होली विशेष रंगीन हुड़दंग : होली के रंग गधों के संग // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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होली आती है तो गधों की बन आती है। आज के रोज़ गधों को गधों पर बैठाया जाता है। उन्हें मुकुट पहनाया जाता है। उनके गले में मालाएं डाली जाती है। उनके सम्मान में कवितायेँ पढ़ी जाती हैं। गर्दभराग में निबद्ध आलाप ले ले कर गायन किया जाता हैं। अबीर-गुलाल से चेहरा रंगा जाता है। भरी पिचकारियाँ छोड़ी जाती हैं। गधा-छाप उपाधियों से उन्हें नवाज़ा जाता है। गधे गदगदायमान हो जाते हैं।

वैसे गधा, जैसा कि हम जानते ही हैं, घोड़े के परिवार का एक सदस्य है। मना, घोड़ा बड़े काम की चीज़ है तो गधा भी कोई कम काम की चीज़ नहीं है। फिर भी घोड़े से वह काफी-कुछ अलग है। घोड़ा हिनहिनाता है, पर गधा रेंकता है। घोड़ा बग्घी, तांगों और इक्कों में जोता जाता है, गधे जुतते नहीं। धोबी और कुम्हार गधों की पीठ पर बोझा सीधे ही लाद देते हैं। बेचारा सीधा जो है ! अत्यंत सहनशील। हर्ष हो या विषाद, उसके चेहरे पर कोई भाव अंकित नहीं होता। वह निष्काम बना रहता है। एक बार किसी कवि ने होली की तरंग में गधे से पूछ लिया, तुम हिन्दू हो या मुसलमान? पलट कर गधे ने प्रति-प्रश्न किया, पहले यह बताएं, गधा में हूँ या आप ? सिर्फ गधों में ही यह क्षमता है कि वे हमारी बोलती बंद कर दें। उनके स्वर का कोई जवाब नहीं।

हिन्दी भाषा और साहित्य में गधों का बड़ा योगदान रहा है। धोबी गधे पर लाद कर मैले कपडे धोने के लिए उसे घाट तक ले जाता है। धुले कपड़ों को दुबारा उस पर लाद कर उन्हें घर ले आता है। फिर भी भाषाई बेमुरव्वत देखिए, कहा जाता है, “धोबी का गधा न घर का न घाट का।” गधे के सिर पर अगर कहीं सींग होते तो वह निश्चय ही धोबियों को अपने सींग पर उठा के पटक देता। लेकिन क्या करे बेचारा, उसके सिर से सींग गायब हो जाना भी हमारी भाषा में कहावत बन के आ गया। भाषा की ये बातें, गधे की लातें हैं। याद रखना चाहिए कि अवसर पड़ने पर गधे भी अपने गधेपन के बावजूद, दुलत्ती झाड़ने सकते हैं। गधे की अधिक से अधिक क्या उम्र होती होगी? यही करीब पचीस साल। शायद इसीलिए आदमी जब इस आयु तक पहुंचता है, तो इसे ‘गधा-पचीसी’ कहते हैं।

किशन चंदर को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक अपनी, सौरी, ‘गधे की आत्म कथा’ ही लिख डाली। शरद जोशी को भी जोश आ गया। उन्होंने भी एक अदद नाटक, ‘एक था गधा’, लिख मारा। हिन्दी साहित्य को ये दोनों उपलब्धियां इसलिए हासिल हो पाईं क्योंकि इनके लेखकों ने राजनीति में गधे के योगदान को बहुत करीब से देखा था।

अमेरिका में डिमोक्रेटिक पार्टी का प्रतीक-चिह्न गधा यों ही नहीं बन बैठा है। कुछ न कुछ तो राजनैतिक कूवत उसमें अवश्य होगी ही। भारत की राजनीति में भी गधे के नाम का खूब उपयोग हो रहा है। गुजरात के चुनावी प्रचार में गधों-वाले बयान काफी चर्चित रहे। विरोधी पार्टियां बेचारे गधे की खाल खींचती रहीं।

कहते हैं, गधे की खाल खींचने में चीन को बड़ी महारत हासिल है। उसने गधे की ‘सार्थकता’ बहुत अच्छी तरह समझ ली है। पाकिस्तान और चीन के बीच जो आर्थिक गलियारा बना है उसमें अन्य विकास योजनाओं के साथ “गधा विकास योजना” भी सम्मिलित की गई है। इसमें चीन एक अरब रूपए का निवेश कर रहा है। इसके तहत पाकिस्तान के गधे अब चीन जाएंगे। वहां इनकी तादाद बढाई जाएगी। उनकी नस्ल को बेहतर बनाया जाएगा। इससे गधा-पालकों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार होगा। नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल द्वारा गधों का प्रजनन कराने वालों की क्षमता का विस्तार होगा। चीन में अच्छे गधों की बड़ी मांग है। वहां गधों की चमड़ी बड़ी उपयोगी मानी गई है। गधे की खाल का उपयोग अन्य चीजों के अलावा वहां दवाइयां बनाने में भी होता है। ये दवाइयां फिर पाकिस्तान एक्सपोर्ट कर दी जाएंगी।

पाकिस्तान में अब गधों के भाव बढ़ने वाले हैं। खैबर-पख्तूनख्वा में बेहतर नस्ल के गधे, चीन विकसित करके उन्हें खरीद लेगा। पाकिस्तान का सपना “सार्थक” होगा। एक पाकिस्तानी टिप्पणीकार का कहना है कि पाकिस्तान को एक अक्लमन्द और प्रगतिशील मुल्क बनाने के लिए वहां से सारे गधों का निर्यात कर दिया जाएगा। गधे जो बच जाएंगे उन्हें बंदूकों और हथगोलों के साथ भारत पाकिस्तान सीमा पर तैनात कर दिया जाएगा। युद्ध अब इंसानों की बजाय गधे लड़ेंगे, जैसे कि अभी तक लड़ते आए हैं।

कहीं मज़ाक न समझ बैठिएगा। यह होली की ठिठोली नहीं, हकीकत है।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद – २११००१

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2 टिप्पणियाँ "होली विशेष रंगीन हुड़दंग : होली के रंग गधों के संग // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत खूब।शानदार रचना।बधाई।

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  2. बड़े ही दिलचस्प अंदाज में गधों की हकीकत बयां की है आपने, होली की बधाई। ठीठोली न मानें होली है भाई

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