संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 78 : "पीतल के पतीले " सच्चा संस्मरण // मंजुल भटनागर

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प्रविष्टि क्र.  78

"पीतल के पतीले " सच्चा संस्मरण

मंजुल भटनागर

चारों तरफ जंग का माहौल था. रात भर लोग गाँव खाली करते रहे थे... बीच बीच में बॉर्डर से गोलियों की आवाजें भी सन्नाटा तोड़ रही थी. माईक पर गाँव खाली करने का सन्देश बार बार सुनाया जा रहा था पर सतवंत कौर को चैन न था. घरों में इक भी मर्द न था. सभी सीना निकाल मोहल्लों की रखवाली कर रहे थे, फिर ट्रेन्च्स भी खोदनी थी. सभी मर्द बचाव के काम में जुटे थे. आर्मी के टैंकों और भारी बूट पहने बॉर्डर पर जाते हुए सिपाहियों की आवाजें उसके दिल दिमाग पर मनों भार में छोड़ रही थी

वो मन ही मन बुदबुदा रही थी किधर ले जाये अपने नन्हे नन्हे चार बच्चों को. तभी आसमान को चीरता दुश्मन का ज़हाज गोले बरसाता तेजी से गाँव के आसमान से गुजरा. सुना देखा दूर आग की लपटे धुआं निकलता हुआ आर्मी के अस्पताल के पीछे से,हाय दय्या कहीं अस्पताल पर बम गिरा दिया इन मनहूस जादो ने तो क्या होगा. वो पड़ोसन का लड़का तो वहीं नर्सिंग सुपरवाईसर है.तीन महीने ही तो हुए हैं चाँद सी बहू ले कर आई हैं प्रीतो. हे भगवान् ! सतवंत उससे आगे नहीं सोच पा रही थी.

रात के अँधेरे के साथ साथ सड़कें भी आग उगल रही थी टैंकों की आवाज उसके कानों में दूर तक से आ रही थी वन टन थ्री टन की बख्तरबंद गाड़ियाँ असले के साथ बॉर्डर एरिया की तरफ कूच कर रहे थे. सतवंत खुद को कोसती रही चली ही जाती कहीं बच्चों को ले कर, पर कहाँ समझ ही नहीं पा रही थी.

चाई जी पिछले साल ही गुजर गयी तब तक वो जिन्दा थी हो आती थी साल में एक बार, कहने को तीन भाई थे पर सब एक से एक शाने ,बहन को कभी याद ही नहीं करते बीबियों के पिछलग्गू.

ब्लेक आउट की वजह से अँधेरा और गहरा होता जा रहा था. यह सरदार साहिब भी ने सारे गाँव के ठेकेदार बने हैं यह नहीं कि अपने बीबी बच्चों को संभाले. सतवंत मन मन में बुडबुड कर रही थी.

अचानक छोटा बेटा प्रिंस जाग गया.माँ हलक सुख रहा है पानी दे दे, हाँ बेटे रुक लाती हूँ कह कर सतवंत आँगन की तरफ दौड़ी. पर गुप अँधेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था.किसी तरह से पानी का जग लेकर आई प्रिंसी को पानी पिलाया और सभी बच्चों को अपनी छाती से चिपका कर लेट गयी.

न जाने क्या सोच रही थी. अचानक उसके मन में एक विचार कौंधा. उसने देखा प्रिंसी कुनमुना रहा था उसे गोद में उठाया और गुप अँधेरे में पड़ोस के घर जा पहुंची. सांकल जोर जोर से खटका रही थी पर डरे छिपे लोग दरवाजा इतनी रात गए दरवाजा नहीं खोल रहे थे.कहीं कोई दुश्मन का आदमी न आ टपके और सब को गोलियों से भून दे. सपन जोत दरवाजा खोल में सतवंत. दो चार बार जब ऊँची आवाज में चिल्लाई तभी सपन जोत और उसके घरवाले ने दरवाजा खोला.

क्या हुआ सतवंत इतनी रात को.क्या हुआ?. सतवंत बोली सपन तूने हफ्ते भर पहले जब माता की चौकी की थी तो चार पीतल के पतीले मेरे घर से मंगवाये थे न. वो दे दे. हाँ सतवंत पर इतनी रात को तू अपने पतीले क्यों लेने आई है? सपन बोली. और तू इतना हांफ क्यों रही है ? क्या गाँव छोड़ के जा रही है ? नहीं तू जल्दी से मेरे चारों पीतल के पतीले दे दे, पर इतने घुप अँधेरे में कैसे मिलेंगे न जाने कहाँ रखे हैं. तू अभी जा में मुंह अँधेरे तेरे पतीले ले कर आती हूँ मैं सपनजोत बोली.

अब सतवंत का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ने लगा. जोर दे कर बोली नहीं मुझे अभी चाहिए सुबह का क्या पता. बेचारी सपन जोत स्थिति भांपती सी, करती क्या न करती दूसरे माले पर गयी गोदाम का दरवाजा खोला. ब्लेक आउट के समय दरवाजों पर कार्बन पेपर, मोमबत्ती भी जलाने की इजाजत नहीं. पर पड़ोसन दरवाजे पर. किसी न किसी तरह चालीस मिनिट की मशक्कत के बाद सतवंत के पतीले उसे मिले. लेकर आई और सतवंत से बोली देख ले तेरे ही है न ?

सतवंत ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं और चारों पतीले लेकर अपने घर की तरफ मुड़ गयी. गली में कुत्ता रो रहा था उसे बड़ा अपशगुन लगा. किसी न किसी तरह से भागती प्रिंसी को संभालती अपने दरवाजे पर पहुंची. जल्दी से अंटी से चाबी का गुच्छा निकाला और दरवाजा खोला.

सामने की सड़क से भारी टैंक असला लेकर अभी भी जा रहे थे. सिपाहियों के बूटों की आवाजें उसे डरा रही थी और सरदार जी उसके शौहर का दूर दूर तक नहीं पता था. शायद अब सुबह ही आयें सतवंत ने कुण्डी लगा कर अन्दर से दरवाजे पर ताला जड़ दिया.

अन्दर कमरे में आई तो सभी बच्चे फर्श पर चटाई का बिस्तर बना लुढ़के पड़े थे. सतवंत ने जल्दी से सभी के सिर पर एक एक करके पतीले पहना दिए. और खुद से बोली वाहे गुरु जी मेरे बच्चों की रक्षा करना.

मंजुल भटनागर

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1 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 78 : "पीतल के पतीले " सच्चा संस्मरण // मंजुल भटनागर"

  1. आपने बहुत अच्छा लिखा है ...
    सजीव वृतांत एकदम।

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