समीक्षा - ‘निंदिया ले के साथ चाँदनी आ जाना’

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समीक्षा पुस्तक का नाम - ‘निंदिया ले के साथ चाँदनी आ जाना’

विधा - लोरी-प्रभाती

गीत रचनाकार - डॉ0 सुधा गुप्ता ‘अमृता’

प्रकाशक - बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र, भोपाल (म0प्र0)

पृष्ठ - 72 मूल्य - रु0150/-

समीक्षक - इं0 सन्तोष कुमार सिंह, मथुरा (उ0प्र0)

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हिन्दी साहित्याकाश में डॉ0 सुधा गुप्ता ‘अमृता’ एक चमकते सितारे की भाँति देदीप्तमान हैं। मध्यप्रदेश के कटनी शहर में निवासरत इस रचनाकार का बहुरंगी सृजन पाठकों के हृदय को आत्मविभोर कर रहा है। कहानी संग्रह, गीत संग्रह, बालगीत संग्रह आदि की लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी अपने दायित्वों का ईमानदारी का पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति जी से पाने वाली शिक्षिका डॉ0 सुधा गुप्ता ‘अमृता’ समाज की सम्मानित नागरिक हैं। हमें इन पर गर्व है।

डॉ0 सुधा गुप्ता जी की नवीनतम पुस्तक ‘निंदिया ले के साथ चाँदनी आ जाना’ मुझे प्राप्त हुई और मैं पढ़ने बैठ गया। लोरी और प्रभाती गीतों का यह गुलदस्ता बच्चों को सुलाने और प्रातःकाल में जगाने वाले गीतों से सुसज्जित है।

वैसे तो लोरी विधा बहुत पुरानी है परन्तु वर्तमान में इस विधा पर तुषारापात होता नजर आ रहा है। जब कभी माँ अपनी ममतामयी वाणी देकर बच्चे को सुलाती थी तो बच्चा माँ के मधारिम स्वर को सुनकर नींद के आगोश में चला जाता था। लोरी का जादू हमें हिन्दी फिल्मों में भी देखने मिलता है। अभी तक फिल्मों में लगभग 101 लोरी गीतों को स्थान मिल चुका है। सन् 1945 से लेकर सन् 2012 तक छुटपुट रूप से लारियाँ फिल्मों में अपना स्थान बना पाने में सफल रही हैं। ‘आ री निंदिया, तू आ के न जाना (फिल्म जीनत), आ जा री निंदिया, तू आ झिलमिल सितारों से उतर (फिल्म दो बीघा जमीन), लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी, दूध में बताशा ( फिल्म मुक्ति), मैं गाऊँ तू चुप हो जा, मैं जागूँ तू सो जा ( फिल्म दो आँखें बारह हाथ) और अन्त में सन 2012 में रावडी़ राठौर में ‘चंदनियाँ छुप जा रे, क्षन भर को लुक जा रे’ आदि-आदि।

आज बालकों की रुचियाँ भले ही बदल रही हैं लेकिन सुधा गुप्ता जी ने इस विधा के गीतों को रचकर समाज को संकेत दे दिया है कि लोरी और प्रभाती की ममतामयी अभिव्यक्ति को यूँ ही विलुप्त नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने अपनी इस पुस्तक में 40 लोरी और 21 प्रभाती गीत लिखकर हिन्दी साहित्य जगत को उल्लेखनीय योगदान दिया है।

मैंने इस पुस्तक को आदि से लेकर अन्त तक पढ़ा है। प्रथम खण्ड में 40 लोरियाँ हैं। ये सुधा जी के ममतामयी अंतस का प्रस्फुटन है जो कागज पर अक्षर बन कर अवतरित हुई हैं। कहते हैं कि जब साहित्यकार बाल कविता लिखता है तो स्वयं को बालक बनना पड़ता है तभी श्रेष्ठ कविताओं का सृजन हो पाता है। यहाँ यह उल्लेख करना समुचित होगा कि एक सेवानिवृत्त महिला का मन, इन लोरियों को लिखते समय एकबार पुनः पुराने समय में लौटा होगा, पालने में बालक लेटा होगा तो दूसरी ओर हृदय में ममता जाग्रत हुई होगी, तभी इस प्रकार का सृजन वे कर सकी हैं। इनकी कल्पनाशीलता तो देखिए, वे चंदा के झूले में गुडि़यारूपी बिटिया को सुलाने को लोरी गाती हैं -

सनन सनन पवन चले/निंदियारानी आना।

चंदा के झूले में/ गुडि़या को सुला जा। और कहती हैं -

खेलखिलौने चाबी वाले/ झोले में भर लाई।

मिट्टी के हैं कृष्ण कन्हैया/ जिसने गाय चराई।

परियाँ बच्चों को हर युग में आकर्षित करती रही हैं। बच्चे उन्हें देखना चाहते हैं, उनसे मिलना चाहते हैं, उनके साथ खेलना चाहते हैं इसीलिए वे परियों के देश भी जाना चाहते हैं, तभी तो सुधा गुप्ता जी बिटिया को ‘लालपरी’ के मिलने का लालच देकर सुलाना चाहती हैं -

तारों की छाँव में/चंदा के गाँव में। लालपरी आएगी/ तुझको सुलाएगी। बिटिया फिर भी नहीं सोती तो वे फिर कहती हैं - सोने लगी हैं बागों की कलियाँ/सोने चली हैं नन्हीं सी चिडि़याँ। पंछी डाल पात सब सोए/ ताल कमल दल सोए।

हर माँ को अपनी संतानें प्रिय लगती हैं, भले ही उनका रूप रंग कैसा भी हो। उनके लिए तो उनका बेटा लाल होता है, चाँद का टुकड़ा होता है। एक लोरी में वे कहती हैं -

मेरे लाल का सुंदर मुखड़ा/लगता जैसे चाँद का टुकड़ा। अलकें हैं जैसे बदली।

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दूसरे खण्ड में 21 प्रभाती गीत हैं। ये गीत बालक को प्रातःकाल में जगाने के लिए गाए जाते हैं। दशकों पूर्व भी ये प्रचलन में थीं। कविवर अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध जी की एक प्रभाती मैंने अपनी पाठ्य पुस्तक में पढ़ी थी। देखें -

उठो लाल अब आँखों खोलो/ पानी लाई हूँ मुँह धोलो।

बीती रात कमल दल फूले/ उनके ऊपर भौंरे झूले।

मेरे प्यार अब मत सोओ/ ऐसा सुंदर समय न खाओ।

आज के समय में और रहन-सहन में अत्यन्त परिवर्तन हुआ है। अब बच्चे को प्यारी-प्यारी प्रभाती नहीं सुनाई जाती है। माँ बच्चे को झकझोरती है हुई कहती है - ‘जल्दी उठ, स्कूल को लेट हो जाएगा, स्कूल बस आने वाली है, मुझे भी नौकरी पर जाना है आदि-आदि।’ बच्चा आँखें मलता हुआ उठता है, गुडमॉर्निंग मॉम बोलता है और फ्रैश होने घुस जाता है। इस बदले हुए वातावरण पर लखनऊ के बाल साहित्यकार और बालरोग विशेषज्ञ डॉ0 प्रदीप शक्ल की कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए -

उठो लाल अब आँखें खोलो/ पापा से गुडमॉर्निंग बोलो।

जल्दी से मुँह में ब्रश डालो/ बाथरूम में जाओ नहा लो।

धूल कार्बन हवा में डोलें/ पेड़ नहीं चिडि़याँ कहाँ बोलें।

सात बज गए बस है आई/ तुमने ब्रैड न पूरी खोई।

बच्चा अभी नींद का मारा/ बस में फिर सो गया बिचारा।

पुस्तक में डॉ0 सुधा जी की प्रभातियाँ भी अत्यन्त सरल एवं सुन्दर हैं। मन में मिठास घोलने वाली हैं। कुल मिलाकर यह पुस्तक - ‘निंदिया ले के साथ चाँदनी आ जाना’ अत्यन्त उपयोगी है। पाठकों के हृदय में अवश्य स्थान बनाने में सफल सिद्ध होगी। मैं डॉ सुधा गुप्ता जी के उज्ज्वल भविष्य और यशस्वी होने की कामना करता हूँ।

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समीक्षक -

इं0 सन्तोष कुमार सिंह ‘चित्रनिकेतन’ बी 45,

मोतीकुंज एक्सटेंशन,

मथुरा (उ0प्र0)

मोबाइल नं0 9456882131

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