लघुकथा // असमंजस // मदन मोहन शर्मा

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असमंजस


आधुनिक संस्कार ना होने की वजह से पति ने घर से निकाल दिया और दूसरी शादी कर ली। साल भर की नन्ही जान अपने बेटे को लेकर एक शहर से दूसरे शहर भटकती रही। मजदूरी मिल जाती तो दो जून की रोटी मयस्सर हो जाती और कभी पानी पीकर ही जठराग्नि को शान्त करना पड़ता। 

अब उसका बेटा पांच साल का हो गया था। दो दिन से दोनों ने अन्न का एक दाना भी नही खाया था। बेटा अनमना सा पास में बैठा हुआ था। और उसकी आंखें दूर शून्य में खोज रही थी सुकून के दो पल।
"भगवान सब ठीक करेगा एक दिन" कह कर पुत्र को दिलासा देती आई थी।
अचानक बेटे ने सवाल पूछा -
माँ, क्या भगवान होता है ?
उसकी आँखों से आंसू के दो मोती ढलके और बालक को अपने अंक में भरकर रूंधे गले से इतना ही बोल पाई -
" पता नही, बेटे !!!"
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मदन मोहन शर्मा
12-G-17, अपना घर योजना,
आर0 के0 पुरम,
कोटा (राजस्थान) 324010

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