संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 80 : संस्मरणात्मक यात्रा वृत्तांत // उदगम से समर्पण तक // डॉ सुधा गुप्ता ' अमृता '

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प्रविष्टि क्र. 80

उदगम से समर्पण तक

डॉ सुधा गुप्ता ' अमृता '


मैं कटनी ( बारडोली ) में रहती हूँ। कटनी को बारडोली की संज्ञा पं. जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम के समय कटनी आगमन पर सेनानियों का उत्साह देखते हुए दी थी। मेरे पिता डॉ. गुलाबदास गुप्ता स्वयं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे बारडोली से जुडी कई घटनाएं सुनाया करते थे जो मैं फिर कभी सुनाऊँगी।


चूना, पत्थर, सीमेंट और मार्बल की नगरी कटनी से हम पति - पत्नि जबलपुर ट्रेन से पहुंचे। वहां मेरे बेटा - बहू वेटरनरी डॉ. के पद पर पदस्थ हैं। उनका बेटा शांतनु कक्षा तीन का छात्र है और उसका मित्र है वीर। हम सब कार से यात्रा के लिए निकल पड़े। तो आइये, आपको भी अपने साथ जाबालि ऋषि की नगरी संस्कारधानी जबलपुर की यात्रा पर ले चलती हूँ अपने परिवार के साथ। जबलपुर को ' संस्कारधानी ' नाम भूदान यज्ञ प्रणेता आचार्य विनोबा भावे ने दिया था। जबलपुर मध्यप्रदेश का एकमात्र ऐसा महानगर है जहाँ तीन शासकीय विश्वविद्यालय हैं - जवाहरलाल नेहरू कृषि वि. वि., रानी दुर्गावती वि. वि. एवं नाना जी देशमुख पशु चिकित्सा वि. वि.। म. प्र. उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ के साथ - साथ आयुध निर्माणी, व्हीकल फैक्ट्री भी यहीं स्थित है। जबलपुर नगर की सबसे बड़ी विशेषता है म. प्र. की जीवन रेखा ' कल - कल, छल - छल बहती चिरकुंवारी कही जाने वाली शिवपुत्री ' नर्मदा ' जिस पर सुप्रसिद्ध सरदार सरोवर बाँध बना है। नर्मदा ही देश की एकमात्र नदी है जिसकी पैदल परिक्रमा की जाती है। प्रसिद्ध यात्री, सेनानी अमृतलाल बेंगड़ ने ' नर्मदा तीरे ' तीन खण्डों में नर्मदा की आत्मकथा लिखी है जो अत्यंत रोमांचक है। हम सब आपस में चर्चा करते हुए पुलकित हो रहे थे कि नर्मदा के दर्शन मात्र से सारे रोग दोष दूर हो जाते हैं, ऐसी है पतित पावन पुण्य सलिला नर्मदा। तभी शांतनु ने पूछा - दादी, नर्मदा, नर्मदा ये कैसा नाम है, नर्मदा क्यों कहते हैं ? मैंने कहा - नरम + दा = नर्मदा, यानि जो देती है नरम, मुलायम, सुखद अहसास यानि उसको देखने मात्र से ही सुख की अनुभूति होती है। इसलिए इसे नर्मदा कहते हैं। अच्छा दादी, तो हम वहीँ चल रहे हैं ? मैंने कहा - हाँ, पहले हम ग्वारीघाट नर्मदा के दर्शन को ही चल रहे हैं। तभी मेरे बेटे ने कहा - हाँ बच्चों, रास्ते में जो स्थान हैं, उन्हें भी तो देखते चलो। वह देखो, मदनमहल पहाड़ी पर स्थित रानी दुर्गावती का किला। शांतनु के दोस्त वीर ने पूछा - रानी दुर्गावती कौन हैं ?


रानी दुर्गावती गोंडवाने की रानी थी जिसकी राजधानी मंडला था।
शांतनु - और यह वीरांगना क्या है ?
जो युद्धकौशल में कुशल महिलाऐं होती हैं, वे वीरांगनाएं होती हैं।

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हम सबने कार से उतरकर मदनमहल पहाड़ी और उसके नीचे बने ओशो आश्रम को देखा जो ओशो की साधना स्थली थी जिनके अनुयायी अनेक देशों में हैं। फिर हम सब रवाना हुए मेडिकल रोड से होते हुए, रास्ते में ही बैलेंस रॉक का अद्भुत नजारा देखकर बच्चे बहुत प्रसन्न हुए और आश्चर्यचकित भी। एक विशाल चट्टान मात्र दो तीन इंच के प्वाइंट पर इतनी ऊँचाई पर वर्षों से टिकी हुई है। वीर और शांतनु ताली बजा रहे थे और फोटो भी ले रहे थे, दोस्तों को दिखाना भी तो है। हम आगे बढ़ रहे थे और जा पहुंचे पिसनहारी की मढ़िया। इस नाम को जानने की उत्सुकता, जिज्ञासा बच्चों में होना स्वाभाविक थी। मैंने बताया - करीब छै सौ वर्ष पूर्व एक गरीब महिला थी जो हाथ से चक्की में आटा पीसती थी, अपनी आजीविका चलाती थी। उसने ही पैसे बचाकर इस मंदिर का निर्माण करवाया। वर्तमान में यह जैन धर्म का मंदिर है जिसे देखने दूर - दूर से लोग आते हैं। यहाँ अनेक गुफाएं एवं प्राकृतिक झरने भी हैं, इसे ही पिसनहारी की मढ़िया कहते हैं। यहाँ दर्शन करने के उपरांत हम अब ग्वारीघाट पहुँचने वाले थे। तभी शांतनु ने एक जगह लगे बोर्ड पर पढ़ा - ' फूटाताल '। वह हंस पड़ा - दादी, यह फूटाताल क्या है ? मैंने समझाया - ताल यानि तालाब। एक समय था जब जबलपुर में अनेकों तालाब थे जो रानी दुर्गावती ने बनवाये थे जैसे सूपाताल, हाथीताल, रानीताल, भंवरताल, अधारताल, हनुमानताल, देवताल, श्रीनाथ की तलैया आदि। किन्तु अब तालाब सब सूख गए हैं और वहां बस्तियां बन गई हैं, सिर्फ उनके नांम रह गए हैं। यही कारण है कि अब पानी की कमी हो गई है। शांतनु ने अपने मित्र वीर से कहा - मेरी नानी के गाँव उमरानाला में भी तालाब है, उसमें कमल खिलते हैं, बदकें, मछली, कछुआ तैरते हैं और उसमें टर्रकटू भी है। जब सूरज की किरणें पानी पर पड़ती हैं तो बहुत सुंदर लगता है। ' अच्छा मुझे भी ले चलना नानी के गाँव '। मैंने कहा - तालाबों से पानी तो मिलता ही है, शहर, गाँव भी सुंदर लगने लगते हैं। अब तक हम पहुँच गए थे ग्वारीघाट। हमने अपनी कार पार्किंग में खड़ी कर दी। बच्चे लगाने लगे दौड़ घाट की ओर।
नीचे घाट पर हरहराती नर्मदा ! उसके प्राकृतिक सौंदर्य की छटा निहारते आँखें दूर खो गई थीं उसके उदगम स्थल ' अमरकंटक ' में। तभी शांतनु ने कहा - दादी इतना पानी आया कहाँ से ? वीर - हाँ, दादी नर्मदा आई कहाँ से, पानी लाई कहाँ से ?


बच्चो, तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। नर्मदा अमरकंटक नामक स्थान पर नर्मदा कुंड से निकलकर मंडला जिले को पवित्र करती हुई अगम वेग के साथ छोटी - छोटी नदियों को साथ में लेकर विशाल जलराशि के साथ जबलपुर आ जाती है। अब थोड़ी देर शांत मन से नर्मदा की लहरों की उछल - कूद देखो, उसकी आवाज सुनो, वह क्या कहती है। हम सब सचमुच कुछ क्षण के लिए मौन इठलाती अल्हड नर्मदा के सौंदर्य को निहारते रह गए। तभी शांतनु ने कहा - मैंने पानी की आवाज सुनी है दादी। वह कह रहा है मेरे साथ खेलो। हम नहाएंगे दादी। हाँ रुको, हम सब साथ चलकर नहाएंगे। बच्चे उछल - कूद, मस्ती करने लगे, भूल गए पढाई, स्कूल और गाने लगे - ' अक्कड़ - बक्कड़ बड़े भुलक्कड़, पढ़ने गए स्कूल / किन्तु मजे की बात तो देखो, बस्ता गए वे भूल / बस्ता लेने घर को पहुंचे, रस्ता गए वे भूल / भूल - भूल के, भूल - भूल के, पहुंचे स्वीमिंग पूल / उछले - कूदे खूब नहाये, भूल गए स्कूल '। यात्रा का आनंद बच्चों के साथ ' सोने में सुहागा ' हो जाता है। स्नान करके हमने माँ नर्मदा और शिव जी की पूजा कर दीपदान किया। नर्मदा की जलराशि में आटे के अनेक दीये टिमटिम करते चले जा रहे थे। नर्मदा को देखने, उसे स्पर्श करने की अनुभूति को शब्दों में बयां करना ' गूंगे केरी शर्करा ही है '। उसकी अनुभूति को भीतर ही महसूस किया जा सकता है।


सूर्य अस्ताचल को था। उसकी लालिमा की सुखवर्षा में भीगकर बच्चे नर्मदा नर्मदा बोले जा रहे थे। मैंने कहा - नर्मदा को रेवा और मेकलसुता भी कहते हैं क्योंकि यह मेकल पर्वत श्रेणियों से निकलकर बहती है। तभी बच्चों ने कहा - वो देखो दादी बोट, हम बोट में भी सैर करेंगे। मैंने कहा ठीक है।


शाम का वक्त हो चुका था। चाँद अपनी चाँदनी और तारों की बारात के साथ आसमान में था। सभी ने एक स्वर में कहा - ' चाँदनी रात में नौका विहार '। बहू वंदना ने कहा - माँ, आपकी लेखनी तो अब दौड़ने लगेगी। हम पति - पत्नी के मन की बात बहू ने छीन ली थी। हम नाव पर सवार हुए और मल्लाह की स्वर लहरी छप्प - छप्प चलती चप्पू के साथ उछलती लहरों के संग मचलने लगी - नरमदा मैया हो ......  ऐसे मिलहें के जैसे मिल गए मताई और बाप हो ...... नरमदा मैया हो। सचमुच माता - पिता की तरह ही नर्मदा जन - जीवन को पालती - संवारती है। इस पर बने छोटे बड़े बाँध विद्युत् उत्पादन कर जीवन में भी रौशनी भर देते हैं। तभी तो यह मध्यप्रदेश की ' जीवन रेखा ' है। बच्चे पानी की उछलती लहरों को छूने का प्रयास करते उमग रहे थे। नाविक ने बतलाया - बच्चो,  नदी में मगर भी है इसलिए पानी में हाथ मत डालो। अरे क्रोकोडाइल ! बच्चे थोड़ी देर के लिए सिमट गए। इस पार से उस पार घूमते हम तट पर वापिस आ गए थे, मन में नर्मदा को समाये। हमने नर्मदा जल बॉटल में भरा घर ले जाने के लिए। घाट पर ऋषि - मुनियों की वाणी गूँज रही थी और गूँज रहे थे शिव नर्मदा के भजन।
अब हम लोग पंचवटी की ओर रवाना हो रहे थे मध्यप्रदेश टूरिज्म द्वारा आयोजित लेजर शो देखने के किए जहाँ बड़ी स्क्रीन पर ' नर्मदा उदगम से समर्पण तक ' विभिन्न स्थानों से गुजरती हुई दिखाई जाती है। हमने वहां पहुंचकर 100 /- प्रति व्यक्ति टिकिट खरीदा। वहां दोनों ओर वृक्षों की कतार से गुजरते हुए साफ़ सुथरा बड़ा सा पार्क था। फूलों के सुगंध अनोखी सौंदर्य छटा बिखेर रही थी। हम सब एक ऑडिटोरियम नुमा मैदान में थे जहाँ अँधेरा कर दिया गया था। सब लोग पूरी एकाग्रता के साथ बैठे थे। करीब सौ लोगों का ग्रुप था किन्तु, एकदम शांत। सामने स्क्रीन पर चिरकुंवरी नर्मदा की कहानी चित्रित हो रही थी। उदगम स्थल अमरकंटक का मनोरम दृश्य और फिर मंडला आदि विभिन्न स्थानों से गुजरती जबलपुर में कल कल निनादिनी पूरे वेग के साथ बहती हुई खंडवा, बड़वानी, महेश्वर, ओंकारेश्वर तीर्थों में परिणित होती हुई अंत में छोटी बड़ी नदियों के साथ खम्भात की खाड़ी भड़ौंच में जाकर समर्पण कर देती है। नर्मदा की आत्मकथात्मक फिल्म देखने के बाद हम रोमांच से भर गए। तालियों की गड़गड़ाहट से वातावरण गूँज गया। और अब पानी की फुहारों के साथ रंगीन लेजर शो राष्ट्रभक्ति के गीतों के साथ शुरू हो गया अपनी विभिन्न आकृति और इंद्रधनुषी रंगों की आभा बिखेरते हुए। जिसे निस्तब्धता के साथ सभी देखते हुए आनंदित हो रहे थे। एक घंटे चले लेजर शो के पश्चात् आनंद विभोर होते हुए हम अपनी कार से घर के लिए रवाना हो गए।


रात्रि विश्राम के बाद दूसरे दिन हम फिर तैयार थे भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानें, धुआंधार जल प्रपात देखने के लिए। मन में अजीब सी पुलकन थी संगमरमरी वादियों को देखने की। भेड़ाघाट पहुँच मार्ग में ही पड़ता है ' चौंसठ योगिनी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर '। हमने मंदिर के दर्शन किये और पुनः चल पड़े। करीब एक घंटे में हम भेड़ाघाट पर्यटन स्थल पहुँच गए। यहाँ का आनंद नाव के द्वारा ही लिया जा सकता है। हमने एक बोट की, हमारे साथ नाव में कुछ और भी लोग थे। नाविक ने नैया घुमाई और चप्पू की चप्प - चप्प में लहरों के साथ मंद - मंद शीतल पवन के झोंकों का आनंद लेते हम नर्मदा विहार कर रहे थे। नाविक ने बताया - बच्चो ध्यान से देखो, इसी स्थान पर फिल्म 'जिस देश में गंगा बहती है ' की शूटिंग हुई थी और अब हम पहुँच रहे हैं ' बंदर कूदनी '। बच्चे हंस पड़े -बंदर कूदनी नाम क्यों पड़ा ? इस स्थान में संगमरमर की पहाड़ियों से घिरी नर्मदा का पाट कुछ सकरा हो जाता है। इस एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर बंदर ने छलांग लगाई थी जहाँ बीच में नर्मदा बहती है, इसलिए इस स्थान को ' बन्दर कूदनी ' कहते हैं। सूर्य रश्मि में झिलमिलाती नर्मदा और सफ़ेद संगमरमरी चटटनों के अपार सौंदर्य में मन खोया जा रहा था। नाविक ने कहा - अब हम ' भूलभुलैयाँ ' में आ चुके हैं। शांतनु ने कहा - भूलभुलैयाँ, ये क्या होता है ? यहाँ आकर नर्मदा संगमरमर की पहाड़ियों से इस तरह घिर जाती है कि रास्ता नहीं सूझता, कहाँ से नाव निकाली जाय ? इसलिए इस स्थल को भूलभुलैयां कहते हैं। हमें अपने मध्यप्रदेश पर गर्व हो रहा था जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य की अपार सम्पदा भरी पड़ी है। कुछ विदेशी पर्यटक भी अपनी - अपनी बोट में सैर करते हुए कैमरे में प्राकृतिक दृश्यों को कैद कर रहे थे।


नर्मदा किनारे का तो हर कंकड़ शंकर हुआ करता है। यहाँ हर दुकानदार अपनी दुकान को संगमरमर से बनी मूर्तियों से सजाये हुए थे। यहाँ हर बच्चा मूर्तिकला के शिल्प में प्रवीण होता है। हमने भी शिवलिंग और नन्दी न्यौछावर देकर ले लिए, मन भक्ति और श्रद्धा से भर गया। अब तक सूर्य अस्ताचल को था। उसकी लालिमायुक्त अनुपम छटा नर्मदा की लहरों पर सोना बिखेर रही थी। यहाँ से हम धुआंधार जलप्रपात के लिए निकल पड़े। नदी को निहारने का अपना आनंद है तो ऊंचाई से गिरती - झरती जल धाराओं को देखना अपने आप में उल्लास भर देने वाला होता है। ऊंचाई से गिरता जल प्रपात सहस्र धाराओं में बंटता हुआ रजत चांदनी बिखेरता है। पानी की असंख्य धुंआ - धुआं बूंदें हमारे चेहरे, बालों पर उड़ती हुई बैठ जाती है। ऊंचाई से गिरता हुआ पानी इस तरह लगता है जैसे वह नीचे खौल रहा है। वह खौलता सा पानी धुआं की तरह उड़ता है इसलिए यह जल प्रपात धुआंधार के नाम से जाना जाता है। हम सभी ने वहां छायाचित्र लिए। चांदनी रात में धुआंधार का सौंदर्य दस गुना बढ़ जाता है। भेड़ाघाट और धुआंधार देखने के बाद हम लौट गए घर, रात्रि विश्राम के लिए।
तीसरे दिन की यात्रा और भी रोमांचकारी थी क्योंकि हम अब जबलपुर से तीस - पैंतीस किलोमीटर बरगी डेम जल विद्युत् संयंत्र देखने जा रहे थे। बच्चों में असीम उत्साह था। शांतनु और वीर थे कह रहे थे कि हम वहां क्रूज में घूमेंगे। हमने कहा - हाँ, बहुत उतावले हो रहे हो, क्रूज वातानुकूलित भी है और वह हमें पैंतालीस मिनिट की यात्रा करवायेगा, उसमें डांस और मस्ती भरे गाने भी चलते हैं। वीर उछल पड़ा - वाह, तब तो बहुत मजा आएगा दादी। लेकिन खाने के लिए लड्डू ज्यादा रखिएगा। सभी हंस पड़े। करीब एक घंटे में हम बरगी डेम पहुँच गए। वहां हम विशिष्ट अतिथिगृह में रुके, जलपान किया। बरगी डेम देखने के लिए कुछ चलना पड़ता है। वहां गाइड ने बताया, यह डेम अपने - आप में विशिष्ट है, इसमें इक्कीस गेट हैं। आवश्यकतानुसार जब गेट खोले जाते हैं तब इनका नजर देखने लायक होता है।


अब बच्चों का मन क्रूज में घूमने के लिए मचलने लगा। हमने तट पर पहुंचकर टिकिट खरीदे और क्रूज में सब बारी - बारी से सवार हो गए। वहां दो क्रूज एवं एक हाउसबोट था। क्रूज में सौ से अधिक लोग सवार थे। हम सब ऊपर की मंजिल में पहुँच गए। नर्मदा की अगाध जलराशि में क्रूज अपनी मंथर गति से चलने लगा। नर्मदा की लहरें मचलने लगीं और मस्ती भरे गानों का रिकार्ड चालू हो गया जिसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सभी के कदम थिरक रहे थे। कुछ लोग कभी नीचे आकर तो कभी ऊपर जाकर नर्मदा की किलोल करती दूर - दूर तक बिखरी अनुपम छटा का आनंद ले रहे थे। कोई अपने कैमरे में नर्मदा पर झिलमिलाती सूर्य की लालिमा को कैद करता तो कोई सेल्फी में मगन था तो कोई ख़ामोशी से अपने ह्रदय में नर्मदा को समेट रहा था। पैंतालीस मिनिट की यात्रा ऐसा लगा कि चंद मिनिट में ही खत्म हो गई। जी कहाँ भरने वाला है, इस प्राकृतिक सौंदर्य को तो बार बार देखने का मन करता है। लौटकर हम फिर अतिथिगृह में वापिस आए, जलपान करने के बाद हम पुनः जबलपुर घर की ओर रवाना हो गए। घर आकर भी यात्रा की चर्चा समाप्त नहीं हो रही थी। सब मोबाईल पर फोटोग्राफ्स देख रहे थे। बच्चों ने कहा - धन्यवाद दादी,आपने हमें इतनी अच्छी यात्रा करवाई। वीर ने कहा - लेकिन दादी, कुछ लड्डू और बनाकर रख देना तब जाना कटनी। मैंने कहा - ठीक है मेरे लड्डू।
हम दो दिन बाद पुनः अपने गृहनिवास कटनी आ गए जीवनदायिनी नर्मदा को अपने ह्रदय में बसाये हुए।

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डॉ. सुधा गुप्ता ' अमृता '

( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित )

दुबे कालोनी, कटनी 483501 म. प्र.

मोबा : 95844-15174       

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