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आत्माराम यादव पीव की कविताएँ

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मुझको हँसना आता नहीं है दुख में बीता सारा बचपन, जीवन मुझको भाता नहीं है। मुझको हँसना आता - - - - छिछलेपन पर हँसने में तुम माहिर भरमाकर क...

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मुझको हँसना आता नहीं है


दुख में बीता सारा बचपन,
जीवन मुझको भाता नहीं है। मुझको हँसना आता - - - -
छिछलेपन पर हँसने में तुम माहिर
भरमाकर काम निकालने में जगजाहिर
अपना लूं तुम सा व्यवहार भाता नहीं हैं। मुझको हँसना आता - - -
जब भी जीवन में सुख की बूंदे आयी
तुमने गहरे तक उनको सोख लिया
सुख की राहे बंद हो मिथक नया ईजाद किया
पक्के धुनी हो अलमस्ती,ये राग गाना आता नहीं है। मुझको हँसना आता- -  दुख सहने का आदी हूँ
मैं कमजोर नहीं पड़ता हूँ
’’पीव’’ खुशी से दुख को गले लगाकर
मैं हरदम अपने पथ पर आगे बढता हूं
स्वप्न सँभालो सुनहले अपने, मुझको जीना आता है। मुझको हँसना आता- -


समय तू चलता चल, समय तू  चलता चल


किसने देखा आता है तू, किसने देखा जाता है तू
समा सके न इन आँखों में, यूं दबे पांव आता है तू।।
उतर रहा सूरज नभ से, समय को अपलक देखें
सागर तेरे पाँव पँखारे, धरती लिखती लेखें ।।
तेरी सूरत तेरी मूरत,दुनिया वाले न जान सके
जिन आँखों ने देखा नहीं, वे ही तेरी पहचान करें।
समय तू चलता चल, समय तू चलता चल।
जीवन सार्थक हुआ उसी का, जिसने तुझको माना
समय रहते जो सब काम किये, जीते वही जमाना ।
जहाँ आदमी ही आदमी को, पहचानने की भूल करे
समय खराब है उसका, जीवन का लक्ष्‍य ये ही तय करें।।
समय बलवान बड़ा है, नहीं बराबर उसके कोई खड़ा है
पीव एक बार गुजरे समय तो, ,नही दुबारा वह खड़ा है।।
समय तू चलता चल, समय तू चलता चल ।।

कहाँ गये पखेरू, वीरान पेड़ रोते


आज भी दरवाजा खोलते ही नजर आता है
नीम का पेड़ जो देवी की मढिया से सटकर खड़ा है
और कुछ दूरी पर एक विशाल
इमली का पेड़ हुआ करता था
जिसे चंद स्‍वार्थियों ने जड़ से काटकर
जमीन पर कब्‍जा कर विशाल भवन खड़ा किया है।
पिछवाड़े की खिड़की के खुलते नजर आता बेरी का पेड़
इमली, नीम के पेड़ पर कई परिन्‍दों का बसेरा रहा है
साँझ गये आँगन में खटिया पर लेटे
मैं देखा करता कतारबद्ध पखेरूओं को
भारी कोलाहल कर वापिस जंगल से
अपने घोसलों की ओर लौटते हुये
तब सैकड़ों की सँख्‍या में तोते, गौरैया पक्षी
इमली की शाखों पर पंख खोले पसर जाते
परिन्‍दे का घर बना इमली और नीम
सूर्य की पहली किरण के साथ ही
वे खुले आसमान में कलाबाजियाँ करते
जैसे आकाश को  छू लेना चाहते है
तेज आंधियाँ और ठण्‍डी बरसाती हवाओं में
एक दूसरे का हाथ थामने का उपक्रम करते
ये सारे पखेरू एक साथ उड़ जाते आकाश में
जिन पखेरूओं की आँखें खुली नहीं
और न ही उनके पंख आ पाये
आंधी प्राण हरण कर लेती,, उनके
उड़ न सके जो औंधे मुंह धरती पर आये।
किसी पेड़ पर अब नहीं दिखते
अब गौरैया चिड़िया और तोते
कौवे भी अब गायब हुये,
‘’पीव’’  पेड़ वीरानी में अकेले रोते।


सुझाव/सीख


विदा हुये जिला बैंक के अध्‍यक्ष
संतोष जी, हाय कितने न्‍यारे थे।
तुम भाई थे जिनके,
वे दुश्‍मन तुम्‍हारे थे।
गर्व था पार्टी को तुमपर,
तभी विजयी हुये अध्‍यक्ष बने।
कुछ आशायें,उम्‍मीदों पर,
नहीं खरे थे तुम्‍हारे सपने।
लेखा-जोखा में गच्‍चा खाया,
धोखा हुआ मिला अपयश का साया।
न समझ सके राजनीति की भाषा,
बैंक के दुश्‍मन शत्रुओं को
गले लगाकर तुमने की आशा।
यातना शिविर बनी
वह धोखे की नेपाल यात्रा।
लोकायुक्‍त में दर्ज हुई
उसकी सारी दास्‍तां।
जो पहनाकर मालायें और
भेंट करते थे तुमको फूल।
वो शूल तुम्‍हारे थे ,
जो तम्‍हारी आँखों में ड़ालते थे धूल।
कुर्सी पर चिपके तुमने,
जो अपनों को विसराया है।
समझाईस को अनसुना कर
संतोष ने धोखा खाया है।
हुकुमत तय करे और
जब दे गुनाहों की सजा।
दुआओं ने हाथ उठा लिया,
शायद हो दाता की यही रजा।
आकर बैंक में जितना कमाया
धन तो मिट रहा,अपयश आया।
हुई उम्‍मीदों की झोली खाली
संतोष टूटे सपनों को जोड़ रहा है।
समय ने दिये जो उसे गहरे घाव
अवसाद में दिल अपना निचोड़ रहा है।
दिया नहीं पर पाटिल सुख चाहता
संतोष के हिस्‍से आया बस दुख ही दुख
पीव जिला बैंक का अध्‍यक्ष भी यह जाने
यश पताका उसकी फहराती
न हो जो बैंकहित से कभी विमुख।
 

त्रिशंकु का राज


भरत बुन रहा है सपनों का जाल
दुबे काट रहा सपनों के धागे, भरत की हुई अब धीमी चाल।
रामचन्‍द ने बाधक बन सूत्र पिरोये
मालकसिंह भी बहती गंगा मे हाथ धोये
हायकोर्ट ने मेटी नहीं है, मालक-रामचंद की अर्जी तत्‍काल।
आसमान से गिरे,खजूर पर अटके,
पार्टी-संगठन से मिले खूब झटके
त्रिशंकु बैंक के अध्‍यक्ष हुये पहले,शक्तिहीन हुआ भरत का भाल।
कैसे अपना कर्तव्‍य निभाना,
कैसे अपने मन को समझाना
पीव कब जंजाल हटेगें, कब साकार होगा,भरत के सपनो का जाल ।
माना भरत,मैं हू पतझर का एक जर्जर पत्‍ता
महाप्रलय,तूफानों में कायम रखता हू अपनी सत्‍ता
दंभ हुआ जब संतोष को खूब,,कुरेदी थी मैंने उसके दुर्बल मन की चाल ।
क्‍या लाना,क्‍या ले जाना
अंत समय हुआ खूब पछताना
संतोष के सपने टूटे तो,अध्‍यक्ष बने पूरे हुये सपने, भरत हुआ खुशहाल।।

दान...;


उतारो उतारो आज तुम जिस्‍म से
अपनी खूबसूरत
आत्‍मा का यह गहना
उठो दुआयें देकर यमराज को,
यह आत्‍मा दान दे दो।
बनाकर भेजी थी
विधाता ने तेरी निराली सूरत
जिस्‍म इंसान का देकर,
गढी गजब की मूरत
उठो प्रार्थनायें गाकर अपने प्रभु को,
इन साँसों का आभार दे दो।
आज मगरूर है कितना,
तेरा बनाया इंसान
लेकर कंचन सी काया,
बनता धरती की शान
उठो निशब्‍द मौन श्‍मशान को,
अपनी काया का अग्निदान दे दो।
अखण्‍ड़ राज्‍य सारे जगपर जिनका था,
अब उन नामचीनों की शान कहाँ है
क्‍यों इतरावे शान बघारने वालों,
यह दुनिया बस एक धुआं- धुआं है।
पीव उतारे केचुली विषधर जैसे,
झूठे मिजाज रिवाज को तुम उतारा दे दो।

जब वह ईश्‍वर से रूठ जाती है…..


वह घर के कोने में बैठी
खुद से बातें करती रहती है।
आँखों में अश्रुधार लिये
खुद अंजानी पीड़ा सहती है।
सास-श्‍वसुर और ननदे-नंदोई
इनसे उदासी रख बनी निर्मोही।
देवर-देवरानी और जेठ-जिठानी
बेरूखी इनकी उसने जिद ठानी।
तनहाई में जीना, खुद आँसू पीना
आँखें मींचे, खुद-से बातें करना।
बातें पुरानी, घर की कहानी
उसको सताती है, खूब रूलाती है।
प्‍यासी रही बरखा,बीते कई सावन
जियरा उदास रहा,मिले न मनभावन।
मन में धड़कती, मिलने की आस
पगली ये कहती, पिया आओ न पास।
खुश रहे सदा वह, इसी ख्‍याल में जीना
अपनी उदासी छिपाके,अपने आँसूं पीना।
इस जीवन में खिलखिलाकर,कभी हँसी हो,
गुजरे जमाने की या बात उस सदी की हो।
वह खुद इन बातों को मन ही मन दोहराती है
पड़िहार कहते देवी माँ की छाया है तन,मन पर
आने न दूंगी किसी देवी को,वह बुदबुदाती है।


अभी जिंदा हूं खुद मन को बताना


अभी मरी नहीं हूं यह जतलाना
खुदसे कहना, घर को जाती हूं मैं
खुदसे कहना, घर को आती हूं मैं
खुद से कहना, खाना खा लिया क्‍या
खुद ही कहना, अभी कहां,खाती हूं मैं।
जब भी घर में अकेली होती है,
वह सभी काम कर रोती है
बर्तन-कपड़े साफ करना
खाना पकाना और खिलाना
एक मशीन वह बन जाती है
तकदीर उसकी दवा बनी,
दवा छोड़ वह खुद पछताती है।
बेटा-बेटी के घर में होने पर भी
वह तनहाई में खुदको ले जाती है
दिन बदले, मौसम बदले और
पीव बीत गये जीवन के कई साल
खुशमन रखना चाहे सभी पर
उदासी में रहता उसका बुरा हाल।
ईश्‍वर भक्ति में शक्ति नहीं है
भक्ति में ड़ूबी, खुद बड़बड़ाती है
ईश्‍वर को स्‍नान कराना, वस्‍त्र पहनाना
नित पूजाकर मन से भोग लगाना,
उसे यह बात अब कतई नहीं सुहाती है
पीव दुनिया से वह टूट जाती है
वह जब ईश्‍वर से रूठ जाती है।

मेरी बिटिया रानी


मेरे घर जन्‍मी मेरी बिटिया,
जैसे कोई नन्‍ही सी परी हो।
छोटी सी प्‍यारी मेरी बिटिया
जैसे गुड़िया कोई फूल सी हो।
दिल की सच्‍ची मेरी बिटिया
सबसे बातें करती न्‍यारी न्‍यारी।
तुतलाती कोमल हाथों वाली,
दिल चुराती बिटिया मेरी प्‍यारी।
गिरती सँभलती, नन्‍हें पैरों वाली
ऊगली मम्‍मी की थामे मेरी बिटिया।
दादा दादी ओर मम्‍मी की है दुनिया सारी
पापा की है राजदुलारी, मेरी बिटिया रानी।
हुई घर में सयानी , भाईयों की अभिमानी
बातों में सबकी नानी, मेरी बिटिया रानी।
खिलाये वही जो सबको भाये, बेटी हुई स्‍वाभिमानी।
पीव पराये घर जब , बिटिया लेखा जायेगी
तब मम्‍मी पापा को, वह बहुत रूलायेगी ।
आँखों में होंगे खुशी के आँसू, ऐसा नेह लगायेगी
देंगे सुखमय जीवन का सब आशीष, सुन मेरी बिटिया रानी।


बोलिये…. प्‍यारी-प्‍यारी बोलियाँ...


अब कहाँ बोली जाती है,
लोगों में रसीली बोलियाँ
जहाँ देखों वहीं मिलती है,
लोगों में बनावटी बोलियाँ ।
भले प्रेमियों की आँखों में बँसी हो,
प्रेमसनी अनकही बोलियाँ
भले नाते-रिश्‍तों में घुली हुई हो,
मिश्री सी मीठी बोलियाँ।
बिखरे से है सभी साबुत लोग,
बोलते है आपस में अटपटी बोलियाँ।
व्‍हाटसअप’-फेसबुक के हजारों मित्र ,
खुद महारथी बन, बोलते है तर्क-कुतर्क की बोलियाँ।
इलेक्‍टानिक मीड़िया के समाचारवाचक भी
रात-दिन बोलते है, संभावित खबरों की बोलियाँ।
’’पीव’’ यहाँ है सबकी अपनी’ अपनी बोलियाँ।
चाद-तारे, धरा आकाश में, अनहद गूंजती है बोलियाँ
दिन-रात, सुबह शाम रूनझुन की है सुरीली बोलियाँ।
दिल की तनहाई में, आँखों की गहराई में
नशीली है, सुरीली है, खटटी है मीठी है, सारी बोलियाँ।
सच्‍चे थे,अच्‍छे थे,मिलजुल कर सब रहते थे
इंसानियत थी,इंसान थे,तब बोली जाती थी सच्‍ची बोलियाँ।
’’पीव’’ भूले है, बिसरे है,हम जाकर जहाँ ठहरे हैं
कीर्ति और धन का नशा,राजबल से छल का नशा
छोड़कर इंसान बनो,बोलिये तब प्‍यारी प्‍यारी बोलियाँ।

----.

एक 


थकान
बहुत छायी,खूब छायी,
जीवन में उदासी
हताश मन,बोझल तन,
ड़ूबी है बोझ से जिन्‍दगी उबासी।
हैरान है,परेशान है,
जीवन के रास्‍ते,
हम बहुत थके,
खूब थके, जिन्‍दगी तलाशते।
हाथ थके,पाँव थके, थके सारे अंग,
श्रद्धा थकी, विश्‍वास थका, थका जीने का ढंग।
उम्‍मीद थकी, इंतजार थका,
कल्‍पनाओं का आकाश थका
मान थका,सम्‍मान थका,
जीवन का हर सोपान थका
शब्‍द थके,ज्ञान थका, पक्षियों का गान थका,,
आज नाच भूल गया, अपने सारे राग-रंग।
शांति थकी, राग थका,साधुओं का वैराग्‍य थका,,
तीर्थ थके, ग्रन्‍थ थके, पुजारी और संत थके,
औषधि थकी, मधु थका, अमृत का हर कण थका,,
अब जहर को भी आ गया, नये जीने का ढंग।
वृक्ष थके, सुमन थके, बीजों के हर अंकुरण थके,
पूजा थकी, यज्ञ थका, देवों का नैवेद्य थका
योग थका, मोक्ष थका, यम का यमलोक थका,
भूल गया आदमी आज अपने जीने का ढंग।
किरणें थकी,धूप थकी, रोशनी भी खूब थकी,,
मृदंग की थाप थकी,वीणा की झंकार थकी
कान्‍हा की मुरली थकी,राधा का इंतजार थका,
समाधि का तत्‍व थका,ब्रम्‍ह का ब्रम्‍हत्‍व थका
जीवन का अस्‍तित्‍व थका, शिव का शिवत्‍व थका,
कृपा थकी, वरदान थका,आशीर्वादों का परिणाम थका
पीव देव हो गये है जैसे सारे अपाहित अपंग।
देह को गलाये चला, काँटों पर सुलाये चला,
शत्रुता बढ़ाये चला,,दिल में आग जलाये चला
स्‍वार्थ में ड़ूब गया, बनकर हर आदमी मलंग।
आदर्श को गाढ. दिया, पाखण्‍ड़ को ओढ़ लिया,
सच को दबा  दिया,झूठ को अपना लिया
थोप लिये क्रियाकाण्‍ड़ व्‍यर्थ के ढ.कोसले,
अब डसने को बन गया खुद आदमी भुजंग।
स्‍वार्थ को ताज मिला,ईमान बैठा रोता, 
रोगों को पंख लगे,इलाज कहाँ होता?
धर्मभूमि भारत से,हमने धर्म को खदेड़ा, 
पाश्‍चात संस्‍कृति ने डाला है अपना ड़ेरा।
आदमियत ही आदमी में, सदियों से हो गयी है बंद

      दो

आदमी की कोई हद न रही
जाने ये क्‍या हद हो गयी ?
कि आदमी की हद सरहदों में खो गयी
सरहद बना ये आदमी,आदमी है कहाँ
खोखला उसका वजूद और झूठा उसका जहाँ,
सगे भाईयों के बीच,आपस में ठनी हो गयी,
आंगन में लगी बाँगड़., और घनी हो गयी ?
जाने ये क्‍या हद हो गयी
कि आदमी मुस्‍कान गमों में खो गयी 
चेहरे पर खिलती थी कभी उसके मुस्‍कान
गिरगिट सी रंग बदलती है अब उनके मुस्‍कान
स्‍वार्थ में हाय ये मुस्‍कान बिखर गयी
आदमी की मुस्‍कुराहट, अब आदमी की नहीं रही?
जाने ये क्‍या हद हो गयी ?
कि आदमी की आँखों की चमक अंधेरे में खो गयी
आँखों में उसकी कभी रहती थी जो मासूमियत
लरजते थे आँसू,प्‍यार की देने को शहादत
जुल्‍म ढाती अब उसकी आँखें,अब शैतान हो गयी
हाय आदमी की आंखें, निर्दोषों के खून की प्‍यासी हो गयी।
जाने ये क्‍या हद हो गयी ?
कि आदमी की जिंदगी, हादसों में खो गयी
कभी फूलों की तरह महका करती थी जिंदगी
श्रद्धा से नतमस्‍तक करती थी वन्‍दगी
आदमी की जिन्‍दगी एक हादसा हो गयी, गर्दिशों की मानो वह बादशा हो गयी।
जाने क्‍या हद हो गयी ?
कि आदमी की जिंदगी समयचक्र में खो गयी
कभी समय के साथ, जो चला करता था आदमी
आज टूटती बिखरती वो जिन्‍दगी की माला है आदमी
समय के हाथों दो कौड़ी का खिलौना है आदमी
निगल रहा है कालचक्र, हाय चुन चुन कर आदमी।
आज के आदमी के आगे,मजहब की कोई शान न रही
शानो-शौकत से जी रहा है,वह मजहब को राजीखुशी
मजहब के नाम पर, वह फसाद करा रहा है
सच्‍चे मजहब का मतलब वह कुछ और बता रहा है।
आदमी, आदमी की आन को मिटा रहा है आदमी
आदमी, आदमी में छिपे भगवान को मिटा रहा है आदमी ।
जाने क्‍या हद हो गयी ?
कि आदमी की आन,अब मजहबों में खो गयी
कभी मजहब का होकर, जो गया था आदमी
आज तक लौटा नहीं, वह मजहब का आदमी
पीव पहचान उसकी, खुदा से जो हो गयी।
खुद खुदा हो गया, वह मजहब का आदमी।

तीन-

परिवर्तन के झुनझुने
परिवर्तन के झुनझुने
कुछ हमने बजाये हैं
बेसहारा मजबूर के चेहरे
सुनकर मुस्‍काये हैं
दबा दिये तुमने सारे स्‍वर
कुछ ऐसे भूकम्‍प जगाये हैं।
जनक्रान्‍ति के गीत
कुछ हमने गाये हैं
पराधीन भावुक मन ने
अपने मन में सजाये हैं
पुराने कानों के परदों ने
कुछ जलभुनकर ठुकराये हैं।
अरमानों के ज्‍वालामुखी
कुछ हमने जगाये हैं
सूखे आँसू की जलती आँखों ने
अभावों से भी शीतल बताये हैं
सब अपनों ने ही खरीद लिये
कुछ ऐसे धन के अंबार लगाये हैं।
महाप्रलय की अंधड़ आँधी
कुछ हमने चलायी हैं
उखड़. जाये सब अंधविश्‍वासी ड़ूंड़
देख नवचेतना हर्षायी हैं
सब फूटते अंकुरों को दबा दिये
कुछ ऐसे ही ड़ूंड़ों ने रोक लगायी हैं।
घायल दिल के युवकों को
कुछ हमने सहलाया है
अतीत की उफनती लहरों ने
भँवर में भविष्‍य को फँसाया है।
अंधेयुग के आकाओं ने
कुछ ऐसे ही सदियों से ड़ुबाया है।
पथराई हुई आँखों को
कुछ सपने हमने दिखाये हैं
अन्‍यायपूर्ण हरकतों-दलीलों से
वे अभी भी पथराये हैं
बुदबुदाते हताश-उदास वे
कुछ ऐसे ही चीखे चिल्‍लाये हैं।
परिवर्तन के झुनझुने कुछ हमने बजाये हैं।

चार-

सोये हुये नादानों जागो
ओ सोये हुये नादानों जागो,
ओ भारत की संतानों जागो
परिवर्तन का सूर्य उगा है,नीदं भगाओ लम्‍बी न तानों।
ओ माझी तूफान से लड़.ने वाले
देश सारा ड़ूब रहा है उसे बचाले।
तोड़. सभी रूढि.यों की कच्‍ची रस्‍सी
इन रस्‍सियों को, आज जरा आजमाले।
परिवर्तन का तूफान उठा है, पतवार उठाओं बाधमान तानों।
सगाई मगनी छोड़.छुटटी
बंद से बहुत रही आपस में कुटटी
बाहर करते आये मन-मरजी
घर में भले रहे नाराजी।
अपना घर तो सँभाल न पाये, दूजा घर क्‍यों तोड़ने की ठानों॥
अहंकार की झूठी शान ने
गरीब कमजोरों को नहीं छोड़ा है
पंच-परमेश्‍वर पंचायत ने
भ्रष्‍ट चरित्र को ओढ़ा है।
पंचायत की मर्यादाओं को, आज बचाओ ओ परवानों।
दूध के लिये बच्‍चे अकुलाते
शराब पीकर तुम मस्‍ताते
नाच रही है घर-घर में भूख
तुम नवाब बने इतराते खूब।
नवाब बनने से पहले, बनो श्रमिक घर इन्‍द्रासन तानों।
दगावाज मक्‍कारों ने
खूब बंबड़र मचाया है
निर्माण करो फौजी अरमानों को
इससे जुल्‍म का ठेकेदार घबराया है
राह के काँटे हटा के यारो, फूल बिछाने की तुम ठानों।
खिसियानी बिल्‍ली सी तुनक मिजाजी छोड़ो,
उछलकूद बंदरवाजी छोड़ो,
देश तोड़.ने वालों के सिर फोड़ो
परिवर्तन के हर अटके रोड़े तोड़ो।
भेड़िया नहीं शेर बनो तुम, बनो फौलादी जंगवानो।
इंसानियत की लाश बिछायी
आज धर्म के ठेकेदारों ने
संवेदनाओं में आग लगायी
घर के भेदी मक्‍कारों ने
आग बुझाओ दिल को मिलाओ,संगठित होने का प्रणठानों।
अक्‍ल के अंधे अज्ञानियों को
तुमने ताज पहनाया है
ज्ञानी बैठा सुबक रहा है
जोर उसने अपना आजमाया है।
जरा तो चेतो अज्ञानियों से,ज्ञान को सबल बनाओ ओ ज्ञानवानों।
नेतृत्‍व यहाँ बीमार पड़ा है
कुछ अलग बनाओ अपना तकाजा
कहीं अर्थी न उठानी पड़. जाये
उसमें मिलाओ अपना खून ताजा।
समय तुम्‍हें पुकार रहा है,निष्‍ठा लाओ ओ नेतृत्‍ववानो।
   

        पाँच

जो करना है अभी करें, आज के दिन
दिल में नये अरमान बसायें,आज के दिन।
दिल को गूंचे की तरह खिलायें, आज के दिन॥
फूलों की तरह हँसे-हँसायें, आज के दिन।
बादल की तरह झूमे-छा जायें, आज के दिन॥
मुस्‍कान की बरखा में नहायें,आज के दिन।
कलियों की तरह खिल जायें, आज के दिन॥
भँवरों की तरह भनभनायें, आज के दिन।
झरनों सा कल-कल बह जायें, आज के दिन॥
अमावस्‍या के अंधेरे से समा जायें, आज के दिन।
सन्‍नाटे के दिल को छू जाये, आज के दिन॥
रात के मस्‍तयौवन में सो जाये, आज के दिन।
ऊषा के गुलाबी पलक खोलें, आज के दिन।
ओंस कणों सा दूब पर छा जायें, आज के दिन॥
ज्‍योतिर्मय किरणों को जगायें, आज के दिन।
नाजुक कलियों के पाँखों को छू लें, आज के दिन॥
आकाश-धरा की ध्‍वनि में झूलें, आज के दिन।
छोटा सा है जीवन मैने जाना, आज के दिन।
सागर से गहरे सपने मैंने जाना, आज के दिन॥
झूठा दंभी अहंकारी हूँ मैंने जाना, आज के दिन।
हूँ दो पल का मेहमान क्‍यों न समझा, आज के दिन
मौत ले लेगी प्राण क्‍यों न समझा आज के दिन॥
पीव करें तैयारी मौत संग जाने की, आज के दिन।
बिखर जायेगी श्‍मशान में देह की राख, आज के दिन॥
    

         छह

प्‍यास
ओ कुम्‍हरे तू बना ही देना,
मेरी देह को  एक  गगरिया।
फूटी हो न रिसे कहीं से,
थ्‍जसे सावत रखु में सारी उमरिया।
जीवन की अंतिम साँसों तक अमृत भर लूँ
गागरिया को कर दूँ
जैसे मैं पूनम की चांदनिया।
रे जितनी खाली हो,
उतना अंधेरा अंतरमन में
ज्‍योति जलाकर,
पीव फेलाये ज्‍योतनिया।

सात -


खाली हाथ
सारी रात
नींद आँखों से कोसों दूर है
ख्‍यालों का पुलिंदा
मधुर पल की चाह में
एक पल के लिये
जीने को उत्‍सुक है।
नितांत अकेला,
कुर्सी पर बैठा आदमी
विचारों में ड़ूबा
तलाश रहा है उस पल को
और वह मधुर पल
उसके हाथों से खिसक कर
बहुत दूर असीम में
सरकता हुआ चला जा रहा है।
ख्‍यालों के पुलिन्‍दे की परतें
कुर्सी और आदमी के चारों ओर
ढेर बनी उन्‍हें दबा रही है
और हाथ न आती उन परतों को
पीव वह आदमी, प्‍याज की तरह
परत दर परत छीलने को विवश है
उसके मिट जाने तक।

आठ-

पहनी है धरती ने ज्‍योति की पायल
आज आसमाँ से ये जाकर कह दे कोई
सितारों की महफिल कहीं और सजायें।
पहनी है धरती ने ज्‍योति की पायल,
दीपों के घुंघरू, स्‍वर झाँझन सुनायें।
खैर नहीं तेरी ओ अमावस्‍या के अंधेरे
धरती से उठा ले तू आज अपने ड़ेरे।
रोशनी को देख अंधेरा थरथराया
खूब चीखा पटाखों में, अंधेरे का हुआ सफाया।
झूमकर नाची है दीवाली, आज बनकर दीवानी
मानो पड़.नी है शादी की, उसकी भाँवरे रूहानी।
नहाती है रजनी,प्रभाती कुमकुमी उजाले में
आती है दीवाली लिये,कई नई सौगातों में।
खुशियाँ से बजने लगी,आज मन में शहनाईयाँ
स्‍वप्‍न सारे टूट गये, विश्‍वास ने ली अंगड़ाईयाँ।
फूलों की मुस्‍कान सा, आज संगीत सजा है
प्‍यार की तरंगों का, नया गीत जगा है।
पीव खोली है आँखें,मन चेतना लहरायी है
खुशियों को पंख लगे, ज्‍योति दीपक में आयी है।


रचनाकार ...आत्माराम यादव पीव  (वरिष्ठ पत्रकार)
ब्‍यूरो, हिन्‍दुस्‍थान समाचार एजेन्‍सी, होशंगाबाद
पता- के-सी- नामदेव निवास, द्वारकाधीश मंदिर के सामने,
जगदीशपुरा वार्ड़ नम्बर -2 होशंगाबाद मध्यप्रदेश

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रचनाकार: आत्माराम यादव पीव की कविताएँ
आत्माराम यादव पीव की कविताएँ
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रचनाकार
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