संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 75 : संस्मरणात्मक कहानी - 15 जनवरी की वो काली रात................. // नीतू मुकुल

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

प्रविष्टि क्र. 75

15 जनवरी की वो काली रात.................

नीतू मुकुल

‘इन सारी घटनाओं को देखते हुए कोर्ट ये फैसला करती है कि अपराधी अभी नाबालिग़ है और जुर्म भी पूरी तरह अंजाम तक नहीं पहुंचा .... पर अपराध करने का प्रयास भी अपराध है अतः इस बच्चे को दो माह के लिए बाल सुधार गृह में भेजा जाय....’ यह कहते हुए जज साहब कुर्सी सरका कर खड़े हो गए।

किशोरी लाल अचकचा कर उठे और देखा कि घड़ी अभी भोर के ४.३० बजा रही है। पास रखे चद्दर को उठाकर अपने माथे का पसीना पोंछा , बाहर कड़ाके की ठण्ड थी और किशोरी लाल पसीने से तर-बतर। पास सो रही पत्नी ने उनींदी आँखों से किशोरी लाल को देखा और मन ही मन बुदबुदाई कि फिर वही रोज की नौटंकी ... भूल क्यों नहीं जाते सब कुछ।

किशोरी लाल उम्र के पचासवें पड़ाव पर थे। ये उनके जीवन का काला सच था जिसे वो सालों से याद करके रात के ठीक ४.३० बजे जाग जाते थे इन बीते सालों में बहुत कुछ बदला पर इस तरह घबराकर उठ जाना जैसे कल की ही बात हो , इसके बाद वो खूंटे पर टंगे अपने स्वेटर को उठाते फिर गौशाला में जाते और फिर वापस आकर सो जाते। सालों से जीवन ऐसे ही चल रहा था। इधर कुछ दिनों से किशोरी लाल का स्वास्थ्य दिनोंदिन गिरता जा रहा था , इसलिए पत्नी के कड़े आदेश थे कि सुबह जल्दी नहीं उठना है और सैर के लिए भी ७ बजे से पहले जाने की इजाजत न थी। बहरहाल इसी कारण उन्हें अपने नित्य कर्म , पूजा पाठ में थोड़ा विलम्ब हो जाता था। पहले जहां वो सुबह ९ बजे अपनी गद्दी पर बैठ जाते थे ,आजकल ११ बजे से पहले न पहुंचते। ऐसे ही एक दिन पूजा करके उठे ही थे की पत्नी ने आकर आवाज लगाई

‘ सूरज के बाबू , आपसे कोई महिला मिलने आयी है।’

‘कौन ये काम के बखत आ गयी।’ सीढ़ी से उतरते देख महिला उठ खड़ी हो गयी ,

‘ अरे आप बैठिये , माफ़ करिएगा मैंने आपको पहचाना नहीं।’ चश्मे को आँखों पर और चढ़ाते हुए बोले।

बड़ी सरलता से वो महिला बोली ‘ सर आप मुझे कैसे भूल सकते है , मैं तो आपकी ज़िन्दगी का वो पन्ना हूँ जिसकी वजह से आपकी जिन्दगी में अन्धेरा छा गया।’

‘ क्या ?? नीरजा ....?’ किशोरी लाल के चेहरे पर कई भाव आने जाने लगे। लड़खड़ाकर गिरने ही वाले थे कि हमेशा की तरह उनकी जीवन संगिनी ने आकर थाम लिया। माहौल में सन्नाटा छा गया। उस सन्नाटे को तोड़ती हुयी नीरजा बोली

‘ सर मैं आपसे माफी मांगने आयी हूँ , जानती हूँ मेरा जुर्म माफ़ नहीं किया जा सकता ....।’

फिर हाथ जोड़कर बोली ‘उम्र के इस पड़ाव पर मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा है।’

किशोरी लाल भड़क गए और बोले ‘ आप मेरे घर से चलीं जाएँ .. वैसे भी मैं औरतों का अपमान नहीं करता , मुझे उस घटना पर कोई बात नहीं करनी , खैर आपने वही किया जो आपको नजर आया। जब सच कोई देखना ही न चाहे तो कोई कुछ भी नहीं कर सकता। नीरजा मेरे पास अब कुछ भी नहीं बचा , तुम मुझसे क्या बात करोगी।’

नीरजा बोली ‘ सर एक बार तो मुझे सूरज से मिला दो , मैं उससे भी माफी मांगना चाहती हूँ। मुझे कुछ ही दिन पहले ही उस १५ जनवरी की रात का सच पता चला है , किस्मत की विडंबना तो देखो वो लड़की मेरे घर की बहू बन कर आयी है।’ और फिर सूरज... सूरज आवाज़ लगाती वो ऊपर सीढ़ियों पर चढ़ने लगी। तभी पीछे से सूरज की माँ बोली ‘ किसे ढूंढ रही हो , वो तो दुनिया के तानों से तंग आकर हमें छोड़ कर चला गया।’

‘क्या कह रही हो ... सूरज चला गया ?’

‘हाँ यही सच है। हमारा बेटा ज़िंदा है या मर गया पता नहीं , पर उसके बाबा को उम्मीद है कि वो एक दिन जरूर वापस आएगा और उसी के इंतज़ार में पिछले १७ सालों से सुबह चार बजे जाकर गेट खोलते हैं और कहते हैं कि सूरज कह कर गया है कि सुबह चार बजे तक लौट आऊँगा। तब से बिना नागा किये रोज तड़के चार बजे उठते हैं और गेट खोलते हैं , फिर आकर सो जाते हैं , कहीं ऐसा न हो कि सूरज आये और गेट बंद देख कर वापस न चला जाए .. नीरजा जी आतंरिक रेप ने तो हमारा समाज से स्थान छीना था पर मेरे बेटे का जो लोगों ने तानों और फब्तियों से हर पल बाहरी रेप किया उसका क्या ? आतंरिक रेप करने वाला तो बच्चा था पर बाहरी रेप करने वाले तो समझदार , भले और शिक्षित लोग थे , इन लोगों को कौन सजा देगा जो अपने तानों से रोज आते जाते सूरज का रेप करते रहते थे।’ और सूरज की माँ इतना कहते कहते फूट फूट कर रोने लगी। उधर किशोरी लाल की आँखों से झर-झर आँसूं बहने लगे।

नीरजा उन दोनों को रोता देख उनके आंसुओं के सहारे अतीत की गहराइयों में उतरती चली गयी ...... जब उसने इंटर कालेज में साइंस टीचर की नौकरी ज्वाइन की थी , क्लास के पहले ही दिन वो सूरज की फैन हो गयी थी। कालेज का सबसे आज्ञाकारी , होनहार और टीचर को सम्मान देने वाला छात्र था। सभी टीचर्स का फेवोरिट स्टूडेंट था। सूरज १० बी का छात्र और सांझ १० अ की छात्रा थी। एक दम सूरज के उलट थी सांझ। हर समय अपने बाप की दौलत का घमंड उसके चेहरे पर झलकता रहता था। पर पता नहीं ऐसा क्या था कि अक्सर दोनों को एक साथ देखा जाता था। सूरज उसकी कार से ही घर जाता था। एक बार स्कूल से पर्यावरण कैम्प में बच्चों को जाना था । करीब २० बच्चों के साथ सूरज और सांझ भी पलिया के दुधवा नेशनल पार्क गए। नीरजा के साथ दो टीचर और दो हेल्पर भी थे। सभी बच्चे बहुत खुश थे। सभी बच्चों ने बढ़ चढ़ कर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।

वापस आने के बस दो दिन बचे थे। उस रात को वो कभी नहीं भूल पायी ..| जंगल में वैसे भी अन्धेरा जल्दी हो जाता है। करीब करीब रात का ९ बज रहा होगा। सभी बच्चे रात का खाना खाने के बाद कैंप फायरिंग के लिया इकट्ठा थे। डांस और अन्ताक्षरी का दौर चल रहा था। तभी सांझ ने सूरज के कान में कुछ कहा और थोड़ी देर बाद एक एक कर दोनों वहां से चले गए। कुछ देर बाद सभी बच्चे और टीचर भी अपने अपने टेंट में सोने के लिए चले गए। नीरजा अभी लेटी ही थी कि सहसा एक लड़की के चीखने की आवाज़ आयी और वो झट पट उठ कर उस तरफ भागी जिधर से आवाज़ आ रही थी। वहां का नजारा देख सभी के होश उड़ गए। सांझ जमीन पर गिरी हुयी लेटी थी और सूरज उसके ऊपर ...| भीड़ देखते सांझ और जोर जोर से चिल्लाने लगी। सूरज झटक कर अलग हुआ। नीरजा ने तड़ाक से जोरदार चांटा सूरज के गाल पर मारा और बोली कि ये सब क्या है। सांझ रोते हुए मैम के पीछे जा खड़ी हुयी।

‘मैम मैंने कुछ भी नहीं किया , ये सब इसकी चाल है ..’ सूरज बोला

‘चुप रहो...........’ नीरजा चीखते हुए बोली..

और उसी समय दोनों के माँ बाप को फ़ोन करके बुलाया। सांझ के माँ बाप अपनी लड़की को ले जाने लगे और नीरजा से बोले कि जब आप बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा सकती तो क्यों ले जाती है। अभी मैं तुरंत पुलिस को सारी जानकारी देता हूँ। अच्छा हुआ वो लड़का यहाँ मुझे नजर नहीं आया नहीं तो उसका यहीं पर खून कर देता। नीरजा और अन्य टीचर जो उस समय उनके साथ थे और किसी तरह मामले को संभाला और सभी लोग वापस आ गये। उन्हें लगा कि मामला शांत हो गया।

एक दिन नीरजा स्कूल से घर आयी ही थी कि इंस्पेक्टर आ गये और बोले कि सांझ के पिता ने कम्प्लेन दर्ज़ कराई है। आपको पुलिस स्टेशन में विटनेस के तौर पर बुलाया गया है। नीरजा को लगा कि उसके सैंडिल में रेत भर गयी है , इतना कि एक कदम चला जाना भारी था। पुलिस स्टेशन का नज़ारा बहुत ही भयानक था। सूरज बार-बार कह रहा था कि उसने कुछ भी नहीं किया , लेकिन सांझ के आंसू उसे झूठा साबित करने में अमादा था। उसे था कि सूरज , सांझ के आगोश में अस्त हो जाए।

किशोरीलाल को अपने बेटे पर और उसे दिए गए संस्कारों पर पूरा भरोसा था , किन्तु नीरजा की गवाही और हालात को देखते हुए उसे दो महीने के लिए बाल सुधार गृह में भेज दिया गया।

कुछ ही दिनों में नीरजा ने उस शहर से अपना ट्रान्सफर करा लिया क्योंकि उसे वहां पढ़ाना भारी हो रहा था। सांझ के पापा ने उसका एडमिशन भी दूसरे स्कूल में करा दिया था , पर ये वाकया नीरजा कभी न भूल पाई। उसे हर पल वो लम्हा याद आता। बच्चों की नादानी को हम बड़े माफ़ भी कर सकते थे। खैर.......। तभी किशोरी लाल की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हो गयी। अपने आंसुओं को छिपाते हुए बोली

‘किशोरी लाल जी मेरी बात को शांत होकर सुनिए , सूरज के बारे में है।’ सूरज का नाम आते ही पति-पत्नी निढाल से बैठ गए।

नीरजा ने कहना शुरू किया। इसे भाग्य की विडंबना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ? जानते है .. वो सांझ हमारे घर की बहू बन कर आ गयी है। शादी में बच्चों के एक्ज़ाम की वजह से न जा सकी , पर अभी पिछले महीने सोचा की बहू देख आऊँ। वहां पहुँच कर बहू के रूप में सांझ को देख कर चौंक गयी। मैंने पिछली जिन्दगी के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। पर शायद सांझ को हमेशा ये डर रहता कि कहीं मैं उसका बीता हुआ कल उसके परिवार को न बता दूं। जल्दी ही मुझे उससे बात करने का मौक़ा मिल गया। घर के सभी लोग किसी विवाह समारोह में शामिल होने गए थे। एकांत पाकर मैंने सांझ से पूछा कि उस बात को अब सालों बीत गए है , तुम अब समझदार लड़की हो , बताओ उस दिन क्या हुआ था।

सांझ रोने लगी और बोली ‘ मैम मुझे माफ़ कर दो। उस समय मैं बहुत डर गयी थी अपने रुतबे और घमंड में चूर थी। मैम आपको याद होगा कि एक बार मैं कालेज बंक करके अपनी फ्रेंड्स के साथ फिल्म देखने गयी थी। ऐसा मैंने कई बार किया पर पकड़ी नहीं गयी , पर एक दिन मैं सूरज की वजह से पकड़ी गयी और प्रिंसिपल मैम ने मेरे पापा को बुलाया। पापा ने सबके सामने मुझे जोरदार कई चांटे एकसाथ मारे। मैं ये अपमान बर्दाश्त न कर सकी। मैंने सोचा कि मेरी इतनी बेज्जती सूरज के कारण हुयी है। और उसी दिन से मैं सूरज को अपमानित करने का मौक़ा तलाशने लगी। मैं चाहती थी कि उसका भी अपमान सबके सामने इसी तरह से हो। उस दिन मुझे मौक़ा भी मिल गया। आप सबने जो देखा और समझा ऐसा कुछ भी नहीं था। सूरज मुझे सिर्फ समझाने का प्रयास कर रहा था। मैं उसके पास जाने का नाटक कर रही थी और वो मुझे धक्का देकर हटा रहा था। सहसा रात के अँधेरे में उसका पैर किसी चीज से टकरा गया और फिसल गया , जब तक मैं संभाल पाती वो मेरे ऊपर ही गिर गया। महीनों से मैं इसी मौके की तलाश में थी। आगे तो आप खुद ही जानती है। मैम मैं तो कभी भी नहीं चाहती थी कि सूरज को इतना बड़ा दंड मिले। बस उसके पापा सबके के सामने उसकी पिटाई करे और उसी तरह उसका अपमान हो जैसा मेरा हुआ था ... किन्तु बात बहुत ही आगे निकल गयी थी और मैं समाज और पापा के भय से चुप हो गयी थी। सूरज पर रेप करने का आरोप मढ़ दिया गया था।’ मैं सांस थामे सांझ की सारी बातें सुन रही थी। मैंने सांझ से कहा कि तुम्हें इतने सालों में कभी गलती का एहसास तक नहीं हुआ कि तुमने सूरज के साथ कितना गलत किया है।

‘हां मैम .. मुझे अपनी गलती का एहसास उसी दिन हो गया था जिस दिन सूरज को बाल सुधार गृह में भेजा गया था , पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। क्या कहती ? किससे कहती ? किस मुंह से कहती ? हम भी वहां से चले आये और समय के साथ यादें भी धुंधली होती चली गयी।’

किशोरी लाल जी जो खामोशी से सारी बातें सुन रहे थे , गहरी सांस लेते हुए बोले ‘अब इन बातों का क्या फायदा , मेरा बेटा तो मुझे छोड़कर चला ही गया . हाँ तसल्ली मिली कि मेरा विश्वास और परवरिश जीत गयी। अब आपको क्या बताएं कि लोगों के तानों से हमारा बेटा तंग आ गया था। यहाँ अपनों के बीच बेगाना हो गया था। उन दिनों जिन रास्तों से गुजरता लोग क्या यूँ लगता कि पेड़ ,दरख़्त, पहाड़ सबने मुंह फेर लिया हो। उस दिन तो बहुत ही खुश था। उसको खुश देखकर हमें लगा कि मेरा बेटा जीना सीख रहा है।’ उस दिन जब ट्यूशन से लौट कर आया और बोला -

‘ पापा मेरे दोस्त के बड़े भाई की शादी है मैं बरात में चला जाऊं क्या ? सुबह चार बजे तक लौट कर आ जाऊँगा।’

इतने सालों के बाद हमने बेटे को इतना खुश देखा। खुशी में इतना भी न पूछा कि कौन दोस्त। उस दिन माँ-बाप को प्रणाम कर गया और आज तक वापस नहीं लौटा ............|

‘आपने खोजने की कोशिश नहीं कि क्या ?’

‘ सारे प्रयत्न किये।’

‘मैंने बोलने वाली भीड़ को देखा और आज न बोलनी वाली भीड़ भी देख रहा हूँ ....| मैंने छाती पर सवार हजारों बलात्कारियों को सर उठाकर चलते भी देखा।’

सोफे से उठकर अपनी पत्नी का हाथ थामकर बोले...

‘हमारा बेटा आएगा ,’

‘क्या हुआ जो जीवन से एक दिन और कम हो गया हो।’

‘मैडम जी चाहत की अलगनी पर धोखे और रंजिश के कपड़े नहीं सुखाये जाते। अब आप जा सकती है। आपने जो कहा हमने सुन लिया ,’

और वो दोनों वहां से चले गए।

जिन्दगी के कुछ और साल और महीने धीरे धीरे बीतते चले गए। इधर कुछ दिनों से किशोरी लाल का स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा था। उस रात कुछ जल्दी सो गए थे। पत्नी से ज्यादा बात भी नहीं की। दिसंबर की रातें तो वैसे भी सुनसान रहती है। दोनों पति-पत्नी रजाई में दुबके सो रहे थे। सहसा डोरबेल बजी ...........| सन्नाटे को चीरती डोरबेल की आवाज से पूरा घर घनघना उठा। कोई बाहर गेट पर लगातार बेल बजा रहा था। किशोरी लाल की पत्नी हड़बड़कर कर जाग गयी ,

‘अरे कौन है भाई ? आती हूँ। उठो देखो सूरज के बाबू कोई आया है।’

तीन चार बार आवाज दी पर वो उठे नहीं। वो अपने बुढ़ापे की हड्डियों को समेटते और कराहते हुए उठी और लाइट जलाई , देखा कि सुबह के चार बजे है।

‘अरे.... आज चार बजे सूरज के बाबू ने दरवाजा नहीं खोला ...?’

फिर कराहते हुए धीरे से खुद ही उठ गयी। उधर कोई बराबर डोरबेल बजाये जा रहा था। कमरे से गेट तक की दूरी दस-बीस कदम भर की थी , पर उसे पार करने में घंटो का समय लग रहा था। गेट का ताला कंपकपाते हाथों से खोला।

‘क्या भाई कौन हो.....क्यों इस तरह ......?’

जैसे ही सर उठाकर देखा तो आँखें फटी सी रह गयी। आज उन्हें बिना चश्मे के इतना साफ़ नजर आया ..

‘सूरज .!! मेरे बच्चा !!!!’

जल्दी से हाथ पकड़ कर उसे गेट के अन्दर किया और ताला लगा दिया कि शायद ये डर था कि फिर न चला जाए और तेज़ी से भागती हुयी कमरे की तरफ गयी अब न तो गठिया का दर्द था न ही बुढ़ापा ...

‘सूरज के बाबू देखो .. हमारा सूरज वापस आ गया है ,’

‘तुम झूठ नहीं बोले.. देखो न ठीक चार बजे आया है।’ जब किशोरीलाल के शरीर में कोई हरकत न हुयी तो आशंकाओं के साथ उनका कसकर शरीर हिलाया। खैर किशोरी लाल पंखे को शून्य में निहारते हुए निष्प्राण हो चुके थे , पर चेहरे पर मुस्कराहट और अजीब सी शांति थी कि जैसे उनकी सालों की तपस्या पूरी हो गयी हो। आज उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हर आदमी के मन में उनके प्रति प्रेम और श्रद्धा का भाव था और चार कंधों में एक कान्धा उनके सूरज का था ........|

नीतू मुकुल


परिचय

1. रचनाकार का पूरा नाम -- नीतू मुकुल

2. पिता का नाम-- श्री प्रभु दयाल खरे

3. माता का नाम-- श्रीमती कमला खरे

4. पति का नाम-- डॉ श्रीपति वर्मा

5. वर्तमान / स्थायी पता--

209 , मुक्तानंद नगर , पूजा टावर के सामने ,गोपालपुरा बाईपास पुलिस चौकी के पास, जयपुर , (राज.)

6. ई-मेल--  neetumukul2015@gmail.com

7. शिक्षा / व्यवसाय-- एम्.ए ( राज नीति शास्त्र ) ,/----

8. प्रकाशन विवरण-– लगभग दो दर्जन कहानियां प्रकाशित

I. भारत-भारती ( ऑस्ट्रेलिया ) --- लघु कथा “बिना छाँव का दरख्त” अंक जुलाई 2017

II. साहित्य-कुञ्ज (कनाडा)--- कहानी “उसके मुकम्मल रिश्ते” अंक – अप्रैल 2017

III. कादम्बनी ---- कविता का प्रकाशन , अंक – मार्च 2017

IV. गृहलक्ष्मी --- कहानी “ज़ज्बा” का प्रकाशन , अंक –

V. गृहशोभा ..... कहानी “कोख का मुआवजा”, अंक – जून (द्वितीय ) 2017

VI. वनिता ..... लघु कथा “ साहस,श्रद्धा और समर्पण” अंक –मई-2017

VII. सरस सलिल ... कहानी “किसना” अंक-अप्रैल 2017

VIII. होम मेकर .... कहानी “किराए की बेटी” अंक – जुलाई 2016

IX. आह जिन्दगी .... “आखिर कसूर क्या था” अंक – नवम्बर 2017

X. सरिता ... लेख अंक .


अन्य उपलब्धियां ...... एक कहानी संग्रह “ऐसा प्यार कहां” प्रकाशित

आकाशवाणी इंदौर, जयपुर से कहानियों का प्रसारण.

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग दो दर्ज़न से अधिक कहानियों का प्रकाशन.

मध्य प्रदेश के दैनिक अखबारों में लघु कथाओं का प्रकाशन.

अभिरुचि... स्त्री विमर्श और स्त्री चेतना के सन्दर्भ में चिन्तन एवं लेखन तथा संगीत गायन

नीतू मुकुल

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 75 : संस्मरणात्मक कहानी - 15 जनवरी की वो काली रात................. // नीतू मुकुल"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.