संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 65 : –‘दाग़ लगने से अगर कुछ अच्छा होता है, तो दाग़ अच्छे हैं न!’ -अनिता ललित

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प्रविष्टि क्र. 65

संस्मरण –‘दाग़ लगने से अगर कुछ अच्छा होता है, तो दाग़ अच्छे हैं न!’

-अनिता ललित

पहाड़ों पर ट्रेकिंग का अपना अलग ही आनंद है। दो वर्ष पहले गर्मियों में मैं, मेरे पति एवं मेरा अट्ठारह वर्षीय बेटा, बिनसर, उत्तराखण्ड (समुद्रतल से 2,412 मीटर ऊँचाई ) गए। जिस रिज़ॉर्ट में हम ठहरे हुए थे वह जगह पूरी तरह प्रकृति की गोद में बसी हुई थी -ऊँचे पहाड़, लम्बे-लम्बे पाइन के पेड़, टेढ़े-मेढ़े रास्ते ।

मेरे पति का मन हुआ कि अगले दिन सुबह-सवेरे बर्ड सैंक्चुअरी (Bird Sanctuary) चिड़ियाएँ देखने जाया जाए। मेरा बेटा तो तैयार था परन्तु मुझे थकान के कारण सुबह-सुबह उठने का दिल नहीं था। इसके अतिरिक्त मुझे पहाड़ों पर जंगल की पतली, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चलने का सोचकर ही मन में कुछ डर सा लगता था। उसपर ऐसी जगहों पर अजीबो-ग़रीब विषैले कीड़े-मकोड़ों का भी भय था। फिर भी अगले दिन मैं सुबह तैयार हो गई क्योंकि अकेले रिज़ॉर्ट में रुकने का भी मन नहीं था कि बाद में पछतावा होता कि कोई अच्छी चीज़ देखने से रह गए।

सो हम लोग सुबह साढ़े छः बजे गाइड को मिलने, उसके बताए हुए स्थान पर पहुँच गए। वहाँ जाकर पता चला कि एक परिवार और है, जो साथ चलेगा। वे लोग आधे घंटे देरी से आए। ऐसी एक्टिविटीज़ (Activities) में समय की पाबंदी न हो, तो आधा मज़ा वैसे ही किरकिरा हो जाता है। आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद वह परिवार आया -उसमें पति-पत्नी, दो छोटे बच्चे क़रीब सात-आठ वर्ष के, और उन बच्चों की नानी थीं। उनको देखकर सबसे पहला विचार मन में यही आया कि ये लोग कितना चल पाएँगे ! छोटे-छोटे बच्चे तो थोड़ी ही देर में थक जाएँगे और नानी को देखकर भी अनुमान लग रहा था कि तेज़-तेज़ नहीं चल पाएँगी।

ख़ैर, ट्रेक शुरू हुई और हम सभी रंग-बिरंगी चिड़िया देखते हुए आगे बढ़ने लगे। हम लोग आगे-आगे चल रहे थे। ऊबड़-खाबड़ रास्ता था, टेढ़े-मेढ़े, ऊँचे-नीचे पत्थर थे, कहीं-कहीं रास्ता काफ़ी संकरा हो जाता था। झाड़ियों के बीच में से पतली-पतली टहनियाँ और पत्ते निकलकर रास्ते को दुर्गम बना रहे थे! इधर हम तीनों एक-दूसरे को सम्भल कर चलने को बोल रहे थे, उधर उस परिवार के बच्चे अपनी नानी को ! -जो देख-सुनकर अच्छा लग रहा था। कुल मिलाकर आनंद आ रहा था। छोटी बच्ची अपनी नानी से पूछ रही थी, “नानी आप जल्दी-जल्दी क्यों नहीं चलती हो?”

इस पर नानी बोली, “बेटा, नानी बूढ़ी हो गई है न, इसीलिए!”

“आप बूढ़ी क्यों हो गईं नानी? मम्मा तो नहीं हुई!” बच्ची ने फिर सवाल दागा! मुझे हँसी आ गई! यह देखकर बच्ची शरमा गई!

हम सब लोग उन बच्चों की बातों का आनंद ले रहे थे और हौले-हौले आगे भी बढ़ रहे थे! जैसा मैंने सोचा था, वैसा बिल्कुल नहीं हुआ ! -कुछ ही देर में उन बच्चों में से नन्हा लड़का बड़े आत्मविश्वास के साथ, बिना किसी सहारे के आगे चलने लगा था, उसका उत्साह व हिम्मत देखकर हम सभी ने उसकी तारीफ़ की।

यूँ ही चलते-चलते हम सब एक उजड़ी सी जगह पर पहुँचे। तीन-चार टूटी-फूटी सीढ़ियों से चढ़कर जब ऊपर पहँचे, तो देखा कि एक छोटा सा पुराना, खंडहर सा मंदिर है। मंदिर इसलिए लगा क्योंकि उसके ऊपर एक त्रिशूल और बदरंग से लाल रंग का छोटा सा झंडा लगा हुआ था। लम्बी-लम्बी घास उगी हुई थी। एक विशालकाय पेड़ ने पूरी तरह उसपर अपना साया किया हुआ था! कुल मिलाकर वो जगह हॉन्टेड (Haunted) सी लगी, जैसा अक्सर फ़िल्मों में देखने को मिलता है। मैंने अपने बेटे और पति से कहा -“ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म का सीन हो, यहाँ इस खंडहर जैसे मंदिर से फ़िल्म शुरू हो और फ्लैशबैक में यही मंदिर, एक रंगीन भव्य एवं सुंदर मन्दिर हो, उत्सवी माहौल हो और एक कहानी शुरू हो, जैसे कि पिछले जन्म की कहानी हो और अंत में यहीं आकर समाप्त हो जाए तथा बिछुड़े हुए लोग मिल जाएँ !”

यह सब मैंने मज़ाक में ही कहा था क्योंकि मुझे लगा था कि पहाड़ों में तो लोगों की आस्था देवी-देवता, मंदिर-पूजा-पाठ वगैरह में बहुत अधिक होती है, फिर क्या बात है, जो यह मंदिर इस तरह उपेक्षित सा है! -मुझे आश्चर्य भी हुआ था।

फिर वहाँ पर उस पेड़ की लटकी, झूलती हुई डालियों में, चिड़ियाओं को देख कर हम सब वापस हुए।

सीढ़ियाँ उतरते हुए मेरा बेटा और पति मुझसे कुछ क़दम आगे हो गए और वह परिवार शायद मेरे पीछे था। मैं अपने पति और गाइड की तरफ़ देखते हुए, उनसे कुछ पूछते हुए सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि मेरा ध्यान बँट गया ! अंतिम सीढ़ी, जो आधी टूटी हुई थी और सामने बिछी बजरी और गिट्टियों के ही रंग की होने कारण उसी में मिल गई थी, उसपर मेरा ध्यान नहीं गया व वह मेरी नज़र से चूक गई। परिणामस्वरूप मेरा दायाँ पैर आधा नीचे, आधा ऊपर पड़ा और खटाक से मुड़ (ट्विस्ट) गया। मैं दूसरे पैर से अपने को सम्भालती कि मेरा दूसरा पैर बजरी पर पड़ा और फिसल गया! जबतक मुझे कुछ समझ में आता, उसके पहले ही मैं धड़ाम से औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़ी। आवाज़ सुनकर मेरे पति और बेटे भी चौंक गए! कुछ पल को हम तीनों को ही समझ नहीं आया कि मैं गिर गई हूँ। मेरे दोनों हाथों में एकाध छोटा-मोटा सामान था। एक पैर मुड़ा हुआ था और दूसरे पैर के घुटने पर तेज़ जलन हो रही थी तथा कुछ रिसता हुआ सा महसूस हो रहा था, दाईं कोहनी भी छिल गई थी।

तभी मेरा बेटा दौड़कर, घबराकर मेरे आया, मुझे सहारा देकर उसने उठाया और वहीं सीढ़ियों पर बिठाया। पति को तब तक भी विश्वास नहीं हुआ था कि शायद मैं गिर भी सकती हूँ। गाइड ने थोड़ा पैर हिलाने को कहा, वो सब मैंने किया। इसके बाद मैं खड़ी तो हुई मगर दर्द हो रहा था। मैंने पूछा , “अभी और कितनी दूर चलना है?”

वह बोला, “चार किलोमीटर और है अभी, उतना ही वापस भी आना है , अगर आपको दर्द हो आप आगे मत जाइये, आगे रास्ता और भी संकरा है।”

दर्द तो हो ही रहा था! मैं सोच में पड़ गई! तभी पति बोले, “अरे! तुम जिम में इतना चलती हो, कुछ नहीं होगा! चलो! चल सकोगी!”

मुझे गिरने का, मोच आने का अनुभव नहीं था, सो मैं निश्चय नहीं कर पा रही थी कि आगे जाऊँ या नहीं। मेरे बेटे ने शायद मेरे चेहरे का दर्द पढ़ लिया और आगे बढ़कर बोला, “नहीं! आगे नहीं जाना है। पापा वापस चलो ! और अगर तुम्हारा बहुत मन है, तो तुम आगे चले जाओ, मैं माँ के साथ वापस जा रहा हूँ।” और “चलो माँ!” कहकर मेरा हाथ पकड़कर मुझे वापस ले चला। मैं उस सुनसान जंगल में अकेले वापस जाने से डर रही थी। तभी देखा कि पतिदेव भी वापस हो लिए हैं।

कुछ दूर आकर, जहाँ हम तीनों प्राणियों के अलावा और कोई नहीं था, मेरा बेटा रुका और मेरे गले लग गया तथा बोला, “मेरी लाइफ़ में तुम लोगों से ज़्यादा और कुछ भी इम्पॉर्टेंट नहीं है। तुम लोगों के बिना मैं अपनी लाइफ़ सोच भी नहीं सकता!” वह भावुक हो उठा था!

मेरा बेटा थोड़े गंभीर और कम बोलने वाले स्वभाव का है! उसके दिल की घबराहट और दर्द मैं समझ रही थी। बच्चों के लिए माता-पिता शक्ति का स्तम्भ होते हैं, उनका आदर्श होते हैं! उनको तक़लीफ़ में देखकर वो सहम जाते हैं! उसकी बात सुनकर मेरा भी दिल भर आया। मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा, “अरे! कुछ नहीं हुआ! मैं बिल्कुल ठीक हूँ! और तुम हो न! तुम्हारा सहारा लेकर तो मैं जितनी दूर कहो, उतनी दूर चल सकती हूँ!”

मैं सोचने लगी, हम गृहणियाँ एवं माँएँ अक्सर यह सोच लेती हैं कि परिवार में किसी को हमारी परवाह नहीं, हमारी हैसियत केवल काम करने वाली मशीन की है! मगर ऐसा नहीं है ! -मेरे बेटे के शब्दों ने मुझे मेरी अहमियत बता दी थी।

किसी तरह वापस उसी पथरीले, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर बेटे का सहारा लिए मैं पैदल चल पड़ी और हम सब वापस रिज़ॉर्ट पहुँच गए। मैं यह सोचने लगी कि जिस परिवार को मैं अपने से कम सामर्थ्य वाला समझ रही थी वो तो आगे बढ़ गया और हम सब वापस आ गए- ये होनी का ही तो खेल था! होनी -कब, किसको कहाँ पछाड़ दे कुछ नहीं पता !!!

इस आधी-अधूरी ट्रेकिंग ने मुझे कुछ बातें फिर से सिखा दीं (reinforced)

· यूँ तो डर के आगे जीत होती है, मगर कभी-कभी मन में उठा कोई डर किसी अनहोनी का संकेत भी हो सकता है, जिसे अंग्रेजी में ‘इन्ट्यूशन’ (Intuition) कहते हैं। इसलिए सावधान रहना चाहिए। ट्रेक पर जाने को मेरा मन पहले से ही हिचकिचा रहा था मगर फिर भी मैं गई -बेमन से!

· दूसरे की क़ाबिलियत पर कभी शक़ नहीं करना चाहिए, न ही अपने से कमतर समझना चाहिए -क़िस्मत कब, किसके साथ होगी -कुछ कहा नहीं जा सकता। हमें आधे रास्ते से वापस लौटना पड़ा, जबकि वह दूसरा परिवार ट्रेक पूरा करके, ख़ुश-ख़ुश वापस लौटा!

· कभी-कभी कोई छोटी सी दुर्घटना हमारे अपनों को, हमारे और भी क़रीब ले आती है और हमको हमारी असली जगह का एहसास करा जाती है, जो कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की आपाधापी एवं उलझनों में हम भूले हुए होते हैं। -चोट मुझे लगी, दर्द मुझे हुआ परन्तु असर मेरे बेटे पर हुआ, और एक पल को, मुझे खो देने का डर उसको अन्दर तक हिला गया –उसके भावुक मन की बात ने हम दोनों को, एक-दूसरे के प्रति इस अपार-अथाह स्नेह की अनमोल पूँजी का फिर से आभास कराया, हमें इस मधुर अनुभूति से सिंचित किया, वरना तो आज के तकनीकी युग में सारी भावनाएँ, मेल; व्हाट्सएप्प तथा इमोटिकॉन्स के सहारे ही प्रदर्शित होने लगी हैं! अपने बेटे की स्नेहसिक्त बातों के आगे मैं अपनी चोट, अपना दर्द सब भूल गई! अर्थात्–

‘दाग़ लगने से अगर कुछ अच्छा होता है, तो दाग़ अच्छे हैं न!’

और अंत में यह बात कि -ज़िन्दगी का कोई ठिकाना नहीं है! हर पल आपस में मिलजुल कर, प्रेमभाव से भरपूर जीना ही असली मायनों में जीना है।

तीन दिन रिज़ॉर्ट में रुककर प्रकृति की सुंदरता का भरपूर आनंद लेते हुए, एक-दूसरे के साथ यादगार पल बिताकर हम वापस अपने घर आ गए। 

-0-

अनिता ललित

1/16 विवेक खंड

गोमतीनगर

लखनऊ

226010

ई मेल: anita.atgrace@gmail.com

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1 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 65 : –‘दाग़ लगने से अगर कुछ अच्छा होता है, तो दाग़ अच्छे हैं न!’ -अनिता ललित"

  1. किसी किसी तकलीफ़ में भी दिल का सुकून छिपा होता है ...
    उस सुकून के मिलने पर उस तकलीफ़ का दर्द एक मीठी सी टीस
    पैदा करता है...और उस तकलीफ़ को याद करने का दिल भी ...
    ये संस्मरण भी वैसा ही था ...अपनों द्वारा दिल का सुकून मुबारक हो |

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