व्यंग्य // अस मानुस की जात // धर्मपाल महेंद्र जैन

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मेरे पूर्वज बंदर नहीं हो सकते। हमारी सभ्यता का यह पहला डिजिटल युग है। जेब में मोबाइल है, कंधे पर लैपटॉप है, कानों पर ईयर फ़ोन हैं, और कॉलर पर माइक लगा है। जहाँ ईश्वर नहीं है, वहाँ वाई-फाई है। हम सर्वज्ञ, सर्वगुण संपन्न मनुष्य हैं। सिर्फ वक्त की जरूरत हो तो गधे को बाप बनाते हैं। अन्यथा, हम हाथी पर बैठते हैं और शेर की खाल पर बैठ कर साधना करते हैं। देवताओं को भोग चढ़ा कर खुश रखते हैं और भूत-पलितों से बचने के लिए डोरा बाँध कर रखते हैं। बंदरों में ऐसा कोई गुण नहीं है।

मैंने मनुष्य के बारे में थोड़ा और विचार किया है। धरती पर सकुशल रहने के लिए हमने जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा ले रखा है। परलोक में स्थान पाने या अगला जन्म सुधारने के लिए पंडित रख रखे हैं। कितने ही मनुष्य भगवान बन गए हैं। जो योग्यता होते हुए भी भगवान नहीं बन पाए, उन्होंने खुद को भगवान घोषित कर दिया है। कुछ तिहाड़ जैसी जेलों में भगवान बनने की परिवीक्षा पर हैं। बंदर ऐसा कुछ नहीं कर सकता। तब भला बंदर हमारा पूर्वज कैसे हो सकता है।

पिछले दिनों एक राजनेता वैज्ञानिक भी बन गए। राजनेता कुछ भी बन सकते हैं। सरकार की लुटिया डुबोनी हो तो जनतंत्र के रक्षक बन सकते हैं। वोट कबाड़ना हो तो हर बैंक खाते में पंद्रह लाख रुपये डालने का वादा कर सकते हैं। ये राजनेता लघु स्तर के मंत्री हैं तो चिंतक बन गए। उन्होंने कहा ‘मनुष्य के पूर्वज बंदर नहीं थे, मनुष्य आदिकाल से मनुष्य ही रहा है।’ यह बात एकदम सच है। यदि हमारे पूर्वज बंदर होते तो वे राजनीति कैसे करते। बंदर टोपी उछाल सकता है, टोपी का रंग नहीं बदल सकता।

अब सारे विपक्षियों ने मोर्चा खोल दिया है। वे कह रहे हैं 'हमारे पूर्वज बंदर थे। असहिष्णु सरकार इतिहास बदलते-बदलते, विज्ञान भी बदलने लगी है।' ये विपक्षी सदा-सर्वदा बंदरों जैसा व्यवहार करते हैं। उनके पूर्वज निश्चित ही बंदर रहे होंगे। शेष विश्व के लोग ज्ञानी हैं, सरकार की हाँ में हाँ करते हैं। उनके पूर्वज आदि-आदि काल से मनुष्य रहे हैं, ऐसा आर्यों ने कहा है, वेदों ने कहा है, विशुद्ध भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा है। हम मनुष्यों के डी एन ए की बंदरों से तुलना करना घोर अपमान की बात है। ये विज्ञान कैसा अंधविश्वासी है। बचपन में माँ गुस्से में कहती थी, तुम जानवर हो, जानवर से गये-गुजरे हो। गुस्से में कही गई बात क्या सच होती है भला!

आदमी के पूर्वज कौन हो सकते हैं, यह समझाने के लिए मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ। दो विमान चालकों ने अपने विमान फुल-टैंक किये और न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से जानबूझ कर टकरा दिए। खुद मर गए और अन्य तीन हज़ार लोगों को मार डाला। मुंबई की होटल में कुछ लोग मशीनगनें चलाते घुस गए, सैकड़ों लोगों को मार डाला और खुद भी मारे गए। ऐसी घटनाओं से सिद्ध होता है कि आदमी को दूसरे आदमियों को मारने में बड़ा आनंद आता है, भले ही वह खुद मर जाये।

अब बंदरों का सोच देखें। वानरराज हनुमान की कथा हम सब जानते हैं। उन्होंने अपनी पूँछ में आग लगाई, और दानवों की लंका जला दी। बंदर हो कर उन्होंने बंदरों के जंगल में आग नहीं लगाई। यह हुई बुद्धि की बात, जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। न खुद मरे न किसी बंदर को मारा। वानरों के इस उपकार के कारण, मानव सभ्यता उनकी चिर ऋणी है। बदले में आदमी ने बंदर के लिए पिंजरे बनवाए और डुगडुगी पर नचाया। आदमी में बंदर के प्रति उदार भाव है ही नहीं। आदमी के पूर्वज बंदर होते तो क्या वह उनके प्रति इतना छिछला होता!

निर्ममता आदमी के ख़ून में दौड़ती है। गैंगरेप करने में मानवीय प्रजाति का मुकाबला सृष्टि की कोई प्रजाति नहीं कर सकती। भगवान के घर के नीचे भीख मांगने वालों में जानवरों के मुकाबले आदमियों की संख्या ज़्यादा होती है। लोगों को अंधा या अपाहिज बना कर भीख मँगवाने का धंधा कोई जानवर या पक्षी नहीं चलाते। धरती पर सर्वाधिक विष आदमी फैलाता है, फिर भी अपनी नस्ल को सुसभ्य और श्रेष्ठ मानता है। मृत्युशैया पर लेटे आदमी के अंग जिस द्रुतगति और कुशलता से डॉक्टरों के भेष में छुपा आदमी निकाल लेता है, उसके क्या कहने? आदमी के बारे में यह सब जानते हुए जानवरों की कोई भी प्रजाति क्यों कहने लगी कि वे आदमी के पूर्वज हैं।

यदि बंदर अंग्रेज़ी या हिन्दी बोल पाते तो चार्ल्स डार्विन से ज़रूर कहते कि डार्विन तुम झूठे हो। ऐसे आदमी के पूर्वज बंदर हो ही नहीं सकते। सच तो यही है कि आदमी का पूर्वज आदमी ही है, पर शर्म के मारे वह उसको अपनी संतान नहीं मान रहा।

(गंभीर समाचार, कोलकता के 1-15 मार्च 2018 अंक में प्रकाशित)

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