संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 71 : अभिमन्यु (एक संस्मरण) // अनघा जोगलेकर

प्रविष्टि क्र. 71 : 

अभिमन्यु (एक संस्मरण)

अनघा जोगलेकर


बचपन से ही पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं में मेरी दिलचस्पी रही है। दादी से, नानी से, माँ से रामायण और महाभारत की बहुत सी कथाएं सुनी हैं लेकिन जिस कथा ने मुझे सबसे अधिक झकझोरा, वह थी अभिमन्यु के चक्रव्यूह की कथा।

इस कथा को मन के किसी कोने में सुरक्षित रख, मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई। ईश्वर में अटूट विश्वास होने के साथ ही विज्ञान में रम गई। मुझे याद है हमारे विज्ञान के अध्यापक कहा करते थे, "विज्ञान पढ़ना, पढ़ाना एक बात है लेकिन उसे समझते हुए जीवन से जोड़ना कठिन कार्य है।"

उनकी इस बात को दिमाग में बैठा, मैं जीवन में आगे बढ़ गई। अभियंता की डिग्री हासिल कर मैंने अपने नए जीवन में पदार्पण किया।

विवाह के पवित्र रिश्ते को निभाते हुए दिन बीतते गए और एक दिन एक सुखद एहसास ने मेरे जीवन की बगिया को महका दिया।

बड़े बुजुर्गों ने भी अपने-अपने सुझाव, सलाहों की पोटली खोलनी शुरू कर दी। कोई कहता, "देख बिटिया, इन दिनों बहुत काम किया कर ताकि डिलेवरी में आसानी हो।" तो कोई कहता, "खूब हरी सब्जियां खाया कर और हाँ, दूध पीना न भूलना ताकि बच्चा तन्दुरुस्त पैदा हो।"

सासूमाँ कहतीं, "रोज रामायण पाठ किया कर बहु। बच्चे पर अच्छे संस्कार डलेंगे।" तो माँ कहती, "बेटा, इन दिनों रोना बिल्कुल भी नहीं। नहीं तो बच्चा रोतलु पैदा होगा।" फिर प्यार से मेरे सर पर हाथ फेर कर कहती, "हमेशा हंसती रह मेरी बच्ची।"

मैं सबकी बातें मानती। सबकी बातों में तथ्य तो थे ही। इसी बीच कब मेरे मन और दिमाग के वे दो कोने एक हो गए पता ही न चला। विज्ञान के अध्यापक की कही बात और दादी की सुनाई अभिमन्यु की कहानी एकाकार हो गई और मैंने एक प्रयोग करने की ठानी।

मैं सोच रही थी, "जिस तरह अभिमन्यु ने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह को भेदना सीख लिया था, क्यों न मैं भी अपनी होने वाली संतान को गर्भ में ही किसी कला से अवगत करा दूँ।"  उन दिनों अचानक ही मुझे संगीत से लगाव हो गया था। अपने में इस यकायक आए परिवर्तन को ईश्वर का संकेत समझ, मैं तरह-तरह के वाद्ययंत्रों की ढेर सारी सीडी ले आई।

बड़ों की कही बातें पूरी करने के बाद जो समय बचता उसमें मैं यह सीडीज़ सुनती। जलतरंग, तबला, गिटार, पियानो...... सारे वाद्ययंत्र झंकृत हो उठे। मेरा जीवन संगीतमय हो गया। दिमाग शांत और मन ईश्वरीय अनुभूति से परिपूर्ण हो उठा। मेरे दिन रात महक गए। गर्भस्थ शिशु भी संगीत की ताल पर हिलोरें लेने लगा।

निश्चित समय पर मेरे पुत्र ने जन्म लिया। मुझे लगा जैसे स्वयं ईश्वर ही मेरी गोद में आ विराजें हों। समय बीत रहा था। वह तिल-तिल बढ़ रहा था।

अभी वह तीन वर्ष का ही हुआ था कि उसने पहली बार खाने के टेबल पर अपनी उंगलियाँ चलाईं। मेरे कानों में मिश्री सी घुल गई मानो कोई प्यारी सी धुन बजी हो।

मैं भाव-विभोर हो उठी। मेरा प्रयोग सफल होता दिख रहा था। लगा जैसे उसने गर्भ में ही शुरुआती संगीत सीख लिया हो। नींव तैयार थी। बस इमारत बननी बाकी थी।

आज वह ग्यारह वर्ष का हो गया है। संगीत ही उसका जीवन है। संगीत ने उसे सकारात्मकता से भर दिया है।

जब भी उसे तन्मय हो पियानो बजाते देखती हूँ तो सालों पहले किये अपने प्रयोग की सफलता पर खिल उठती हूँ। जानती हूँ कि मेरा अभिमन्यु संस्कारों से परिपूर्ण हो, जीवन के कुरुक्षेत्र में उतरने के लिए तैयार हो चुका है और वह चक्रव्यूह भेदकर, सफल होकर ही बाहर निकलेगा, ये विश्वास भी है।

@अनघा जोगलेकर

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