संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 73 : यहाँ दरख्त बोलता है ...... // नीतू मुकुल

नीतू मुकुल

प्रविष्टि क्र. 73

यहाँ दरख्त बोलता है ......

नीतू मुकुल

काला पानी......... हाँ इसी एक शब्द ने बचपन से मेरी विश लिस्ट में अपनी जगह बना ली थी। अक्सर जब शैतानी करती तो मम्मी गुस्से में कहती,तू मेरी बात नहीं मानोगी तो काला पानी भेज देंगे। फिर किताबों में काला पानी और क्रांतिकारियों की यातनाएं पढ़ पढ़ कर लालसा एक बार वहां जाने की और प्रबल हो गयी। इसलिए जब मेरे पति ने नए साल के सेलिब्रेशन के लिए वहां जाने का प्रोग्राम बनाया तो मन बल्लियों उछलने लगा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह छुट्टियों का आनंद उठाने का खूबसूरत सैरगाह है। समुद्री लहरों और ऊंची ऊंची दिल को झकझोर देने वाली मंद बयार में झूमती नाचती ताड़ की पत्तियां, सफ़ेद रेत वाला सागर तट, समुद्री चट्टानों पर प्रहार करती धाराओं की आवाज , हरे भरे मानसूनी जंगल और दुर्लभ पक्षियों की चहचहाहट। इन सभी चीजों को समेटे संसार का नाम है अंडमान निकोबार द्वीप समूह है। फोटो ग्राफी के शौक़ीन कुछ घुमक्कड़ किस्म के कुछ दोस्त भी साथ थे। हम जयपुर से शाम की फ्लाइट से दिल्ली निकले। फिर दिल्ली से दूसरी फ्लाइट से कलकत्ता होते हुए हमें अंडमान पहुंचना था। दिल्ली से हम उड़े तो कलकत्ता में एक घंटे फ्लाइट में ही बैठे रहे। एक घंटा एक साल प्रतीत हो रहा था। मैं जल्दी से जल्दी उस सपनों के टापू में पहुंचना चाहती थी। मन में ढेरों सवाल थे। कैसे लोग वहां रहते होंगे? क्या उस टापू में जीवन उतना ही सरल होगा जैसे हम लोगों का है ? चारों तरफ पानी के बीच में टापू का कितना सुंदर नजारा होगा। उस नज़ारे को मैं अपने अंदर कैद करना चाहती थी। आसमान में रुई के सफ़ेद फाहे से बादल और उन बादलों के बीच में समुद्र का हिलता नीला पानी ऊंचाई से देखने पर ऐसा प्रतीत होता जैसे बादलों के बीच में नीली लहरें हिलोरे खा रहीं हो। आसमान में उड़ते जाना और पूरब का नारंगी से लाल होता सूरज , आसमान में बादल ऐसे बिखरे थे जैसे स्कूल की आखिरी घंटी के बाद गेट के बाहर बच्चों की चटर-पटर करती फौज हो। पूरब स्कूल की पहली घंटी और पश्चिम आख़िरी घंटी के इंतज़ार का नाम है। एक इंतज़ार के दम पर अच्छे और बुरे पल बखूबी जिया जा सकता है। इंतज़ार बड़ा वंडर शब्द है। आखिर हमारा इन्जार ख़त्म हुआ और कुछ ही पलों में हम अंडमान की जमीन पर थे।

नैसर्गिक धरातल पर अद्भुत जीवन...

हमने पहले ही सारा पैकेज टूर बुक करा लिया था। हमारे पहुंचते ही एक व्यक्ति गाड़ी लेकर पहुंच गया। उनके साथ हम लोग होटल चल पड़े। एअरपोर्ट से होटल तक का सफ़र काफी ऊंचा नीचा था। हम जैसे ही होटल के अन्दर गये , मन एकदम रोमांचित हो गया। वातावरण में एक भीनी भीनी अगरबत्ती की खुशबू फ़ैल रही थी शायद थोड़ी देर पहले ही पूजा की गयी थी। उस सुगन्धित महक ने हमारी थकान एकपल में उतार दी। दोपहर में एक अच्छी नींद लेने के बाद हम फिर घूमने निकले। हम अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में थे। यहाँ पर पर्यटकों की सुविधा और मनोरंजन हेतु कई इंतजाम किये गए हैं। यहाँ पर जल क्रीडा की भी व्यवस्था थी। जब हमारे टूर गाइड ने घुमाने की जगह के बारे मैं बताया तो मैंने आदिवासी संग्रहालय जाने की उत्सुकता जाहिर की। वहां पहुँच कर हम लोगों नें करीब से रहन सहन के बारे में जाना और उनके हांथों के बने सामाने को देखा और सोचने लगी कि कितना सहेजते हुए उन्होंने नैसर्गिक प्रकृति को हम सभी को सौंपा। क्या मैं आने वाली पीढ़ियों को वैसे ही सौप पाऊँगी। इसके बाद हम समुद्र तट पट गए। या खुदा ...! सर्द हवाओं ने जैसे अंडमान में भी सर्दी का एहसास करा दिया था। सूर्य अस्त की लाली की आभा में लिपटी ये लहरें कभी सोने सी तो कभी चान्दी सी प्रतीत हो रहीं थी। हम सब ने जम कर फोटोग्राफी की। इधर उधर भागते भूख का एह्सास होने लगा।

सामने टपरी में चाय की दूकान थी। हम सब वहां पर पहुँच गए। हम सबने चाय मांगी, तो चाय वाली ने बड़ा अजीब सा सवाल किया , काली या सफ़ेद ? हमने देखा वहां पर बैठे ज्यादातर लोग काली चाय पी रहे थे। उसने हमारी चाय में मिल्क पाउडर डालकर चाय हमारी तरफ बढ़ा दी। पूछने पर पता चला यहाँ पर दूध बहुत महँगा है। दूध देने वाले जानवर न के बराबर है। पूरे पोर्ट ब्लेयर में एक ही गौशाला है। जिसका दूध तो केवल अमीरों के रसोई घर में ही मिलता है। वहां पर दूध से बनी चीजें भी नहीं मिलती। टापू पर जीवन बहुत कठिन था। हरी सब्जियां , खाने पीने और पहनने सभी चीजों के लिए मद्रास या कलकत्ता के बाजारों में ही निर्भर रहना पड़ता था। वहीं से सामान भर भर कर आता और पहुँचने में तीन तीन दिन लग जाते , इन सबके बावजूद जब हम पोर्ट ब्लेयर की मार्केट में खड़े हुए तो लगा हम अपने ही शहर में है। ढेरों आती जाती गाड़ियां ऐसा कोई सामान नही था जो उस मार्केट में मौजूद नहीं हो। चारों तरफ पानी के बीच में खड़े होकर गोलगप्पों का मजा ले रहे थे। स्वाद और कीमत वही। मैंने अपने ड्राईवर से पूछा कि यहाँ लाइट का बंदोबस्त कैसे है। उसने बताया कि यहाँ कोई पॉवर हाउस नहीं है। सरकार की तरफ से बड़े बड़े जेनरेटर लगे हैं। वही हमारा पॉवर हाउस है, जिससे पूरे टापू में बिजली सप्लाई होती है। तभी एक प्रश्न और दिमाग में कौंधा कि एक तरफ खारे पानी का फैला संसार और दूसरी तरफ मीठे पानी की उपलब्धता। ये सब कैसे संभव है ? उसने कहा कि हम सभी प्रकृति के संयोजन में ही जीते हैं। बरसात के पानी को इकट्ठा करते है जिसे सरकार घरों में नलों द्वारा पहुंचाती है और उसका उपयोग बड़ी ही किफायत से करते हैं। हाँ ...कहीं कहीं मीठे पानी के स्रोत भी पहाड़ियों में मिल जाते हैं। तभी हमारी नजर सामने मकान में लगे आम के पेड़ पर गयी , देखा उसमे छोटी छोटी केरियाँ लगी थीं , हम आश्चर्य से भर गए कि माघ के महीने में आम ......! मैं सोच रही थी कि यहाँ पर काला पानी जैसा कुछ भी न था , तभी हमारा ड्राईवर बोला , मैडम जल्दी करिए सेलूलर जेल में लाइट एंड साउंड शो शुरू हो जाएगा। मैं अपने बचपन की विश पूरी करने चल पड़ी।

परछाइयों में गूंजता इतिहास

इसकी नींव 1897 में रखी गयी थी। इसके अन्दर कुल 634 कोठरियां हैं। इस जेल में वीरसावरकर, गणेश दत्त सावरकर और बटुकेश्वर दत्त सहित अनेक क्रांतिकारियों को यहाँ भीषण यातनायें दी जातीं थी। इन देश भक्तों को कोल्हू के बैल की तरह तेल निकालने के लिए जोता जाता था। और इन लोगों को खाने पीने के नाम पर सडा-गला और दो वक़्त का पानी दिया जाता था। जेल इस तरह बनी हुयी है कि कोई कैदी एक दूसरे को न देख सके।

एक घटे बाद लाइट एंड साउंड शो शुरू हुआ। हाँ...! बोलने वाला दरख़्त यहीं आकर देखा, जिसने मुझे हमारे क्रांतिकारियों के साथ हुए जुल्मों की दास्ताँ सुनायी। उस दरख़्त नें सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। बड़ा भाग्यशाली है वो दरख़्त जिसने इतने महान देशभक्तों को देखा और उतना दुर्भाग्यशाली भी कि उन पर होते हुए अत्याचार का प्रत्यक्ष गवाह बना। दरख़्त के मुंह से उन क्रांतिकारियों की कहानी सुन हम कुछ देर वहीं शांत बैठ गए, लगा हम उस पल में पहुँच गए। यकायक मुझे अपनी विश लिस्ट याद आ गयी। उस रोज जिन्दगी इतने करीब बैठी थी कि उसकी गर्माहट हथेली पर महसूस कर सकती था। सारे सुख मीठे ताप से पिघलते नजर आ रहे थे। उन पलों में दिल सारी कायनात को सजदा करना चाहता था, दिल दुखाने वालों को बिना शर्तों माफ़ करना चाहता था। उस उजास भरी शाम को मैंने अपनी मुट्ठी में भर लिया। एक पल में संसार की सबसे रईस लड़की बन गयी। कुछ पल यूं ही बैठे रहे। भूख का एहसास होने लगा। मैंने एक बार उस जेल को नहीं .... नहीं....., मंदिर को बेहद मोहब्बत भरी निगाह से देखा और शुक्रिया कहा। मेरी जिन्दगी की एक यादगार शाम यहीं आकर मिली थी। जब तक सफ़र को थोड़ा अपने अन्दर न ले जाएँ तो उनका क्या फायदा। फिर हम पास बने होटल में खाना खाने आ गए। आश्चर्य हुआ कि इतनी मुश्किल से रसद यहाँ तक पहुंचती है। हमें लगा यहाँ खाना महँगा मिलेगा पर हम सरप्राइज हो गए कि दाम वही।

संघर्ष और प्रकृति का अनूठा संयोजन

दूसरे दिन सुबह 9.00 मैं बजे बारहटांगा पहुंची। वहां के ढलान दार सड़कें, उसके दोनों तरफ हरे सोने की वादियां, बीच-बीच में आदिवासियों के घास फूस से बने घर दिखाई दिए। बहुत ही अद्भुत नजारा था। सरकार ने इन्हें प्रोटेक्ट करने के लिए कुछ नियम बनाए हुए हैं। हम उन नियमों का पालन करते आगे बढ़ रहे थे। तभी कुछ आदिवासी नजर आए,वह एक पूरा परिवार था। एकदम काले , ना ही कपड़े पहन रखे थे, हाथों में धारदार बड़ी से चाकू थी, औरतों ने आदिवासी जेवर पहन रखे थे। होंठों पर कुछ लाल रंग लगा हुआ था| बारहटांगा के जंगलों को रेनफॉरेस्ट भी कहते हैं। अधिक हरियाली की वजह से वहां हर समय नमी रहती है। वहां की आस पास की वादियां मन की सारी पीड़ा दूर कर देती हैं। अंडमान में हमने देखा वहां बसे आसपास के टापू पर जन जीवन पूरी तरह पोर्ट ब्लेयर पर निर्भर है। यहीं पर हमने देखा कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए लोग बस और कार को पानी के जहाज पर रख कर ले जाते हैं| बातों बातों में एक व्यक्ति ने बताया कि हम इसी तरह कार और बस में बैठकर सफर करते हैं। आधा सड़क पर आधा पानी में तभी हमारे सफर को मंजिल मिलती है। जहाज की आखिरी खेप शाम 6:00 बजे बंद हो जाती है क्योंकि वहां दुर्लभ जीव-जन्तु भी मौजूद है| यहाँ पौधों और जंतुओं के करीब डेढ़ सौ प्रजातियाँ ऐसी हैं जो सिर्फ यही मिलती हैं। कुल क्षेत्रफल का 1105 प्रतिशत भाग मैंग्रूव के जंगलों से आच्छादित है। समुद्र में उगे इन मैंग्रूव की लयबद्धता देखने लायक होती है। हम पहले जहाज फिर वोट से लाइमस्टोन केव पहुंचे। प्रकृति कि ऐसी खूबसूरत छटा देखते ही बनती है। इसकी सुंदरता का बयान कर पाना शब्दों में मुश्किल है। जहां तक नजर जाती है वहां तक समुद्र और मैंग्रूव के पेड़ नजर आते हैं। लाइमस्टोन केव जाने के लिए इन्ही के ऊपर छोटे-छोटे लकड़ी के पुल बनाए गए। कच्ची पगडंडी पर पैदल चलकर ही जाना था| गुफाएं काफी अंदर थी| करीब 3 किलोमीटर का रास्ता था। हम-सब को सूरज की तीखी धूप से प्यास लगने लगी। पर वहां तो कुछ नजर ही नहीं आ रहा था| केवल चार-पांच घर दिखाई दे रहे थे| जिनके बाहर अनाज फैला था| वहां कुछ औरतें इसको साफ कर रहीं थी। मैं सोचने लगी कि समुद्र के अंदर इस छोटे से टापू पर यह लोग कैसे रहते होंगे| ना तो वहां नेटवर्क था ना, कोई अन्य साधन जिससे आप बाहरी दुनिया का हाल जान सके। पूछने पर पता चला कि वह हर चीज के लिए समुद्र का 45 मिनट का सफर करके बारहटांगा जाते हैं| सोचो कितनी टफ लाइफ जीते होंगे।

एक दम थक गई मेरे पति मुझसे काफी आगे निकल गए| मुझे प्यास के मारे चला न जा रहा था| खैर कुछ दूर जाने पर देखा एक जगह भीड़ थी वहां लोग नींबू पानी पी रहे थे और वहीं मेरे पति नींबू पानी का गिलास लिए खड़े थे। मैंने झट से उनके हाथों से गिलास लिया और एक ही सांस में पूरा गिलास पी गयी। जानते हैं आप..! समुद्र के बीच इस टापू में मैंग्रूव के जंगलों में खड़े हम मीठा नींबू पानी पी रहे थे। सब कुछ अपने आप में अनूठा अनुभव था| फिर हम आगे बढ़ गए| गुफाओं में पहुंचकर कुदरत का अद्भुत नजारा देखने को मिला। हर एक आदमी अपने कैमरे में प्राकृतिक छटा को कैद करना चाह रहा था| फोटो लेने की होड़ सी मच गई थी| बहरहाल हमें अंधेरा होने से पहले वापस बारहटांगा तक पहुंचना था| रास्ता भी दुर्गम था, हमारे साथ जो नाविक था बोला आप लोग फटाफट फोटो लेकर वापस चले, नहीं तो जहाज नहीं मिलेगा। अगले 10 मिनट तक हम लोग फोटो ले सकते थे, डर से ज्यादातर लोग 5 मिनट में वापस आ गए। तभी मैंने देखा दो ओल्ड अंग्रेज लेडी आराम से नजारों को अपने कैमरे में कैद कर रहीं थी। मैंने उन्हें पास जाकर बताया कि हमें जल्द वापस लौटना है। इसलिए आप शीघ्रता से फोटो लेकर अपने ग्रुप में शामिल हो जाएँ। वो मुझे धन्यवाद देने लगीं। फिर हमने साथ में कुछ सेल्फी ली और खेत की मेड़ पर चलते हुए अपनी अपनी मंजिल पर आगे बढ़ गए। बहरहाल आज का दिन काफी खूबसूरत रहा, सूर्यास्त से थोड़ा पहले हम वापस अपने ठिकाने पर लौट आये।

पानी की गहराइयों में उतरता जीवन

तीसरे दिन हम फिर सुबह 6:00 बजे नार्थ बे के लिए निकले| सड़क के दोनों ओर समुद्र की सफ़ेद रेत नजर आ रही थी। हमने वहा पहुंचकर सबसे पहले स्कूबा डाइविंग करने के लिए टिकट लिए, क्योंकि मेरे बेटों को इसका बहुत इंतजार था। वह अंडमान आए ही थे स्कूबा करने के लिए। यह उनकी एक विश थी। खैर मैंने भी मौके का फायदा उठाते हुए अपनी विश में स्कूबा को शामिल कर लिया। पर पानी से डर लगता था। कुछ ही देर में पति टिकट ले कर आ गए| फिर अपने सफ़र पर बढ़ गए| चारों तरफ सिर्फ पानी पानी, दूर-दूर कोई जीवन नजर नहीं आता। यहां आने वाले पर्यटकों को चारों तरफ फैला समुद्र रोमांचक वाटरस्पोर्ट्स के खूब अवसर प्रदान करता। खास तौर से अगर आप स्कूबा डाइविंग के शौकीन हैं तो भरपूर मज़ा ले सकते हैं| समुद्र के अंदर सम्मोहित करने वाली दुनिया में आप यहां हजारों तरह की रंग बिरंगी मछलियां, अन्य जीवों, मूंगे व् पन्ने की चट्टानों और कुछ डूबे हुए जल पोतो का रहस्य अवशेष भी देख सकेंगे।

इसके बाद हमलोग स्कूबा डाइविंग के लिए ड्रेसअप हुए। पहले हमें 15 मिनट की ट्रेनिंग दी गई । ट्रेनिंग के दौरान मैं और मेरे पति तो हिम्मत हार गये। बच्चे छोटे होने के बाद भी डाइविंग करने 17 से 18 फिट अंदर गए, पर मैं एक जगह जड़़वत हो गई| जब तक बच्चे वापस न आ गए मेरी सांस रुकी रही, जब बच्चे बाहर आए तो बहुत खुश थे। चीख चीख कर बता रहे थे हमने वहां कोरल देखे , केकड़े देखे , तरह तरह की मछलियाँ देखी, उनको हाथों से छुआ। फिश ने उनके पैरों में गुदगुदी की। इन सारी क्रियाओं का उन लोगों ने मेरे दोनों बच्चों का पानी के अंदर वीडियो बनाया और महज एक घंटे में सीडी में डालकर दे दी। इसके बाद हम लोगों ने वहां पर वेज पुलाव खाया। स्वादिष्ट और फ्रेश था। इसके बाद हम सभी वापस पोर्ट ब्लेयर आ गए।

क्यों न पैदा हो रोमांस ..

चौथे दिन हम लोग हैवलाक के लिए शिप से निकले। उस दिन नए वर्ष का सूरज शिप की डेक में ऊपर चढ़ कर देखा जो हमें नए वर्ष की शुभकामनाएँ देने आ गया था। नए वर्ष का पहला दिन होने के कारण पूरा शिप रंगमय था। बच्चे और बूढ़े सभी उत्साह से भरे थे। उत्साह इतना कि एक सत्तर का पड़ाव पर कर चुकीं भद्र महिला भी “मेरे रसके कदम” में थिरक रहीं थी जिन्हें देख कर शिप का माहौल और रूमानी होगया और हम सभी के पैर भी उसी ताल में लय बद्ध हो गए। अचानक मेरे पति ने आवाज लागाई कि देखो मै तुम्हे उड़ने वाली मछलियाँ दिखाऊँ। पहले तो विश्वास नही हुआ , पर देखा तो हतप्रभ हो गयी। नाचते गाते हम सब हैवलाक पहुंच गए। सफेद रेत के तट पर बने राधा कृष्णा रिसोर्ट में हमसब रुके| कुछ देर आराम करने के बाद हम सब सनसेट देखने पहुंचे। वहां पहुंच कर ऐसा लगा कि समुद्र में सोना पिघला कर डाल दिया गया हो। हम रेत पर चलते और हमारे पैर रेत में फंस जाते। पैर तो आगे बढ़ जाते पर चप्पल रेत में दब जाती फिर वापस कदम खींचते , हाथ से चप्पल निकालते, पहनते और आगे बढ़ जाते। ये सब करने में हम सब बच्चे बन गए| तभी मम्मी का कॉल आया पर बात ना हो सकी बार-बार उनका काल आ रहा था पर नेटवर्क की प्रॉब्लम की वजह से बात ना हो पा रही थी। पास ही एक दुकान थी। फोन रिचार्ज, कॉफी शॉप किराना शॉप, सारी खूबियां एक ही दुकान में मौजूद थीं। हमने उसे अपनी अपनी समस्या बताई, बोला आप लोग गरमा-गरम कॉफी पियें, तब तक मैं आपकी परेशानी का हल ढूंढता हूं। थोड़ी देर में उसने एक फोन से हमारी मम्मी से बात करा दी। हम सब सुरक्षित हैं यह जानकर वो खुश हो गईं।

हम लोग हैवलाक में 2 दिन रूके, पर जब काफी पीने का मन करता तो उसकी दुकान पर जाते। बातों-बातों में उससे पूछा क्या तुम बचपन से ही यहाँ पर हो। बोला हमारा परिवार बिहार से है। तो फिर तुम यहाँ कैसे ..? बोला मेरे दादा अंडमान में आकर बस गए थे, तब से तीन पीढ़ी हम यहीं पर है, आगे बताने लगा जब देश आजाद हुआ तो सरकार ने घोषणा की यहां पर रहने वालों को मुफ्त जमीन और नौकरी दी जाएगी। ज्यादातर यहां बसने वाले गरीब थे जिनको ढंग से भोजन तक न मिलता था वो यहां आकर संपन्नता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यहाँ मुश्किल से दस हजार लोग रहते हैं। सभी एक दूसरे को भली भांति जानते हैं| यहां न कोई अमीर है न गरीब है, सब एक बराबर, सब लोग आपस में बड़े प्यार से रहते हैं। हम लोग यहाँ घरों पर ताला लगाना भी जरुरी नहीं समझते, यह कहते हुए उसने दुकान के सामने दीपक जला दिया। उसी समय दो बच्चे कुछ खरीदने आए बोले अरे यहाँ तो दीपक जल गया, चलो वापस चलें। मैंने उससे पूछा यह दिया देखकर वापस क्यों चले गए ? वह बोला यहाँ इसका मतलब होता है दीपक जल गया मतलब दुकान बंद हो गई। आज एक नई परंपरा से रुबरु होने का मौका भी मिल गया। दूसरे दिन हम काला पत्थर बीच पहुंचे। सर्वोत्कृष्ट आनंद...! सागर किनारे सुकून भरा बसेरा चाहते हैं तो एक बार यहां सब को जरूर आना चाहिए| जहां तक निगाह जाती है वहां तक समुद्र अपनी नीली आभा बिखेर रहा था। यह जगह फोटोग्राफी के लिए सबसे उपयुक्त है| हमने जमकर जमकर पोज दिए और कैमरे की मेमोरी फुल कर दी। उसके बाद हम सब ने राधा नगर बीच पर नहाने का आनंद लिया, जब तक सूरज चमकता रहा तब तक हम समुद्र के अंदर रहे| जैसे जैसे सूरज की तपन कम होने लगी लहरों की गति और आवाज तेज होती गई| नहाने के बाद बाहर पास ही गरमा-गरम बेसन और पालक के पकौड़े का आनंद उठाया।

यह हमारा आखिरी पड़ाव था। अब हमें वापस जाना था| बहुत कुछ देख लिया बहुत कुछ देखना बाकी था। अभी इस तरह के और कई टापू थे जिनके बारे में हमें जानना था और उसकी सुंदरता अपने साथ बटोर कर लानी थी, खैर कुछ रह जाएगा तभी हम दुबारा अंडमान आयेंगे। सुबह 6:00 बजे वापस कलकत्ता को निकलते हुए सोच रही थी कि इस यात्रा ने क्या दिया..? जवाब मिला खुद से रुबरु होने का, इतिहास को जीने का, और यायावरी के जरिए दुनिया को समझने का मौका मिला।

  मैं समृद्ध,संतुष्ट और प्रसन्न थी ....................................|

नीतू मुकुल

जयपुर


परिचय

1. रचनाकार का पूरा नाम -- नीतू मुकुल

2. पिता का नाम-- श्री प्रभु दयाल खरे

3. माता का नाम-- श्रीमती कमला खरे

4. पति का नाम-- डॉ श्रीपति वर्मा

5. वर्तमान / स्थायी पता--

209 , मुक्तानंद नगर , पूजा टावर के सामने ,गोपालपुरा बाईपास पुलिस चौकी के पास, जयपुर , (राज.)

6. ई-मेल--  neetumukul2015@gmail.com

7. शिक्षा / व्यवसाय-- एम्.ए ( राज नीति शास्त्र ) ,/----

8. प्रकाशन विवरण-– लगभग दो दर्जन कहानियां प्रकाशित

I. भारत-भारती ( ऑस्ट्रेलिया ) --- लघु कथा “बिना छाँव का दरख्त” अंक जुलाई 2017

II. साहित्य-कुञ्ज (कनाडा)--- कहानी “उसके मुकम्मल रिश्ते” अंक – अप्रैल 2017

III. कादम्बनी ---- कविता का प्रकाशन , अंक – मार्च 2017

IV. गृहलक्ष्मी --- कहानी “ज़ज्बा” का प्रकाशन , अंक –

V. गृहशोभा ..... कहानी “कोख का मुआवजा”, अंक – जून (द्वितीय ) 2017

VI. वनिता ..... लघु कथा “ साहस,श्रद्धा और समर्पण” अंक –मई-2017

VII. सरस सलिल ... कहानी “किसना” अंक-अप्रैल 2017

VIII. होम मेकर .... कहानी “किराए की बेटी” अंक – जुलाई 2016

IX. आह जिन्दगी .... “आखिर कसूर क्या था” अंक – नवम्बर 2017

X. सरिता ... लेख अंक .


अन्य उपलब्धियां ...... एक कहानी संग्रह “ऐसा प्यार कहां” प्रकाशित

आकाशवाणी इंदौर, जयपुर से कहानियों का प्रसारण.

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग दो दर्ज़न से अधिक कहानियों का प्रकाशन.

मध्य प्रदेश के दैनिक अखबारों में लघु कथाओं का प्रकाशन.

अभिरुचि... स्त्री विमर्श और स्त्री चेतना के सन्दर्भ में चिन्तन एवं लेखन तथा संगीत गायन

नीतू मुकुल

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