संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 68 : संस्मरण आर्मी के जीवन का // मंजुल भटनागर

प्रविष्टि क्र. 68

संस्मरण आर्मी के जीवन का

मंजुल भटनागर

आप सभी स्नेहीं मित्रों से एक सच्चा संस्मरण सांझा करने जा रहीं हूँ। यह कोई छह साल पूर्व की घटना है। मेरे बेटे की शादी २२ जनवरी की तय थी। सब तैयारियां पूरी हो चुकी थी। बस मेरे बेटे को विवाह के लिए आना था घर। वो आर्मी में है और उस समय लेह लद्दाख की पोस्टिंग पर था।

आज कल जिस प्रकार बर्फ पड़ रही है शायद उस साल भी वैसे ही पड़ी होगी ऐसा में सोचती हूँ। उन दिनों मैंने एक नया आई बी स्कूल ज्वाइन किया था .इस कारण कुछ अधिक ही व्यस्त थी। शादी की तैयारियां और स्कूल की कमिटमेंट्स में यह सोच नहीं पायी की इन दिनों जम्मू के सभी मार्ग अत्यंत बर्फ बारी से बंद रहते हैं या इतनी समझ भी नहीं थी बस पंडित ने जो डेट निकाली वो ही हमने विवाह के लिए तय कर दी

चारों और खुशियों का वातावरण था मेहमान आ पहुंचे थे .मेरे बेटे की शादी २२ जनवरी की थी और उसने १० तारीख यानी दस जनवरी से छुट्टी ली .अब समस्या यों हुई कि वो १० तारीख से वो रोज लेह के एयर पोर्ट पर आता,पर बर्फ लगातार पड़ने से हवाई पट्टी तीन से चार फीट की बर्फ से ढंकी होती,  जब तक हवाई पट्टी साफ़ होती और ताज़ा बर्फ गिर जाती .प्लेन आता और चक्कर लगा कर वापिस निकल जाता .और इस तरह रोज फ्लॉइट रद्द हो जाती .यह सिलसिला रोज चलता रहा  .कोई और ओकेसन होता तो ठीक था ,मेरा बेटा छुट्टी रद्द कर देता पर यहाँ तो सब विवाह के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे और विवाह की सभी तैयारियां पूर्ण हो चुकी थी।

रोज आशा रहती उसे भी और हमें भी कि आज जरुर कोई न कोई फ्लाइट मिल जाएगी पर ऐसा कई दिनों तक नहीं हुआ और तारीख हो गयी १८ जनवरी .अब सोचिये २२ की शादी और लड़का पहुंचा ही नहीं .१९ को मेहँदी का निमंत्रण था .मेहमानों से घर भरा था .२० जनवरी को ट्रेन से सभी बारातियों के साथ ट्रैन में रिज़र्वेशन था जबलपुर के लिए .

पर दिन पर दिन बेटे की घर पहुंचने की आशा धूमिल होती जा रही थी. क्या करें क्या न करें .समझ ही नहीं आ रहा था। लड़की वालों को कुछ फंक्शन कैंसिल करने पड़े .लड़की का रो रो कर बुरा हाल था  ,उसका कहना था कि छोटा शहर है। हम क्या कहेंगे लोगों को बारात क्यों नहीं आई? इक अजीब सा डर मन में था सभी के।

घर के बड़े बुजुर्ग दूसरी डेट निकलवाओ ,पंडित को बुलाओ जैसे सुझाव दे रहे थे .पर मुंबई जैसी जगह में जहां बुकिंग भी साल साल पूर्व होती है हाल की ,पंडित की और न जाने कितनी बेशुमार बुकिंग .जिन्दगी हलक में आ रही थी .

१९ तारीख की सुबह से ही मेहँदी का निमंत्रण क्यूंकि कार्ड पर ही था मेहमान विराजने लगे अब समझ नहीं आ रहा था , जिसकी मेहँदी है वो तो पहुँचा ही नहीं .क्या करूं ,कैसी परीक्षा थी भगवन पता नहीं .बस मूर्तिवत सबका स्वागत कर रही थी .खाना पीना हुआ .सब बैठे थे कोई कुछ नहीं कह रहा था .बस सिर्फ मौसम ठीक हो जाय यही इल्तज़ा थी उस सर्व शक्ति मान से .

भोजन के उपरान्त सब लोग जाने लगे। मतलब लोकल मेहमान .तो बस यही सोच के घर के मंदिर में कुछ मेहंदी की रस्म कर ली जाय ,और कुछ टीका इत्यादि .सब पूजा घर में बैठे .कुछ रस्म के बाद भगवान् समक्ष कुछ आरती कुछ भजन मन को शांति हेतु गाये गए .कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या होगा ,नुक्सान की किसे फ़िक्र थी। जो पैसा इत्यादि बुकिंग इत्यादि में गया सो गया .

यही सोच , सब के वाक् प्रहार से बचने हेतु भगवान् के कमरे में शांत हो हाथ जोड़ बैठी भगवान समक्ष ,और भगवान् से सच्चे मन से कहा कि हे जगतनाथ तुझे तो सबसे पहले निमन्त्रण भेजा था ,तूने यह क्या कर दिया .और शायद घंटा दो घंटा कब बीत गया प्रभु के समक्ष . निराश ,असंजस की स्थिति में बैठी रही .किसी ने डिस्टर्ब नहीं किया सोचा कि परेशान हैं .

और फिर हुआ चमत्कार ,उसी समय जितनी देर मैं भगवान् के समक्ष हाथ जोड़े बैठी थी ,उसी समय एक एयर इंडिया का जहाज़ लेह की हवाई पट्टी पर दुनिया भर के रिस्क लेता हुआ नीचे उतरा और गिरती बर्फ ,बिजली की गर्जना    ,बादल की गड़गड़ाहट के बीच वो ज़ांबाज पायलट ज़हाज़ उड़ाता हुआ लेह से चंडीगढ़ तक प्लैन उड़ा कर ले आया .

डेढ़ घंटे में मेरा बेटा चंडीगढ पहुँच गया था .और हैरानी की बात है उसके इक महीने तक लेह में इतनी बर्फ गिरी कि कोई भी फ्लाइट न वहां उतर सकी न कोई वहां जा सकी .

मैं पूजा के कमरे से बाहर आई और मेरी बात हुई फ़ोन पर अपने बेटे से ,"माँ में आ रहा हूँ" .आँसू रुक ही नहीं रहे थे मेरे  .

आमीन

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