संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 97 : परीक्षा फल // सुमन तिवारी

प्रविष्टि क्र. 97

परीक्षा फल

सुमन तिवारी

आज शाम को ही बिटिया रानी ने एक संस्मरण प्रतियोगिता के बारे में बताते हुये कहा कि आप संस्मरण प्रतियोगिता में भागीदारी कीजिए। इच्छा हुई कि तमाम संस्मरणों में से एक ऐसा संस्मरण लिखूं जिसे मैं अपने विद्यार्थियों को भी सुनाती हूं, जिससे कुछ बच्चे प्रेरित भी हुए हैं और अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सके ।जिससे और लोगों को भी शायद प्रेरणा मिले।

पहले अपनी पूजनीया माता जी को (जो अब इस दुनिया में नहीं है) क्षमा याचना सहित सादर प्रणाम करती हूं और उनकी कृतज्ञ हूं जिनकी डांट,मार,सीख से इस योग्य बनी हूं कि समाज में एक सम्मानजनक पद पर हूं। मेरा मानना है कि वह बच्चे अभागे होते हैं जो बचपन में मां की डांट मार से वंचित रह गये हों।

घटना उस समय की है जब मैं कक्षा सात में थी। मैं बचपन में अक्सर खेलते समय मुंह के बल गिरती थी जिससे मुंह तो फूटता ही था ऊपर के होंठ में सूजन और तीव्र ज्वर से परेशान हो जाती थी। फिर शल्य क्रिया द्वारा होंठ की सफाई के बाद ही स्वस्थ हो पाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में स्वस्थ होने में बारह से पन्द्रह दिन लग जाते थे। वर्ष १९६६ में मैं कई बार अस्वस्थ हुई। अतः पढ़ाई न होने के बावजूद भी परीक्षा देने की जिद देखते हुए पिताजी ने तीनों परीक्षायें देने की अनुमति दे दी। परीक्षा-फल सबको पता ही था लेकिन मैं फेल होने का दर्द नहीं जानती थी। परीक्षा फल आने के बाद ईर्ष्यालू पड़ोसियों ने जो अपमान किया वह मैं नहीं भूल पाती। जानबूझ कर घर का प्रत्येक प्राणी अलग-अलग परीक्षा फल पूछ-पूछ कर ज़लील करता। मैं ने घर के बाहर भी निकलना छोड़ दिया पर पड़ोसी तो पड़ोसी ही ठहरे! एक दिन माता जी से किसी ने बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में अपने बच्चों की झूठी तारीफ करते हुए मुझे कुछ कह दिया । माताजी पूरे क्रोध में घर आयीं मैं घर का काम ही कर रही थी अतः मार से तो बच गयी पर डांट से नहीं बच पायी। उस दिन उन्होंने भी बहुत बुरी तरीके से डांटा कि “छोटी बहन (सरिता जो बचपन से ही कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करती थी) प्रथम स्थान पर है और तुम फेल हो गई। पैसे,समय सब की बरबादी ।“ मैं धीरे से बोली-"मेरे लिए कापी मत खरीदियेगा मैं पुरानी कापी-किताब से काम चला लूंगी।"

"साल भर की फीस और साल जो बर्बाद हुआ उसका क्या करोगी?" के साथ ही बहुत डांट पड़ी जो मुझे कहीं चुभ गई। मुझे लगा कि वह तो जानती ही हैं कि मैं पूरी पढ़ाई नहीं कर पायी थी फिर भी डांट रही हैं।बाल- मन में यह बात सालती रही कि फीस की भरपाई कैसे करूं? जबकि उस समय पाकेट-मनी का भी रिवाज नहीं था, इतना रुपया ही नहीं होता था।

पुरानी कापी से पेज़ निकालकर नई कापी बन गई वादे के मुताबिक मैनें नई कापी उस वर्ष नहीं मांगी। ज़रुरत ही नहीं पड़ी।उस वर्ष पास हो गई लेकिन फीस और एक वर्ष का ताना नहीं भूल पा रही थी। भरपाई करनी है पर कैसे नहीं समझ पा रही थी। एक-दो बार नये कपड़े लेने से इंकार कर दिया, लेकिन इतने कपड़े थे ही नहीं कि काम चल जाये।

हाई-स्कूल की परीक्षा उम्मीद के विपरीत उत्तीर्ण की। सबको तृतीय श्रेणी की उम्मीद थी, उसमें अनुक्रमांक न पाकर पिताजी ने अखबार अलग रख दिया। सब बहनें द्वितीय श्रेणी में देखने लगीं और अचानक से सरिता चीख पड़ी, ”पास हो गयीं।“ पिताजी ने चौंककर अखबार देखा। कई बार अनुक्रमांक मिलाकर तसल्ली करने के बाद बोले- "गुरु जी ने तो कमाल कर दिया। उम्मीद नहीं थी।" पिताजी मुझे प्यार से गुरू कहते थे मैं टापर नहीं थी लेकिन परीक्षा देने के बाद क्या लिखकर आती थी यह नहीं बता पाती थी इसीलिए मेरे उत्तीर्ण होने के प्रति सब सशंकित ही रहते ।

ग्यारहवीं कक्षा में संयोग से फीस माफ़ी का फार्म भरवाया जा रहा था। पिताजी अवकाश प्राप्त कर चुके थे आय प्रमाण -पत्र चाहिए था पिताजी की राय लेकर चुपचाप विद्यालय में जमा कर

दिया। संयोग से फीस माफ़ हो गई। कक्षा सात में दो रुपए उन्सठें पैसे (2.59)लगती थी जबकि ग्यारहवीं में छ: रुपये कुछ पैसे (जो याद नहीं है)माफ़ हुई। बड़े ताव से घर आयीं। माता जी के हाथ में रसीद पकड़ा कर बोली-"कक्षा सात में एक साल फेल होने पर फीस की भरपाई सूद सहित दो गुनी फीस बचा दी।“

माताजी को बात चुभ गई। लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने कहा-"साल बर्बाद हुआ उसको कैसे वापस करोगी?" यह ऐसा प्रश्न था जो चुभता तो था पर इसका कोई हल नहीं सूझता था। वक्त बीतता गया पर चुभन कहीं सालती रही बेतहाशा ।

वर्ष १९७५ की बात है। लखनऊ से वाराणसी आ गयी। विद्यालय में पढ़ाते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम०ए ०का व्यक्तिगत रूप से फार्म भर दिया। दुर्योग से लड़कों के हड़ताल के चलते वह सत्र शून्य घोषित कर दिया गया। मैं ने एल०टी०का फार्म भर दिया वहां माइग्रेशन-सर्टीफिकेट नहीं लगना था। संयोग से पढ़ने वाले बच्चों की प्रार्थना पर विश्वविद्यालय में दिसम्बर १९७५ में एम० ए०प्रथम वर्ष की परीक्षा हुई जो मैंने भी दे दी और अप्रैल १९७६ में एल०टी० की परीक्षा दे दी। उसी वर्ष जून में एम०ए० द्वितीय वर्ष की परीक्षा हो गई। छ: महीने में तीन परीक्षा तीनों उत्तीर्ण। फिर शान से लखनऊ गयी। माताजी का जब तुंरत दूसरी बार चरण स्पर्श किया तो उन्होंने कारण पूछा। मैंने बताया-"कक्षा सात में फेल होने पर एक बर्बाद हुआ था। छ: महीने में तीन परीक्षा पास कर सूद समेत दो साल बचा लिया। " अब मेरे मन से बोझ उतर गया था। लेकिन माता जी को बात चुभ गई। वह रोने लगीं कि अब डांटने का भी हक नहीं था? मैं ने कहा-"मेरा मकसद आपको दु:खी करना नहीं था, आपके ही आशीर्वाद से भगवान जी ने ऐसी परिस्थिति दी कि मेरा मन भी हल्का हो गया अन्यथा मन पर साल बर्बाद होने का बोझ था। वह रोती जा रही थी। मैं वहां से हट गई। पिताजी ने उन्हें समझाया कि आप भी तो पढ़ाई के नाम पर साल बर्बाद होने का ताना दे ही देती थी उसे भी तो दु:ख हुआ तभी तो वह आज कह रही थी। अन्यथा आज तक उसने कुछ कहा था?

कक्षा नौ की पुस्तक में एक पाठ है परम हंस रामकृष्ण जी पर । उसमें पढ़ा था कि जिस प्रकार पानी में डूबने पर शरीर से प्राण निकलने को व्याकुल होते है, यदि वही व्याकुलता हो तो ईश्वर भी मिल जाते हैं। शायद वही व्याकुलता थी जो मेरा साल भी बच गया।

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परिचय

नाम-सुमन रानी तिवारी

जन्म दिनांक-२९जुलाई

शिक्षा- एम०ए०(हिन्दी,प्राचीन भारतीय इतिहास)एम०एड०

पेशा-शिक्षिका (भारती निकेतन उ०मा०वि०, वाराणसी)३१मार्च को सेवा निवृत्त।

पहली रचना भजन (कक्षा ६में पढ़ाई के दौरान) , इण्टर में दो कहानियां लिखी ।बी०ए०केबाद कुछ रचनाएं की जिनमें दो-बदायुं की पत्रिका में प्रकाशित एक शाहजहांपुर अखबार में प्रकाशित हुई।बाद में अधिकांश रचनाएं आग की भेंट चढ़ गई।अब छिटपुट रचनाएं (शौकिया)

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