संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 83 : अजनबी दूत // अर्चना पांडेय

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प्रविष्टि क्र. 83

अजनबी दूत

अर्चना पांडेय

आज भी मैं वो पल स्मरण कर प्रसन्नचित हो विचारमग्न हो जाती हूँ, कि आखिर कौन थे ? वो अजनबी भैया कोई दूत या स्वयं वेष बदल कर प्रभु प्रकट हुये थे.

अपने माता-पिता व भाई संग गोरखपुर के सफर के लिये दिल्ली से रवाना होने वाली रेलगाड़ी हमसफर में मैं अभी अपने सीट पर बैठी ही थी कि एक बीस,इक्कीस वर्ष के नवयुवक मेरे सामने वाले सीट पर आकर बैठे. मैं महज नौ साल की थी,बहुत बचपना था मुझमें.

वो आते ही मेरे पिताजी के संग गपशप मे व्यस्त हो गये. कुछ क्षण तक तो शोर का वातावरण बना रहा,किंतु शीघ्र ही मेरे पिताजी मौन हो फोन पर व्यस्त हो गये. माहौल काफी शांत प्रतीत हो रहा था,मुझे बेहद प्रसन्नता हुई, क्योंकि मैं भैया के अतिवाचाल स्वभाव से क्षुब्ध हो गयी थी.

मैंने ऊपर वाले का आभार किया और झरोखे पर बैठ बाहर का दृश्य निहारने लगी. सफर करते समय रेलगाड़ी में ,मैं सदैव झरोखे पर ही बैठती थी, झरोखे से बाहर का दृश्य अत्यंत मनमोहक प्रतीत होता था. बशर्ते कोई विघ्न उत्पन्न न हो. किंतु मेरी प्रसन्नता बस कुछ पल की ही थी क्योंकि भैया मौन साधने वालों में से नहीं थे, जब उन्हें आभास हुआ की मनोरंजन की अब कोई अन्य युक्ति नहीं हैं तब उन्होंने अपनी तिरछी निगाहें मुझ बित्ते भर की मासूम पर गड़ाई. उनकी वाकपटुता से कब तक बच पाती शामत तो आनी ही थी.

भैया को खुरापात सूझी वे अपने अधर को दांतो से दबाते हुए, मुझे छेड़ने के उद्देश्य से फुसफुसाते हुये मध्यम स्वर में “हेलो” बोले . प्रारम्भ में मैंने उनकी आवाज अनसुनी कर दी, किंतु फिर दुबारा उनके रवैये पर मैंने प्रतिक्रिया की, फिर क्या? वो मुझसे अनगिनत प्रश्न करते गये और मैं बेमन जवाब देती गयी प्रतीत हो रहा था कि मैं किसी परीक्षा हाल में बैठी हूँ और वो मेरी परीक्षा ले रहे हो. उन्हें मौन देखने की प्रतीक्षा खत्म ही नहीं हो रही थी. अंतत: मैं खिन्न हो मुँह बनाते हुये बोली- “ सभी यात्रियों को सूचित किया जाता है , कृपया कोई किसी को तंग न करे.
आखिरकार लज्जित हो लाचार मन भैया अपने बैग से किताब निकाल अध्ययन में व्यस्त हो गये. मैं चैन की साँसे भर फिर रेलगाड़ी से बाहर निहारने लगी. शीघ्र ही आदित्य व मयंक में लुकाछिपी का खेल आरम्भ हो गया और अंधकार होने लगा,अंधेरे में बाहर का दृश्य धुंधला प्रतीत हो रहा था. अंतत: मेरा ध्यान झरोखे से हट सामने उबासी ले रहे भैया पर पड़ा, जो किताब में अपना चेहरा छुपा पढ़ने में मग्न थे.

और मैं खामोश उन्हें देख रही थी अब मेरे हृदय में उनसे बात करने की उत्सुकता उत्पन्न हो रही थी.किंतु वो मुस्कुरा -मुस्कुरा कर कहानियों का आनंद ले रहे थे. मैं कभी मस्तक पे हाथ रख, तो कभी घुटनों के बल सीट पर बैठ कर उनके पुन: बात करने की प्रतीक्षा कर रही थी. मेरे मन में एक विचार आया कि इस किताब में आखिर ऐसा क्या है? जिससे आनंद लेने में वो इतने लीन थे. यद्यपि मैंने अपना सिर नीचे झुका कर किताब के कवर पर नजर डाली जिस पर स्पष्ट अक्षरों में शीर्षक “टू स्टेट” लिखा था जिसके लेखक चेतन भगत थे.

चेतन भगत की चर्चा पूर्व भी सुनी थी किंतु उस दिन भैया के प्रसन्नचित्त मुख को देख बहुत प्रभावित हुयी.
मैं हर क्षेत्र में प्रतिभावान थी किंतु मेरी तहेदिले ख्वाहिश गायिका बनने की थी, मगर पिताजी के हाथों कुटम्मस के डर से मैंने अपनी भावनाएं अपने भीतर दबा ली. किंतु मेरा सपना कुछ बनने का था इसलिये उस दिन चेतन भगत से प्रभावित हो मैंने लेखनी में अपनी पहचान बनाने का दृढसंकल्प लिया.

वक़्त के साथ-साथ मैं चेतन भगत के अतिरिक्त कुमार विश्वास की भी प्रशंसक बन गयी.और उसी पल के संकल्प के कारण आज लेखनी में, मैं अपनी पहचान बनाने में सक्षम हो पायी हूँ. आज बेहद खेद होता है मुझे भैया के साथ किये गये दुर्व्यवहार के बारे में सोचकर.

अर्चना पांडेय

२६-०३-२०१८

मोदीनगर,ग़ाज़ियाबाद

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