तोड़ फोड़ कौशलं // डा. सुरेन्द्र वर्मा

तोड़-फोड़ कीजिए, जोड़-तोड़ कीजिए

न बने काम तो, तोड़-मरोड़ कीजिए

आदमी में तोड़-फोड़ की प्रवृत्ति एक आदिम प्रवृत्ति है। इसके उदाहरण राम और कृष्ण के समय में भी ढूँढे जा सकते हैं। राम ने तो अपना पराक्रम दिखाने के लिए, और तो और, धनुष तक तोड़ डाला था। कृष्ण ने भी तोड़-फोड़ कोई कम नहीं की। सच तो यह है, आदमी का बच्चा बचपन से ही तोड़-फोड़ शुरू कर देता है। हताश और निराश होने पर वह या तो रोता है या फिर गुस्से में तोड़-फोड़ की शरण चला जाता है, और अपना काम निकाल कर ही चैन लेता है। अपना काम करवाने के इस कौशल को वह धीरे धीरे बाद में अपनी समझदारी से और भी विकसित करता है। कब, कहाँ, कैसे और किसकी तोड़-फोड़ करनी चाहिए, इसके गुरु सीख लेता है।

बेशक, गीता हमें बिना तोड़–फोड़ किए ही कर्म करने का कौशल बताती है। इसे निष्काम-कर्म कहा गया है| गांधी जी ने भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का कौशल हमें बताया था और इसे सत्याग्रह नाम दिया गया था। किन्तु आधुनिक समय में ये सारी की सारी कार्य-पद्धतियाँ ना-माकूल हो गई हैं एक तो इनका उपयोग करने में आत्मसंयम के नियमों का पालन करना पड़ता है जो आजकल के मंजे हुए राजनीतिज्ञों और सुविधा-भोगी आम आदमी के बस की बात नहीं है। दूसरे जब से इन प्रविधियों का दुरुपयोग आरम्भ होने लगा है, सत्याग्रह जैसी चीज़ भी दुराग्रह बन गई है। अत: आम-जनता का विश्वास भी इन “अपालनीय” तरीकों से उठ गया है। लोग अपना काम करने और करवाने के लिए तोड़-फोड़ कौशल, जो अधिक स्वाभाविक, सरल और जन्मजात है, अपनाने लगे हैं। राजनीतिज्ञों को तो यह बहुत ही रास आया है।

विरोध के नाम पर तोड़-फोड़ को आज एक सहज संभाव्य तरकीब की तरह अपनाया जा रहा है। हाल ही के दिनों में पदासीन और पदाकांक्षी सभी तरह के राजनीतिज्ञों द्वारा लगभग हर जगह तोड़-फोड़ को अंजाम दिया गया है। वाहनों की तोड़-फोड़, दफ्तरों में तोड़-फोड़; मंदिरों मसज़िदों और गिरजा-घरों की तोड़ फोड़, दूकानों, मालों में तोड़-फोड़; आश्रमों की तोड़-फोड़, अस्पतालों में तोड़-फोड़; घरों की तोड़-फोड़, थानों में तोड़-फोड़; टाइगर ज़िंदा है और पद्मावती जैसी फिल्मों की रिलीज़ पर सिनेमाघरों और थिएटरों में तोड़-फोड़ ; यहाँ तक कि कब्रस्तानों तक में तोड़-फोड़ की जाने लगी है। और ये सारे के सारे सुविचारित और सुनियोजित तोड़-फोड़ के नमूने हैं। ज़ाहिर है, इस तोड़-फोड़ में आम-आदमी का योगदान भी सम्मिलित है ही।

त्रिपुरा में बी.जे.पी की अप्रत्याशित जीत की खुशी में वहां एक के बाद एक दो जगहों पर रूसी क्रान्ति के नायक, लेनिन, की मूर्तियाँ तोड़ डाली गईं। तोड़-फोड़ की आग ऐसी फैली कि महानायकों की मूर्तियाँ तोड़े जाने का एक सिलसिला ही शुरू हो गया। एक सप्ताह के अन्दर मेरठ, उत्तर प्रदेश, में भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति तोड़ दी गई, तमिलनाडु में समाज सुधारक, पेरियार की मूर्ति गिरा दी गई। हर जगह मूर्ति-तोड़क सियासत शुरू हो गई। लोग देश तोड़ने तक की बात करने लगे। अंतत: सरकार को भी कहना पडा, सावधान रहें, तोड़ने वालों को तोड़ के रख दिया जाएगा। कांटे को कांटे से ही निकाला जा सकता है। कहा जा सकता है, संसद से लेकर सड़क तक और सड़क से लेकर सरकार तक तोड़क-नीति चालू आहे।

आज हालात ऐसे हो गए हैं कि यदि आपको किसी राज्य में जाना है तो यह सुरक्षित करना पड़ता है कि वहां बंद, आगजनी, हिंसा, धारा १४४, कर्फ्यू आदि, तो नहीं लगा है वरना सहज ही तोड़ फोड़ की संभावना हो सकती है।

आदमी की ज़बान इतनी लचीली है कि कुछ कहना चाहती है और कुछ कह जाती है। जुमलेबाजी के बिना काम भी तो नहीं बनता। जब इस तरह की जुमलेबाजी का विरोध होता है तो झट से कह दिया जाता है ऐसा कुछ तो कहा ही नहीं गया था। बात को ‘तोड़-मरोड़’ कर पेश किया गया है। हर बात का तोड़ है। आदमी कोई न कोई तोड़ ढूँढ़ ही लेता है। आजकल तो जब बहुमत नहीं मिलता, ‘जोड़-तोड़’ से सरकारें तक बना ली जाती हैं।

तोड़ने का कार्य केवल वस्तुओं तक ही सीमित नहीं होता। ज़रूरत पड़ने पर सम्बन्ध तोड़ लिए जाते हैं, नियम और व्यवस्थाएं तक तोड़ दी गईं हैं। अंधविश्वास तोड़ दिए गए हैं। मर्यादाएं तोड़ दी जाती हैं। लेकिन ये बड़ा जोकिम भरा काम है, कभी कभी लेने के देने पड़ जाते हैं। सीता जी तक बच नहीं पाई थीं। उन्होंने लक्ष्मण रेखा क्या तोडी, अच्छी खासी मुसीबत में पड़ गईं वे।

जोड़ तोड़ की कला एक सकारात्मक कला भी बन सकती है। टूटे-फूटे प्रयोगहीन सामान को मौलिक कल्पना से जोड़ कर नया सृजन भी किया जा सकता है। बस ऐसे तोड़-फोड़ के साथ जोड़ ज़रूरी है। चंडीगढ़ का “रॉक-गार्डेन’ इसका जीता जागता उदाहरण है। अभी हाल ही में एक विद्यालय में एक ‘तोड़-फोड़-जोड़ कार्य- शाला’ का आयोजन किया गया। इसमें तोड़ फोड़ और जोड़ द्वारा संगीत और विज्ञान संबंधी प्रयोग किए गए।

एक होता है, ‘भंडा-फोड़’। दूसरों की छिपी गलतियों को प्रकट कर देना। राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे का भंडाफोड़ करने में महारत हासिल कर ली है। भंडा-फोड़ की एक तरह से स्पर्धा ही शुरू हो गई है। मैं कभी- कभी सोचता हूँ कि आखिर यह ‘भन्डा--फोड़’ शब्द आया कहाँ से ? मुझे लगता है इसका एक बड़ा ही रोमांटिक सन्दर्भ है। भंडा या भांडा बर्तन को कहते हैं। पुराने ज़माने में स्त्रियाँ जब पनघट से पानी भरकर अपना घडा (भांडा) सर पर रखकर चलती थीं तो कोई मनचला कांकरिया मार के उनके भांडे में छेड़ कर देता था। – यही “भंडा-फोड़’ बाद में भेद छिपी बात को किसी दूसरे के द्वारा प्रकट कर दिए जाने के लिए प्रयुक्त होने लगा, ऐसी पूरी संभावना है। बाल कृष्ण के लिए कहा जाता है कि वे चुरा कर मक्खन खाया करते थे। मक्खन यदि कहीं ऊपर रख दिया जाता था तो वे अपने बाल-सखाओं को एक के ऊपर एक चढ़ा कर मक्खन की मटकी फोड़ देते थे। कई जगहों पर यह मटकी-फोड़ पर्व की तरह आज भी मनाया जाता है।

बिना तोड़े स्वादिष्ट फलों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। बेर, बेल, कैथ, नाशपाती, संतरा, केला, सेब इत्यादि, यदि तोड़े न जाएं तो उनका स्वाद भला कैसे लिया जा सकता है ? सुगन्धित, सुन्दर फूजों को पाने के लिए, उन्हें भी लोग तोड़ ही लेते हैं, भले ही यह कितना ही गलत क्यों न हो ! क्या आप बिना तोड़े रोटी खा सकते हैं? लेकिन धन्य हैं वे जो बिना काम-काज किए ही बैठे ठाले रोटियाँ तोड़ते हैं।

तोड़-फोड़ के कौशल को विकसित कीजिए और खुश रहिए।

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-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद –२११००१

1 टिप्पणी "तोड़ फोड़ कौशलं // डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. सुंदर ,समसामायिक आलेख आ.सुरेन्द्र जी

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