सुशील शर्मा की काव्य रचनाएँ

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ग़ज़ल
सुशील शर्मा

तुझ से जीवन में क्यों दूरी है
तेरी मेरी क्यों ये मजबूरी है।

दूर दूर रहकर कबतक देखूंगा
तेरे पास में आना बहुत जरूरी है।

गाल गुलाबी चाल शराबी तन प्यासा है।
कब मिल पाएगी ये हलवा पुरी है।

जो मेरी है बस मेरी है बस मेरी है।
बिन तेरे मेरी सब बात अधूरी है ।

तेरे अक्स को भी गर कोई छूता है।
उससे मेरी दुश्मनी जरूरी है।

रोशनी
सुशील शर्मा

जब से मिले हो तुम जिंदगी जवानी हो गई है।
दिन लरजते फूल रात रवानी हो गई है।

रोशनी दूर थी अब तलक मेरी महफ़िल से
तुम से रोशन मेरी जिंदगानी हो गई है।

जब से रखा है पैर तुमने आँगन में हमारे।
पर्वतों की राह भी मैदानी हो गई है।

फूले है वन उपवन फूली अमराई है।
ये सारी प्रकृति तेरी ही निशानी हो गई है।

अंधेरों में जल उठे तेरे तब्बसुम के दिये।
जब से तेरी नजर की मेहरबानी हो गई है।

ग़ज़ल
सुशील शर्मा

कोई अपना मेरे पास आये तो कैसे
जिंदगी मेरा साथ निभाये तो कैसे।

जख्म जिंदगी ने बेइंतिहा दिए है।
खुशी मुझे खुशी से सहलाये तो कैसे।

माँ बाप का साया सिर पर न रहा।
कोई मुझे दिल से अपनाये तो कैसे।

बचपन दुखों की पनाहों में है
मन को विश्वास दिलाये तो कैसे।

भूख पेट मे नींद आंखों पे सोती है
भाई मुझे खाना खिलाये तो कैसे।


तेरे कूचे में
सुशील शर्मा

तिरा अक्स दिल मे बसाने की तमन्ना है।
आज तुझ पर दिल हार जाने की तमन्ना है।

देखा बहुत दूर दूर से तुझको
आज पास आने की तमन्ना है।

बाते बहुत होती हैं प्यार करने की।
आज तुझ पे जान लुटाने की तमन्ना है।

दिल टूटने का कोई शिकवा नही होगा।
बस तुझ पर दिल हार जाने की तमन्ना है।

तुझको देखे बगैर चैन दिल को कहां।
तेरे कूचे में घर बनाने की तमन्ना है।

ग़ज़ल
पायल पाजेब

सुशील शर्मा

तेरी पायल मेरे दिल का संगीत है।
मन के झरने से झरता कोई गीत है।

आँगन में छनकती है जब भी पायल
मन के कोने से निकलता नवगीत है।

जब भी कहीं घुंघरू खनकते है।
तेरी पाजेब का लगता संगीत है।

जब भी यादों के साथ मिलता हूँ।
सुनातीं तेरी पायल का गीत है।

तेरी पायल की रुनझुन से लगता है।
तू पिछले जन्मों का मेरा मनमीत है।


*बहारें फिर भी आएँगी*
सुशील शर्मा

बहारें फिर भी आएँगी
ज़माने में भले ही तुम न रहोगे।
फिजायें गुल खिलाएंगी
ज़माने में भले ही तुम न रहोगे।

तोड़ कर दिल यूँ जाने का
सबब तो बता देते।
खुशियां अब भी मुस्कुरायेंगीं
ज़माने में भले तुम न रहोगे।

कभी किसी के जाने से
कोई मर नहीं जाता।
कलियां फिर खिलेंगी
ज़माने में भले ही तुम न रहोगे।

कभी निकलो इस गली से
तो एक नजर देख लेना।
बहारें गुनगुनाएंगी इस
ज़माने में भले ही तुम न रहोगे।

वो कोई और होते है
जो गम से टूट जाते हैं।
ये आँखें मुस्कुरायेंगीं
ज़माने में भले ही तुम न रहोगे



  शिव उवाच

पूजन तुम्हारी कैसे स्वीकार करूँ।
मन मैला तन का कैसे आधार करूँ।
भाव नहीं पूजन के तेरे मन में फिर।
भोग को बोलो कैसे अंगीकार करूँ।

हर तरफ मुखौटों की भरमार है।
जिसको देखो वही गुनाहगार है।
अब नहीं ईमानों का मौसम यहां।
हर शख्स पैसों का तलबगार है।


हर शख्स से मैं जब भी मिला।
अंदर से मुझको वो टूटा मिला।
हर चेहरे का एक अलग विन्यास है।
हर चेहरे के ऊपर मुखोटा मिला।

हर जगह मंदिरों में पत्थर रखे।
मेरी सूरत मैं मुझको मुखोटे दिखे।
सोने चांदी में मेरी पूजन बिकी।
मन के कौने मुझे सब खाली दिखे।

दीन दुखियों का कष्ट हरता हूँ मैं।
टूटे दिलों की मदद करता हूँ मैं।
एक विल्वपत्र बस चढ़ाना मुझे।
जीवन को सुखों से भरता हूँ मैं।

सबने पूजा मुझे अलग ताव से।
सबने मांगा मुझे अलग चाव से।
जिसका दामन था जितना बड़ा।
उसको ज्यादा दिया उसी भाव से।

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प्रकृति से सीखो
सुशील शर्मा

प्रकृति और मानव का
  गहरा संबंध है।
जीवन की अनुभूति से
प्रकृति के आबंध हैं।
मानव की चिर
सहचरी प्रकृति है।
मानवीय संवेदना के
चौखटे की आकृति है
शोक, विषाद, 'रूदन
एवं अवसाद के क्षणों में
प्रकृति निर्मित
पर्यावरणीय रक्षणों में
प्रकृति के संवेदनात्मक रूप
  अश्रुपात करते हैं
मानव-जीवन में 
सतत विकास करते हैं।
समुद्र, नदी, वन,
वृक्ष, पक्षी, की अपर्णा
रेगिस्तान, सन्नाटा,
मौन, दुःख, करुणा
इन सभी संवेदनाओं
को प्रकृति जीती है
मानव के सारे दुष्कर्मों
को चुपचाप सहती है
मानवीय अस्तित्व से
जुड़ी बुनियादी बातें
प्रकृति से ही नियंत्रित
  सभी दिन और रातें।
प्रकृति से संवेदनाएं गर
नहीं सीख पाएंगे हम।
आने वाली पीढ़ी को
क्या मुंह दिखाएंगे हम।

प्रेमगीत
सुशील शर्मा

तुम मेरे दिल की बाती हो।
जब चाहूं तब जल जाती हो।
प्रेम समंदर इतनी पैठी
हरदम प्रेम में मदमाती हो।

स्नेह स्वर्ण सी सिंचित तुम।
मेरे मन में अनुमोदित तुम।
जन्म जन्म से तुझ से रिश्ता।
मेरी अर्धांगिनी घोषित तुम।

तुमने अब स्वीकार किया
मैं तेरे मन में जला दीया।
अब न छुपाओ खुद को तुम
तेरी आँखों ने इज़हार किया।


पल पल तेरे बिन अब रहना मुश्किल है।
बिन तेरे जीवन ये जीना मुश्किल है।
आज से तुम मेरी वेलेंटाइन बन जाओ।
अब तन से तन की दूरी सहना मुश्किल है।

तुम बिन जीवन लगे अधूरा सा।
घर तुम बिन लगता घूरा सा।
तन मन धन समर्पित तुमको है।
मिल कर कर दो मुझको पूरा सा।

तेरे संग हरपल अब वेलेंटाइन है।
तेरे संग जीवन मीठा गायन है।
हर पल जीवन का अब तेरा है।
तू मेरे दिल की ठाकुरायन है।


सम्मान की भूख
सुशील शर्मा

सुनो साहित्यकार
सम्मान चाहिए
भिजा देना इतने पैसे
मेरे एकाउंट में
या खरीद लेना
मेरी पत्रिका
जिसमें सिर्फ पैसे वालों
के ही आर्टिकल छापता हूँ
जी हज़ूर
आप तो मुझे सम्मान दे दो
मंच पर स्थान दे दो
एक प्रशस्ति पत्र
शाल श्रीफल देकर
नीचे से ये लिफाफा ले लो
मुझे बड़ा साहित्यकार बनना है
बगैर सम्मानों के कोई बड़ा
  साहित्यकार नही बन सकता
सम्मान के बगैर सीना नही तन सकता।
सभी लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों
के चरण वंदना कर आया हूँ।
उनको अपनी गुण ग्रंथावली
शब्दशः रटा आया हूँ।
सम्मान के दिन सभी मेरे गुण गाएंगे।
आपके सुर में सुर मिलाएंगे
आप सभी मिलकर मुझे
ऊंचा साहित्यकार बनाएंगे।

तुम्हारी आदत

तुम्हारी ये आदत है।
दिल तोड़ना और मुस्कुराना
  तुम्हारी ये आदत है
अपने हुस्न के जलवे दिखाना
तुम्हारी  ये आदत है
इश्क़ करके तड़पाना
तुम्हारी ये  आदत है।
प्यार करना और गुनगुनाना।
तुम्हारी ये आदत है
मना करके बाहों में समा जाना।
तुम्हारी ये आदत है
इश्क़ करके मुकर जाना।
मेरी ये आदत है
तुमको अपना बनाना।


मेरी  रचना का पौधा
सुशील शर्मा

एक रचना का पौधा
भाव के बीज
चिंतन का पानी
अनुभवों की खाद
शब्दों के बैल
लेखनी का हल
श्रम की स्याही
छंदों के खेत में
मैंने बोया था
फिर एक दिन
मेरी एक रचना उगी
दो पत्तों के साथ
फिर निदाई की
फिर गुड़ाई की
फिर चार पत्ते
फिर आठ पत्ते
इसी बीच समीक्षकों
ने ओले बरसाए
अपनी पीठ पर सहे
उस रचना के ऊपर झुक कर
फिर कुछ दिन बाद
स्वस्थ पौधा
फिर कई फल लगे
सभी ने खाये
कुछ वो बीज ले गए
उन्हें अपने खेतों में लगाये
मेरी रचना में सिमटी
सारी कायनात
मेरे पौधे के बाजू
के पौधे मुरझाए
क्योंकि उनको
छोड़ दिया गया था
सिर्फ बो कर।


  क्षणिकाएं
सुशील शर्मा


वो पुरानी यादें
किताबों की बुनियादें
तुम्हारे लिखे कुछ पत्र
धुंधले से तुम्हारे चित्र
वो कक्षा की बातें
वो सुनहरी मुलाकातें।

स्वप्न कुछ बुने हुए
प्रेम से सने हुए
तुम्हारे अबोल शब्द
वो आंखों के इशारे
थे मन के सहारे।

जीवन की डगर
अलग थी मगर
कभी न भूला मन
तुम्हारा आंगन
हृदय से कसे हो
मन में तुम बसे हो।

क्षणिकाएं

सुशील शर्मा

तुम्हारे प्रेम का असाध्य
सौंदर्य वेष्ठित ओज।
पुष्पिताग्र उदंड उरोज
सुलगे अंगार सी देह।
तुम्हारी यौवनी गंध का मेह।
देह मन आत्मा सब व्यक्त
ज्योतिर्मयी चेतना सिक्त।
आंखों में अनकहा प्यार।
जीवन का बस यही आधार

अनिमिष स्वप्नदर्शी
अनगिनित स्मृतियां खास
झाड़ियों के पीछे की
अभिसारी घास
तुम्हारा सीमांत प्रेम
मेरा पिघलता अस्तित्व
तुम्हारे प्रेम के सागर में
रेत सा बहता मेरा व्यक्तित्व।

बसंत में सूखी नदी
प्रेम की भूखी नदी
सिमट सी गई
रेत के नीचे
चिमट सी गई।
सर्द सूखे पत्थरों से लदी
बसंत में सूखी नदी।

हाइकु-125
आशा अभिलाषा
सुशील शर्मा

उड़ती जाए
मन की अभिलाषा
पंख लगाए।

सुधा तृप्ति की
मन है मधुकर
चंदन आशा।

मुट्ठी में आशा
कठिन डगर है
घना कुहासा।

अरे विधाता
लेकर सब कुछ
भर दो आशा।

कैसी उत्कंठा
मृग मरीचिका सी
तुम्हें तलाशे।

एक लालसा
ईश्वर स्मरण से
कटे जाल सा।

हाइकु-126
चांद सितारे सूरज निहारिका

सुशील शर्मा

रात अंधेरे
चांद सा झिलमिल
तेरा चेहरा

तेरा खयाल
फलक पर चांद
रोशन मन

दिल के राज
चांद है राजदार
तन्हा सी रातें।

तेरा चेहरा
आसमान में चांद
आंखे हैं तारे।

चंदा मामा
मैंने पहन लिया
तेरा पजामा।

निहारिका सी
शुभ्र झिलमिलाती
तुम्हारी पाती

घर की छत
सूरज सुर्ख गोल
डूबता मन


हाइकु-127
कर्म माया तृषा

सुशील शर्मा

मानव कर्म
बीज बना अंकुर
फल निश्चित।

कर्म आश्रित
मानवीय चेतना
शरीर धर्म

कर्म का मूल
आत्म का समर्पण
मुक्ति का द्वार।

ईश अर्पित
कर्म का प्रयोजन
धर्म सम्मत।

कर्मशीलता
मानव की प्रवृति
जन्म बंधन।

माया ठगिनी
भरमाये जीवन
बने दावाग्नि।

माया का मोह
गुड़ में लगा चींटा
जीवन बीता।

तृषा की अग्नि
ईर्ष्या की लकड़ियां
माया पवन।

हाइकु-128
युद्ध शांति रक्त विनाश पीड़ा

वृक्षों का नाश
अधाधुंध विकास
पीड़ित मन

रिसती पीड़ा
जीवन अग्निपथ
युद्ध भीषण।

युद्ध की भूमि
रक्त बहता रहा
शांति की चाह।

विस्तार नीति
युद्ध संग अनीति
रक्त पिपासु

हाइकु -129
श्रीदेवी को श्रद्धांजलि

एक लम्हे में
चालबाज़ चाँदनी
हो गई जुदा

सदमा लगा
सुहागन नगीना
लंबी जुदाई।

फरिश्ते बने
पत्थर के इंसान
खुदा गवाह।

अंतिम यात्रा
विनम्र श्रद्धांजलि
मुक्ति की आस।

  हाइकु -130
कली भ्रमर पुष्प बसंत

सुशील शर्मा

शस्य श्यामला
मदमस्त श्रृंगार
बसंती प्यार

मस्त भ्रमर
कलियों के कानों में
गीत सुनाये।

पराग रस
गुनगुनाते भौरें
फूलों पर झूलें।

कोकिल कूकी
सतरंगी बसंत
नवल कली।

ऋतु अनंग
रतिमय आनंद
मस्त मदन।

पीली सरसों
केशरी है पलाश
पुष्प सुवास।

भौरीं गुंजन
बसंत निकुंजन
पिक कुंजन

मधुप गान
कलियन वितान
नैनन बान।

रंग अनंत
चित्रकार बसंत
सजा दिगंत



रोला छंद

मुख पर ले मुस्कान प्यार तुम सबसे कर लो ।
सबका कर सम्मान प्रेम से जीवन भर लो।
दो दिन का श्रृंगार मगन मन भर कर करलो।
जाना है उस पार ईश के चरण पकड़ लो।

सुशील शर्मा

चंचरी छंद
12,12,12,10

मिलन की भी बात हो,
तुम से मुलाकात हो।
प्यार की बरसात में,
खुद को भिगोइये।

दिल महक महक उठे,
प्यार संग लहक उठे।
जिंदगी के रंग में,
भंग न मिलाइये।

मिलजुल कर प्यार संग,
पीकर के प्रेम भंग।
सूखे इस जीवन में,
प्रेम बरसाइये।

जीवन है चार दिवस
छोड़ कर सारी हवस
प्रभु के श्री चरण संग
प्रीत अपनाइये।

सुशील शर्मा

मरहटा छंद
10, 8, 11 मात्राएँ

मोहक सी सूरत,सुंदर मूरत
मत करना गुरूर
जीवन संग ज्योति ,मन के मोती
प्रेम लदी भरपूर।
मन में अभिलाषा ,तेरी आशा।
जीवन है मजबूर।
मन में तुम बसते, जीवन रस्ते।
चलते चलो हुजूर।

सुशील शर्मा

रोला छंद
गुलाल

हाथ में ले गुलाल देख मुझ को मुस्काई।
रंग रंगे कपाल भांग की मस्ती छाई।
देख रूप सौंदर्य चाँदनी भी शरमाई।
अपलक देखें सभी प्रेम की वो तरुणाई।

सुशील शर्मा

रोला छंद
बसंत

प्रिय बसंत मुस्काय चुनरिया ओढ़े धानी
सतरंगी हो जाय जिंदगी बड़ी सुहानी
पिया मिलन की आस लिए फिरती है रानी।
मन बांधे उल्लास सजन की प्रेम दीवानी।

सुशील शर्मा

रोला छंद
लालिमा

लाल लाल रंगीन, शाम देखो मन भाए।
लोहित नीला गगन, लालिमा अंग लगाए।
गोधूलि बेला संग ,तारे सब क्षितिज समाए।
चाँद उतर चुपचाप ,घर की छत पर चढ़ जाए।

सुशील शर्मा

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