संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 96 : आह.... वो जन्मदिन // शिवानी गौड़

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प्रविष्टि क्र. 96

आह.... वो जन्मदिन

शिवानी गौड़

जन्मदिन हर साल चला आता है. चला ही नहीं आता बल्कि आने से करीब 15-20 दिन पहले इंतज़ार भी करवाता है. हर साल रंग बदलता है लेकिन फिर भी इसके आने से हर कोई खुश ही होता है. ऐसी जलवाफरोशी तो हमने आजतक किसी और की देखी नहीं. बहुत पहले किसी ज़माने में जब दोस्तों की संगत से दिन शुरू और खत्म हुआ करते थे तब हमारे जन्मदिन को कैलेण्डर में हंगामाखेज़ दिन के रूप में लिखा जाता था. ईश्वर भी उस दिन पूरे मूड में होते और बेतरह कहकहे लगाते. इतने ज्यादा की उनकी आँखों से गिरे हुए पानी में हम घुटनों तक डूब जाया करते थे. रास्ते के गड्ढे पनाह मांगते की बख़्श दो भाई . सड़कों के किनारे पानी ऐसे दौड़ता कि सीने में हौल उठने लगती. लेकिन मानना पड़ेगा दोस्तों को जो किसी के हौसले में जरा सी भी कमी आती हो. हर दोस्त अपने ख़ास अंदाज़ में हमें बताता की हमारे पैदा होने भर से ये दिन कितना अहम् कितना खास हो गया है. शादी के बाद पता चला कि बिना हंगामे के भी ये दिन गुज़ारा जा सकता है. अब ईश्वर भी उस दिन सिर्फ मुस्कुरा देता और सड़कों पे पानी भी संभल संभल के कदम उठाता. हमें भी आदत हो चली थी इस शांति की कि अचानक इस साल हमारे पतिदेव को जाने क्या सूझी की उन्होंने एलान किया की वो इस दिन को हमारे लिए ख़ास बनायेंगे. सुनते ही तो हमारे आस-पास ख़ुशी के लड्डू ऐसे फूटे की हम डर से सहम ही गए की कहीं हमें डायबिटीज़ ना हो जाए. इसलिए हमने तय किया की हम इन लड्डुओं को हौले-हौले हाथ लगायेंगे न की नदीदों की तरह एक ही बार में गप से मुंह भरेंगे.

इस साल हमारा जन्मदिन शनिवार को था तो पतिदेव घर में ही थे. हमने अपनी उम्मीदों को परवान चढाने से पहले थोडा सब्र किया, ठन्डे पानी की दो घूँट हलक से नीचे उतारी. पतिदेव का एलान सुन कर उन दो घूंटों ने भी हलक में ऐसा नाच दिखाया की जान जीभ पर आ कर बैठ गई. उसे दाँतों के नीचे दबा कर रोका. सर पर दोहत्तड मारे. तभी याद आया की पानी पीते समय अगर धसका लगे तो इसका मतलब कोई याद कर रहा है. सारे दोस्तों, सारे महबूबों को कोसा की भला ये भी कोई तरीका हुआ याद करने का की जान ही निकाल दो. खैर उस समय तक इंतज़ार किया जब तक पतिदेव एंग्री बर्ड में जीतने न लगे. जब वो दो-चार गेम जीत चुके तो हमने उनके हाथ में चाय का प्याला पकडाया और धीमे से पूछा-

"आज का प्लान क्या है?"

जवाब मिला--" जो तुम चाहो, आज जो कहोगी वही होगा"

सुनते ही तो हमारे कानों ने एक पल भी गवाएं बिना अपने सारे दरवाज़े खिड़कियाँ बंद कर ली. कहीं ये मीठे से, खूबसूरत से, सुरमई से, नशीले से, मोहब्बत से लबरेज़ अलफ़ाज़ निकल न जाएँ. उस पल तो घंटाघर का वो बड़ा सा गजर भी कानों के करीब आ बजता तो उनपर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. हमारा दिल बल्लियों उछल रहा था. धडकनें सीने से ज्यादा कनपटियों पे बज रही थी.

पतिदेव ने पूछा बोलो कहाँ चलोगी?

हमने कहा जिधर को रस्ता हो गाडी उधर ही मोड़ दीजियेगा बिना जाने की कहाँ आ गए, कहाँ पहुंचेंगे.

मतलब?

मतलब की बस ऐसे ही जोधपुर की सड़कों पर चक्कर लगाने हैं.

पतिदेव की नज़रों ने चुगली कर दी की वो हमें अहमक समझ रहे है. हलकी हलकी बारिश हो रही थी. बताया था न की अब ईश्वर भी कहकहों की जगह मुस्कुराने लगा था वो भी शांति से. हमने ईश्वर की तरफ एक बोसा उछाला और गाडी में बैठ गए. पतिदेव ने अनजान सडकों, अजानी गलियों में तब तक घुमाया जब तक हम सीट पर धीमे-धीमे नीचे की तरफ न सरकने लगे. हमारी तरफ देखते हुए मुस्कुरा के पूछा " थक गई ? वापस चलें?

बिलकुल भी नहीं , हाँ भूख लग रही है कुछ खिला दो

"बोलो कहाँ चलोगी? तुम्हारी पसंद के रेस्ट्रों में चलेंगे.

हमने मन में सोचा वो माराsssss बेट्टा! आज तो मजा ही मजा.

ऐसा नहीं कि पतिदेव के मिजाज़ से वाकिफ नहीं हम सो हमने धीरे से कहा की आज स्ट्रीट फ़ूड खाना है. बोलते ही हमें गाड़ियों में सीट बैल्ट की अहमियत पता चली. उस दिन अगर सीट बैल्ट न पहनी होती तो हम गाडी का सामने वाला शीशा तोड़ कर सड़क की गोदी में खेल रहे होते. गाड़ी की चर्रर्र की आवाज़ के बीच पतिदेव ने पूछा --"क्या कहा तुमने"

"तुमने वादा किया था की आज सब कुछ हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ होगा"

पतिदेव से नज़रें मिला ही कौन रहा था कि पता चलता की वो हमें खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे हैं या मुहब्बत भरी नजर से निहार रहे हैं. खैर पतिदेव को अपना वादा याद था तो गाड़ी घुमाई और हमें स्टेशन रोड ले गए. वहां लाइन से सड़क किनारे एक तरफ बहुत से ढाबे नुमा कुछ थे . पतिदेव ने गाड़ी की स्पीड कम की और कहा--जो ढाबा अच्छा लगे बता देना उसके सामने ही रोक दूंगा.

वो ढाबे नुमा जो कुछ भी थे उन्हें देख कर हम तुनक गए . मुंह से बोल निकलता तो कैसे. हमारे स्ट्रीट फ़ूड के ख्वाब का ये हाल होगा सोचा न था. गाड़ी धीमी चलती हुई सड़क के आखिर तक आ गई. पतिदेव ने मुस्कराहट छुपाने की कोशिश तक नहीं की और प्यार से कहा वापस एक चक्कर लगाऊं? शायद इस बार आपको कोई ढाबा अपने मन मुताबिक दिख जाए.

हमने कहा- जी नहीं! कोई जरुरत नहीं, आप हमें सरदारपुरा ले चलें.

हमारी बात सुन कर इस बार पतिदेव ज़रा खुल कर मुस्कुराए , कहा -"जिप्सी चलोगी?

ना

15 A. D.?

हमने इनकार में सर हिलाया. उस इनकार में इतनी मासूमियत थी की एक बार को तो खुदा भी फ़िदा हो जाता. सच्ची कसम से. और ये तो हमारे पतिदेव थे . सरदारपुरा पहुँच के बोले अब कहाँ?

हमने कहा-- जिप्सी के ठीक सामने एक छोले-कुलचे का ठेला है, वहां चलना है . हमने अक्सर वहां बहुत भीड़ देखी है.

पतिदेव की आँखें चौड़ी हो गई- "तुम वहां खाओगी? पक्का?

हाँ!

हमारा इरादा पक्का था. कितने समय से तो उस ठेले की महक हमें अपनी ओर खींच रही थी, ज़माना हो गया था सड़क पर चलते चलते आइस्क्रीम खाए हुए. रिक्शा रोक उस पर बैठे-बैठे चाट के ठेले पर से वो गरम गरम आलू टिक्की और गोलगप्पे खाए हुए. सच बताएं उस दिन छोले-कुलचे के ठेले पर खड़े हो कर दोस्त बेतरह याद आये. अब न तो बनारस की विश्वनाथ गली के गोलगप्पों में और न ही काशी चाट भण्डार की आलू टिक्की में वो स्वाद रहा.

"मैं गाड़ी से भी नहीं उतरूंगा". पतिदेव फरमाए.

"मत उतरियेगा"

"मैं खाऊंगा भी नहीं."

हमने कहा "हम अकेले खा लेंगे, आप चलें तो सही"

हमने एक प्लेट छोले-कुलचे पैक करवाए. देख कर थोडा अफ़सोस हुआ की पत्ते के दोनों की जगह प्लास्टिक की कटोरियों ने ले ली थी. खैर हमने सोचा की हम अपना मूड ऑफ नहीं करेंगे और जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है वैसे ही हम भी इन प्लास्टिक की कटोरियों को हरे पत्तों से बने दोनों की तरह ही देखेंगे. हमने गोदी में रख नरम-नरम कुलचे का हौले से एक टुकड़ा तोड़ा और उसे गरम-गरम छोले में लपेट कर ज्यूँ ही मुंह में रक्खा हम उस छोले-कुलचे वाले के कायल हो गए. गुलज़ार साब के एक गाने "बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है" का मतलब उन छोलों-कुलचों के एक, सिर्फ एक निवाले ने एक पल के सौवें हिस्से में समझा दिया. अगले गस्से के लिए उँगलियों ने उठने से और मुंह ने खुलने से सरासर इनकार कर दिया. हम भी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे सो हमने वाह! क्या स्वाद है कहते हुए एक कुलचा खत्म किया. पतिदेव को स्वाद का यकीन दिलाने के लिए उंगलियाँ भी चाटीं. हमारे कानों से निकलती गरम हवा शायद पतिदेव ने अपने चेहरे पे महसूस की , जूस की दूकान के सामने गाड़ी ले गए और पूछा "पियोगी"

मुंह खोलते तो पक्का ड्रैगन की तरह आग की लपटें छोड़ते सो हमने मन भर की गर्दन हाँ में हिलाई. सच कहते हैं लोग दोज़ख और जन्नत इसी दुनिया में हैं. जूस पीते ही लगा जन्नत में कदम रख दिए हों हमने. आखिरी निवाला मुंह तक पहुँच हमारी उँगलियों की कैद से रिहा होने ही वाला था की पतिदेव की आवाज़ नहीं , नहीं ,अलफ़ाज़ सुन वो निवाला क्या, वो उंगलियाँ क्या, हम ही जड़ हो गए. साहब बहादुर फरमा रहे थे-" गिफ्ट क्या लोगी"? हमने निवाले को मुंह में ढकेला , चटपट नैपकिन से हाथ साफ़ किये, जलती हुई जबान और मुंह के अहसास को गाडी से बाहर धक्का दिया और लगे सीट के अगल-बगल, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे ढूँढने. पतिदेव ने हैरत से पूछा-" क्या गिर गया, क्या ढूंढ रही हो?

चिराग

मतलब?

अगर आपके सर पर जिन्न बैठा है तो चिराग भी होना ही चाहिए न. बस हमें ये याद नहीं आ रहा की हमने चिराग रगड़ा कब? और हम तो चिराग रख के भी भूल गए की कहाँ रखा है. हमें लगा हम वाकई में रुआंसे हो जायेंगे.

पतिदेव ने "बोल लो , बोल लो, जो बोलना है" वाली निगाहों से हमें देखा.

"गिफ्ट लेना है या नहीं लेना? इस बार पतिदेव के अन्दर का फौजी बोला.

लेना है, बिल्कुल लेना है. लेकिन गिफ्ट तो आपकी पसंद का होना चाहिए ना. ये बोलते हुए हमें अपनी आवाज़ और बकरी की आवाज़ में कोई फ़र्क महसूस नहीं हुआ. पता नहीं छोले-कुलचे का असर था या फ़ौजी आवाज़ का.

नहीं भई, गिफ्ट भी तुम्हारी ही पसंद का , आखिरकार आपका जन्मदिन है. बोलो कहाँ चलोगी गीतांजलि या तनिष्क?

हम जिस तेजी से फूल कर कुप्पा हुए थे उसी तेजी से गीतांजलि और तनिष्क के नाम ने हमारी हवा निकाल दी. हमें पता है इस पल हमें सुनने वाली हर औरत हमें दुनिया की सबसे बड़ी अहमक के खिताब से नवाजने को व्याकुल होगी. शायद भगवन ने हमें अपनी पीठ की तरफ रख के बनाया था और हमारे हाथ में छलनी भी पकड़ाई थी. हमें ये भी पता है की इस एक जुमले को सुन के हमारे सारे दोस्त हमें शाबाशी देंगे की ज़िन्दगी के आखिरी सालों में ही सही हमने सच बोलना सीख लिया.

गिफ्ट हमारी पसंद का होगा न. हमने एक बार फिर तस्दीक की.

बिलकुल, बिलकुल, आज हमने वादा किया है सब कुछ आपकी पसंद का .

तो फिर हमें मोहनपुरा ओवर ब्रिज तक ले चलिए.

उस भीड़ भरी सड़क पे? वहां कौन सा शोरूम है? पतिदेव आश्चर्य चकित थे.

आप चलिए तो सही. हमने इसरार किया.

ब्रिज पर चढ़ने से पहले जो दाहिनी तरफ थोड़ी खुली सी जगह है हमने गाड़ी वहां रोकने को कहा. कोई और दिन होता तो हमारी हरगिज़ हरगिज़ हिम्मत न होती गाड़ी वहां रुकवाने की. लेकिन उस दिन को तो ख़ास बनाने का वादा था. उस जगह खड़े हो कर देखो तो एक बड़ी खूबसूरत ईमारत दिखाई देती है. गहरे गुलाबी रंग में रंगी हुई. पुरानी सी हवेली जो जाने कितने राज़ समेटे चुपचाप खड़ी है. ब्रिज पे खड़े हो जाओ तो उसके लोहे की रेलिंग लगे हुए गलियार दिखते हैं. हमें जाने क्यूँ उन गलियारों की तरफ नज़र करते ही लगता है अभी कोई महारानी आएँगी डूबता सूरज देखने.

दिमाग फिरने की उम्र हो चली है तो शायद उम्र ने नज़रें इनायत कर दी हों , लेकिन कुछ भी हो हमें हमेशा लगता है की हमारा और उस हवेली का जरुर ही पिछले जनम का कोई नाता है.

हमने पतिदेव को गाड़ी से उतारा और थोड़ा आगे चलने के लिए कहा.

"अब बता भी चुको की तुम्हें क्या चाहिए"? हमें पता था की हम अपनी किस्मत पूरी तरह आजमा चुके हैं.

हमने सामने दिखती हवेली की तरफ इशारा किया -" ये चाहिए! इसे हमारे नाम करवा दें".

पतिदेव के जवाब के इंतज़ार में हम हवेली को निहार रहे थे की अचानक कानो में धाड़ की आवाज़ आई. पलट कर देखा तो पतिदेव लाल चेहरा लिए गाड़ी में बैठ चुके थे . सच्ची अगर सरकार ने तोप बन्दूक रखने की इजाज़त दी होती तो पतिदेव वहीँ हमें इक्कीस तोपों की सलामी दे डालते . खुदा का शुक्र की सरकार की ज़हानत अभी बाकी है. पैरो ने अलग आफत में डाल दिया ये कह कर की अगर हमें मरने का शौक है तो हम जा सकते हैं वो तो रत्ती भर भी नहीं हिलेंगे. ईश्वर गिनती करता थक गया की हमारे पैरों ने जाने कितने वादे लिए हमसे मालिशों और नई-नई सेन्डलों के. मरता क्या न करता वाली तर्ज़ पर हम ने जल्दी-जल्दी सारे वादों की हामी भरी और चुपचाप जा कर गाड़ी में सर झुकाए बैठ गए.

"एक तो वैसे ही ज़रा सा चेहरा है उसे भी सिकोड़ लोगी तो खाली कंधे ही नज़र आयेंगे .

सुनते ही तो हम फूल से हलके हो हवा में उड़ने लगे. इत्ता भी बुरा ताना नहीं था. पतिदेव का मूड थोड़ा दुरुस्त है का ख्याल आते ही हमारे दिमागी घोड़े लगे फिर दौड़ने.

या तो हमारी आँखें ख़राब हो गई थी या पतिदेव बैठे बैठे मोटे हो गए थे. घर से चले थे तो पेट अन्दर ,सीना बाहर और कंधे चौड़े वाली हालत में थे. अचानक क्या हो गया था. क्या गुस्सा पीने से तोंद निकल आती है? पता नहीं क्यों सारे बेफिजूल के ख्यालों को हमारा दिमाग ही नज़र आता है घुसे चले आने के लिए. अब तक तो हमें यकीन होने लगा था की हमारा दिमागी तवाजुन सी-सॉ झूले पे जा बैठा है और उसका साथ हमारी आँखें दे रही हैं. आँखों के साथ-साथ उस दिन तो हमारी गर्दन भी गई होती उन शीरीं लफ़्ज़ों को सुन के अगर हमने ख्याल न रखा होता. शीरीं जुबां से निकलते शीरीं लफ्ज़ उफ़, उस दिन पता चला की टीवी पे कार्टून्स की आँखें कैसे जमीन छूती हैं. हमारे कानों ने शर्तिया ही हमें बिना बताये चारों धाम की यात्रा की होगी जो ऐसे अलफ़ाज़ सुनने को मिले. पतिदेव कह रहे थे " अच्छा अब सीरियसली बताओ क्या लोगी"

हमें भी न खड़े पैर दोज़ख का रुख कर लेना चाहिए जो इन्ने अच्छे पति के साथ ऐसा मजाक किया. वैसे भी हमारी कोई गल्ती नहीं महबूब से मिलने के ख्याल ने हमसे ये सब कराया. हमने धीमे से कहा --" वो सामने जो बुक स्टोर है न वहां से किताबें दिलवा दें"

"हद्द है, तुम कभी सुधर ही नहीं सकती, बीवियां ख्वाब देखती हैं, जिद करती हैं कपड़ों और जेवरों के लिए और एक तुम हो "

"हाँ! तो आपको तो खुश होना चाहिए न की इंटेलेक्चुअल बीवी है आपकी"

"जी! जी!' घर को कबाड़ी की दुकान बना रखा है, जिधर देखो किताबें, डायरियां, पन्ने बिखरे रहते हैं"

"बिखरे ही रहते हैं कुछ कहते तो नहीं आपको"

"कहते नहीं? सारी किताबें आपकी जबान से ही तो बाहर निकलती हैं. खुशनसीब होते हैं वो लोग जिनके घरों में बीवी के दुपट्टे बिखरे रहते हैं, यहाँ तकिये उठाओ तो पन्ने बिखरते हैं. लोगों के खाने में बीवी के बाल निकलते हैं और यहाँ रोज़ अलग अलग डिग्री का जला हुआ खाना मिलता है."

मतलब आपको खाने में बाल मंजूर है? हैरत ने हमारी आवाज़ थोड़ी जोशीली कर दी.

कोई माई का लाल बिना चखे बता के दिखाए की गोभी है या करेला , सबकी एक जैसी शकल."

ये इलज़ाम सुनके सारा जोश हमें लिए वापस दुबक गया.

"हम सबको एक ही नज़र से देखते हैं गोभी हो या करेला, दुभात नहीं करते". हम बुदबुदाए

"कुछ कहा आपने?

हमारी मति थोड़ी न मारी गई थी जो अपनी बात दुहराते. हमने ना में गर्दन हिलाई, थोड़ी सी उम्मीद बची थी कि शायद बुक स्टोर चले जाएं. महबूब के दर तक आ कर खाली हाथ वापस लौटने से बड़ा दुःख कोई नहीं. अब पतिदेव को कौन समझाए कि जब महबूब सीने पर सर रखे आपको निहार रहा हो तो उसे इसलिए नहीं उठा देते की चावल जल रहे हैं. चावलों का क्या है, दुबारा-तिबारा बन जायेंगे. महबूब की हथेलियों की गर्मी को ठुकरा कर भला कहीं दाल -सब्जी की कडछी पकड़ी जाती है? पति देव ने कभी इश्क किया हो तो समझ भी आये ये जुनून.

चलती गाड़ी से गर्दन मोड़-मोड़ के हम महबूब का दर निहारते रहे , सारे महबूब इंतज़ार में बैठे होंगे. कितने ख्वाब थे कि आज तो जी भर के गले लगेंगे, बाहों में भरेंगे. महबूब से न मिल पाने का वो दर्द, वो उदासी , उसे बयान करना हमारे बूते में नहीं.

" उल्लू नहीं हो जो गर्दन घूम जाएगी"

फिर कभी सही, के ख्याल के साथ गर्दन सीधी कर हम चुपचाप घर आ गए.

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