। बिजली कड़कने पर मैं बचपन से ही डरती थी, आज भी डरती हूँ। धीरे-धीरे चारों ओर घना अंधेरा छा गया। तेज हवा और बारिश के कारण बिजली भी नहीं आ रही थी। सड़कों पर घुप अंधेरा था।

बार-बार हवा हमारे गेट को खटखटा कर चली जाती और मैं झट से अपनी कुर्सी से उठ कर देर तक सड़क पर देखती रहती। जबकि देखने को कुछ भी न था, सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा।

वक्त बीतता जा रहा था। मैं और माँ दोनों ही एक दूसरे से अपनी बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रहे थे, पर मैं जानती थी कि माँ का मन भी मेरी तरह अशांत था। हमारे मन आशंकाओं से भरे थे कि ऐसे मौसम में वह आयेंगे भी या नहीं? वर्षों बाद आज मैं अपने पिता से मिलने वाली थी, पर पता नहीं मिल भी पाऊँगी या नहीं?

जब मैं दो साल की थी तब वह मुझे और मेरी माँ को मुम्बई जैसे बड़े शहर में अकेले इस वादे के साथ छोड़ कर चले गये कि वह हमें एक साल बाद अपने पास बुला लेगें। मैं २ साल की बच्ची से २२ साल की युवती हो गयी पर उन्होंने आज तक अपना वादा पूरा नहीं किया।

कल रात पिताजी के एक घनिष्ठ मित्र, गुप्ता अंकल ने आकर हमें सूचना दी कि पिताजी मुम्बई आए हुए हैं और कल शाम हम लोगों से मिलने आयेंगे। पिताजी की एक शर्त थी कि मैं और मेरी माँ उनसे न कोई प्रश्न पूछेंगे, न शिकायत करेंगे और न ही भावुक होंगे। हमने उनकी शर्तें मान ली। मेरे मन में उनके लिए कोई भावनायें नहीं थीं, न अच्छी, न बुरी। मैं सिर्फ एक बार देखना चाहती थी कि एक पिता, एक पति इतना कठोर कैसे हो सकता है।

माँ मुझे दिखा नहीं रही थी पर मैं जानती थी कि वह बहुत उत्साहित थी। दिन भर पिताजी के पसंद का खाना बनाती रही। मैंने कटाक्ष करते हुए कहा “क्यों अपने को परेशान कर रही हो? उनकी पसंद अब बदल गयी है।” उसने दुखी हो कर मेरी ओर देखा और फिर अपने काम में लग गयी। शाम होते ही पिताजी की पसंद की साड़ी पहन, माथे पर बड़ी सी बिंदी लगा और माँग में गहरा लाल सिन्दूर भर वह तैयार हो कर बैठ गयी।

हर बीतते पल के साथ मेरी घबराहट बढ़ रही थी कि यदि वह न आए तो मैं तो अपने को संभाल लूँगी, पर इनका क्या होगा। माँ का ध्यान बांटने के लिए मैंने उनसे पूछा “माँ, पापा हमें छोड़ कर क्यों चले गये थे? आप ने उनसे कभी नहीं पूछा कि उन्होंने आप को क्यों छोड़ दिया?” माँ पहले थोड़ी देर खामोश रही फिर अपनी आँखों में आए आँसू पोंछते हुए बोली “हमारी शादी कम उम्र में ही हो गयी थी। तुम्हारे पिताजी उस समय बीस साल के और मैं अठारह की थी। वह बहुत ही बुद्धिमान व देखने में आकर्षक थे और मैं देखने में साधारण व बारहवीं फेल। शादी होते ही उनका दाख़िला एम.एस.सी, गणित में हो गया। पूरी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान पा कर वह वहीं पढ़ाने लगे।

शादी के दो साल के अन्दर ही तुम्हारा जन्म हो गया। धीरे-धीरे खर्चे ज्यादा और आमदनी कम लगने लगी। पैसों को ले कर हमारे बीच झगड़े होने लगे। इसी बीच उनके लिए अमेरिका से पी.एच.डी. में दाखिले का पत्र आ गया। मैंने उन्हें बहुत रोका पर वह न माने। उनका मानना था कि वहाँ जा कर पैसों की तंगी खत्म हो जायेगी। वह हम दोनों से ही बहुत प्यार करते थे। उनका कहना था कि वह भी हमारे बिना ज्यादा दिन नहीं रह पायेंगे। हमें भी जल्द वहाँ बुलाने का वादा करके वह चले गये। समय बीतता गया और वह हमेशा यही कहते रहे कि अभी थोड़ा और वक्त लगेगा। पांच साल बाद एक दिन उन्होंने तलाक के कागज़ भेज दिए। उन्होंने मेरा जुर्म बताया नहीं और मैंने पूछा नहीं। जब रिश्ते कागज़ पर ही खत्म हो जायें तो सवाल-जवाब का कोई महत्व ही नहीं रह जाता।”

तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई और मैंने भाग कर दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खोलते ही बिजली भी आ गयी। दरवाज़े पर गुप्ता अंकल खड़े थे। मेरी सांस जैसे थम गयी, लगा पापा नहीं आए। तभी एक सज्जन व्हीलचेयर चलाते हुए दरवाज़े की ओर बढ़े। वह मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए बोले “डा. जय शर्मा।” मैंने आत्मविश्वास से भरा हाथ उनकी ओर बढ़ा कर उनका स्वागत किया। मेरी आँखों में आँसू आ गये पर मैं उनको पी गयी। अब तक माँ भी वहाँ आ गयी थी। माँ को देख वह फीकी सी मुस्कान से मुस्कुरा दिए। माँ अपनी भावनाओं पर काबू न रख सकी और उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

हम सब ड्राइंग-रूम में जा कर बैठ गये। माँ ने धीरे से पूछा “चाय लेंगे या खाना लगा दूँ।” पापा ने कुछ भी लेने से मना कर दिया। माँ उदास हो गयी पर कुछ बोली नहीं। मैंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा “माँ ने सुबह से लग कर आप की पसंद का खाना बनाया हैं ........” मैं बात पूरी भी नहीं कर पायी थी कि उन्होंने हाथ के इशारे से चुप करा दिया। अंकल ने माँ से कहा “आप खाना लगा दीजिये, हम खा कर जायेंगे।”

जाते समय पापा ने माँ से कहा “खाना अच्छा बना था। तुम्हारे हाथ में आज भी वही स्वाद है।” लगा कुछ और भी कहना चाह रहे थे पर कहा नहीं और चले गये। हम दोनों दरवाज़े पर खड़े देर तक उन्हें जाते देखते रहे।

मैं और माँ रात भर सो न सके, पर दोनों ही खामोश थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्यों आए थे? कितना अजीब सा व्यवहार था उनका। इतने साल बाद अपनी बेटी से मिल कर एक बार भी उसे गले से नहीं लगाया। माँ से एक बार भी नहीं पूछा कि इतने साल कैसे रहीं वह?

सुबह माँ रसोई में चाय बनाने चली गयी और मैं बाहर वाले कमरे में जा कर बैठ गयी। मन बहुत उदास था। माँ चाय ले कर आयी, तभी मेरी नजर उस स्टूल पर पड़ी जिसके पास पापा बैठे थे। उस पर एक लिफा़फा रखा था जिस पर माँ का नाम लिखा था। मैंने लिफाफा माँ को दे दिया।

माँ ने पत्र पढ़ना शुरू किया “मैं जानता हूँ कि चाह कर भी मैं तुम से माफ़ी नहीं माँग पाऊँगा, इसलिए खत लिख रहा हूँ। अमेरिका पहुँच कर मैं वहाँ की चका-चौंध में खो गया। मुझे हमेशा यही लगता रहा कि तुम वहाँ के माहौल में ढल नहीं पाओगी। यही सब सोच कर मैं तुम लोगों का आना टालता रहा। इस बीच मेरी दोस्ती एक अमरीकी लड़की से हो गयी। मुझे लगने लगा कि यह लड़की मेरे और इस माहौल के अनुरूप है। मैंने तुम्हें तलाक़ दे कर उससे शादी कर ली। हमारे कोई बच्चा नहीं हुआ। हमें बच्चे की कमी कभी महसूस नहीं हुई क्योंकि हम दोनों ही एक दूसरे के लिए काफी थे। पांच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी और मैं हमेशा के लिए अपाहिज हो गया। मैंने वहाँ बहुत इलाज करवाया पर कोई फायदा नहीं हुआ। कुछ दिनों पहले ही मेरे एक पुराने मित्र ने बताया कि केरल में मालिश के द्वारा इसका इलाज हो सकता है, इसलिए मैं कल दोपहर की फ्लाइट से केरल जा रहा हूँ। हिंदुस्तान पहुँचते ही मुझे ऐसा लगा जैसे यह मेरे ही कर्मों की सजा है, जो मुझे इस रूप में मिल रही है। मेरे सभी अपने एक-एक कर के मुझसे किसी न किसी वजह से बिछड़ गये। आज मैं बिल्कुल अकेला हूँ। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।”

माँ ने मेरी ओर देखा जैसे की मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहती हो। मैं खामोश रही। “उन्हें हमारे सहारे की जरूरत है।” माँ के मुँह से यह सुन कर मेरा गुस्सा भड़क उठा “हमारे सहारे की? जब हमें उनके सहारे की जरूरत थी तब वह कहाँ थे? बरसों बाद आये, वह भी एक शर्त के साथ, न कुछ कहा न पूछा बस एक खत छोड़ कर चले गये। इससे अच्छा तो डाकिये से भेज देते।” मैं रो पड़ी।

माँ ने प्यार से मुझे गले लगा लिया और समझाते हुए कहा “मैं उनके प्रति तुम्हारी नाराज़गी समझती हूँ, पर तुम उन्हें नहीं जानती, मैं जानती हूँ। वह कल सख़्त इसलिए थे क्योंकि वह अपने को किसी भी तरह से कमजोर नहीं दिखाना चाहते थे, न ही शारीरिक रूप से और न ही भावनात्मक रूप से। मैं जानती हूँ जब तक वह दिल से शर्मिंदा नहीं होंगे तब तक वह कभी माफ़ी नहीं माँगेंगे। वह एक सशक्त व्यक्तित्व वाले इंसान है, उन्हें हमारी जरूरत नहीं है, पर यदि आज मैंने उनका साथ न दिया, तो मुझे जिंदगी भर एक ग्लानि के साथ जीना होगा। यदि तुम बिना किसी दबाव के खुशी से मेरे इस प्रस्ताव का समर्थन करती हो तो मैं उनका साथ दूँगी, अन्यथा नहीं।”

मैं एक टक माँ को देख रही थी। कितनी महान है यह औरत। पापा ने बिना किसी गलती के इसे छोड़ दिया। एक-एक पैसे के लिए मोहताज बना दिया। कितनी कठिनाई भरी जिंदगी जी है इसने, पर आज उस अपाहिज को स्वीकार करने को तैयार है। मैंने पूछा “क्या यह सब कर के आप को खुशी मिलेगी?” उन्होंने पलकें झुका कर हाँ कहा। मैंने फिर पूछा “अगर उन्होंने ठीक होने के बाद एक बार फिर आपको अपनी जिंदगी से निकाल दिया?” वह भावुक हो कर बोलीं “मैं हमेशा के लिए उनका साथ नहीं चाहती, बस केवल जब तक उनका यहाँ इलाज चल रहा है।” मैं माँ से सहमत नहीं थी, पर उनकी खुशी के लिए मैंने हाँ कह दिया।

सुबह-सुबह जब मैं माँ को छोड़ने एयरपोर्ट पहुँची तो पापा अपनी व्हीलचेयर को ढलान पर चढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। माँ ने झट से जा कर उनकी व्हीलचेयर को सहारा दिया। पापा ने मुस्कुरा कर उनकी ओर देखा और माँ नई-नवेली दुल्हन की तरह शर्मा गयी। पापा की आँखों में खुशी के आँसू थे और माँ की आँखों में एक चमक। दोनों ने हाथ हिला कर मुझे बाय कहा और अंदर चले गये। मैं एक संतोष के साथ वापस घर की ओर चल दी।

माँ को गये तीन महीने बीत गये थे। रोज रात माँ का फोन आता। मेरा हाल-चाल पूछने के साथ ही वह मेरे पूछे बिना ही पापा का हाल विस्तार से बतातीं। उनकी आवाज़ में हमेशा खुशी की खनक होती। उनको खुश देख कर मैं भी खुश थी पर डरती थी कि कल क्या होगा जब पापा वापस अपनी दुनिया में चले जायेंगे, क्या एक बार फिर वह टूट कर बिखर जायेंगी?

रात माँ ने फोन पर बताया कि पापा अब पूरी तरह ठीक हैं और दो दिन बाद वह लोग वापस आ रहे हैं। मैं खुश थी कि माँ वापस आ रही है, क्योंकि इससे पहले मैं कभी माँ के बिना इतने दिन नहीं रही थी।

माँ-पापा लौट आए और उसी रात पापा अमेरिका चले गये। मेरा मन उनके लिए कड़वाहट से भर गया, लगा कितना स्वार्थी है यह व्यक्ति। माँ ने मुझे बताया कि पापा हम दोनों को अपने साथ अमेरिका ले जाना चाहते थे, पर उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने पापा से कहा “आपका साथ मैंने किसी स्वार्थ के लिए नहीं दिया। बीस साल पहले तो मैं वहाँ सामंजस्य बैठा भी लेती, पर आज इस उम्र में तो बिल्कुल नहीं। यदि आप हमारा साथ चाहते हैं तो आप को ही हमारे पास लौटना होगा। अन्यथा हम हमेशा अच्छे दोस्त बन कर रहेंगे।” माँ की बातें सुन कर मुझे उन पर गर्व महसूस हुआ। मैंने पूछा “उन्होंने क्या कहा?” उसने स्वाभिमान से सर उठा कर कहा “वह मेरी बात चुपचाप सुनते रहे। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया पर मैं उनका जवाब समझ गयी।”

लौटने के बाद से माँ हमेशा खुश नजर आने लगी। वह हमेशा पापा के सम्पर्क में रहती। वह अच्छे दोस्त बन गये थे। एक महीने बाद मेरी सिद्धार्थ के साथ शादी थी। सिद्धार्थ मेरे बचपन का दोस्त और मेरा मंगेतर था। माँ ने पूरे उत्साह के साथ शादी की तैयारी शुरू कर दी। सिद्धार्थ के जिद् करने पर माँ ने उससे वादा किया कि वह ज्यादातर हमारे साथ ही रहा करेगी।

शादी की रस्में कल सुबह से शुरू होनी थी। घर पर रिश्तेदार आ चुके थे। हम सब काम समेट कर सोने ही जा रहे थे कि दरवाजे पर घन्टी बजी। मैंने दरवाजा खोला तो गुप्ता अंकल खड़े थे। मुझे देख कर वह मुस्कुरा कर बोले “एक ऐसा मेहमान लाया हूँ जो कभी वापस नहीं जायेगा।” तभी उनके पीछे से पापा मुस्कुराते हुए अपने पैरो पर चल कर आए और मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए बोले “डा. जय शर्मा।” मैं उनके गले लग गयी। सालों से दबी मेरी भावनाएं आँसू बन कर निकल पड़ीं। माँ भी हमें देख कर रो पड़ी साथ ही पापा की भी आँखें नम हो गयी। गुप्ता अंकल ने हँसते हुए कहा “अरे भाई खुशी का मौका है, कुछ गीत-संगीत हो जाए।”

माँ-पापा ने एक साथ मेरा कन्यादान किया। विदा के समय पापा रो पड़े। माँ अब अकेली न थी इसलिए निश्चिंत हो कर मैंने प्रसन्नता और संतुष्टि के साथ अपनी नई दुनिया में प्रवेश किया।

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