संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 82 : गाँव की यादें // कविता नागर


प्रविष्टि क्र. 82

गाँव की यादें

कविता नागर


जब पुरानी यादों की गलियों में विचरण की बात आती है,तो हममें में से अधिकतर बचपन की सरपट गलियों में हो आते हैं। बचपन का ये बेफिक्री का पनपा बीज युवावस्था में प्रसुप्त हो जाता है। ऐसे ही मेरी यादों में बसी है,मेरे गाँव की यादें,नर्मदा मैया,वो कच्चा सा घर। जिन्हें मैं चेतन में अगर भूल भी जाऊं, तो अवचेतन मन नहीं भूलने देता..स्वप्न में यदाकदा विचर आती हूँ, उन गलियों में। वो खुशबू वाली दादाजी की पोटली,जो कि पान मसाले की सुंगध और सुपारी से भरी होती थी। जिसे कोई अमूल्य वस्तु समझ हम चोरी से सुपारी का एक कतरा चुराकर खा लिया करते थे।

जब कभी रंगबिरंगी हो चुकी इस दुनिया के होते भी मैं बेरंग महसूस करती हूँ, तो चली जाती हूँ.. उन श्वेत श्याम यादों में। और वहां जाकर खुद में रंग भर लेती हूं।मेरे दादा का घर,वो ग्रामीण परिवेश,नर्मदा का किनारा आँवलीघाट जो यहां से बस दस पंद्रह मिनट की दूरी पर होगा। दादा का घर गली के छोर पर था,उस छोर से शुरु होते थे,लहलहाते खेत। उस हरीतिमा में खेलते खेलते कहीं दूर निकल जाते थे। अक्सर छुट्टियों में ही गाँव जाना होता था,पिताजी की नौकरी के कारण हम शहर में रहते थे।

चार-पाँच कि.मी. का पैदल कच्चा रास्ता पैदल ही पारकर हम गाँव जाते थे,यदा कदा किसी का ट्रैक्टर मिल जाना बड़ी किस्मत ही होती थी।

एक बांस के प्रवेश द्वार (फाटक)से अंदर होकर,आंगन को पारकर सीधे,पीछे जाकर ही रुकते थे। जहां पीछे का आंगन होता,और दादी अक्सर वही होती थी। जो या तो चूल्हा जला रही होती,या पानी लेकर आ रही होती। मैं और दोनों छोटे भाई बहन,खूब खातिर होती हमारी। बीच बीच में अड़ोस पड़ोस के बच्चे भी झांक झांक हमें कौतूहल से देखा करते थे,जैसे हम एलियन हो।

इस बीच दादी का मायका जो पीछे ही था,वहां खबर होती,और एक पूरी फौज हमें मिलने आ जाती थी, जिनमें हमारे हम उम्र चाचा,बुआ भी होते। दरअसल दादी के चार भाई,और उनके बच्चे। बहुत बड़ा परिवार था,जो सम्मिलित रूप से  रहते थे। दादा-दादी उनके गांव के घर में बंटवारे के बाद यहाँ आन बसे थे,वहाँ कोई आसरा भी ना था। यहाँ दादा खेती करते,और दादी उनकी मदद करती थी।

खैर हमारे जाते ही,घर में सबसे पहले बनती थी,दाल-बाटी और चूरमा। चूल्हे की आंच में सिंकी हुई बाटी,और बड़ी सी देगची में धीमी-धीमी आंच पर पकी,अपने खेत की दाल,जिसमें सिर्फ़ हींग, जीरे और खड़ी लाल मिर्च के छौंक से कमाल हो जाता। चूरमा भी दादी के हाथों से मसलकर बनता, वो बिना मिक्सर कैसे बढ़िया बारीक चूरमा बना लेती थी। वो स्वाद आज भी जीवंत है।

लिपे-पुते,पीली मिट्टी की ढिक (किनारों पर की गई सज्जा) और माढ़ने से सजे हुए घर को छोडकर, फिर हम फलांग लगाते, दादाजी के बाड़े में, यानी उनका बगीचा, जो एक हरित कोष ही था, जिसमें आम, नीम, बेल, जामुन, इमली,अनार, नींबू के साथ-साथ फूल जैसे सदाबहार, गेंदा,गुलाब, चांदनी अपनी छटा बिखेरते,और शौकीन दादाजी नित नये नये पौधे लगाते जाते थे।

एक बार बाड़े में जाओ,तो आने का मन नहीं करता था,सीधे शाम को लौटते,और दादाजी की सफेद गाय, जिसे वो एकदम स्वच्छ रखते, जैसे चांदनी हो, और उसका लाल बछड़ा देख हम कहते ये मम्मी पर नहीं गया है..तो दादाजी हंस देते। इस बीच, बुआ और चाचाजी के बच्चे भी गांव आ जाते और समा बंध जाता।

ऐसे ही छुट्टी खत्म होने पर बेमन से सब विदा लिया करते,फिर यंत्रवत स्कूल जाओ,और पढ़ाई में खो जाओ। खैर परीक्षा में प्रथम आने पर उसका फल भी मिल जाता, फिर से आ जाती छुट्टियां।

कई बार हम नानाजी के घर पहले पहुंच जाते,वहाँ भी नानाजी के हाथ की लहसुन वाली चटनी और पूरी खाने का मजा और मौसियों के बच्चों के साथ एक सामूहिक भोज ही हो जाता था ।फिर वहां कुछ दिनों मौज करके हम नर्मदा के रास्ते, नाव पर सवार होकर नदिया के पार दादाजी के घर आ जाते। अक्सर गर्मी के दिन मे आंवलीघाट पर बहुत भंडारे होते थे तो अक्सर वहां जाना होता था। ट्रेक्टर ट्राली में सबको लेकर वहां जाते और नर्मदा में अटखेलियां करते, बडे़ लोग पूजापाठ में लगे रहते थे। भंडारे की आम की लौंजी, पूरी, दाल-चावल भी स्वाद में विशिष्टता लिए होते थे, जो अन्यत्र नहीं मिलती थी।

हमारे नर्मदा घाट की एक विशिष्टता है, जो मैं अपने बचपन से ही देख रही हूँ, यहाँ बड़े बड़े वाहन एक बड़ी सी नावपर रखकर, इस पार से उस पार पहुंचाए जाते हैं,जो पहली बार देखता है, वह अचरज से भर जाता है।

इस तरह दादाजी के घर से छुट्टियों का लुत्फ़ लिया जाता। एक हादसे में फूफाजी के जाने के बाद, बुआ और उनके बच्चे दादाजी के पास रहने लगे थे। अब हम मेहमान होते थे,और वो मेजबान हो गये थे। समय के साथ भूमिका बदल गई थी। खैर जब तक वय की दहलीज पर ना पहुंचे, सब ठीक-ठाक ही था, पर एक दिन एक आंधी में बाड़े के द्वार पर खड़ा जामुन वृक्ष भरभराकर गिर पड़ा, शायद उसे भी रिश्तों की दरकन का एहसास हो चला था।

मंथरा ,कैकैयी जैसी उपमा दी जाने वाली स्त्रियां आकर रिश्तों पर दीमक लगा गयी थी, और बड़ों के साथ -साथ बच्चों पर भी असर हो ही चला था। एक वितृष्णा सी दादाजी के मन में भी हो चली थी, हम सबके प्रति। वह मोह अब कम हो चला था,और संपूर्ण रुप से बरस रसा था ,पिताहीन बालकों पर,जिसकी उन्हें आवश्यकता भी थी। हमे तों दादाजी का दर्पण सा निर्मल मन चाहिए था, जो कि अब धुंधला हो चुका था।

धीरे-धीरे व्यस्तता की भागदौड़ में हम भी शामिल हो गए। पढ़ने लिखने, इत्यादि में समय बीत गया। रिश्तों की दरकन के कारण गांव जाना भी कम हो गया। खपरैल के घरों  की जगह पक्के धूलरहित मकान बन चुके हैं। घर पक्के हो गए हैं,और दिल कच्चे हो चुके हैं। वो खपरैल वाला घर सूना है, वहाँ दादी भी नहीं रहती है, वो उनकी बेटी के साथ बाड़े में बने पक्के मकान में रहती है। वो बगीचा भी खो गया है। जहाँ हरे वृक्ष हवा से हमें सहलाया करते थे, और हमारी शैतानियों के गवाह थे।

खैर ये मन नहीं मानता, और यादों की फुनगी को औचक ही छू आता है, और एक पल में ही उन सारे लम्हों की सैर कर आता है। वो बाड़े के वृक्ष, खेत,खलिहान, गांव वाले साथी, कच्चा घर और वो बारिश का आना, टपकती बूंदी को हाथों से झेलना। वो नर्मदा का किनारा, धूनीवाले दादाजी की समाधि, वो सारे मंदिर, साधु संतो का जमावड़ा, परिक्रमा पथ पर विश्राम करते परिक्रमा वासी ओर उनका बरसता आशीष..और वह सुंदर परिचित वाक्य... नर्मदे हर।

0 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 82 : गाँव की यादें // कविता नागर"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.