संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 66 : जनकपुर [नेपाल] यहाँ इतिहास जीवित है। // कामिनी कामायनी

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प्रविष्टि क्र. 66

जनकपुर [नेपाल]यहाँ इतिहास जीवित है।

कामिनी कामायनी

वर्षों से एक जबर्दस्त ख़्वाहिश थी मिथिला के राजा विदेह जनक की राजधानी देखने की। ईश्वर की कृपा से जब वहाँ जाने को प्रस्तुत हुए तो लगा, वहाँ से भी बुलावा आने पर ही लोग आते होंगे । खैर, एक बड़ी गाड़ी से हम अपने रिश्तेदारों के साथ एक अलस्सुबह छह बजे निकल पड़े थे। दरभंगा की सड़कों का कायाकल्प देखकर मैं हैरान थी। यह सड़कें ही कभी यहाँ की अभिशाप थीं। लगभग एक सौ दो किलोमीटर की दूरी पर यहाँ से जनकपुर है, जिसमें से तकरीबन बीस किलोमीटर सड़क बेहद खराब, वहाँ जगह जगह रोड़े, पत्थर आदि पड़े हुए थे, जो नवीन सड़क निर्माण की सूचना दे रहे थे।

अत्यंत खुशनुमा मौसम, चैत बैसाख का महीना, मंद मंद बहती हुई हवा। घुमावदार सड़क के दोनों ओर खूब सूरत बागीचे। एकदम वीरान, बहुत कम या नहीं के बराबर यातायात। दूर दूर कहीं कहीं बस्ती ॰ चारों तरफ गेंहू की कटाई के बाद के खुले खुले खेत .कुछ खेतों मे फसलों के बोझ बनकर रखे थे, कुछ खेत्तों में [बने खलिहानों में ]दानों को भूसे से अलग कर जमा किया गया था। इधर की भूमि बहुत उपजाऊ है और धन यहाँ की मुख्य फसल है।

दूर पास के, रास्ते के दोनों तरफ, मँझोले, छोटे, बड़े आकार के गदराए आम के पेड़ थे। हम बढ़े जा रहे थे उस अनुपम नैसर्गिक सुषमा को अपने नयनों में समाहित करते हुए, निहारते हुए। एक पुल था एक नदी थी। कुछ मील तक की सड़क धूल धूसरित, कष्ट साध्य यात्रा लगी , वहीं वीरान से एक जगह, में एक घरनुमा जगह के सामने, भारत नेपाल सीमा पर गाड़ी रोक दी गई। चेकिंग के बाद एक टोकन लेकर गाड़ी आगे बढ़ी, तो कुछ दूर पर नेपाली सीमा रक्षक ने रोक लिया। कितने लोग आ रहे हैं जा रहे हैं वगैरह वगैरह। वहाँ की रसम अदायगी के बाद हम अपनी मस्ती में आगे बढ़े। वैसा ही सब कुछ, वैसे ही वृक्ष, पोखर तालाब, जिनके किनारे एकदम साफ सुथरे, चमकता हुआ जल,, तनिक भी नहीं लगा, हम मिथिला से बाहर हैं [किसी समय यह मिथिला का ही तो एक हिस्सा था, आज नेपाल का है ]। किसी दूसरे देश जैसी बात सिर्फ चेक पोस्ट पर लगी थी। एक दो जगह रुकते हुए, करीब साढ़े दस बजे सुबह हम लोग जनकपुर पहुँच गए। पार्किंग कुछ दूरी पर थी। हम गलियों के दोनों ओर लगे तीर्थ स्थलों जैसे दुकानों से होते हुए मुख्य मंदिर परिसर के मार्ग तक पहुँचे।

खुले आकाश के नीचे गर्व से छाती तान कर खड़ा सफ़ेद संगमरमर का अलंकृत विशाल नौलखा मंदिर अपने सौन्दर्य का अनुपम, आकर्षण का जादू चारों ओर बिखरा रहा था। यहाँ मंदिर के सामने, चारों ओर बेहद खुला स्थान है, जहां समय समय पर मंदिर से संबन्धित विभिन्न उत्सव आदि होते रहते हैं।

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मुख्य मंदिर के सन्मुख से आगे बढ़कर सर्वप्रथम हम, विवाह मंडप की ओर अग्रसर हुए। वहाँ गेट पर पाँच रुपए प्रति व्यक्ति टिकट और पाँच रुपए कैमरे का देकर हम उस लोहे के फाटक को पार करते हुए उस विशाल परम पूज्य मंडप की ओर बढ़ते चले जा रहे थे । भीड़ ज्यादा थी, लोगों के आवा जाही से, हमें फोटो लेने में कुछ बाधा सी लगी थी।

इतिहास है कि इस जगह पर कभी एक प्राचीन मंडप था जो विक्रम संवत 1990 के भूकंप में धराशायी हो गया था। बाद में इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। यह पेगोडा शैली में निर्माण किया गया बहुत ही आधुनिक, आकर्षक और दर्शनीय स्थल है। इस नवीन मंडप में श्री राम जानकी विवाह के समय गवाह या साक्षी के रूप में, जितने उपस्थित बाराती और कन्यापक्ष के लोग थे, अदृश्य रूप में देवी देवियाँ मौजूद थे, सब का विग्रह बना हुआ है। ऊंचे चबूतरे के ऊपर बने मंडप की दीवारें शीशे के हैं, जिससे अंदर का दृश्य दिखाई पड़ता है। दरवाजे पर बैठे पंडित जी ने श्री रामविवाह कथा को विस्तार देते हुए कहा था, सामने सिंहासन पर श्री राम और सीताजी विराजमान हैं। श्री राम के ओर से उत्तर की ओर मुंह करके सिंहासन पर जनकजी, उनकी पत्नी, जनक जी के भाई, भाभी, और बीच में उनके पुरोहित शतानन्द बैठे हैं। सीताजी की तरफ से दक्षिण की ओर मुंह किए सिंहासन पर श्री दशरथजी, दोनों राजवंश के गुरु विश्वामित्रजी जी और वशिष्ठ जी बैठे हैं। वहाँ भीतर के खंभों में समस्त नगरनिवासियों की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ हैं, जो विवाह के समय किसी न किसी प्रकार उपस्थित थे। विवाहमण्डप के चबूतरे के चारों कोने पर चारों भाईयों श्री राम जानकी का, लक्ष्मण उर्मिला का, भरत मांडवी का, शत्रुघ्न श्रुतिकीर्ति, का कोहबर बना हुआ है। सीताजी , जनक जी की पुत्री उर्मिला, जनक जी के भाई की दोनों बेटियों का विवाह एक साथ ही, एक ही मंडप पर, चारों राजकुमारों के साथ हुआ था। इस मंडप के चारों ओर बहुत ही सुंदर और आकर्षक पार्क हैं। कुछ दूरी पर यज्ञशाला भी है।

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वहाँ से हम श्री जानकी मंदिर देखने आए। यह नेपाल का सबसे भव्य मंदिर माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण टिकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुँवर द्वारा 1894 ईसवी में प्रारम्भ किया गया था। करीब 15-16 वर्ष का समय और 9लाख रुपए इसमें खर्च हुए थे, इसलिए इसे नौ लखा मंदिर भी कहा जाता है। सीताजी का प्राकट्य स्थल अथवा जन्म तो पूनौड़ा में जमीन से हुआ, {यहाँ भी उनका एक मंदिर है }मगर लालन पालन इसी स्थल पर माना जाता है। [यहाँसीताजी की सोने की मूर्ति एक तपस्वी बाबा को मिली थी। इसलिए इसे ही वास्तविक मंदिर माना जाता है ] इस महल के विस्तृत प्रांगण में, पार्श्व में एक सुंदर संग्रहालय भी है, जहां अनेक प्राचीन दुर्लभ मूर्तियाँ, वस्त्र, आभूषण, हथियार आदि रखे हुए हैं। बरामदे के तरफ एक स्थान पर सीता जन्मोत्सव, माता द्वारा गोद में बैठा कर लाड़ दुलार करना, पुष्प वाटिका में पूजा के लिए फूल तोड़ने जाना, श्री राम और जनकनंदिनी जी का प्रथम मिलन आदि आदि उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों की मनोहारिणी झाँकियाँ प्रस्तुत की गई हैं।

यहाँ के मंदिरों के दरवाजे विशाल विशाल और जानकी रामचरित्र केसुन्दर चित्रकारियों से भरा है।

एक दूसरे पंडा जी ने यहाँ इतिहास कि इतनी खूबसूरत झलकियाँ प्रस्तुत की, कि वास्तव में रामायण कालीन दृश्य जागृत हो उठा। कहाँ रामजी का पैर जनक जी ने धोया, कहाँ दशरथ और जनक का मिलन हुआ, किस रास्ते से सीता जी की पालकी गई वगैरह वगैरह। यहाँ जटाजूट वाले अल्पवस्त्रधारी, आत्मतुष्ट साधू संतों की भरमार है। वे अपने भक्तिमय संसार में आनंदातिरेक से गोता लगते रहते हैं।

सोए सोए, सुस्त, अलसाए हुए से शहर, जनक पुर में काफी मंदिर हैं। राम मंदिर, लक्षमण मंदिर, राजदेवी मंदिर, रामानन्द आश्रम , मणिमण्डप, संकटमोचन, शिव मंदिर, नगर डीहबार मंदिर [ग्राम या नगर देवता ] तोताद्रीमठ, रानी पाटी मंदिर, युगल बिनोद कुंज, सुंदर सदन अग्निकुटी, रत्नसागर कुटी गंगा सागर, धनुष सागर, दूधमती, कुपेश्वर क्षिरेश्वर नाथ, जलेश्वर नाथ आदि। यहाँ अनेक सुंदर तालाब भी है। ऐसी मान्यता है कि जहां से सीताजी की शादी के मंडप का मिट्टी लाया गया था, वह मृतखनी बाद में मटीहानी के नाम से प्रसिद्ध हुआ है।

धनुशाधाम जनकपुर से पंद्रह किलो मीटर उत्तर पूर्व में हैं। रा मायणकाल के समय का एक मात्र जीवित और सुरक्षित, परशुराम ऋषि काधनुष अवशेष जो सीता स्वयंवर में श्री राम द्वारा खंडित किया गया था, उसके तीन खंड हुए। एक जनकपुर के ही तालाब में गिरा, दूसरा रामेश्वरम में, और तीसरा यहाँ पर। कहा जाता है कि शिवजी काधरोहर यह धनुष दधीचि की हड्डी का बना है। यह टुकड़ा निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस खंड के ऊपर एक विशाल प्राचीन पीपल का वृक्ष है। जड़ के समीप ही एक कुंड है, जिसका संबंध पाताल से है। पुजारीजी ने बताया, जब इसमें पानी कम होता है तब नेपाल पर कोई न कोई संकट आता है। ऐसा समय अभी उस वक्त आया था, जब नेपाल में राजा और उसके परिवार की हत्या कर दी गई थी। {लेकिन पंडित जी ने यह नहीं बताया कि इस बार भी पानी बहुत कम है, क्योंकि मात्र एक सप्ताह के{अप्रैल 2015 }बाद ही वहाँ भीषण भूकंप का विनाश काठमांडू सहित नेपाल के अन्य हिस्सों को भी झेलना पड़ा था। }

वहाँ रामजानकी का सुंदर मंदिर भी है, और धनुष वाले स्थान को घेर कर उसके ऊपर एक शेड बना दी गई है, एक अत्यंत विशाल घंटी भीबाहर टंगी है। यहाँ आस पास अत्यंत विशाल मैदान है जहां भांतिभांति के समारोह सम्पन्न होते हैं।

जनकपुर में विवाह पंचमी अत्यंत ही आनंद दायक उत्सव है। वहाँ पंचमी के ही दिन [अग्रहण शुक्ल पंचमी] श्रीजी का विवाह हुआ था। विवाह की सारी रीति रिवाजों को इतने मनोहर और मोहक रूप से मनाया जाता है, कि देखने वाले धन्य धन्य हो उठते हैं। इसे देखने के लिए देश विदेशों से हजारों हजार श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है।

इसके अलावा रामनवमी, जानकी नवमी, झूला, फागुनी पूर्णिमा भी धूम धाम से मनाया जाता है।

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यह नेपाल का एक बड़ा और साफ सुथरा अच्छा शहर है। यहाँ आने के लिए प्रायः अनेक स्थान से रेल मार्ग, वायु मार्ग बस, गाड़ी आदि की पर्याप्त सुविधा है। अच्छे और सुविधा सम्पन्न गेस्ट हाउस औरधर्मशालाओं, आदि की समुचित व्यवस्था है, अनेक आश्रम हैं, कुटिया है । यहाँ से काठमांडू जाने के लिए वायु सेवा भी उपलब्ध है।

यहाँ के लोग मैथिली, नेपाली, हिन्दी, धड़ल्ले से बोल रहे थे। भारतीय रुपए आराम से काम कर रहा था। छोटे बड़े सुरुचि पूर्ण ढेर सारे दुकान हैं, विदेशी समान [चीनी ]भी बिकता है, मगर अधिकांश सामान माचिस से नमक तक भारत से ही जाता है, ऐसा वहाँ के लोगों ने बताया, भारत को वे लोग अपना परम मित्र मानते हैं, और चीन से चिढ़े चिढ़े से, थोड़ा परेशान परेशान से लगे। विकास के नाम पर एक सिगरेट फैक्ट्री है, जिसे लोग चुरोट फैक्ट्री भी कहते है, यहाँ करीब 1800 सौ लोग काम करते हैं। [किसी ने कहा वह अब बंद है ] सड़कें बेहतरीन है, गाड़ी मोटर की आवाजाही कम है। लोग सीधे सादे है। चारों ओर का माहौल एकदम धार्मिक है। लगता है समय यहाँ विश्राम करने बैठ गया है।

वापसी में मार्ग के खराब रास्ते को याद कर हम सूरज के रहते ही वहाँ से निकल कर भारतीय सीमा में प्रवेश कर चुके थे। मन प्राण पर धनुर्धारी राम का पौरुष और जगत जननी सीता का बाल्य और किशोर अवस्था के साथ अभूतपूर्व विवाह की मनोहर कहानियाँ अनुगुंजित हो रही थी। सशस्त्रों वर्ष पहले हुए थे वे, मगर धरती के उस पृष्ट भूमि पर वे मानों अद्यतन मौजूद हैं, बल्कि यूं कहें कि जीवित हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह भी परम सत्य है कि विवाह के बाद एक बार भी लौट कर सीता अपने मायके मिथिला नहीं आई, और उन्हें जीवन भर असीम कष्ट मिला, इसी को गांठ बांधकर, किसी समय में लोग अपनी बेटी का जनम कुंडली नहीं बनाते थे और इस माह में बेटी की शादी भी नहीं करते, थे, मगर लोग उस परम स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ठ अपराजिता जगतजननी बेटी को आज भी अपने हृदय में बसाए हुए हैं। मिथिला को अपनी इस अपार शक्तिशालिनी कन्या पर हमेशा नाज़ रहेगा। युगों युगों तक मिथिला की भूमि जानकी जी को अपने कण कण में समाहित रखेगी।

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