संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 57 : दस मिनटों में // शिवानी चौहान

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प्रविष्टि क्र. 57

दस मिनटों में

शिवानी चौहान


बिना सामान टटोले घर से निकलना तो जैसे मेरी बचपन की आदत थी, इस आदत के कारण कई दफा मुझे परेशानी भी हुई थी पर कहते हैं न कि जब तक बड़ी खरोंच न लगे जलन का एहसास नहीं होता, बस ऐसा ही कुछ उस दिन हुआ।

मैंने अपना पसंदीदा सफेद कुर्ता कॉलेज जाने के लिए निकाला ही था कि मम्मी ने टोका और कहा, '' तू क्या इस कुर्ते की दम निकाल के मानेगी ''। वो कुर्ता मुझे इतना पसंद था कि मम्मी की टोक का भला क्या असर होता। मैंने कुर्ता इसी कर पहना तैयार होकर बैग उठाया और कॉलेज के लिए निकल पड़ी।

घर से मैट्रो स्टेशन की दूरी कुछ पांच मिनट की है इस बीच गली मोहल्ले के बड़े-छोटे लोगों से हाय- हैलो करते हुए अपने रास्ते जाना रोज की दिनचर्या का हिस्सा था, उस दिन भी सबसे मिलते हुए फटाफट मैट्रो स्टेशन पहुँची। सामान चैक कराने के लिए लाइन लगी हुई थी। मन तो था कि लाइन तोड़ कर जल्दी से निकल जा?, पर ये हौं कहाँ सकता था तो मैंने कान में लीड लगायी और रेडियो पर बऊआ का कार्यक्रम सुनने लगी।

लाइन में खड़े-खड़े इधर-उधर लोगों को देखने लगी कोई लाइन तोड़कर आगे जाने को उतारू था, तो कोई आपस में ही झगड रहा था। इन सबके बीच मुझे एहसास हुआ कि मेरे पीछे कोई खड़ा है वो भी बहुत सट के। मैं कुछ आगे बढ़ गयी, पल भर बाद फिर वही हुआ मुझे बहुत गुस्सा आया पर शीघ्र ही याद आया कि लाइन में तो सिर्फ औरतें होंगी। मैं पीछे पलटी तो पीले रंग की बनारसी साड़ी पहने एक किन्नर मेरे पीछे थी। उसके माथे पर गोल बड़ी सी लाल बिंदी थी, चेहरे पर गहरा मेकअप और मुँह में सुपारी। मेरे पलटने पर वह मुस्कुरायी लेकिन मैंने तुरंत अपना मुँह आगे कर लिया। उसे देखकर मैं काफी घबरा गयी थी। मैं जैसे-जैसे आगे हो रही थी वो वैसे-वैसे बिकुल मेरे पीछे सट कर खड़ी हो रही थी।

आखिर मेरी बारी आयी और मैं अपना बैग लेकर आगे बढ़ी, वो पीछे ही रह गयी थी। मैं फटाफट प्लैटफॉर्म पर पहुँची और दिलशाद गार्डन जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगी। दो ही मिनट हुए होंगे कि वह किन्नर फिर मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। घबराहट के कारण मेरे हाथ-पैर ढीले पड़ गये थे। मुझे लग रहा था कि कहीं ये मुझसे पैसे न माँग ले। रेडियो पर मेरे पसंदीदा गाने आ रहे थे पर मेरा तनिक भी ध्यान नहीं था। मैं इतना डर गयी थी कि एक बार भी उसकी ओर नहीं देखा। मैट्रो आयी पर मैं नहीं चढ़ी ताकि वो उसमें चली जाये पर उसने भी मैट्रो छोड़ दी। इसी तरह मैंने तीन मैट्रो छोड़ दीं और वह भी वहीं खड़ी रही। आखिर मैंने चौथी मैट्रो पकड़ ली साथ ही वो भी चढ़ गयी।

मैट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा थी जैसे ही वह चढ़ रही थी मेरी नजर उस पर पड़ी, वह मुझे कुछ इशारा कर रही थी। पर मैंने डर के मारे मुँह फेर लिया और आगे बढ़ गयी। वो भीड़ में से निकल कर मेरे पास आयी और मुझे कान से लीड निकालने का इशारा किया।

उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा,. कब से तुझे इशारा कर रही हूँ मेरी तरफ देख क्यों नहीं रही। '' उसकी आवाज काफी भारी थी। मैंने धीमे स्वर में पूछा, '' क्यों? क्या हुआ। '' वो शायद समझ गयी थी कि मैं उससे डर रही हूँ। मेरे हाथ को कोमलता से सहलाती हुई बोली,. बिटिया तेरे कुर्ते का पीछे का बटन निकल गया है और कुर्ता वहाँ से कुछ चिर गया है। मैट्रो स्टेशन पर बहुत लोग थे वहाँ तुझे डराना ठीक न समझा इसलिए तेरे पीछे बिलकुल सट कर खड़ी थी, कोई सेफ्टी पिन है तो दे दे मैं लगा देती हूं। ''

यह बात सुनकर मेरी आँखें भर आयीं। मैं तो न जाने क्या क्या सोच रही थी और वह कब से मेरी रक्षा करती आ रही है। मैंने अपने बैग को टटोला और जैसा कि कुछ न कुछ भूलना मेरी आदत थी, मैं आज अपनी किट भूल आयी थी। मेरा चेहरा बिलकुल रूआँसा हो गया। उसने हाथ मेरा सहलाया और फिर अपनी साड़ी में लगी सेफ्टी पिन मेरे कुर्ते में लगा दी। उसकी खुद की साड़ी खिसक सी थी पर उसने मेरी जरूरत को आगे रखा।

कश्मीरी गेट स्टेशन आने वाला था जहाँ मुझे उतरना था। मैंने उन्हें कस कर गले लगाया, शुक्रिया कहकर विदा ली और मैट्रो से बाहर आ गई। मुड़कर देखा तो मेरी तरह उसकी भी आँखें भर आयी थीं।

प्रताप नगर से कश्मीरी गेट की दूरी बस दस मिनटों की है जिसे मैंने न जाने कितनी बार तय किया था पर उस दिन उन दस मिनटों में मैंने अपने जीवन का वो अध्याय पढ़ा जिससे मैं अनजान थी। उस किन्नर के माँ जैसे स्नेह ने आलिंगन की उस गर्माहट ने किन्नरों के प्रति मेरी नजर नहीं, नजरिया बदल दिया।

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