संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 60 : मोहिनी // डॉ सुरंगमा यादव

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प्रविष्टि क्र. 60

मोहिनी

डॉ सुरंगमा यादव

रिफ्रेशर कोर्स का आज अन्तिम दिन था। सभी को सर्टिफिकेट प्राप्त करने की जल्दी थी। अलग-अलग जनपद तथा प्रदेशों से आये प्रतिभागी प्राध्यापक-प्राध्यापिकाएँ इक्कीस दिन से अपने-अपने घरों से दूर रह कर आज इस अन्तिम दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे। अगर प्रमोशन का चक्कर न हो तो शायद ही कोई ये कोर्स करने आये। आज सुबह से ही सब उत्साहित थे। घर जो जाना था। आपस में सब एक दूसरे का फोन नंबर ले रहे थे। किसी का शाम का रिजर्वेशन था तो किसी का रात का। किन्तु मोहिनी मैडम अपने में ही मस्त थीं। आकर्षक नैन-नक्श, सुडौल देहयष्टि, लुभावनी भाव-भंगिमाएँ। मोहिनी मैडम प्रथम दिवस से ही सबके आकर्षण का केन्द्र बन गयीं थीं। विभाग प्रभारी एवं कोर्स समन्वयक डॉ रविन्द्र सिन्हा भी उन पर विशेष दृष्टि रखते थे। उद्घाटन सत्र में डॉ सिन्हा का वक्तव्य सुनकर मोहिनी मैडम इतनी प्रभावित हुईं कि बाद में उनके पास जाकर उनके वक्तव्य,शब्द चयन,वाक् शैली और व्यक्तित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उनका फोन नंबर भी ले लिया।

डॉ सिन्हा प्रतिदिन दोनों सत्रों में आया करते थे। रिसोर्स पर्सन का परिचय तथा लेक्चर के बाद आभार व्यक्त करना वे कभी नहीं भूलते थे। यद्यपि प्रतिभागियों में से डे अफ़सर भी इसी काम के लिए बनाये गये थे। टी ब्रेक हो या लंच ब्रेक मोहिनी मैडम का प्रतिदिन का काम था रिसोर्स पर्सन और समन्वयक के साथ डायरेक्टर रूम में जाना, मोहक मुद्रा में बात करना,फोन नंबर लेना उनके साथ फोटोग्राफ लेना। पूछने पर पता चला कि उनके विभाग प्रभारी का आदेश है ।ऐसे कोर्सों में एक दिन टूर के लिए भी रखा जाता है। आज वही दिन था। मोहिनी मैडम ने डॉ सिन्हा से पूछा, ‘‘सर आप चलेंगे? अगर आप नहीं जायेंगे तो मैं भी नहीं जाऊँगी।’’ डॉ सिन्हा के चेहरे पर एक पुरुषवादी मुस्कान तैर गयी। एक दिन तो हद ही हो गयी। विभाग में प्रयोगात्मक परीक्षा होने के कारण डॉ सिन्हा को विलम्ब हो गया। मोहिनी मैडम का मन लेक्चर सुनने में नहीं लग रहा था। बेचैनी उनके चेहरे से साफ झलक रही थी। अन्ततः उन्होंने डॉ सिन्हा को फोन लगाया। थोड़ी देर बाद डॉ सिन्हा मुस्कराते हुए वहाँ पहुँचे तो मोहिनी मैडम के मुँह से अनायास ही निकल गया ’’सर अगर आज आप नहीं आते तो मेरा तैयार होना ही बेकार हो जाता।’’ सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे। डॉ सिन्हा जल्दी से डायरेक्टर रूम में घुस गये। मोहिनी का यह व्यवहार अन्य महिला प्रतिभागियों को असहज कर देता था। यूँ तो मोहिनी मैडम शादी शुदा थीं। तीन साल का एक बेटा भी था। लेकिन उनमें चंचलता वही मुग्धा नायिका वाली थी।

कोर्स शुरू होने के तीन-चार दिनों के भीतर सभी प्रतिभागियों के बैठने का स्थान लगभग निश्चित-सा हो गया था। परन्तु मोहिनी मैडम की कोई सीट निर्धारित नहीं थी। वैसे तो वह पुरुष प्रतिभागियों के साथ ही बैठती थीं। लेकिन किस दिन किसके साथ और कहाँ बैठेंगी ये तो उनके आने के बाद ही पता चलता था। इसी लिए जब वह लेक्चर रूम में घुसतीं तो पुरुष प्रतिभागियों के मन में लालसा मिश्रित उत्सुकता रहती कि आज ये सौभाग्य किसे मिलने वाला है। उनके आते ही कई स्वर एक साथ सुनाई देते ‘‘ आइए आइए।’’ पुरुष को महिला का कामिनी रूप ही सबसे अधिक भाता है। यदि महिला स्वयं अपने को इस रूप में प्रस्तुत कर रही हो तो उनके लिए सोने पे सुहागा हो जाता है।

एक-एक दिन बीतते-बीतते आज अन्तिम दिन आ पहुँचा। समापन सत्र शुरू हो चुका था। सर्टिफिकेट वितरित करने के लिए डायरेक्टर हाल में आ चुके थे। समन्वयक डॉ सिन्हा कार्यक्रम का संचालन करते हुए इक्कीस दिनों की संक्षिप्त आख्या प्रस्तुत कर रहे थे। डॉ सिन्हा अपने वक्तव्य में कहते हैं कि ’’ यहाँ आये हुए सभी प्रतिभागियों ने बहुत अनुशासन और गम्भीरता से कोर्स पूरा किया है। इसके लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं। परन्तु यहाँ कुछ महिला प्रतिभागी ऐसी भी हैं जो मुखर नहीं हैं, उन्हें भी खुलना चाहिए। मोहिनी मैडम की तरह आप को भी खुल कर बात करनी चाहिए। मैं इन्हें ’फेस ऑफ द कोर्स’कह सकता हूँ। वैसे तो सभी प्रतिभागियों को ’ए’ ग्रेड दिया गया है क्यों कि ये आपके प्रमोशन के लिए आवश्यक है। लेकिन सर्वाधिक अंक जिस प्रतिभागी ने प्राप्त किए हैं वो हैं मोहिनी जी। बहुत-बहुत बधाई आपको।’’

तालियों के बीच पुरुष प्रतिभागियों की आवाज सुनाई देती है, ये तो होना ही था आखिर वो मोहिनी जो हैं। मोहिनी जी भी अपनी विजय पर मुस्करा रही थीं। आखिर इक्कीस दिनों की उनकी मेहनत रंग लायी थी।

डॉ सुरंगमा यादव

असि प्रो0 हिन्दी विभाग

महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना, लखनऊ (उ0प्र0)

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