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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 54 : अपराधबोध // शालिनी मुखरैया

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अपराधबोध

प्रविष्टि क्र. 54

शालिनी मुखरैया


बात वर्ष 2010 की है जब मेरी बिटिया कोटा मेँ मेडिकल की तैयारी के लिये पढ़ रही थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि वह घर से दूर अकेली रह कर अपने जीवन के लक्ष्य हेतु परिवार से दूर थी । नये लोग , नया वातावरण सब कुछ नया था उसके लिये , ऐसे मेँ अच्छे से अच्छा व्यक़्ति भी हिम्मत खो देता है। इस कारण मेरा और मेरे पति का प्रयास रहता था कि महीने मेँ कम से कम एक बार उसके पास कोटा जरूर हो कर आयेँ जिससे उसे अपने घर के लोगोँ की कमी न महसूस हो और उसके प्रयासोँ मेँ कोई कमी न आ पाये। क्योँ कि अलीगढ से कोई सीधी ट्रेन कोटा के लिये नहीँ थी इसलिये मथुरा जा कर ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। महीने के शनिवार को दोपहर 2 बजे अपनी बैंक ड्यूटी पूरी करने के बाद मथुरा के लिये निकल लेते थे , जन शताब्दी एक्सप्रेस मेँ पहिले से सीट रिज़र्व करा लेते थे जिससे कोई परेशानी न हो ।

ऐसे ही एक बार हम लोग अपनी ट्रेन का इंतेज़ार कर रहे थे , तभी अनायास ही मेरी निगाह प्लैटफार्म के एक कोने मेँ पडी एक महिला पर पडी । उसकी स्थिति बहुत ही दयनीय थी ,ह्ज़ारोँ मक्खियाँ उसके शरीर पर भिनभिना रहीँ थीँ । उसके शरीर पर मैल की परत चढी हुई थी । न जाने उसे इस स्थिति मेँ कौन छोड कर गया था । लोगोँ ने सहानुभूति पूर्ववश उसके पास कुछ खाने के लिये बिस्किट , ब्रैड आदि भी रखे हुये थे , मगर उसकी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीँ थी कि वह उन्हेँ उठा कर खा भी सके । एक व्यक्ति ने कुछ पीने को जूस भी दिया ,मगर उसको भी उसने पीने से इंकार कर दिया , मानो इस जीवन का मोह भी उसने त्याग दिया हो । अपने जीवन मेँ पहली बार किसी इंसान को मैंने इतनी करुणामय स्थिति मेँ देखा था , उस महिला की इस दशा ने मेरे अंतर्मन को अन्दर तक हिला कर रख दिया । आस पास मेँ किसी को भी उसके बारे मेँ पता नहीँ था कि वह कौन है , कहाँ से आयी है । कोई न कोई तो उसके परिवार मेँ अवश्य तो होगा ही , किसी न किसी घर की गृहस्वामिनी तो वह अवश्य होगी ही । किसी न किसी को तो उसने जन्म अवश्य दिया ही होगा ,किसी के भविष्य को तो उसने सँवारा ही होगा । वह कौन से ऐसे निर्मोही लोग थे जो उसे इस अवस्था मेँ मरने के लिये छोड गये थे , इन प्रश्नोँ का उत्तर वहाँ कोई देने वाला नहीँ था । आस पास गुजरने वाले व्यक्ति उसकी करुणामयी दशा पर दृष्टि डालते और अपने गतँव्य को आगे बढ लेते , हम भी शायद उन्हीं लोगोँ में से एक थे कि कौन बेकार के झँझट मेँ पडे । तभी ह्मारे ट्रेन के आने की सूचना प्रसारित हुई और हम भी और लोगोँ की तरह आगे बढ़ लिये ।

अगले माह पुन: ह्मारा कोटा जाना हुआ , मेरे मन उस महिला की स्मृति अभी भी थी। जब हम उस प्लैटफार्म पर पहुँचे तो मेरी निगाहेँ उस महिला को ही खोज रहीँ थी पर वह मुझे कहीँ भी दिखायी नहीँ दी । मेरे मन मेँ यह उत्सुकता थी कि मैँ उसके बारे मेँ पता करूँ कि आखिर उसको लेने कोई आया कि नहीँ । किसी ठेले वाले से पता करने पर पता चला कि कुछ दिन पहिले किसी लावारिस लाश को नगर निगम वाले ले कर गये थे, हो न हो वह वही महिला ही रही होगी न जाने क्योँ बार बार यह ख्याल मेरे मन को झकझोरता रहा । अपने इंसान होने पर खुद को शर्मिन्द्गी महसूस हो रही थी कि क्या हम लोग वास्तव मेँ इँसान कहलाने के लायक हैँ । हम मन्दिरोँ में भगवान को तलाशने तो जाते हैँ, लाखोँ का चढावा भी चढाते हैँ मगर उसके बनाये हुये इंसानोँ की मदद करने से कतरा जाते हैँ । उससे भी बढ कर न जाने कैसे उसके परिवार के लोग थे जो उसे ऐसी स्थिति मेँ मरने के लिये छोड़ गये थे। इंसान न जाने कितनी उम्मीदेँ अपनी औलाद से पालता है कि वह बुढापे मेँ उसका सहारा बनेगी , उसे सुख देगी मगर कितना दुख होता है जब अपनी ही औलाद धोखा देती है । क्या ईश्वर ऐसी औलाद से खुश हो सकता है । हो सकता मरते समय भी उस माँ ने अपनी खुदगर्ज सँतान हो बददुआ न दी हो, ऐसा सिर्फ एक माँ ही कर सकती है । समाज ने परिवार ,रिश्ते आदमी की सुरक्षा के लिये बनाये हैँ ,मगर ऐसे रिश्तोँ का क्या औचित्य जो वक्त पर किसी के काम न आ सकेँ । किसी ने सच ही कहा है,

“दुनिया की इस भीड मेँ हर इंसाँ तन्हा और अकेला है

अपना कहने को सँग उसके रिश्तोँ का रेला है”

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पंजाब नैशनल बैंक

मेडिकल रोड ,अलीगढ

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 3799748074083075280

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