संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 56 : कुछ न सिखला सकी // डॉ़. दीपा गुप्ता

image

प्रविष्टि क्र. 56 

कुछ न सिखला सकी

डॉ़. दीपा गुप्ता


टे्रन की सीटी सुनते ही मेरे दिल की धड़कन बेक़ाबू हो गई। इतनी बेचैनी तो मुझे अपने जिगर के टुकड़ों को छोड़कर आते हुए भी नहीं हुई थी। वैसे तो आज मन का झूमना चाहिए। चार महीने की कठिन तपस्या जो पूरी हो रही है। मगर मन ऐसा नहीं सोच रहा। मेरी निगाहें तो खिड़की के बाहर सामने खड़ी कोड़म्मा को निहार रही है। उसकी आँखों में भी वही दर्द। वह अपने को संभालती हुई बताती जा रही है कि मैं किसी से ज्यादा बातें न करूं। बाहर का खाना न खाऊं… ।

धीरे–धीरे टे्रन अपनी रफ्तार पकड़ने लगी। मैं अपना हाथ हिलाती रही। चेहरा उदास और आँखें नम। नज़रें बस कोंड़म्मा पर टिकीं। बड़ी बिन्दी, पीला चेहरा, बालों में गुड़हल के फूल। कुछ अजीब लगी थी पहली बार और आज उसकी ओर से ध्यान हट नहीं रहा। वह भी प्लेटफार्म पर बुत सी खड़ी है, अधखुली हथेली को धीरे–धीरे हिलाती हुई। ओझल होते तक मैं उसे एकटक निहारती रही।

टे्रन प्लेटफार्म के सारे दुकान फिर आस–पास के पेड़–पौधों को पीछे ढ़केलती हुई आगे बढने लगी। मैं बाहर खिड़की से प्रकृति का नजारा लेती, रीमझीम फुहार से रोमांचित हो अपनी ही यादों में खो गयी। बरसात के फुहार की झिंसी चार महीने पहले उस दिन भी ऐसी ही थी। जब मैं ठण्डी हवाओं को चीरती हुई तीव्र गति से स्कूटी चलाती दफ्तर पहुंची। रोज कितनी भी जल्दी–जल्दी काम निपटाऊं, देरी हो ही जाती है। देरी होने के भय से धड़कन थोड़ी तेज थी। पहुंचते के साथ ही चपरासी ने बताया कि सर ने मुझे याद किया है। धड़कनें उबलने लगीं।

“नमस्ते सर² क्या आपने मुझे याद किया?”धड़कनों पर लगाम लगाती हुई मैं बोली। “हाँ आपके लिए एक खुशखबरी है, मैंने कुछ लोगों का नाम सह–प्रबंधक के लिए प्रस्तावित किया था। उसकी मंजूरी आ गयी है। उसमें आपका नाम पहला है। इसके लिए आपको चार महीने हमारे मुख्य कार्यालय विशाखपट्टण्म में प्रशिक्षण लेनी होगी। यदि आप नहीं जाएंगी तो हम दूसरे को भी भेज सकते हैं। यह आपके लिए सुनहरा मौका है। कल तक अपनी राय हमें बता दीजिए। ”

“ठीक है सर” कहती हुई मैं कशमोकश की पोटली लिए बाहर आई। सहकर्मियों की अटकलें लग रही थी। प्रश्नों की झड़ी लग गई। मैं मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई। पद–प्रतिष्ठा किसे नहीं भाती? पर चार महीने घर से दूर ऊपर से नई जगह, नया माहौल, भाषा भी अलग। मैंने मन–ही–मन इस अवसर को नकार दिया।

मेरी सहेली श्वेता भी समझाती रही “चली जा आहूति ऐसा मौका बार–बार नहीं आता। विशाखापट्टण्म बहुत सुंदर शहर है, एक बार सागर की लहरों का मजा तो देख। मेरी मौसी भी तो अभी वहीं है, नेवी में। तुम्हें कुछ भी दिक्कत नहीं होगी। कुछ ही दिनों में वहाँ नेवी मेला भी लगने वाला है। बहुत ज़ोरदार होता है। वो तो हमें बहुत बुला भी रही है । तू चलेगी तो तेरे बहाने मैं भी दो–चार दिन घूम आऊँगी। ”

श्वेता मेरे बचपन की सहेली है। मेरे स्वभाव से भली–भाँति परिचित। यहाँ मेरी सहकर्मी भी। वह जानती है कि दीपक और बच्चों को छोड़कर मैं नहीं रह सकती तथा दीपक के बिना कोई भी निर्णय लेना मेरे लिए आसान नहीं। उस दिन, दिन–भर एक तनाव सा रहा। घर भी बोझिल मन से लौटी।

“मुबारक हो मैनेजर साहिबा। ” मेरे दरवाजा खोलते के साथ ही दीपक ने कहा।

“आपको कैसे पता चला?” मैं उनके हाथों से बैग और मिठाई का डब्बा लेती हुई पूछी।

“श्वेता मिली थी हलवाई की दुकान पर उसी ने बताया इसलिए समोसों के साथ–साथ मिठाई भी ले आया। ” “और भी कुछ बतायी या बस यही। ”

“हां बतायी ना कि चार महीने की प्रशिक्षण हेतु तुम्हें विशाखपट्टण्म जाना होगा। ”

जिस बात को सोच कर मैं दिनभर तनाव में थी, उसे कितनी आसानी से दीपक कह गये।

“पर कैसे संभव है? बहुत मुश्किल होगी। मुझे समझ में नहीं आ रहा। छोड़िए–हटाइए, मुझे इच्छा भी नहीं जाने की। ”कहते हुए मैंने अपनी मनःस्थिति जाहिर कर दी।

“नहीं आहूति ऐसा मत सोचो² ऐसे मौके बार–बार नहीं आते। बस चार महीनों की ही तो बात है। वहाँ श्वेता की मौसी भी तो है ना, रहने का इन्तजाम कर देगी। ”दीपक ने मानो निर्णय सुना दिया।

आखिरकार मैं विशाखपट्टण्म के लिए ट्रेन में बैठ ही गई। बच्चे अपने–अपने अनुसार माँगे रखने लगे। दीपक मुझे हिम्मत के साथ–साथ नसीहत भी देते रहे। बच्चे और दीपक को छोड़कर जाना बहुत कष्टदायक लग रहा था। बार–बार यही ख्याल टीस रहा था, क्यों इतनी महत्वाकांक्षाÆ क्यों इतनी पदोन्नति की चाहÆ सब कुछ तो ठीक ही चल रहा था, मैं भी ना…। सोच–सोचकर सारा गुस्सा अपने पर मढ़ती रही। यहाँ श्वेता का साथ बहुत बल दे रहा था। मैं तो थोड़ी गुमसुम ही थी। श्वेता ही इधर–उधर की बातें बता रही थी। अभी तक वह प्रणय–बंधन में बंधी नहीं इसकारण हृदय–बंधन की तड़प से अंजान हँसती खिलखिलाती इस विशाल दुनिया में रमीं रहती है। प्रणय–बंधन दुनिया को सिमटा देती है। मेरी दुनिया तो सिमट चुकी है। मेरे प्राण भी उस कहानी वाले राक्षस के ही भांति है जो अपने प्राण को एक विशाल पीपल के पेड़ के ऊपर पींजडे, में रखा रहता था। मेरा तो उस घर में है जिसमें मैं पीली चुंदरी में सजी, नाक से माँग तक भखरा सिंदूर लगा, सोलहों श्रृंगार कर दीपक के साथ कार में बैठ कर आयी। कार रुकते ही दरवाजे पर औरतों का ज़मावड़ा लग गया। सासु माँ ने बगल की महिला के गोद से बच्चे को लेकर मेरी गोद में बिठा दिया। नन्हा प्यारा बच्चा मेरी गोद में आकर मेरे आभुषण युक्त सजे–धजे रंगीन चेहरे को किंकर्त्तव्यविमूढ़ देखता रहा। सासु माँ ने मेरी भरी माँग को फिर से भरा, गोबर के लड्डू औंछ कर फेकीं तथा दोनों गालों को पान के पत्ते से सेंका। पान के पत्ते में तो गर्माहट नहीं थी पर सासु माँ के खुमार से शीतकाल के ठिठुरते बच्चे को माँ की गर्म रजाई में घुसने का अतुल्य आनंद मेरे भीतर समा गया। सभी औरतों ने एक–एक कर ऐसा ही किया। बाँस की बड़ी–बड़ी दो दौरियाँ लायी गयी। मुझे उसी में उतारा गया। पीछे से दीपक भी उसी में खडे, हो गये। दही का चुकिया मेरे सिर पर रख दीपक उसे पकडे, हुए थे। बहुत मुश्किल लग रहा था उसमें चलना। ननद–भौजाई की हँसी–ठहाकों के साथ दौरी में पैर रख–रखकर ही देवता घर के चौखट तक आयी। चौखट पर खड़ी ननदों को हर्जाना देकर ही अंदर प्रवेश मिला। वही अनजान घर धीर–धीरे मेरी जान बन गयी थी। उसे छोड़कर जाना मेरी अंतःकरण को झकझोर रहा था।

कुछ ही देर के बाद पाँच–छह आदमी कड़बड़–कड़बड़ करते हुए हमारी बोगी में आये। उनकी भाषा बिलकुल हमारी समझ से परे थी। हाव–भाव से बस हम इतना ही समझ पाये कि उन लोगों की सीट भी इसी बोगी में है। सभी के सभी तंदुरुस्त और काले। काला कुर्ता, काला पायज़ामा और गले में लटकता हुआ गमछा भी काला। पैर में चप्पल भी नहीं। ललाट पर साधुओं के समान तिलक–मुद्रा। गले मे ताँबे की कड़ी से गुथी रुद्राक्ष की कई मालाएं। मुझे इन लोगों को देख कर कुछ डर सा लगने लगा। न चाहकर भी ध्यान उधर चला ही जाता। रात की हर करवट में भी मेरा भयभीत मन मेरी नजरों को एक बार इनकी ओर ढकेल ही देता। सर की उसी बात की तरह कि आँखें बंद करके कुछ भी सोचो उस बडे, काले बंदर को न सोचना और बार–बार वही काला बंदर सामने आ जाता है। आधी रात को उनको उतरते देख मेरे पूरे शरीर में शांति की लहर दौड़ गई। प्रशांत मन झपकी की आगोश में समा गया।

हम सुबह–सुबह ही विशाखपट्टण्म पहुंचे। रेलवे स्टेशन पर ही ‘कुली कावाला’, ‘इला रंडी–इला रंडी’ जैसे शब्दों को सुनते ही मैं अकबका गई। स्टेशन से बाहर निकलते ही सिर मुड़ायी हुई कई स्त्र्यिाँ दिखी। ये तो मेरे लिए बिलकुल अचंभा था क्यों कि मेरे यहाँ तो नारियों का सिर मुंडन बहुत अशुभ माना जाता है। यहाँ पर काले वेषधारी के साथ–साथ लाल वेषधारी भी दिखे। पुरुषों का लाल कुर्ता–पायजामा, लाल गमछा, बड़ी सी लाल बिंदी, हाथों में लाल चूड़ी, पैरों में महावर, सब लाल–लाल देखकर लगा कहाँ पहुँच गयी। भय भाग जाने को पे्ररित करने लगा। श्वेता ने बताया कि ये काले वाले स्वामी और लाल वाले भवानी हैं। इनका चालीस दिन का व्रत होता है। इस समय इनका पहनावा अलग, व्यवहार व खान–पान सब सात्विक होता है। डरने की कोई बात नहीं।

श्वेता की मौसी कूरमनापालेम में रहती थी जो स्टेशन से भी तीस–चालीस किलोमीटर दूर था। हम आटो से सीधे वहीं पहुंचे। मैं पूरे रास्ते आटो से बाहर इधर–उधर ही देखती रही। जगहों के नाम पढ़ना भी मेरे लिए मुश्किल था। सभी गोल–गोल ही नज़र आता, मानो अपने लिखे को गोल–गोल करके काट दिया गया हो। कूरमनापालेम का नाम हथेली में लिख कर याद की, यहाँ रहना जो था।

मौसी का मिलनसार व्यवहार देखकर मन प्रसन्न हो गया। वह मेरे रहने का इंतजाम बगल वालपर धीरे–धीरे सब काम अच्छे से कर देगी। सबसे अच्छी बात यह है कि ये थोड़ी–बहुत हिंदी भी जानती है। ” मैं खुश हो गयी सोची ‘यहाँ उपन्यास पढ़ने के लिए अच्छा समय मिल जाएगा, जम कर पढूंगी। ’ मैं और श्वेता तैयार होकर इस्पात निगम के टे्रनिंग एंड डवलपमेंट सेंटर पहुंचे, वही मेरा प्रशिक्षण होने वाला था। नाम पंजीकृत कराकर वापस आ गई।

दूसरे दिन सभी साथ मिलकर नेवी मेला गए। तरह–तरह के झूलों व खिलौनों को देखकर बच्चों की बहुत याद आई। अगले दिन रविवार को आऱ के़ बीच में तो नेवी का समुद्र में प्रदर्शन देखने लायक था, सोची अगली बार दीपक और बच्चों के साथ जरुर आऊंगी। उन्हें फोन पर ही सारा मंजर बयां की। बच्चों से भी बातें हुई, वे तो अपनी ही दुनियाँ में मस्त लगे। मैं पूछी “ मम्मी याद आती है” तो कहता है “थोला–थोला। ”

और यहाँ मैं जल बिन मछली, बछडे, बिन गाय सी। हम बडे, ही अपने को जल्दी ढ़ाल नहीं पाते। श्वेता के साथ तीन दिन बहुत अच्छे गुजरे। हर दिन कहीं–न–कहीं घूमते रहे। कोंडम्मा के कारण खाने–पीने की चिंता से भी निश्चि्ांत। पर खाने का स्वाद नया। बहुत चटकारा, खट्टा, तेल–मसाले से भरपूर। हर चीज में करी पत्ता। हम इसके इतने आदि न थे। ऊपर से पाचन के लिए सुबह शाम मट्ठा। मैं सोचती पेट को बिगाड़ना ही क्यों पर खा–पी लेती, कोंडम्मा के चाव के कारण…।

श्वेता के जाने के बाद और खराब लगने लगा। दिनभर बेगानों के बीच प्रशिक्षण केंद्र में रहती। घर लौटने की भी कोई बेचैनी नहीं जो पहले वहाँ दफ्तर में हुआ करती थी। वहाँ तो चार के बाद ध्यान बस घड़ी पर ही टिकी होती थी। यहाँ पर बस अनजान जगह के कारण जल्दी लौटना चाहती। वैसे यहाँ का माहौल बहुत अच्छा है, डरने जैसी कोई बात नहीं। घर में हो तो समय देखकर प्रशिक्षण केंद्र और केंद्र में हो तो समय देखकर घर। बस यही दिनचर्या बन गयी थी। हर समय यही लगता रहता कैसे कटेंगे चार महीने, दिन में कई बार मेरी नज़रें कैलेंडर पर दौड़ जाती। लगता जो समय पंख लगाकर उड़ रहा था, वह भी अपनी थकान मिटाने के लिए बैठ गया है। दिन कटना ही नहीं। यहाँ मौसी और कोंडम्मा का साथ डूबते को तिनके का सहारा सा था।

सुबह उठने के साथ चाय की तलब होती है।

“कोंडम्मा” कहती हुई मैं रसोई घर में गई।

“ऊंडु–ऊंडु” कहते हुए हाथ के इशारे से उसने मुझे वहीं रोक दिया। फिर मेरे चप्पल की ओर इशारा करके “जोडु–जोडु” कहने लगी। मैं समझ गई, मेरा चप्पल पहन कर रसोई में आना इसे पसंद नहीं। मैं वापस रसोई से बाहर जाकर चप्पल निकाल आयी।

चाय मांगने पर बोली “मैं बनाती पहले ब्रश कर कुछ खा, खाली पेट ना। ” मैं असमंजस में पड़ी चुपचाप बाहर निकल आयी। कोंडम्मा की अधिकार पूर्ण बातें कुछ अजीब लगी। थोड़ा गुस्सा भी आया। जानती हूँ कि वो रसोई को बहुत साफ–सुथरा रखती है, बिना स्नान के खुद भी अंदर नहीं आती, पर ऐसे टोकना उचित है क्याÆ मैं बच्ची तो नहीं…।

धीरे–धीरे मैं ही कोंडम्मा की बातों को मानने लगी। लगता, कौन समझाए, एक तो भाषा की भी समस्या।  माथापच्ची के बनिस्बत मानने में ही भलाई लगा। उठते के साथ जो चाय की तलब होती थी वह भी थोड़ी कम हो गयी पर वह ही हर सुबह मुस्कान बिखेरती हुई कहती “टी बनाती, ब्रश करो। ”

उसकी टूटी–फूटी हिंदी गुदगुदा जाती। बीच–बीच में मौसी भी बहुत सारी बातें बताती और तेलुगु शब्दों से परिचय कराती। हम दोनों मिलकर बहुत हँसते। कोई–कोई शब्द तो अंतरंग तक गुदगुदा देते। हमारी सभी बातों में कोंडम्मा न केवल साथ होती बल्कि मुस्काकर सहमति भी जताती। जुबान की भाषा से तो नहीं पर नजरों की भाषा से मैं उसकी ओर खिंचने लगी थी।

प्रशिक्षण केंद्र से आने के पश्चात् मैं उपन्यासों में ही खोई रहती। कोंडम्मा भी अपना काम खत्म कर चुपचाप मेरे पास ही बैठ जाती। मेरे पन्ना पलटने पर या चिंतन की मुद्रा देख, मुझे समझे बगैर ही अपने बारे में कुछ–न–कुछ बताने लगती। मेरे बारे में भी जानने की कोशिश करती। यहाँ पर उसकी टूटी–फूटी हिंदी भी मुझे समझाने में असमर्थ थी। आधी–अधूरी समझ मुझे उसके बारे में जानने को और अधिक उत्सुक कर गई। मौसी ने बताया कि इसकी शादी इसके मामा से हुई है।

“मामा से” मैं तपाक से पुछी।

मौसी ने समझाया कि “यहाँ मामा–भगिनी की शादी को बहुत ही शुभ माना जाता है। ” जबकि हमारे यहाँ तो मामा, भगिनी की पूजा करते हैं , शादी की सोच भी पाप है। इसके दो बेटे हैं। दोनों अच्छी नौकरी करते हैं। पत्नी और पैसा आ जाने के बाद बूढ़ी माँ भार लगने लगी। वैसे भी यहाँ शादी के बाद लड़के ससुराल के तरफ ज्यादा झुके रहते हैं हर पर्व–त्योहार में माँ के घर नहीं सास से आर्शीवाद लेने जाते हैं। इसका पति किसी और के चक्कर में है सारी कमाई उसे ही उढे,ल देता है। ये बहुत ही स्वाभिमानी औरत है, खुद कमा कर खाएगी किसी से एहसान नहीं लेगी।

धीरे–धीरे कोंडम्मा मेरे जेहन में समाने लगी। रोज सूर्योदय से पहले हल्दी लगाकर नहाती, पीले चेहरे पर बड़ी सी कुमकुम की बिंदी लगाती। बालों में फूल जरुर लगाती भले ही वो गेंदा या गुड़हल ही क्यों न हो। रोज ललिता–सत्यनारायण का पाठ पढ़ती। यहाँ बालों में फूल लगाने का प्रचलन अधिक है। वो कभी– कभी मेरे लिए भी गजरा या गुलाब लाती। लगाने के लिए कहती बताती इसे बहुत शुभ मानते है। मैं खुश होकर लगा लेती। लगता दीपक होते तो इतराकर दिखाती।

एक दिन मौसी के साथ पड़ोस की एक औरत आयीं। उसने मेरे माथे पर कुमकुम लगाया, मुस्काते हुए कहा– “ पापा की मैच्योर फंक्शन रंडी। ”

मकान में ही कर दी थी। साथ में एक कामवाली भी। मौसी ने कहा “आहूति, ये कोंडम्मा है थोड़ी बूढ़ी ह मैं अवाक उसे देख रही थी। वो मुस्काती रही। मुस्कान की भाषा सर्वोपरी थी। मुझे समझ तो आ गया कि ये मुझे अपने घर बुलाना चाहती है पर क्यों समझ नहीं आ रहा था। उसका माथे पर कुमकुम लगाकर निमंत्र्ण देने का अंदाज अच्छा लगा। मौसी ने बताया कि इसकी बेटी का मासिक धर्म शुरू हो गया है। उसी का समारोह है। कितना अजीब लगा सुनकर मैं कह नहीं सकती। हमारे यहाँ तो कोई इसका जिक्र भी नहीं करता और यहाँ पार्टी। मैं अवाक् उसकी मुस्कान से अपनी मुस्कान मिलाती रही।

“ओ के” मैंने मुस्काते हुए कहा।

मैं मौसी के साथ उपहार लेकर उस महिला के घर गयी। सभी महिलाएं सोने के भारी–भारी आभूषण, भारी पट्टू साड़ी पहनी हुई थी। उनके लंबे–लंबे बाल बेली फूल के गजरे से और भी अधिक खिल रहे थे। छोटी सी गुड़िया भी सोने के आभूषणों से लदी थी। वहीं पर बगल में एक प्लेट में पीला अक्षत व गुलाब की पंखुड़ी रखी हुई थी। सभी उस गुड़िया को आशीर्वाद देने के लिए लाइन में खडे, थे। इतनी भीड़ होने के बाद भी सभी कार्यक्रम व्यवस्थित तरीके से चल रहा था। मैं और मौसी भी लाइन में लग गए। हमने भी उसके सिर पर अक्षत डाला। उसका सिर चावल व गुलाब की पंखुड़ियों से भर गया था। वो तो और भी प्यारी दिख रही थी। हँस–हँस कर सबका सम्मान करती। उपहार लेती। बीस साल पहले का जमाना याद आया, जब मैंने माँ को बताया था और माँ मुझसे ढाई रस्सी कटवा कर कपड़ा बाँध दी थी। मैं शर्म से गड़ी जा रही थी।

खाना खाने के बाद जब हम जाने लगे तो उस महिला ने हमें उपहार दिया, साथ में ब्लाउज पीस, पान का पत्ता, सुपारी, हल्दी, कुमकुम और दो केला। ऐसे हुई हमारी वहाँ से बिदाई। मौसी ने बताया कि यहाँ सभी कार्यक्रमों में ऐसा ही होता है।

मुझे यहाँ जो सबसे अधिक परेशानी थी वह खाने में ही थी। मैं खुद बनाना चाहती थी पर कोंडम्मा को मेरा रसोई में आना मंजूर नहीं था। शायद वह मुझे ज्यादा सुख व आराम देना चाहती थी । “पढ़ो, मैं बनाती” कहकर मुझे हटा देती।

मैं उसकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती थी। उसके शौक से बनाए खानों को जबरन मुस्काते हुए खा लेती। एक दिन उसने बिरयानी बनाया बिलकुल अपने पुलाव जैसा उसके साथ प्याज का रायता दी, मुझे तो पुलाव के साथ आलुदम ही अच्छा लगता है मां ने शुरु से वैसा ही खिलाया, दीपक और बच्चों को भी तो वही अच्छा लगता है पर आज रायता के साथ खायी। रोज तरह–तरह के खाने, हर चीज में इमली। धीरे–धीरे इमली के रस से बना रसम और पुलुसू का स्वाद भी भाने लगा।

प्रशिक्षण केंद्र से आते समय कणिति बस स्टॉप पर गाड़ी रुकी। गुमटी में कोल्ड डिंक्स की बोतल देख दीपक की याद आयी। कभी–कभी वे घर आते वक्त ले आते थे। वो जानते है कि खाना खाने के बाद कोल्ड डिंरक्स पीना मुझे बहुत पसंद है। मैं स्प्राईट की एक बोतल ले ली। खाना खाने के बाद थोड़ा खुद ली और थोड़ा कोंडम्मा को भी दी।

कोंडम्मा को ये बिलकुल पसंद नहीं कि खाने के बाद मट्ठा के अलावा कुछ और भी पीया जाये। मुझे भी मना करने लगी। खुद तो चखी भी नहीं। मेरा देर रात तक जग कर पढ़ना उसे अच्छा नहीं लगता। कहती जल्दी सो जाओ देर रात तक जगने से हाजमा खराब हो जाती है। सुबह जल्दी उठा करो, थोड़ा टहलो, तबीयत अच्छी रहेगी। रात में जब तक मैं न सो जाऊं वहीं बैठी रहती। उसे देख मुझे लगता मेरी आजादी छिन गई, फिर मैं सो जाती। पहले सोची थी कि यहाँ देर रात तक चिंतामुक्त होकर आराम से पढ़ती रहूँगी। वहाँ चाहकर भी समय नहीं निकाल पाती थी। सुबह उठने की जल्दबाजी में जल्दी सोना पड़ता था। उल्टे यहाँ तो जल्दी सोने व जल्दी उठने की आदत बन गई। एक दिन ‘गीता’ ले आई। कही इसे रोज पढ़ो, इसमें बहुत शक्ति है। फिर रोज पूछती भी, ई रोज पढ़ा धीरे–धीरे भगवान कृष्ण की बातें जेहन में घुसने लगी, लगा ये तो जीवन–पुस्तिका है। जीवन की हर समस्या का समाधान है इसमें।

‘अक्षय तृतीया’ के दिन कोंडम्मा मुझे सिंहाचलम ले कर गई। हिरण्य कश्यप को मारकर जब भगवान पत्थर का रूप ले लिए थे उस पत्थर का दर्शन करवाया। आज के दिन ही केवल ‘चन्दन महोत्सव’ में भगवान को आवरण मुक्त किया जाता है। दर्शन कर मन शांत हो गया। प्रसाद में लड्डू ओर पुलिहौरा (नमकिन खट्टा चावल) मिला। प्रसाद में नमक, अजीब लगा पर लड्डू खाकर मन तृप्त हो गया, वह समय याद आया जब कॉलेज टूर में दक्षिण भारत गए थे और वहाँ हम सब दिन–भर लाइन लगाने के बाद रात में तिरूपति बालाजी का दर्शन कर पाए तथा लड्डू प्रसाद खाये थे। यहाँ भी लड्डू का वही स्वाद मज़ा आ गया। कुछ लड्डू दीपक और बच्चों के लिए भी ले ली। कल वापिस भी तो जाना है। पहाड़ी से उतरते समय गरमागरम जलेबी छनती दिखी। मैं खुद ली और कोंडम्मा को भी दी, पता चला उसे जलेबी पसंद नहीं। आग्रह करने पर भी वह चखी तक नहीं। मुझे बुरा लगा। मेरा चेहरा उतर गया, लगा उसे तनिक भी मेरी भावनाओं की चिंता नहीं।

दोपहर में प्रशिक्षण केंद्र जाकर अपना जरुरी कागज़ात ली। निकट के बाज़ार गाजुवाका जाकर बच्चों के लिए खिलौने व गेम सीडी ले आयी। सामान बांधने की चिंता हो रही थी। सोची पहले चाय पी ली जाए। कोंडम्मा को चाय बनाने के लिए कहने रसोई में जा ही रही थी कि दरवाजे पर ही कदम रुक गए, चप्पल निकाल कर अंदर गई। कोंडम्मा की द्रवित आँखें देख मन में तीर सी चुभी। मेरा जाना उसे भी वैसा ही कचोट रहा था जैसे कि मुझे। मुझे देख वह समझ गई, बोली– “चलो तुम सामान बांधो मैं टी लाती। ” मैं वापस आकर अपने काम में भिड़ गई। मैं कोंडम्मा को भी अपने साथ ले जाना चाहती थी पर मौसी ने बताया कि इसे कहीं भी मन नहीं लगता। कई बार इसके रिश्तेदार इसे यहाँ से ले जाना चाहे पर ये कहीं जाती नहीं। यदि कहीं जाती भी है तो, दो–चार दिन से अधिक कहीं नहीं रहती।

टे्रन में चा–चाय चिल्लाते हुए लड़के की आवाज से तंद्रा खुली। कोंडम्मा के साथ बिताये वात्सल्य भरे मधुर पल मेरे चेहरे पर सितारों सी छिटक गई। सुबह–सुबह चाय की तलब में चाय तो ले ली पर पी न सकी बिना ब्रश किये। सुबह के छः बजने वाले थे। रायपुर आने ही वाला था सोची अब सब घर में ही करूंगी। हाथ में चाय लिये–लिये माथा घनघनाता रहा। सोचती रही। कितना कुछ सीख ली इन चार महीनों में। किस चीज के साथ क्या खाना, घर को कैसे रखना, जल्दी सोना, जल्दी उठना, हर काम संयम के साथ करना, गीता पढ़ना। पर हर बार यही भाव उठता कि चाह कर भी मैं कोंडम्मा को कुछ ना सिखला सकी।

खिड़की से ही दीपक और बच्चों को देखकर आँखें छलक आयी।

……


परिचय

नाम –डॉ़ दीपा गुप्ता

जन्म – रामानुज गंज, छत्तीसगढ़, भारत

शिक्षा– एम ए(हिंदी), एल एल बी(स्वर्ण पदक), बी एड, पीएच डी

संप्रति– हिंदी प्राध्यापिका

माता– शारदा देवी

पिता–स्व़मदन प्रसाद गुप्ता

पति– श्री पवन कुमार गुप्ता(अभियंता)

संतान– बिपुल मृदुल

प्रकाशित रचनाएं– पवन…एक झोंका(काव्य–संग्रह), मृगतृष्णा( कहानी–संग्रह)

सम्मान– भारत–भारती सम्मान(जबलपुर, मध्य प्रदेश)भारत के अनमोल रत्न (तेजस्वी अस्तित्व

फाउंदेशन, दिल्ली)

पता– विल्ला नं़ 99, सरदार नेस्ट, गाजुवाका, विशाखापट्टणम, आंध्र प्रदेश, भारत, पिन–530044

0 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 56 : कुछ न सिखला सकी // डॉ़. दीपा गुप्ता"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.