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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 84 : छः महीने दिन तथा छः महीने रात का देश ओस्लो // सुधा शर्मा

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प्रविष्टि क्र. 84 छः महीने दिन तथा छः महीने रात का देश ओस्लो सुधा शर्मा " मुझे ऐसा लग रहा था जैसे पेट का सब बाहर निकल जाएगा। साथ ही ...


प्रविष्टि क्र. 84

छः महीने दिन तथा छः महीने रात का देश ओस्लो

सुधा शर्मा

"मुझे ऐसा लग रहा था जैसे पेट का सब बाहर निकल जाएगा। साथ ही मन में यह आशंका थी कि पास बैठी लड़कियां घृणा करेंगी। लेकिन मेरा डर धराशाई हो गया जब उन लड़कियों ने मेरी स्थिति को भांपकर एअर होस्टेस से एक बैग की मांग की , जिसमें मैं उल्टी कर सकूं । मुझे पानी पिलाया। पानी पीते ही मेरा जी और घबराया और पेट ने पूरी तरह साफ होने का निर्णय ले लिया। उल्टी होने पर वह जापानी लड़की मेरी पीठ थपथपा रही थी और रिलैक्स रिलैक्स कहते हुए सांत्वना दें रही थी। मेरा मन कृतज्ञता से भर गया और पूरा विश्वास हो गया कि पूरी दुनिया को एक ही ईश्वर ने बनाया है। और हमारे मन का यह अहं,कि सभी सद्गुणों के स्वामी केवल हम ही है, चकनाचूर हो गया"

स्मृतियों के गलियारों में झांकने पर मैं स्वयं को एक छोटे-से कस्बे के घर के मिट्टी के आंगन में खड़े पाती हूं। स्वप्न में यह सोचने की शक्ति नहीं थी कि मैं सिर के ऊपर से गुजरने वाले चील से दिखने वाले जहाज को सामने से देख भी पाऊंगी। शादी हो कर भी एक सामान्य परिवार में आई। सारा जीवन बच्चों की शिक्षा, और गृहस्थी के लिए नमक मिर्च का जुगाड़ करने में ही बीत गया। औकात से बढ़कर ख्वाब देख कर दुखी होना मुझे स्वीकार नहीं था। लेकिन ईश्वर ने अति होनहार बच्चों का उपहार से मेरे जीवन को कृतार्थ किया था।

मुझे स्मरण है वो पच्चीस जुलाई का दिन जब नार्वे की राजधानी ओस्लो से मेरे बेटे का फोन आया। फोन पर मुझे ओस्लो घुमाने का निमंत्रण था। विदेश यात्रा के बारे में सोच कर मन रोमांचित हो रहा था।

ओस्लो की यात्रा यानी ऐसे स्थान की यात्रा, जहां छः महीने दिन तथा छः महीने रात होती है। बचपन से ही मन यह सोच कर हैरान रह जाता था कि कैसे रहते होंगे वहां के लोग लगातार छह महीने तक सूर्य नारायण के दर्शन के बिना, और कैसे वहां के लोग सूर्य के अविराम प्रकाश में शांति से आराम से गहन निद्रा का आनंद लेते होंगे? कैसे वहां दिनचर्या निर्धारित होती होगी। अब उस विस्मय का उत्तर प्रत्यक्ष रूप से मिलने वाला था। बेटे से भी मैं वहां के लोगों, रहन-सहन और मौसम के बारे में पूछती रहती थी । अब वह जिज्ञासा शांत होने वाली थी। और सोच-सोच कर मन की गागर अधजली गगरी के समान छलक रही थी।

खैर पासपोर्ट तो पहले से ही बना हुआ था। अब कल्पनाओं को उड़ान भरने के लिए वीजा बनवाने के लिए कार्रवाई प्रारंभ हुई। वीजा बनवाने के लिए हमें दो बार दिल्ली जाना पड़ा। चाणक्य पुरी में स्थित नार्वे दूतावास में वीजा बनवाने में अधिक झंझट नहीं हुआ। बेटा भी ओस्लो से दिशा निर्देश देता रहता था। इससे काम और आसान हो गया।

बेटे ने यह भी निर्देश दिया कि गरम कपड़ों की व्यवस्था ठीक से करके लाना क्योंकि नार्वे यूरोप का ऐसा देश है जहां तापमान माइनस में चला जाता है।

मैंने जाने से पहले ओस्लो के बारे मै जानने की उत्सुकता के कारण मोबाइल पर देखा तो पता चला कि यूरोप में नार्वे की राजधानी ओस्लो सबसे बड़ा नगर है, जिसकी स्थापना एक म्यूनिसपल के रूप में हुई थी। जिन स्थानों को पत्रिकाओं के पृष्ठों पर देखा था उनके प्रत्यक्ष दर्शन का समय आ गया था।

एक सितंबर को सुबह ६:२० पर लुफ्थांसा एअरवेज से मुझे जाना था। दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट से फ्लाइट पकड़ने के लिए रात के ग्यारह बजे हमने मेरठ छोड़ दिया। इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हम पहले भी गए थे। जब 2004 में बेटा पहली बार विदेश यात्रा अर्थात आस्ट्रेलिया में इंफोसिस कम्पनी की ओर से गया था । उत्साह चरम सीमा पर था। खानदान का पहला बेटा विदेश जा रहा था। लगभग सभी रिश्तेदार बेटे को छोड़ने गये थे। सभी के मन में उमंग थी कि आज एअरपोर्ट देखने को मिलेगा। लेकिन वहां के नियमानुसार कोई भी एअरपोर्ट की आंतरिक सज्जा या सुंदरता के दर्शन नहीं कर पाया था। एअर पोर्ट पर खड़े हवाई जहाज को भी नहीं देखा था । 2008  में मुझे डोमेस्टिक प्लेन में बैठने का अवसर मिला । जब बेटे के साथ दिल्ली से बेंगलुरु ,बेंगलुरु से पूणे और फिर पूणे से दिल्ली वापस आई थी। आज इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंच कर बड़ी प्रसन्न थी। बेटे ने अच्छी तरह से यात्रा के संबंध में गाइड किया था । वैसे भी बेटा फोन से संपर्क बनाये हुए था।

दिल्ली एअरपोर्ट पर चैकिंग प्रक्रिया के पश्चात माइग्रेशन फार्म भरने की प्रक्रिया शुरू हो गई । फार्म भरने के बाद मैं सम्बन्धित अधिकारी के पास जाना चाहती था। वहां पर पहले से ही जर्मनी जाने के लिए एक परिवार खड़ा था। लेकिन वहां कोई लाइन नहीं लगी थी। अतः अनजाने में मैंने सीधे अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया। तभी उस परिवार ने मुझे रोका और ताना दिया कि हम भारतीय ही अपना हक दूसरों को आसानी से दे देते हैं जबकि विदेशी तो जरा भी नहीं हट सकते। यह सुनकर मैं चुपचाप पीछे खड़ी हो गई। लेकिन फार्म भरा न होने के कारण अधिकारी ने उन्हें फार्म भरने के लिए भेज दिया। पूरी प्रक्रिया होने के बाद अब मैं निश्चिंत होकर गेट नं 10 जहां लिखा देखा, वहीं बैठ गई । लेकिन मैं ग़लत थी क्योंकि जब जहाज में बैठने के लिए घोषणा हुई पता चला जहाज तक पहुंचने के लिए बहुत दूर जाना था। मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। मैंने ट्राली ली उसमें बैग रखा और बड़ी तेज गति से चलना प्रारंभ किया।पू छने पर पता चला कि गेट नंबर दस बहुत दूर है। जल्दी पहुंचने के लिए मैंने विद्युत स्वचालित मार्ग पर भी दौड़ लगा दी। मंजिल तक पहुंचने के समय तक मैं बुरी तरह हांफ गई। और लाइन में सबसे पीछे मैं ही थी। चलो बाल-बाल बच गयी ,नहीं तो सारे करे कराए पर पानी फिर जाता। और मैं कल्पनाओं में ही ओस्लो घूम रही होती।

सौभाग्य से मेरी सीट विंडो के पास थी। प्रकृति प्रेमी मन खुशी से झूम उठा यह सोच कर कि ऊपर से नीचे का, बादलों के ऊपर का मनोहारी दृश्य‌‌ देखने का अवसर मिलेगा। सूरज से और पास से नजर मिलाने का मौका मिलेगा। उड़ान भरते समय हवाई जहाज की प्रत्येक गतिविधि को निरखने के लिए मन बड़ा लालायित था। अतः निगाहें कांच की पारदर्शी खिड़की के बाहर के दृश्य को ही घूर रही थी। अन्तर्राष्ट्रीय हवाई जहाज आकार में बहुत बड़े थे। आसमान में चील जैसे दिखने वाले जहाज इतने बड़े होते हैं सोचकर मन आश्चर्यचकित रह गया। दो मिनट बाद ही जहाज के विशालकाय पंख खुले, ऐसा लगा मानो वो अपने अन्दर हवा भर रहे हो। हवाई जहाज पहले दौड़ा ‌‌‌‌‌ फिर आकाश की ओर उड़ चला। अन्दर बैठे होने के बाद भी‌‌ हवाई जहाज जैसे ही ऊपर उठा मेरे दिल में धक्का सा लगा। बादलों को चीरता हुआ जहाज अब ऊपर था। जहां तक निगाहें जाती बादलों का ही साम्राज्य था।

दिल को पता था कि ‍इन बादलों का कोई अस्तित्व नहीं है फिर भी भगवान की कृति देखकर मन ईश्वर के प्रति अभिभूत हो गया। कितनी सुंदर और कितनी प्यारी है उसकी रचना। लेकिन मन विज्ञान को सराहें बिना भी न रह सका। विज्ञान की कृपा से ही बादलों को इतने पास से देखने का अवसर मिला। स्वर्णिम सूर्य रश्मियों के कारण यहां पर जहां-तहां सोना बिखरा पड़ा हो ;वहां का दृश्य देखकर तो ऐसा ही ऐसा आभास हो रहा था। विभिन्न आकृति धारण कर बादल अपने अस्तित्व का परचम लहराना चाहते थे। कहीं लगता था कि दूर कोई गुफा है। कहीं हिरण दौड़ लगाने का भ्रम उत्पन्न कर रहे थे। जहां बादल नहीं थे वहां ऐसा लगता था मानो किसी कलाकार ने अपनी तूलिका से कोई रंग-बिरंगा चित्र बनाया हो। कभी काले,कभी सफेद,कभी सलेटी रंग के बादल मंडरा कर मन को आकर्षित कर रहे थे। नीचे देखने पर कभी पर्वत श्रृंखला, कभी रेगिस्तान आ रहा था। सभी दृश्यों का अपना आकर्षण था। संसार में इतनी सुन्दरता, इतनी विभिन्नता बिखरी पड़ी हैं देखकर शब्द बयान करने में असमर्थ से हो रहे थे। मनमोहक दृश्यों को देखते-देखते मैं उनमें इतनी डूब गई कि समय का आभास ही नहीं हुआ । इतने में ही पेटी ( सीट बेल्ट) बांधने का निर्देश दिया गया क्योंकि हवाई जहाज इस्तांबुल हवाई अड्डे पर पहुंच चुका था। इस्तांबुल में हमें एक- दो घंटे के लिए रूकना था और वहीं से ओस्लो के लिए फ्लाइट पकड़नी थी। दिल्ली एअरपोर्ट की घटना ना दोहरानी पड़े यह सोचकर मैं बहुत सजग थी लेकिन वहां के कर्मियों ने हमें उसी गेट के पास बैठा दिया था जहां से फ्लाइट में बैठना था।

वहीं पास में एक भारतीय परिवार दिखाई दिया, जो मराठी था। उस परिवार को देखकर मन बड़ा संतुष्ट और प्रसन्न हुआ। मैंने बातचीत का सिलसिला शुरू किया। प्रारंभिक बातें बड़ी अच्छी रही। उस परिवार की मंजिल भी ओस्लो ही था। परिवार में चार सदस्य थे। पति-पत्नी ,उनकी बेटी और बेटी का बेटा। बुजुर्ग दम्पत्ति का बेटा ओस्लो में रहता था। यह सोच कर मैंने फोन नंबर पूछा कि चलो विदेश में एक भारतीय परिवार से कभी-कभी बातें करने का मौका मिल जाया करेगा। लेकिन लगता था कि वो परिवार नाराज़ हो गया क्योंकि वह थोड़ी दूर जाकर बैठ गया और उस परिवार के इरादे भांप कर मैं भी खामोश हो गई।

इस्तांबुल का एअरपोर्ट बड़ा सुन्दर था। बरबस ही मन आसपास घूमने के लिए मन लालायित हो उठा। मैं अपना हैंडबैग लेकर चल पड़ी। एअर पोर्ट के सौंदर्य निरखने के लालच में मैंने सामने आए अवरोधक पर ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन एक नवयुवक ने बड़ी फुर्ती से मेरा बैग अवरोधक के दूसरी ओर रख दिया। मन कृतज्ञता से भर गया और दिमाग में यह विचार कोंध गया कि पूरी पृथ्वी पर सभी मानवों की प्रवृत्ति समान है। क्रोध,दया, वात्सल्य, घृणा, ईर्ष्या, प्रेम, लोभ, ये भाव मनुष्य के मूल भूत गुण है । हां इनका प्रतिशत अलग-अलग हो सकता है। सभी मनुष्य अच्छे हैं। लेकिन स्वार्थ के वशीभूत होकर सब विपरीत आचरण करते हैं। यहां विदेश में भी एक अनजान दोस्त मेरी सहायता कर के चुपचाप चला गया था।

अब मैंने एअरपोर्ट की एक महिला कर्मचारी से , जो देखने में अधिकारी टाइप की लग रही थी, शौचालय के बारे में पूछा ।वह मुझे उचित स्थान पर छोड़ कर आई।

मैं आसपास ही थोड़ा सा घूमी। विभिन्न देशों के व्यक्ति विभिन्न प्रकार के परिधानों में इधर-उधर चहलकदमी कर रहे थे। फ्लाइट उड़ने का समय पास सोचकर मैं अपने स्थान पर आकर बैठ गई।

तभी थोड़ी देर बाद फ्लाइट में बैठने की प्रक्रिया शुरू हो गई। अब मैं अपनी सीट पर बैठ गई । सौभाग्य से अब भी मेरी सीट साइड की ही थी। थकी हुई होने के बाद भी मैं बाहर के नजारों को आंखों में कैद करने के मोह को नहीं त्याग पाई। आखिर यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। मेरे पास दो जापानी लड़कियों की सीट थी। दूध जैसी गोरी-चिट्टी और माडर्न । वे दोनों जापानी भाषा ही बोल रही थी। अतः सारी बातें मेरे सिर के ऊपर से होकर जा रहीं थीं। तभी बाहर का नजारा आकर्षक नहीं था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्लेन काले पत्थरों के पहाड़ों के ऊपर से गुजर रहा हो। थोड़ी देर में ही ऐसा लगा जैसे काले पानी का सागर नीचे लहरा रहा हो। हरियाली का नामोनिशान नहीं था। यह दृश्य बहुत देर में समाप्त हुआ। अब मेरा दिल घबरा रहा था ।पता नहीं लंबा सफर इस घबराहट का कारण था या बाहर का दृश्य। दिल्ली से इस्तांबुल तक दृश्य मन को आह्लादित कर रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे पेट का सब बाहर निकल जाएगा। साथ ही मन में यह आशंका थी कि पास बैठी लड़कियां घृणा करेंगी। लेकिन मेरा डर धराशाई हो गया जब उन लड़कियों ने मेरी स्थिति को भांपकर एअर होस्टेस से एक बैग की मांग की , जिसमें मैं उल्टी कर सकूं । मुझे पानी पिलाया। पानी पीते ही मेरा जी और घबराया और पेट ने पूरी तरह साफ होने का निर्णय ले लिया। उल्टी होने पर वह जापानी लड़की मेरी पीठ थपथपा रही थी और रिलैक्स रिलैक्स कहते हुए सांत्वना दें रही थी। मेरा मन कृतज्ञता से भर गया और पूरा विश्वास हो गया कि पूरी दुनिया को एक ही ईश्वर ने बनाया है। और हमारे मन का यह अहं,कि सभी सद्गुणों के स्वामी केवल हम ही है, चकनाचूर हो गया।

ओस्लो के एअरपोर्ट पर जैसे ही प्लेन लैंड हुआ चैकिंग की प्रक्रिया शुरू हो गई। एअर पोर्ट से बाहर निकलने से पहले इंक्वैरी आफीसर्स के प्रश्नों की बौछार झेलनी पड़ती। मेरे से पहले एक मुस्लिम महिला सात बच्चों के साथ थी । वह आफीसर को संतुष्ट नहीं कर पा रही थी और उसी के कारण मुझे भी एअरपोर्ट से बाहर निकलने में देर हो गई। अतः अब मेरे सामने अपना सामान ढूंढने की समस्या खड़ी हो गई। काफी पूछताछ के बाद मैं उचित व्यक्ति के पास पहुंच सकी। लुफ्थांसा फ्लाइट से आए हुए सामान की बैल्ट से मेरा सामान सुरक्षित रख लिया गया था। सीट पर एक अफ्रीकी महिला बैठी थी। उसने कुछ प्रश्न पूछने के बाद मेरा सामान उपलब्ध करा दिया। बाहर मेरा बेटा प्रतीक्षारत खड़ा था।

एअर पोर्ट से घर तक जाने के लिए हमें मैट्रो रेल पकड़नी थी। मेट्रो ट्रेन में जरा भी भीड़ नहीं थी। मैट्रो स्टेशन पर बहुत सुंदर-सुंदर दुकानें सजी हुई थी। मैट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही सीढ़ियां उतर कर एक विशालकाय शेर की पत्थर की मूर्ति थी । शेर का मुंह खुला था और पूंछ मुड़ी हुई थी। काफी लोगों ने शेर की प्रतिमा के साथ फोटो खिंचवाएं। कोई पूंछ पर बैठकर कोई खुले मुंह में हाथ रखकर फोटो ले रहे थे।

उसके साथ मैंने दो-तीन फोटो खिंचवाएं। शहर ने बरबस ही मुझे अपनी ओर आकर्षित कर लिया। सड़क बहुत चौड़ी और साफ-सुथरी थी। सड़क पर बस, ट्राम, और कार सब चल रहे थे। दोमंजिला बसे भी थी। वहां पर कुछ निश्चित दुकानों से ट्रैवलिंग कार्ड मिलता था, जो प्रत्येक वाहन के लिए मान्य था। अर्थात इस कार्ड से हम ट्रेन,बस,नाव में सफर कर सकते हैं।इन वाहनों में एक मशीन लगी होती है इस मशीन में कार्ड लगाने से वाहन‌‌ का किराया कट जाता है। यानी जगह-जगह पर टिकट खरीदने के झंझट से छुटकारा।

जिज्ञासु की भांति मैं इस शहर को बड़े ध्यान से निहार रही थी। ओस्लो उंचा-नीचा पहाड़ी स्थल है। सितंबर के महीने में प्रकृति अपने पूर्ण यौवन पर थी।

बस द्वारा हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। अब हम दोनों ओर पत्थरों की दीवार से घिरे स्थान पर जाकर पतली पगडंडी पर चलकर, पत्थर के बने जीने पर चढ़कर एक बहुमंजिली इमारत के सामने थे। इसी मंजिल के प्रथम तल के एक फ्लैट में मेरा बेटा किराए पर रहता था। प्रवेशद्वार पर कांच का गेट लगा था, जो बाहर से तो एक चाबी से खुलता था लेकिन अंदर से हैंडल घुमाकर खुल जाता था। मतलब यह है कि बाहर का कोई अनजान व्यक्ति उस बिल्डिंग में प्रवेश नहीं कर सकता था। बिल्डिंग में प्रवेश करने के लिए अंदर रहने वाले व्यक्ति को फोन करो या हाथ में चाबी होनी आवश्यक थी।

यह बिल्डिंग उल्लेवाल सिकेहुस (अस्पताल) के पास थी। इस अस्पताल की बिल्डिंग के एक हिस्से की छत पर हैलीपेड था। यहां से हैलीकॉप्टर रोगियों को इलाज के लिए लाने,ले जाने के लिए अंबुलैंस की भांति प्रयोग किया जाता था। अस्पताल में और अस्पताल के चारों ओर तथा इस बिल्डिंग के आसपास हरे-भरे पेड़ और हरियाली का साम्राज्य था।

‌ ‌  मैं सुबह ही घूमने के उद्देश्य से बिल्डिंग के आसपास के क्षेत्रों में निकल जाती। वहां के मकानों की‌‌ विशेषता है कि वहां हमारे भारत के मकानों की भांति अधिकांशतः मकानों की दीवार से दीवार मिली हुई नहीं थी। सभी मकानों के चारों ओर चारदीवारी होती है और हरियाली होती है। हमारे यहां तो लोग सौ गज जमीन खरीदने पर सवा सौ गज जमीन का उपयोग करने का प्रयास किया करते हैं ।

वहां के लोगों की एक विशेष आदत है अनजान लोगों को भी मुस्करा कर हाय-हेलो करना। मैं जब भी अपने फ्लैट से बाहर निकलती थी,तब अक्सर मुझे अनजान लोगों की हाय, हैलो सुनने को मिल जाती थी। नार्वे के लोग अक्सर भागते-दौडते मिलते थे। अपने फ्लैट की बालकनी से सड़क का दृश्य देखकर तो ऐसा ही लगता था ।पैदल मार्ग पर लडके-लडकियां अधिकतर दौड़ते-भागते दिखते थे। शायद वो योग के लिए अलग से समय न निकाल पाते हो और काम के समय भागकर एक पंथ दो काज वाले सिद्धांत को अपनाते होंगे। एक बार मैंने देखा एक स्त्री ने नीचे से दौड़ना शुरू किया और ऊपर दौड़ती हुई चढ़ी। मेरी आंखें निरन्तर उसका अनुसरण कर रही थी। मेरे लिए यह आश्चर्य और साहस का काम था। अब आधुनिक युग की बात छोड़ दें तो हमारे देश में तो नारी को सिर झुकाए हुए आंखों को नीचे करके चलने की सलाह दी जाती थी।

मुझे पता चला कि प्रशासन ने पूंजीवाद को रोकने के लिए और समानता बनाते रखने के लिए लोगों के वेतन में अधिक अंतर नहीं रखा है। आवागमन के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर अधिक जोर दिया गया है । बहुत कम लोगों के पास अपनी कार है। यहां पैट्रोलियम की सुविधा होते हुए भी पैट्रोल बहुत महंगा है। हो सकता है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना इसका मात्र उद्देश्य हो। हमारे देश में घर का पैट्रोल नहीं है फिर भी कुछ व्यक्तियों के पास तो दो-दो गाड़ियां हैं। जब से बैंक ने दया-दृष्टि की है तब से तो लगभग हर चौथे व्यक्ति के पास अपनी कार है। अधिक गाड़ियां होना भी हमारे देश की सडकों पर जैम समस्या का प्रमुख कारण है। देश जनसंख्या की समस्या से तो पहले से ही जूझ रहा है। वहां पर हमारे देश की अपेक्षा बाइक का भी कम प्रयोग है। वहां का युवा साईकिल का प्रयोग बहुत करता है। जगह-जगह पर साईकिल स्टैंड बने हैं। कोई भी कार्ड धारक कार्ड का इस्तेमाल कर साईकिल उठा सकता है और कार्य पूर्ण होने पर साईकिल यथास्थान रख सकता है। मेरे मन में प्रश्न उठा कि हमारे देश में तो लोग एटीएम तक उखाड़ लेते हैं। यदि साईकिल स्टैंड बना दिए तो शायद साईकिल का हैंडल छोड़कर सारी साईकिल बेच देंगे। पता नहीं हमारे कानून की विनम्रता है या हमारे अंदर देशभक्ति की भावना की कमी। खैर छोड़ो; इस विषय में हम अति साधारण लोग कर भी क्या सकते हैं।

पहले शनिवार को हम ओस्लो की मैरिडलेन में स्थित मैरिडलवेनन्ट झील देखने गए। यह शहर की सबसे बड़ी झील है और इस पर पूरे शहर की प्यास बुझाने का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है। झील के चारों ओर विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और घना जंगल था। विभिन्न प्रकार की बत्तखें और अन्य पक्षी इसमें स्वतंत्रता पूर्वक विचरण कर रहे थे। कुछ बत्तखें तो गर्दन उठाकर इठलाती, बलखाती ऐसे चल रही थी जैसे अपने निवास स्थान की गरिमा का उदघोष कर रही हो। पेड़-पौधे की परछाई से और सूर्य की किरणों के प्रभाव से झील की सुंदरता द्विगणीत हो रही थी। तभी बेटे ने बताया कि यह झील दिसम्बर और जनवरी के महीनों में जम जाती है और लोग इस पर स्कैटिंग का आनंद लेते हैं। झील के किनारे बैठने के लिए लकड़ियों की बैंच बनी हुई थी। मन तो कर रहा था कि ‌‌‌‌‌‌‌‌बैठकर तूलिका से इस दृश्य को कैनवास पर उकेर दूं। लेकिन इस दृश्य को यथासंभव आंखों में कैद करके हम वहां से लौट आए। रास्ते में अनेक अंग्रेज मिले , जिन्होंने अपने बच्चों को अपने कंधों पर या गर्दन के दोनों ओर पांव करके बैठा रखा था। बचपन में मैं सोचती थी कि बच्चों को कंधे पर हम भारतीय ही बैठाते हैं; वो भी गंवार लोग। मैंने महसूस किया कि हमारे अंदर शायद आत्मस्वाभिमान की कमी है। या आत्मविश्वास की जो हम अपने से श्रेष्ठ दूसरों को समझ लेते हैं या यूं कहिए कि हम अति विनम्रता के कारण अपने से अधिक अन्य लोगों को महत्व देते हैं और इसका परिणाम यह होता है कि दूसरे हम पर हावी हो जाते हैं। और शायद हमारी पराधीनता में भी यह भाव प्रधान रहा हो। कुछ लोग रास्ते में ही टांग उठाकर योग कर रहे थे। कुछ लोग भाग रहे थे या तीव्र गति से चल रहे थे। ऐसा लगता था मानो कि यहां के लोगों ने भागने को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया हो ताकि ओस्लो की कड़कड़ाती ठंड से दो चार हो सकें।

अगले दिन हम मोनोलिटन को देखने के लिए निकल पड़े। जैसे कि इसके नाम से ही इंगित होता है यह एक पत्थर से बना विशाल स्तूप है। इसमें असंख्य मानवों की आकृतियां उकेरी गई हैं। ये आकृतियां आपस में गुंथी हुई हैं। इसकी ऊंचाई चौदह मीटर है। यह १९२३ से १९४३ में बनीं अर्थात इस को बनाने में बीस वर्ष का समय लगा। यह विजिलैंड पार्क में स्थित है। इस पार्क को मूर्तियों का पार्क ही कहना उचित है यहां पर मानव के हर रूप , हर उम्र, और हर वर्ग की मूर्ति है। पार्क के प्रवेश द्वार पर बहुत बड़ा लोहे का फाटक है। फाटक के अंदर घुसते ही रास्ते के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे वृक्ष पहरेदार की भांति खड़े हैं। इसके बाद मूर्तियों का क्रम शुरू हो जाता है। पार्क में कहीं बाप ने बच्चे को अपने कंधों पर बैठा रखा है , कहीं ममतामयी मां अपने बच्चे को उछाल कर खिला रही है, कहीं दो सैनिकों को द्वन्द्व करते हुए दिखाया गया है। कहीं पर स्त्री ने अपने दोनों हाथों और घुटनों को जमीन पर टिका रखा है और दो बच्चों को पीठ पर बैठा रखा है। कहीं पुरुष ने एक बच्चे को गोद में बैठा कर दूसरे बच्चे की कमर के इर्द गिर्द हाथ डाल रखे हैं। कहीं छः नारियां सिर से सिर मिलाएं खड़ी हुई है , मानो गुप्त मंत्रणा कर रही हो। इन सब मूर्त्तियों की पीठ दिखाई दे रही है। कहीं छोटे-बडे सभी मनुष्य एक-दूसरे से गुथें हुए हैं मानो एक-दूसरे को आगोश में लेने का प्रयास कर रहे हों। जीवन के हर रूप को दिखाने का सफल प्रयास किया गया है। मूर्तियां बड़ी सजीव और आकर्षक है। पार्क में जगह-जगह बड़े करीने से सुंदर आकृति में रंग बिरंगे फूलों के पौधे लगे हैं जो पार्क को और अधिक जीवंत बना देते हैं । पार्क बिल्कुल समतल नहीं है जैसे-जैसे चलते जाते हैं सीढ़ियों के माध्यम से ऊपर चढ़नते जाते हैं। पार्क के बीच में एक छोटा सा झरना है। गोलाई में खड़ा छः या आठ व्यक्तियों का समूह गोल कटोरेनुमा पात्र को सिर झुकाए कंधों पर उठाए हुए हैं। यह मूर्ति काले पत्थरों से निर्मित है। झरने के चारों ओर युगल मूर्तियां हैं। ये भी काले पत्थरों से निर्मित है। शेष मूर्तियां सफेद पत्थर की बनी हैं। आगे चलने पर ऊपर जाने के लिए हर दिशा में सीढ़ियां बनी हुई हैं। चारों दिशाओं में बनी मूर्तियां ही सीढ़ियों को चार दिशाओं में बांटती हैं। सीढ़ियां चढ़ने के बाद गोलाकार रूप में मानवाकृतियों से गुंथा स्तूप खड़ा है। यह पार्क वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इस पार्क की सभी मूर्तियां नग्न अवस्था में हैं। इस पार्क में हम घंटों तक घूमते रहे। और यहां के कला सौंदर्य को आंखों में कैद करने का प्रयास करते रहे।मन बड़ा प्रसन्न हो रहा था कि हर जगह का मानव पत्थरों में भी जान डालने की कोशिश करता है। भारत की वास्तुकला के रूप में अजन्ता, एलोरा की गुफाएं भी बेजोड़ हैं।

बेटे की छुट्टी के अनुसार हम घूमने की योजना शनिवार और रविवार को ही बनाते थे। अगले शनिवार को गलसतवे चर्च घूमने गए। यह अधिकांशतः मूल रूप में नार्वे में जीवित बचे हुए चर्च हैं। और आमतौर पर इसे मंडप चर्च माना जाता है। इन सभी चर्चों में लकड़ी के दरवाजे हैं और बहुत सुंदर मेहराब हैं। इनकी सजावट क्रियश्चयन पद्यति और पूर्व क्रियश्चयन चर्च का मिला जुला रूप है।

अगले दिन सुबह ही घूमने के लिए हम ओपेरा हाउस गये। यह नार्वेजियन का राष्ट्रीय ओपेरा और बैलेट घर है। यहां ४,१४,०००स्केवर फीट के कुल क्षेत्र में ११००कमरे हैं। और ओडिटोरियर सीट १,३६४ हैं। दूसरे दो प्रदर्शन स्थान है यहां दो सौ और चार सौ सीट हो सकती हैं। मुख्य मंच बावन फीट चौड़ा और एक सौ तीस फीट गहरा है। इसका बाहरी धरातल सफेद कैराया के मार्बल से बना है। कैराया , इटली और सफेद संगमरमर इसे पानी से निकलने का दृश्य उत्पन्न करते हैं। यह नार्वे का सबसे बड़ा सांस्कृतिक भवन है और बहुत सुंदर और आकर्षक है। यहां ओपेरा हाउस के बाहर मुझे एक सुनहरा स्टेच्यू दिखाई दिया। मैंने बेटे से कहा -कितना सुंदर स्टेच्यू है बिल्कुल सचमुच का आदमी लग रहा है। मेरे बेटे ने हंसते हुए कहा- मम्मी इसके पास जाओ और छूकर देखो। मैं जैसे ही पास गई ;उसने हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया। मेरे हाथ मिलाते ही वह मेरे पास आकर खड़ा हो गया। और अपना हैट उतार कर मेरे सामने कर दिया। बेटे ने उसमें एक क्रोन डाल दिया। और मुझे बताया कि यह भिखारी है और बहुरूपिया बनकर भीख मांगता है। मेरे बेटे ने उसके साथ एक फोटो भी खींच दिया।

इसके बाद हम पैलेस पार्क गये, जो ओस्लो के केंद्र में स्थित है और आम पार्क भी है।बाइस हेक्टेयर में फैला यह पार्क अत्यंत सुंदर और आकर्षक है। लगता है ईश्वर ने यहां विशेष सुंदरता बिखेरी है। रायल पैलेस जाने के लिए अनेक चौड़ी-चौडी सीढ़ियां चढ़ कर जाना पड़ता है। सीढ़ियों के पास बहुत बड़ा मैदान है। मैदान में चौड़े ऊंचे स्तूप पर एक घुड़सवार वीर की मूर्ति लगी है। यह मूर्ति रिकॉर्ड नोरड्रेक की है। महल के बाहर दो सैनिक विशेष वेशभूषा में पहरा देते हैं। उनका पोजीशन बदलना प्रसिद्ध है। इस बड़े मैदान में बड़े दिन के अवसर पर सारी जनता एकत्रित होती है और प्रशासन की ओर से आयोजित आतिशबाजी का आनंद उठाती है। पास में ही गार्डन है, जहां अनेक मूर्तियां लगीं हैं।

अगले शनिवार लिन्डोया आयरलैंड जाने की योजना बनाई। यहां हम स्टीमर के द्वारा गये। समुद्र के तट से अनेक छोटे-छोटे , हरे-भरे टीले से दिखाई देते हैं। वास्तव में ये आयरलैंड थे। क्योंकि आस्लो में अनेक छोटे-छोटे आयरलैंड हैं। इन आयरलैंड के रोगियों को लाने ,ले जाने के लिए अस्पतालों में हैलीकॉप्टर की व्यवस्था है। इस आयरलैंड में घूमते-घूमते हम इतना खो गये कि शाम होने का अनुमान ही नहीं हुआ। और स्टीमर तक पहुंचने का रास्ता भूल गए। बेटा कभी इधर भागता कभी उधर, लेकिन रास्ता सूझ नहीं रहा था। अब हमें चिंता हुई । कोई दूर -दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था। तभी सामने से चार लड़के आते हुए दिखाई दिए। उनको देखकर हमारी आंखों में आशा की किरण चमक उठी। उन्होंने हमें स्टीमर तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया और हम अपने घर आ गए लेकिन आयरलैंड का दृश्य अब भी घूम रहा था। समुद्र के किनारे काले-काले पत्थर थे। और उन पत्थरों पर बर्फ पतली चादर के रूप में जमी थी। हाथ में उठाने पर कांच का टुकडा सा लगता था। वापसी के समय सूरज की किरणों से समुद्र का पानी स्वर्णिम आभा से युक्त था। प्राकृतिक दृश्यों का पूरा आनंद लेने के लालच में हम जानबूझकर स्टीमर के ऊपरी हिस्से में बैठते। जबकि ऊपर ठंड के कारण हाथ पांव सुन्न हो जाते थे। बस में भी मैं भागकर साइड की सीट पर बैठती थी।

रविवार को हमने शहर भ्रमण की योजना बनाई। शहर बहुत सुंदर और प्रायोजित तरीके से बसा हुआ था। बड़ी-बड़ी सड़कें दो भागों में विभाजित थी। एक भाग आने वालों के लिए,दूसरा भाग जाने वालों के लिए। दोनों भाग में पहले पैदल चलने वालों के लिए मार्ग फिर पेड़ों की कतार, फिर साईकिल सवारों के लिए मार्ग। इनके किनारे भी पेड़ पहरेदार के रूप में खड़े थे। फिर वाहनों के लिए पथ था। जगह-जगह पर सफेद या काले पत्थरों से निर्मित मूर्तियां शहर की सुंदरता में चार चांद लगा रही थी। विभिन्न स्थानों पर सुंदर-सुंदर फव्वारे लगे हुए थे।

वहां की लड़कियों बहुत सुंदर है। वे अपनी आंखों का मेकअप तो विशेष रूप से करती हैं। बच्चों के लिए प्रैम, कार सीट या डलिया नुमा सीट होती है , जिनमें बैठाकर या रखकर बच्चों‌ को ले जाते हैं। यदि आपके पास ये उपरोक्त साधन नहीं हैं तो टैक्सी चालक आपको अपनी टैक्सी में बैठाना स्वीकार नहीं करेगा। प्रैम को बस में चढ़ाने की व्यवस्था बहुत अच्छी है। बस को सड़क के किनारे रोककर उसका तल हलका सा नीचा कर दिया जाता है और प्रैम को आसानी से बस में चढ़ाने की व्यवस्था हो जाती है। बस ड्राइवर प्रैम सहित औरत को देखते ही यह सुविधा स्वयं उपलब्ध करा देते हैं। भारत के शहरों की अपेक्षा ओस्लो काफी छोटा शहर है। जनसंख्या कम होने के कारण सड़कों पर भीड़ नहीं है।

ओस्लो में जच्चा बच्चा का खर्च वहां की सरकार द्वारा उठाया जाता है। यदि कोई महिला किसी अन्य देश की भी वहां रहती है और वो बच्चे को जन्म देती है तो उसके खाने-पीने की, रहने की, कपड़े की व्यवस्था अस्पताल की ओर से ही होती है। अस्पताल में बहुत साफ-सफाई और प्रत्येक कमरे के साथ एटैच बाथरूम है। बाथरूम की अलमारी में साफ धुले ‌कपड़े, जो जच्चा-बच्चा के उपयोग के लिए आवश्यक हो,रखे रहते हैं। प्रयुक्त कपड़े रखने के लिए अलग व्यवस्था रहती है। नवजात शिशु की मां को कुछ धनराशि भी मिलती है। अस्पताल में बच्चे के जन्म के समय बच्चे का पिता भी उपस्थित रहता है। अर्थात डॉ पिता के सामने ही बच्चा पैदा करती है। सरकार की ओर से पत्नी की देखभाल के लिए पति को शायद एक या दो माह की छुट्टी मिलती है। अस्पताल में भी पत्नी के साथ पति ही रहता है। वहां पर भारत की अपेक्षा डॉ का व्यवहार बड़ा अच्छा होता है। वे मरीज को देखते ही उठकर पास आते हैं,हाथ मिलाते हैं और प्यार से बात करते हैं। लेकिन यदि प्राइवेट डाक्टर के पास एपोंटमेंट लेने के बाद भी नहीं जाते हो तो पेनल्टी के रूप में आपसे धन लेता है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी घर आने पर फोन द्वारा समय समय पर अनेक दुकानों से बच्चे के सामान (‌‌‌‌‌‌‌‌डाइपर, डस्टबिन, बच्चों से संबंधित सामान की किट) को प्राप्त करने की सूचना मिलती रहती है। क्योंकि वहां बच्चों के पालन-पोषण करने का दायित्व सरकार द्वारा उठाया जाता है। सत्तरह वर्ष की आयु के पश्चात युवा वर्ग को धनार्जन करने के लिए स्वयं काम करना आवश्यक है। वहां पर भारत से अलग व्यवस्था है। भारत में माता- पिता अपने सामर्थ्य के अनुसार बच्चों को पढ़ाते-लिखाते हैं अर्थात मां-बाप की आर्थिक स्थिति के अनुसार बच्चों को सुविधाएं मिलती हैं। ओस्लो में सब बच्चों का पालन समान स्तर पर होता है। सत्तरह वर्ष की आयु के पश्चात युवा अपने भाग्य के स्वयं निर्माता हैं ओस्लो में माता पिता को बच्चों को मारने-पीटने का या दण्ड देने का कोई अधिकार नहीं। बच्चों को स्कूलों में पुलिस का फ़ोन नंबर रटा देंगे,जिससे बच्चे घर में कोई घटना ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌होने पर पुलिस को सूचना दे सके।

ओस्लो का कोई नागरिक यदि कोई भी काम करने में असमर्थ हो गया है अर्थात युवा अवस्था में या किसी भी अवस्था में दुर्घटना ग्रस्त हो गया है और शारीरिक रूप से कार्य करने में आकर्षण हो गया है तो उसके निर्वाह का दायित्व सरकार द्वारा उठाया जाता है। कुल मिलाकर यह देश बहुत शांत सुखी और समृद्ध माना जाता है।

ओस्लो में साफ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। कोई व्यक्ति यदि अपने कुत्ते को घुमाने ले जाता है तो अपने हाथ में टिशु पेपर रखता है। यदि कुत्ता रास्ते में मल त्याग कर देता है तो उसके साथ का व्यक्ति मल साफ कर गंदगी को डस्टबिन में डाल देता है। यानी सफाई रखना वहां किसी एक व्यक्ति या केवल सरकार की नहीं, वरन् प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। मुझे यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगी क्योंकि हमारे मौहल्ले में जिसने भी कुत्ता पाल रखा है वह कुत्ते को मल त्याग करने के लिए छोड़ देते हैं। और इसी कारण मौहल्ले में अक्सर लड़ाई देखने को मिल जाती है।

यहां की भाषा नार्वेजियन है। कोई बाहर का व्यक्ति यदि यहां की कम्पनी में नौकरी करने का प्रयास करता है तो उसे नार्वेजियन भाषा आनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति चर्च में इस भाषा को सीख सकता है। मुझे वहां का भाषा प्रेम अच्छा लगा। वहां की सारी जनता अंग्रेजी नहीं जानती। अब मेरा यह भ्रम भी टूट गया कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। एक हम हैं कि अपनी भाषा बोलने वाले को जाहिल गंवार समझते हैं और अंग्रेजी वक्ता को विद्वान। मेरे मन में एक प्रश्न कौंध गया। हमने अंग्रेजी को इतना महत्व क्यों दिया। जबकि हिन्दी पूर्ण रूप से वैज्ञानिक,व्याकरण से समृद्ध सरल और मधुर भाषा है।

मैं सितंबर माह में ओस्लो गई थी अतः मुझे Bygdoy घूमने का मौका ‌‌‌‌भी मिला। यह शहर के केंद्र में पश्चिम की ओर एक प्रायद्वीप है। यहां पर ओस्लो के सबसे लोकप्रिय संग्रहालय‌ मिलते हैं। यह प्रायद्वीप मुख्य रूप से एक आवासीय क्षेत्र है। लेकिन संग्रहालय के अलावा बायगडोनी एक मनोरंजक क्षेत्र भी है जिसमें गर्मी के उपहार के रूप में समुद्र तट और हुक में बालीवाल कोर्ट है। सायक्लिंग और पैदल चलने के लिए भी सुंदर ट्रेल्स हैं। हम सिटी हाल के पीछे से पियर ३से नाव द्वारा गये। वहां जाने में केवल पंद्रह मिनट लगे। वैसे बस नं तीस से भी जा सकते हैं। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। खेतों और जंगलों के माध्यम से कई ट्रेल्स हाइकिंग व बाइकिंग के लिए भी सुंदर क्षेत्र है। गर्मियों में हुक में समुद्र तट की यात्रा भी बड़ी मनोरंजक थी।

उन्नीसवीं सदी का पोलरशिप भी  fiam    म्यूजियम में प्रर्दशनी के लिए रखा है । जबकि kon-tiki म्यूजियम अन्वेषक Thor Heyerdahl के जीवन को समर्पित है। यह नार्वेजियन संस्कृति को समर्पित है। यह आगंतुकों के लिए भी है।

ओस्लो की समुद्र तट रेखा धब्बेनुमा से क्षेत्रों से घिरी है। यहां पर vikingship museums, fram museum, kon-tiki museum, osloford हैं। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए "पूर्ण स्थल" है। हमने एक फैरी ली और अनेक स्थानों को देखा। आज की यात्रा बहुत सुखद और अविस्मरणीय बन गई थी। हमने जाने के लिए बोट का मार्ग चुना, जो ओस्लो Radhus से शुरू होता है। वापिस हम बस से आए।

वहां के मकान की बाहरी दीवार ईंट, पत्थर और सीमेंट से बनी होती है । घर की आंतरिक दीवारें लकड़ी से बनी होती है, वो भी खोखली। दीवारों के बीच में रूई, चूना और न जाने क्या-क्या भरा होता है। कमरों की उंचाई कम होती है और कमरों में रोशनदान नहीं होते। कांच की खिड़कियों पर काले रबर या प्लास्टिक के पर्दे लगे होते हैं जो गर्मियों में रोशनी रोकने और रात का अहसास दिलाने में मदद करते हैं।

प्रत्येक घर में सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए ब्लोअर लगे होते हैं। घर में प्रवेश करते ही एक शू रैक होती है और गर्म, भारी कपड़े कोट इत्यादि टांगने के लिए अलमारी होती हैं। बाहर से आने वाले भी जूते और गर्म कपड़े अलमारी में टंगे सेंगर में टांगकर कमरे में प्रवेश करते हैं।

वहां अक्टूबर के प्रारंभ में घड़ी की सुइयां शासनादेश द्वारा एक घंटे पीछे कर दी जाती है।

धन्य है विज्ञान, जिसने मानव का जीवन इतना सुखी बना दिया। नवंबर का महीना शुरू होते ही बर्फ गिरनी शुरू हो गई थी। नवंबर के अंत में तापमान शून्य की ओर बढ़ने लगा था। वो तो अच्छा था कि नलों में गर्म पानी आता है। ऊपर से नीचे तक शरीर पर गर्म कपडें पहनकर चलते हैं फिर भी ठंड का अहसास होता है। बर्फ पर चलने के लिए जूतों में लोहे की कील से बना तला सा लगाते हैं। जिससे बर्फ पर पैर नहीं फिसलते। मन यह सोचकर परेशान हो गया था कि बिजली के आविष्कार से पहले मानव कितने कष्ट में रहता होगा। और इतनी ठंड से बचने के लिए करता उपाय करता होगा।

बड़ा दिन अर्थात जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन आने से एक माह पहले ही शहर सज गये थे। अब हमने शहर के माल घूमने शुरू किए। माल में सभी वस्तुओं की भव्य दुकानें थीं। लेकिन सड़कों के किनारे लगी फुलवारी, मर चुकी थी। पेड़ पौधों पर अब फूल पत्रों की जगह पर बर्फ ने कब्जा कर लिया था। चारों तरफ बर्फ का साम्राज्य था। हम सिटी माल गये और बच्चों के लिए कुछ उपहार खरीदे। बेटा अब भी कुछ और सामान खरीद रहा था, लेकिन मैं अनजाने में गलत जगह खड़ी हो गई। मेरे पीछे चार-पांच आदमी आकर खड़े हो गए। तब मैंने ध्यान दिया और उनसे कहा-यू मे गो। लेकिन कहने से ही काम नहीं चला, वहां से हटना पड़ा। अन्यथा सब मेरे पीछे ही खड़े होते रहे। यहां भी मेरा मन अपने देश के लोगों की आदत देखकर हंस पड़ा। हमारे यहां रेल का टिकट लेना हो, अस्पताल में पर्चा बनवाना हो या अन्य किसी भी कार्य के लिए लाईन लगी हो, नवागन्तुक लाईन में लगने की भूल नहीं करता। पीछे वाले चिल्लाते रहेंगे, लेकिन वो धैर्य पूर्वक खड़ा रहता है और अपने मन में यह सोचकर खुश होता रहता है कि मैं तुम जैसा बेवकूफ थोड़े ही हूं जो लाईन में खड़े होकर समय बर्बाद करूंगा और अपने पैरों को कष्ट दूंगा। और इसी कारण लड़ाई झगड़ा भी हो जाता है।

हम जब भी समुद्र तट पर जाते वहां अक्सर क्रूज खड़ा मिलता। हमने भी क्रूज से सफर करने का निर्णय लिया। यह डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन जाता था। ओस्लो के नागरिक अधिकतर अपनी कार साथ लेकर सामान खरीदने के लिए कोपेनहेगन जाते हैं क्योंकि ओस्लो की अपेक्षा वहां सामान सस्ता मिलता है। और क्रूज़ में अच्छे ब्रांड की शराब और मेकअप का सामान बहुत सस्ता मिलता है।लोग अपनी कार क्रूज़ में रखकर ले जाते हैं और उससे कोपेनहेगन में शापिंग करते हैं, और घूम भी आते हैं। ओस्लो से कोपेनहेगन जाने में क्रूज़ से सौलह घंटे लगते हैं। लेकिन ये सोलह घंटे केवल सफर के नहीं होते हैं। बडे मनोहारी होते हैं। क्रूज़ में जाना अपने आप में अति आनन्द दायक है। उसमें एशो-आराम के सब साधन मौजूद हैं। जहाज स्वीमिंग पूल, डिकोजी, वाटरगेम्स, आदि मनोरंजन के विभिन्न साधनों से सुसज्जित था। नीचे के प्रथम और द्वितीय तल पर कार पार्किंग की व्यवस्था है। क्रूज़ पर नौ तल थे। एक तल पर मिनी बाजार था। एक तल पर खाने-पीने के लिए होटल , रेस्टोरेंट था। दो तलों पर यात्रियों के लिए कमरें बने थे। कमरों में ही टायलेट और बाथरूम की व्यवस्था थी। कमरों में सोफा कम बेड था। और एक बेड था। एक तल पर सिनेमा हॉल था। एक तल पर बच्चों के खेलने के लिए पूर्ण व्यवस्था थी। और एक तल पर संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। एक गायक और गायिका माइक हाथ में लेकर स्टेज पर थिरक रहे थे और सुरीली आवाज में गाना गा रहे थे। दर्शक भी झूम रहे थे और कोई -कोई दर्शक भी स्टेज पर थिरक रहा था।

जब हम रेस्टोरेंट में गये तो वहां की गंध हमें सहन नहीं हो सकी और हम उल्टे पांव चलने के लिए तैयार हो गए। क्योंकि हम बचपन से ही शुद्ध शाकाहारी थे और कभी अंडे को भी हाथ नहीं लगाया था। वहां पर पूर्ण रूप से सी-फूड तथा मांसाहार की ही व्यवस्था थी। जैसे ही हमने वापसी के लिए कदम उठाए पीछे से एक सुरीला आवाज ने हमारे कदमों को रूकने के लिए बाध्य कर दिया। मुड़कर देखा तो एक अत्यंत सुंदर लड़की हमारी ओर मुस्करा कर देख रही थी। उसने बड़े प्यार से पूछा-"आर यू इंडियन? हमने भी मुस्करा कर जवाब दिया। तभी वो टूटी-फूटी हिंदी में बोली-" मुजे इंडिया बड़ा अच्चा लगता है। आई लव इंडिया। मैं बी एक बार इंडिया गई ती। वहां पर मेमान का कैसे वैलकम करते हैं, मैं बूल गई।"सुनकर मन गदगद हो गया। अपने भारतीय होने पर बड़ा गर्व हुआ। बेटे ने बड़े प्यार से हाथ जोड़कर बताया "नमस्ते"। उसने भी मुस्करा कर नमस्ते कहते हुए हाथ जोड़ दिए।

दो-तीन घंटे तक हम क्रूज़ के सौंदर्य को निहारने में व्यस्त रहे।वह अपने आप में एक छोटा सी दुनिया थी। जिसमें प्रत्येक सुख -सुविधा का साधन उपलब्ध था। क्रूज़ की साज सज्जा अद्वितीय थी। अपने कमरे से बाहर निकलकर देखने पर ऐसा लगता था कि छोटा-सा मोहल्ला बसा हुआ है। मैं तो कमरे के अंदर आकर भी नहीं सो सकी। कांच की खिड़की से बाहर का दृश्य देखकर भाव-विभोर होती रही। चारों तरफ अंधेरा था लेकिन दूर तट पर बसे शहरों की रोशनी की परछाई पानी में लहरा रही थी। कहीं -कहीं गुप्प अंधेरा था। जहाज के चलने के कारण पानी में वृत्ताकार लहरें उठ रहीं थी और रात के सन्नाटे में भयंकर ध्वनि उत्पन्न कर रही थी। मैंने आराम तो अवश्य किया लेकिन सारी रात सोई नहीं। सुबह तड़के समुद्र में उषाकाल की छटा दर्शनीय थी। अतः सबसे ऊपर जाकर हमने इस अद्भुत दृश्य को देखा। अधिकतर लोग इस दृश्य को अपने फोन में, अपनी आंखों में कैद करने की होड़ में शामिल थे। सूर्य लाल गोले की भांति समुद्र से निकल रहा था । समुद्र में नहाने के कारण वह लाल से स्वर्णिम रंग का हो गया। उस रक्तिम अनल गोले का आहिस्ता आहिस्ता सागर से निकलना फिर सोने में बदल जाना नयनाभिराम दृश्य था। सुबह पो फटते ही जहाज गन्तव्य पर पहुंच गया। क्रूज़ से बाहर निकलते ही देखा तो सारे में बर्फ फैली हुई थी। यहां सड़क पर भांप उठती दिखाई दी। पता चला कि मौसम उग्रता से निपटने के लिए सड़क के नीचे गर्म पानी की धारा की व्यवस्था है। हमारे पास वहां घूमने के लिए केवल एक ही दिन था। अतः हमने कोई ऐसी एजेंसी ढूंढने की कोशिश की जो एक दिन में हमें कोपेनहेगन के दर्शन करा सके। वहां पर घूमने के लिए दो प्रकार की सेवाएं उपलब्ध थी। व्यक्ति अपनी इच्छानुसार जलमार्ग या सड़क मार्ग चुन सकते थे। हमने बस द्वारा जाना चुना। और बस की दूसरी मंजिल पर बैठकर वहां के दृश्यों का आनंद लिया।

समय के अभाव के कारण अधिकतर स्थानों को बाहर से देखकर ही हमें संतुष्ट होना पड़ा। बस में एक गाईड था जो सबको वहां के स्थलों के बारे में जानकारी दें रहा था। उसके विवरण के अनुसार जो मुझे याद रह सका उसी का वर्णन मैं कर रही हूं। ट्रवोली १९्वी सदी का सुंदर पार्क है। दि लिटिल मरमेड कांस्य की मूर्ति है। अमलियनबोर्ग लोइन्टर की रानी का निवास स्थान है। रोजनबर्ग कैंसर १७वी शताब्दी का महल और रायल म्यूजियम है। न्याहवन एक बंदरगाह,शहर और महल है। फ्रेडरिक चर्च मार्बल से बना बहुत सुंदर और आकर्षक है। My carlsberg Glyptotck फाइन आर्टस , स्कल्पचर व पेंटिंग का भव्य म्यूजियम है। कोपेनहेगन ओपेरा हाउस रायल डेनिस ओपेरा का समुद्र के किनारे स्थित है। एक सिंगल आर्टिस्ट को समर्पित थोरवलडसन म्यूजियम है। सोर्सेज 17वीं शताब्दी का फोर्मर सरकार एक्सचेंज है। डेविड कलैक्शन इस्लामिक , यूरोपियन और डेनिश आर्ट म्यूजियम है। यहां विश्व प्रसिद्ध गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड भी है।

अब मेरे लौटने का समय पास आ रहा था। जाने से पहले मैं एक बार अपने पिपासु नेत्रों की प्यास शांत करना चाहती थी। अतः मैं अकेली ही पैदल विजीलैंड पार्क गई। पहले और अब के पार्क में जमीन आसमान का अंतर आ गया था। मूर्तियां सभी वो ही थी लेकिन मौसम के कारण फुलवारी गायब थी। प्रकृति के बिना जीवंत लगने वाली मूर्तियां मानों रो रही थी। वास्तव में प्रकृति के बिना हम सब अधूरे हैं।

मेरे साथ मेरे बेटे का दोस्त, उसकी पत्नी और उसका छः साल का बेटा भी भारत एक माह के लिए अपने परिवार से मिलने के लिए जा रहे थे। उन्हें पुणे जाना था अतः उनका मेरा साथ इस्तांबुल तक ही था।

उन्हें घर से निकलने में थोड़ी सी देर हो गई थी। अतः एअरपोर्ट की बस पकड़ने के लिए भागा दौड़ी करनी पड़ रही थी। वहां पर एअरपोर्ट के लिए विशेष बस जाती थी जिसमें बस के निचले भाग में सामान रखने की प्रर्याप्त जगह होती है। चौराहे पर रैड लाइट होने वाली थी लेकिन वे अतिशीघ्र बस पकड़ने के लिए चौराहे को पार करना चाहते थे। बेटा जोर जोर से रोने लगा और चिल्लाने लगा-मम्मा पुलिस पकड़ कर लोक-अप में डाल देगी। तब उसकी मम्मी ने कहा-अरे! अब हम इंडिया जा रहें हैं वहां कोई रूल्स नहीं होते। मैं हंसी और बोली बेटा! हम इंडियन केवल मशीन नहीं इंसान हैं और हम आवश्यकता के अनुसार नियमों में छूट भी दे देते हैं। लेकिन मन सोचे बिना नहीं रह सका कि हम सुरक्षा के नियमों के प्रति भी क्यों गंभीर नहीं हैं।

मेरे भारत लौटने का समय आ गया था। बेटे के बहुत मना करने पर भी अपने साथ रास्ते के लिए खाना ले लिया था। दिसम्बर का महीना होने के कारण धरा पर बर्फ की चादर बिछी हुई थी। घर से एअरपोर्ट तक के रास्ते में खेत खलिहान, पेड़ पौधे सब बर्फ की आगोश में समा गए थे। तब मुझे क्रूज़ पर लिखीं ये पंक्तियां याद आ गई जिनका भाव कुछ इस प्रकार था। हमारा नार्वे स्विट्जरलैंड से कई गुना सुंदर है। विश्व उसे खेल का मैदान कहता है , जबकि यह तो स्वर्ग है। मैं अपने मन में हल्का सा मुस्कुरा पड़ी। वास्तव में यह देश प्रेम है। और अपने देश के बारे में सोच कर मन कृतज्ञता से भर गया कि ईश्वर ने भारत को विशेष रूप से बनाया। लेकिन मन खिन्नता से भर गया कि विश्व गुरु की उपाधि प्राप्त करने वाला भारत आज चंद लोगों के कुकर्मों के कारण गरिमा हीन हो गया है। इसके सौंदर्य से प्रभावित होकर ही तो अनेक आक्रांताओं ने इसे छीनने के प्रयास में इसे रौंदा है। विदेशों में नियमों का कठोरता से पालन होता है जो सर्वहितकारी है। हमारे देश में कानून का पालन सारथी से नहीं होता, इसका एक कारण अधिक जनसंख्या भी है। वहां एक राज्य की जनसंख्या हमारे एक शहर से भी कम है। दो सदस्यीय घर और अनेक सदस्यीय घर की व्यवस्था में अवश्य ही अंतर होता है।

इस्तांबुल से भारत आने वाले प्लेन में मेरी सीट के पास एक जर्मनी महिला की सीट थी। वह मृदुभाषी,सरल और सुशील थी। बातों में उससे पता चला कि जर्मनी की ठंड से बचने के लिए वह प्रति वर्ष भारत के बंगलुरू शहर में जाकर मकान किराए पर लेकर रहती है। तीन महीने यहां गुजारकर फिर अपने देश लौट जाती है। इसी कारण भारत में उसके अनेक मित्र भी हैं। यह सुनकर मेरा मन भी गर्व से ऊंचा हो गया। हमारे देश में कुछ तो विशेष है जो दुनिया भर के लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं।

मैंने प्लेन में खाना लेने से इंकार कर दिया और अपना टिफिन बॉक्स निकाल कर खाना खाया। एक पूड़ी और करेले की सब्जी उस जर्मनी महिला को भी खिलाई। खाना खाने के बाद वह प्रशंसा किए बिना न रह सकी। रात होने के कारण मैं आंखें बंद करके बैठ गई। वैसे प्रत्येक सीट के सामने छोटा टीवी लगा था। लेकिन सिर में दर्द होने के कारण मुझे टीवी की ओर देखना भी अच्छा नहीं लग रहा था। सुबह -सुबह ही फ्लाइट दिल्ली एअरपोर्ट पर थी। मुझे लेने के लिए मेरा भाई, भतीजी और भतीजा आया था। पहली विदेश यात्रा होने के कारण यह यात्रा मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3830,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2770,कहानी,2095,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1907,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 84 : छः महीने दिन तथा छः महीने रात का देश ओस्लो // सुधा शर्मा
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 84 : छः महीने दिन तथा छः महीने रात का देश ओस्लो // सुधा शर्मा
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