संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 92 : मेरी यादें मेरा सफ़र // डॉ मोनिका देवी शर्मा

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प्रविष्टि क्र. 92

संस्मरण
मेरी यादें मेरा सफ़र

डॉ मोनिका देवी शर्मा

बचपन की यादें। अपने घर को छोड़कर बहुत याद आई । गांव में सब अपना था । महानगर में दिखावा ही बस दिखता है । 23 मई 2008 की रात थी, सारे परिवार के साथ थी। शुक्रवार का दिन मिल -जुलकर दिन बिताया 24 मई शनिवार को एक सांवली सी लड़की जो आज डॉक्टर मोनिका देवी के नाम से है, पहली बार अपने गांव व परिवार को छोड़कर हैदराबाद जैसे महानगर में आने के लिए तैयार थी।


हैदराबाद में 26 मई 2008 दिन सोमवार अनजान लोग। सब अंग्रेजी बोलने वाले थे। एक गांव की हिंदी साहित्य में एम,ए करने वाली साधारण सी लड़की जो सब को दिल से अपना मानती थी लेकिन शहर के लोग अलग होते हैं। उसका सीधा उदाहरण यहां देखने को मिला। यहां सब कुछ अलग अजनबी सा लगने लगा। छोटे से देहात से निकलकर महानगरीय जीवन को देखना मेरे लिए बहुत ही हर्ष का विषय है।
               2009 में मेरा दाखिला एम फिल में हो गया । जब तक भी मुझे हैदराबाद का कुछ भी मालूम नहीं था। मेरे मौसा जी दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में मुझे छोड़कर आये। उस समय मुझे तेलुगु भाषा का कोई ज्ञान नहीं था। फिर भी किसी तरह पहला दिन बीता। सबको ऐसे देख रही थी जैसे किसी विदेश में आ गयी हूँ। कॉलेज का दूसरा दिन था। मेरा भाई संदीप मुझे खैरताबाद दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,में छोड़ने गया था। वह है तो मुझसे छोटा लेकिन उस दिन गाड़ियों ऑटो से मुझको ऐसे बचा रहा था जैसे मेरा बड़ा भाई हूं। बहन भाई का रिश्ता भी जग में सबसे न्यारा होता है । गांव की लड़की शहर में आकर बहुत कुछ सुनती भी है। एम फिल करते समय मेरे गुरुओं ने मेरा बहुत साथ दिया ।


जिंदगी आसान नहीं होती ।
ये शहर में आकर जाना ।।
संग अपनों का छुटा,
बेगानों को अपना माना।।
हरियाली प्रकृति से अंजानी ,
मशीनों की बनी दीवानी।
यही बनी अब मेरी कहानी।।


धीरे-धीरे समय बीतने लगा। और एमफिल से पीएचडी का सफर शुरू हो गया। 1 जनवरी 2011 का वह दिन मेरी जिंदगी का बहुत ही यादगार दिन बना। PHD के रजिस्ट्रेशन के लिए साक्षात्कार हो रहा था, मेरा नंबर आया तो हम हंसते हुए 11 लोगों की कमेटी के सामने कुर्सी पर बैठ गए। सब मुझसे मेरा विषय जानने के लिए उत्सुक थे। मैंने पीएचडी साक्षात्कार के लिए - चित्रा मुद्गल के कथा साहित्य में सामाजिक चेतना  विषय चुना था, 20पृष्ट का सार लेकर गई थी। लेकिन मुखपृष्ठ पर विषय का नाम (न)लिख कर,अपना नाम (मोनिका देवी )लिख दिया था । सब लोग विषय पर मेरा नाम देखकर हंसने लगे थे। वह पल बहुत ही व्यंग्य पूर्ण रहा। PHD का कार्य शुरू हो गया। इसी दौरान मेरी माता तुल्य मौसी जी श्रीमती संतोष कोशी जो मुझको हैदराबाद लेकर आई थी। उनकी तबीयत डायबिटीज के कारण ज्यादा खराब रहने लगी थी ,मैं जो एक जिंदादिल लड़की अब एक जिम्मेदार बन गई। मौसी का साथ बहुत ही प्यारा रहा। खट्टी मीठी यादों के सहारे कब 8 साल बीत गए पता ही नहीं चल पाया। 25अक्टूबर 2015 को मौसी मेरा साथ छोड़कर चली गयी। उनका जाना मुझे अंदर तक झकझोर गया । हैदराबाद में रहकर (मोनी) डॉ मोनिका देवी तो बन गयी, लेकिन जिंदगी के उतार- थोड़ा बहुत देखने को मिले पहली बार डिग्री कॉलेज में पढ़ाने का अवसर मिला जो 2 महीने तक मैंने डिग्री कॉलेज में काम किया डिग्री कॉलेज लड़कियों का कॉलेज।  बहुत ही आनंद से 2 महीने बीत गए धीरे-धीरे अवसर मिलते गए। सन 2014 में भीमराव अंबेडकर ओपन विद्यालय हैदराबाद में आकाशवाणी पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ था। मैंने आकाशवाणी को हमेशा ही सपने में जिया था। उस दिन मैंने आकाशवाणी को हकीकत में जिया था।
धीरे धीरे कारवां आगे बढ़ने लगा। सामाजिक मुद्दों पर मैंने आलेख लिखने शुरू कर दिए,  जो कनाडा ब्रिटेन, चीन, जापान,पिट्सबर्ग तक छपकर आने लगे। ग्रामीण जीवन को आधार बनाकर कविताएँ लिखनी आरंभ हो गयी। गांव की नादान लड़की को कब जिंदगी के दुःख -दर्द समझ आने लगे यह पता ही नहीं चल पाया।
अब तो मानो दर्द से ही मेरी दोस्ती हो गयी हो।

-नित्य नहीं चिंता नई बीमारी,
जीवन स्नेह था मेरा
बचपन में पिता लेकर जाते
आज पैदल जा कर डॉक्टर को दिखाना ।।
दर्द भी होता पर उफ़ तक ना हो पाती ।
कहे किसे यहां कोई नहीं अपना माता-पिता संग लगे जंग सपना।।


यादों का दौर चलता रहा कामयाबी भी मिलती रही । उस्मानिया विश्वविद्यालय में डॉक्टर की डिग्री 2016 में प्राप्त हो गई। आलेखों का सिलसिला अब किताब में बदल गया। आज दो आलोचनात्मक किताबें, 6 संपादित किताबें आ रही है ।कभी भी ऐसा नहीं सोचा था कि मैं संपादिका बनूंगी । मेरा जीवन पहले भी साधारण था आज भी साधारण है बस मानसिकता थोड़ी बदल गई है।
5 अक्टूबर 2010 का दिन था। मैं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा फैज़ाबाद के पुस्तकालय में गई थी।  उदास मन से ही कुछ लिखने की कोशिश कर रही थी। तभी मेरी मेज की दूसरी ओर बैठे एक युवक पर नजर पड़ी। मेरी एक आदत है, बिना बात करने वालों के साथ भी मैं बात कर लेती हूं। तो मैंने बस शुरू किया कि आप क्या लिख रहे हो? उस्मानिया विश्वविद्यालय PHD के फॉर्म आए हुए हैं, जिन की अंतिम तिथि 11 अक्टूबर 2010 है। यह सुनकर मेरा उदास मन थोड़ा खुश हुआ लेकिन खैराबाद से विद्या नगर तक का आना बहुत दूर था। उस युवक से सारी जानकारी लेकर मैं अकेली ही कल पढ़ने के लिए उस्मानिया विद्यालय के आगे 5 किलोमीटर तक पैदल चलती गयी।


कोई साथ नहीं था,किसी से बात नहीं
मन में ले विश्वास,
उस्मानिया में एडमिशन होगा इस बार ।
टूटी अगर आस,वापस जाना होगा देहात ।।
जिस उम्मीद से आई थी,वह होगी पूरी आज।।
यही सोच कर धूप कब बनी सांझ।।
चलते -चलते मंज़िल आ गयी पास।।


उन क्षणों की वह सुखद यादें आज भी मन को ताजगी वह मेहनत का जज्बा प्रदान करती है। दूसरों के घर में रहते हुए। आज 10 साल बीत गए हैं। 2017 में मुझे सम्मान पर सम्मान मिलने लगे साथ ही साथ जो कभी नहीं सोचा था। वह सब घटने लगा। जिंदगी में नाम तो मिलने लगा, लेकिन छोटी-छोटी बातों में सुनने को बहुत कुछ मिलने लगा। कि हिंदी से पढ़ी हो अगर दिमागदार होती तो, आज कुछ और बन जाती । कुछ आता जाता तो है नहीं कहते हैं पीएचडी है।।


दूसरों के घर में अपना कोई मूल्य नहीं होता  ,फिर भी इस स्नेह की किस डोर से बंधी हूँ , जाने के रास्ते तो देखती हूं लेकिन जा नहीं पाती। जिस लड़की में पहले भोलापन चुलबुलापन था, आज गंभीर हो गई है । दो -दो भाभी है ।भाइयों संग सब रहते हैं फिर भी मन का कोई कोना खाली सा रहता है। छोटे भाई का विवाह होने के बाद जीवन शैली बिल्कुल बदल गई। पहले जिस घर में सबकी जुबां पर मेरा ही नाम रहता था आज कोई नहीं पुकारता।


2014 में एक अर्द्ध सरकारी डिग्री कॉलेज में प्राइवेट नौकरी मिल गई। मैं गांव की खुशमिजाज लड़की यहां महानगर के लोग थे। देखने में चेहरे से मुस्कुराते अवश्य थे । लेकिन पीठ पीछे छुरा-घोंप देने वाले कार्य करने में माहिर हैं। 2014 से 2015 ऐसे ही कशमकश में बीत गया, साल दर साल चुनौती भरा आने लगा। 2016 में हाई स्कूल में हिंदी अध्यापिका की नौकरी मिली। मेरा मन बहुत प्रसन्न था लेकिन खुशी ज्यादा दिन तक नहीं चली। तानाशाह प्राचार्य के व्यवहार के कारण मैंने नौकरी छोड़ दी। वह चाहती थी कि मुझे बांध कर रखें, लेकिन आजाद परिंदे को कोई बांध नहीं। स्कूल में रहकर पढ़ना-लिखना नहीं हो रहा था, तो प्रिंसिपल को बड़े प्यार से कह दिया कि अब आप की तानाशाही हम नहीं सहेंगे।


थोड़ा गम तो हुआ कि 25000 महीने में आ रहे थे। अब कैसे दिन निकलेंगे यही सोच मन को उदास कर रही थी। थोड़ा सा मानसिक तनाव भी हुआ। तनाव भी अब रहने लगा फिर मन में मन में सोचा जिस रब ने मुझे पैदा किया वही जिंदगी चलाएगा। 2016 नवंबर में स्कूल छोड़ा था। 2017 जनवरी में फिर से पुराने डिग्री कॉलेज से बुलावा आ गया कि सहायक प्रवक्ता का पद खाली है। लेकिन तनख्वाह बहुत कम थी। हमने सोचा ना होने से तो अच्छा है कि महीने का खर्चा निकल जाएगा। यही सब सोचकर फरवरी 2017 से कॉलेज में दोबारा पढ़ाने लगी। यह दुनिया बहुत अलग थी लोगों में जलन इस कदर होती है। यह अब मालूम हुआ साथ में रहकर प्यारी बातें कर के स्टाफ रूम में लोग पीठ पीछे हटने लगे। उन की हंसी, हंसी रह गई मुझे 35 सम्मान मिल गए ।आज स्टाफ रूम में पांच लोग हैं, लेकिन मैं सब से अलग हूं। सबके साथ हँसती तो हूं लेकिन मन में समाज के दुख दर्द लेकर घूमती हूं, जिनको कलम का सहारा देकर लिखना आरंभ कर दिया।


डॉ मोनिका देवी शर्मा
सहायक प्रवक्ता
हिंदी विभाग,हिंदी महाविद्यालय हैदराबाद,तेलंगाना

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