बाल कहानी - गुम हुई मेंढक की सुरीली आवाज // प्रमोद भार्गव

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ऐसा नहीं था कि मेढक प्रकृति की गोद में आया ही टर्राने के लिए था। कई शताब्दियों पहले मेंढक भी कोयल की तरह लुभावनी कूक निकालता था। जो मोर की गूंज की तरह पूरे जंगल को गुंजायमान कर देती थी। वह तो दुर्भाग्यवश एक हदसा घट गया जिसने मेंढक की मृदुवाणी हर ली।

हुआ यूं कि एक घर के बगीचे में मेंढक और बिल्ली साथ-साथ रहते थे। दोनों में बड़ी गहरी मित्रता थी। घर में जब कभी गृह स्वामिनी नहीं होती थीं तो दोनों मिलकर खूब शरारत करते। घर का सामान तोड़-फोड़ भी डालते और रसोई में घुसकर खान-पान की वस्तुओं को चट कर जाते।

ऐसे ही एक दिन गृह स्वामिनी चौके (रसोई) में चूल्हे पर मांस के कतरे पकने रख कर पड़ोस में हाल-चाल पूछने चली गईं। मेंढक और बिल्ली तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में रहते थे। बस फिर क्या था दोनों ही पलक झपकते चौके के भीतर हो लिए।

मांस की हवा में तैरती गंध उनके नथुनों में जैसे ही घुसी, उनके मुंह में तो पानी आ गया। बिल्ली तपाक से मेंढक से बोली, 'आज तो कोई अच्छा सा माल पक रहा है ?'

-'सुगंध से तो कुछ ऐसा ही अनुभव हो रहा है।' दोनों लपककर चूल्हे के पास पहुंच गए।

बिल्ली ने आग की आंच से बचते हुए अपने अगले पैर से पतीले का ढक्कन नीचे गिरा दिया। वाष्प का गुबार फूटने से सुगंध और फैल गई। बिल्ली की तो जीभ लपलपाने लगी। मांस के उबलते टुकड़ों पर आंखें गड़ा कर बिल्ली बोली, 'मेंढक भाई इसमें तो लाजवाब ताजा मांस के टुकड़े पक रहे हैं।'

-'जल्दी करो बिल्ली बहिन भूख मिटाने का इंतजाम। स्वामिनी आ गईं तो लेने के देने पड़ जाएंगे।' मेंढक बोला।

तब बिल्ली ने सलाह व निर्णय सुनाते हुए कहा, 'मैं जब तक मांस खाती हूं तब तक तू पहरेदारी कर। जैसे ही स्वामिनी दिखें अपनी प्यारी आवाज में कूक भर देना। फिर तू खाना मैं पहरेदारी करूंगी।'

मेंढक सहमति जताते हुए पहरेदारी के लिए दरवाजे पर चला गया।

बिल्ली ने जैसे-तैसे चार-छह उबलते मांस के टुकड़े पतीले में से निकाले और खाना शुरू कर दिए। जल्दबाजी में मुंह जलने की भी उसने परवाह नहीं की। खा चुकने के बाद बिल्ली पहरा देने लगी और मेंढक राम चूल्हे के पास आ गए। मेंढक के लिए बिल्ली कुछ मांस के टुकड़े निकाल कर रख गई थी, जिससे उसे गर्म पतीले से मांस निकालने में परेशानी न हो।

गर्म होने के बावजूद स्वादिष्ट मांस के टुकड़ों को मेंढक ने मुंह में ले लिया। इतने में ही बिल्ली ने गुर्रा कर गृह स्वामिनी के आने का संकेत किया। बिल्ली तो तत्परता से नौ दो ग्यारह हो गई। पर मेंढक अजीब सांसत में पड़ गया। मुंह में मांस का टुकड़ा न निगलते बने न उगलते। फिर भी मेंढक मांस को चबाने की कोशिश करते हुए चौके से बाहर निकल कर एक लंबी छलांग लगा कर बगीचे की हरियाली में छिप गया। पर मांस के टुकड़ों को चबाने के साथ उसमें से जो वाष्प निकली उससे उनका टेंटुआ झुलस गया और मेंढक की मधुर आवाज जाती रही। अब मेंढक जब भी मुंह से आवाज निकलता तो टर्र...टर्र के शब्द निकलते। भद्दे और बेसुरे। तब से मेंढक अपनी इसी बेसुरी आवाज को ढोता चला आ रहा है।

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प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

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