पत्‍थर तराशकर हीरा निर्माण की कथा // प्रमोद भार्गव

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आजकल हीरों के गहनों का व्‍यापार करने वाले चंपत हुए व्‍यापारियों की खूब चर्चा है। करीब 1400 करोड़ रुपए का पंजाब नैशनल बैंक को चपत लगाने वाले नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी देश से पलायन कर गए हैं। इन लोगों ने तो देश को आसानी से चूना लगा दिया , लेकिन जरा उन हीरा उत्‍खनन करने वाले मजदूरों की भी पड़ताल करें जो पसीना बहाकर हीरे में चमक लाते हैं।

भूगर्भ में कार्बन का शुद्धतम रूप हीरा है। मन को प्रफुल्‍ल करने वाली अनूठी और बेशकीमती दौलत है हीरा। और इस जगमग हीरे की खानें हैं विश्‍व प्रसिद्ध पर्यटन स्‍थल खजुराहो के आसपास। पन्‍ना जिले के ग्राम मझगांव और छतरपुर के ग्राम बंदर में हीरे की विश्‍व प्रसिद्ध खदानें हैं। इन्‍हीं खदानों के गर्त में दबा पड़ा कोयला कई जटिल क्रिया प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद चमचमाता और चकाचौंध करता स्‍वच्‍छ एवं सुस्‍पष्‍ट हीरा के रूप में परिवर्तित होता है। कभी आंध्रप्रदेश की गोलकुंडा और कुलूर की खानों से भी हीरे निकाले जाते थे, लेकिन अब ये खानें इतिहास की दंतकथाएं भर रह गई हैं। भारत में वर्तमान में केवल पन्‍ना और छतरपुर में ही हीरे की खानें हैं, जो भारतीय खनिज विकास निगम के अंतर्गत हीरा उत्‍पादन के कार्य से जुड़ी हैं। किंतु अब इन खदानों का भी निजीकरण कर 60,000 करोड़ रुपए के हीरे निकालने की योजना बनाई जा रही है। आस्‍ट्रेलियाई कंपनी रियो टिंटों इन क्षेत्रों की 490 हेक्‍टेयर भूमि में हीरा उत्‍खन्‍न की तैयारी में है। हालांकि अकेले छतरपुर में ही निगम ने 958 हेक्‍टेयर क्षेत्र में हीरा होने की उम्‍मीद जताई है। भारत के अलावा दुनिया के 20 अन्‍य देशों में भी हीरे की खदानें हैं।

खानों में हीरा की तलाश कर उसे कैसे तराशा जाता है, यह जानने से पहले थोड़ा हीरे के इतिहास के बारे में जान लें। हीरा यानी एक रत्‍न, जो पत्‍थर की एक जाति है और अमूल्‍य व दुर्लभ है। हीरे को संस्‍कृत में हीरक, चंद्र, मणिवर, वज्रक, हीर, रत्‍नमुख्‍य, अभेद्य आदि नामों से जाना जाता है। इसे हिंदी में हीरा, बंगाली में हिरे, मराठी में हिरा, गुजराती में हिरों, कन्‍नड,़ तेलगु व तमिल में वज्र, फारसी में इल्‍माश, अंग्रेजी में डायमण्‍ड और लैटिन में प्‍यूकार्बन एडमस कहते हैं।

अंग्रेजी का डायमण्‍ड शब्‍द यूनानी शब्‍द एडमास से निकला है। जिसका अर्थ है, अविजयी, अविजित। अर्थात जिस पर विजय न पाई जा सके। वास्‍तविकता भी है कि हीरे को हीरे के अलावा कोई दूसरी धातु नहीं काट सकती। ‘एडमास‘ संस्‍कृत के अभेद्य शब्‍द का भी पर्याय है, जो संस्‍कृत साहित्‍य में हीरे के लिए प्रयुक्‍त होता है।

हीरे के व्‍यापार व इसके अभूषणों में इस्‍तेमाल की परंपरा बहुत पुरानी है। एक जमाना था जब पूरी दुनिया में भारत की गोलकुण्‍डा (आंध्रप्रदेश) खानों से हीरे निर्यात किए जाते थे। पंदहवीं शताब्‍दी तक हीरों के गहने केवल राजा-महाराजाओं के उपयोग तक सीमित थे। यूरोपीय देशों में फ्रांस ही एकमात्र ऐसा देश था, जो आधुनिक फैशन व अभूषण अपनाने में अब्‍बल था। सन्‌ 1734 में यहीं की एक ऐगन्‍स सोरल नाम की धनाढ्‌य महिला ने हीरे के गहने पहनकर राजा-महाराजाओं के मिथक को तोड़ने का दुस्‍साहस कर तहलका मचाया। कालांतर में धनी व संभ्रात महिलाओं में हीरे के गहने पहनने ही होड़ सी लग गई और हीरा स्‍तरीय जीवन का प्रतीक बन गया। इससे फ्रांस व अन्‍य यूरोपीय देशों में हीरे की मांग बढ़ गई और भारत लगातार तीन सौ साल तक इन देशों में हीरों की आपूर्ति करता रहा।

इसी प्रकार फ्रांस के टैवर्नियर नाम के रत्‍नों के एक व्‍यापारी ने सन्‌ 1688 में भारत की यात्रा की इस यात्रा में उसने गोलकुंडा खानों में हीरे का उत्‍खनन किए जाने का वृत्तांत इस प्रकार किया है, ‘दक्षिण भारत के गोलकुंडा से लेकर कुलूर तक हीरे की खानें हैं। कुलूर की खानों से सौ साल से हीरा निकाला जा रहा है। इस धंधे से 50 हजार मजदूर जुड़े हुए हैं। खानों में पुरूष खुदाई करते है, और स्‍त्रियां व बच्‍चे मिट्‌टी और पत्‍थर अलग करते है।

सन्‌ 1233 में ब्राजील में हीरे की खान-खोज निकाली गई और करीब 138 साल तक ब्राजील हीरे की भरपाई करता रहा। 1988 में दक्षिण अफ्रीका में अनायास एक किसान के लड़के को खुदाई करते हुए हीरा मिला। इस हीरे को ‘स्‍टार आफ अफ्रीका‘ नाम दिया गया। यह हीरा क्रय-विक्रय होता हुआ अंग्रेजों के हाथ लगा। बाद में अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका में हीरों की खानों की पड़ताल की और सन्‌ 1993 में डी-बियर्स कंपनी ने इस कार्य में कामयाबी भी हासिल की। ये खानें हीरे की दुनिया का सबसे बड़ा खजाना साबित हुईं। रूस के यूराल पर्वत और आस्‍टे्रलिया में भी हीरे की खाने प्रचुर मात्रा में खोज निकाली गईं। वर्तमान में अफ्रीका, आस्‍ट्रेलिया और रूस ही हीरे के प्रमुख उत्‍पादक राष्‍ट्र हैं। नए शोधों से प्रमाणित हुआ है कि हीरा प्राचीन भारत में भारतीय आर्यों ने सबसे पहले खोजा और इसकी महत्ता को परखकर प्रयोग शुरू किए। लेकिन हीरे का गहनों में इस्‍तेमाल सबसे पहले इटली की राजधानी रोम में शुरू हुआ। यह घटना ईसा से करीब चार सौ साल पहले घटी, ऐसा माना जाता है।

मध्‍य प्रदेश की हीरा खानों से दौलत के अद्‌भूत पाषण को निकालने के लिए करीब डेढ़ हजार मजदूर रोज ठेकेदारों को पट्‌टे पर दिए गए जमीन के टुकड़ों में खुदाई करते हैं। जमीन का पट्‌टा भारतीय खनिज विकास निगम द्वारा दिया जाता है, जिसके सर्वेसर्वा पन्‍ना और छतरपुर के पदेन जिलाधीश होते हैं। यह पट्‌टा ठेकेदार को मात्र 25ग25 का दिया जाता है, जो केवल 625 वर्गफीट का होता है। ठेकेदार से इसका प्रीमियम शुल्‍क भी लिया जाता है। खुदाई में हीरे की प्राप्‍ती होती है तो उस पर 10 फीसदी हक ठेकेदार का होता है और 20 फीसदी सरकार अथवा निगम का। किंतु अब खदानें एक मुश्‍त ठेके पर देने की परंपरा शुरू करने की तैयारी में प्रदेश सरकार आ गई है।

हीरों की खोज के लिए जिन गड्‌डों में उत्‍खनन किया जाता है, उन गड्‌डों का इलाका भुरभुरी एवं दोमट मिट्‌टी का होता है। इस मिट्‌टी के बीच-बीच में कार्बन की कठोर चट्‌टानें होती हैं। इसलिए इनकी खुदाई बेहद कठिन होती है। यदि हीरा के पारखियों को हीरे की उम्‍मीद दिखती है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा 20 फीट गहरे गड्‌ढे खोदकर ही हीरा मिल जाता है। खदान के गड्ढों से निकाला गया चट्‌टानों का करीब 500 टन चूरा एक निश्‍चित स्‍थान पर एकत्रित किया जाता है और फिर पत्‍थरों के इन टुकड़ों को कूटा व तोड़ा जाता है। कुटाई का यह कार्य सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच मजदूर करते हैं। यहां कटीले तारों की बागड़ लगी रहती है और बंदूकधारी पहरेदारी के लिए मौजूद रहते हैं।

पत्‍थर तोड़ने के इस दुष्‍कर कार्य के बीच हीरे के पारखी कारीगारों को अपनी निगाहें चौकस रखनी होती हैं और पत्‍थर से हीरे को अलग करने का काम केवल एक हाथ से करना जरूरी होता है। मजदूरों का दूसरा हाथ पीठ के पीछे कर दिया जाता है, जिससे यकायक हीरा निकलने पर उसके चोरी किए जाने की संभावनाएं जाती रहें। इस तरह से पांच सौ टन चट्‌टानों की हाड़तोड़ तुड़ाई के बाद बमुश्‍किल दस-बराह ग्राम हीरा चूरा मिलता है।

इन चट्‌टानों से मायावी पाषण के रूप में जो हीरा निकलता है वह कार्बन का कठोरतम आकार होता है। इस कच्‍चे हीरे का रूप साधारण गोल, लंबे अथवा अण्‍डाकार मुलायम पत्‍थर के जैसा होता है। बाद में इस साधारण पत्‍थर को कारीगरों के अनुभवी हाथ तराशकर इन्‍हें भांति-भांति के हीरों के रूप में आकार देते हैं। ये सभी आकार ज्‍यामितीय होते हैं। तराशने की सूक्ष्‍मतम प्रक्रिया से हीरा 10 से 12 बार मक गुजरता है। हालांकि पहले हीरे के टुकड़ों को केवल 22 कोणों तक ही तराशा जाता था। इससे हीरा खिल जाता है और इसके मूल्‍य में इजाफा हो जाता है। तराशने का काम अब मशीनों से भी होने लगा है, लेकिन हीरे के व्‍यापारियों व पारखियों का मानना है कि हीरे तराशकर जो जान कारीगर डालते हैं, वह मशीन से कदापि संभव नहीं है। तराशने के बाद हीरे पर पॉलिश की जाती है। हीरे के कारखानों में हीरे पर पड़े दागों को लेजर किरणों से भी साफ किया जाने लगा है। आखिर में इनका नामाकरण कर मूल्‍य निर्धारित किया जाता है। इनके नाम होते हैं, गुलाब, नाशपाती, ब्रिलिएंट, बादाम, अष्‍टकोण, ओवल, दालदाना और कार्बोशन इत्‍यादि।

भारत की आजादी के बाद से पन्‍ना की हीरा खदानों से हीरा उत्‍खनन का काम पूरी तरह भारतीय खनिज विकास निगम ने संभाला हुआ है। इसके पहले व्‍यापारी ही पन्‍ना रियासत को कर चुकाकर हीरा उत्‍खनन का कार्य करते थे। इन खदानों से सरकार को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ की राजस्‍व की वसूली होती है। बवजूद हीरा खानों में काम करने वाले मजदूरों की हालात नितांत दयनीय है। इन मजदूरों को पांच-छह हजार रुपए प्रतिमाह मजदूरी मिलती है। इसके ऐवज में इन्‍हें सुबह आठ बजे से शाम 3-4 बजे तक खटना पड़ता है। हीरे को पत्‍थर के टुकड़े से चुनते वक्‍त हथौड़ा पीटते-पीटते इनके हाथों में छाले पड़ जाते हैं और प्रक्रिया से जो धूल के कण उड़ते हैं, वे इनके मुंह से शरीर में प्रवेश कर इन्‍हें दमा, खांसी और क्षय रोग के स्‍थाई रोगी बना देते हैं। खानों पर प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र की व्‍यवस्‍थाएं नहीं है। जिला प्रशासन यहां धनाढ्‌यों के लिए डायमंड पार्क के निमार्ण और हीरा तराशने व पालिश करने के संयंत्र लगाने की कोशिशों में तो लगा है लेकिन मजदूरों के हित साध्‍य के लिए प्रशासन की कोई योजना प्रस्‍तावित नहीं है।

खानों से हीरा निकाल लिए जाने के बाद सरकार इसकी निलामी करती है। नीलामी मुंबई अथवा पन्‍ना में की जाती है। नीलामी में व्‍यापारी बोली लगाकर हीरा खरीदते हैं। हीरा व्‍यापार के प्रमुख केंद्र सूरत, जयपुर, नवसारी और पालनपुर में हैं, मुंबई हीरा व्‍यापार और तस्‍करी का अंतरराष्‍ट्रीय केंद्र है। पूरी दुनिया में अकेला भारत हीरे का 80 फीसदी उत्‍पादक राष्‍ट्र है। लेकिन हीरे के कारोबार में लंदन की डी-बिर्यस कंपनी का 14 फीसदी दखल है। 1966 तक भारत केवल 11 करोड़ रूपए के हीरे के निर्यात करता था, यह निर्यात अब पचास हजार करोड़ रूपए से ऊपर पहुंच गया है। भविष्‍य में इसके और बढ़ने की संभानाएं हैं।


दुनिया में विश्‍व प्रसिद्ध हीरे

कोहिनूर- दुनिया का सबसे मशहूर हीरा भारत का कोहिनूर है। 1304 में एक भारतीय राजा के पास यह हीरा था। सोलहवीं सदी में मुगल सम्राट बाबर ने इसे हथिया लिया और यह मुगल शासकों के राजसिंहासन तख्‍ते-ताऊस की शोभा बना रहा। इस समय यह हीरा आठ सौ कैरेट का था। इस हीरे के साथ इसी समय यह अवधारणा भी जुड़ गई कि जिस व्‍यक्‍ति के पास यह हीरा रहेगा, वह इस कोहिनूर के रहने तक सम्राट बना रहेगा। लिहाजा इस हीरे को पाने के लिए नादिरशाह ने दिल्‍ली पर हमला बोल दिया और मुगलों को परास्‍त कर कोहिनूर नादिरशाह के कब्‍जे में आ गया। नादिरशाह से यह हीरा महाराजा रणजीत सिंह के कब्‍जे में आ गया। रणजीत सिंह के हाथों से निकलकर लाहौर पहुंचा। जहां सन्‌ 1850 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने इसे ब्रिटेन की साम्राज्ञी विक्‍टोरिया को भेंट किया। आज भी यह काहिनूर ब्रिटेन की महारीनी के राजमुकुट की शोभा बना हुआ है, किंतु संग्रहालय में वर्तमान में यह हीरा 103 कैरेट का है। कोहिनूर का अर्थ प्रकाश अथवा रोशनी का पर्वत है।

कुलानीन- यह हीरा दुनिया का सबसे बड़ा हीरा माना जाता था। यह 3100 कैरेट का था। लेकिन बाद में इस हीरे को काटकर विभाजित कर दिया गया। 530 कैरेट वजन वाले कटे हिस्‍से को नाम दिया गया ‘स्‍टार ऑफ अफ्रीका‘ यह हीरा भी ब्रिटेन के राजसिंहासन में अलंकृत है।

रीजंट- मूल रूप से यह हीरा भारत की गोलकुंडा खान से निकला था। इसका वजन 410 कैरेट वजन था। टॉमस पिट ने इस हीरे को खरीदा और इसे तराशकर 136 कैरेट का बनवा लिया। टॉमस से आर्लियंस डयूक ने इसे 1717 में खरीदा। तब इसकी कीमत 1 लाख 24 हजार पौंड थी। तभी इसका नामकरण ‘रीजंट‘ किया गया और इसे पन्‍द्रहवें लुईस के राजमूकुट में सजाया गया। 1762 में फ्रांस की राज्‍यक्रांति के दौरान रीजंट को लूट लिया गया। कालांतर में नेपोलियन ने रीजंट को वापस लाने की ठानी और रीजंट प्राप्‍त कर अपनी तलवार की मूठ में अंकित करवाया। नेपेलियन की पराजय के बाद उसकी पत्‍नी ने रीजंट लेकर आस्‍ट्रेलिया पहुंची और आस्‍ट्रेलिया सम्राट को उपहार स्‍वरूप रीजंट देना चाहा, लेकिन उसने स्‍वीकार नहीं किया। अब यह हीरा पेरिस की आर्ट गैलरी की शैभा बढ़ा रहा है।

होप- हीरों के व्‍यापारी टेवर्नियर ने इस हीरे को भारत की कुलूर खान से 1642 में खरीदा था। इस नीले रंग के हीरे का वजन 112 कैरेट था। टेविर्नियर ने इसे होप लुईस चौदहवें को बेच दिया। इसे तरशकर 67 कैरेट का करा लिया गया। 1792 में फ्रांस में हुई राज्‍यक्रांति के दौरान यह हीरा लूट लिया गया और अर्से तक गुमनामी के अंधेरे में रहा। बाद में 1830 में इस हीरे का पता चला और अब यह होप अमेरिका में है।

ओरलॉफ- 300 कैरेट भार का यह हीरा मुगल सम्राट शाहजहां ने गोलकुण्‍डा की खानों से प्राप्‍त किया था। बाद में भारतीय हीरों में बेजोड़ यह हीरा औरंगजेब को मिला। औरंगजेब ने इसे तराशकर गुलाब की कली के आकार का आयाम दिया। इससे इसका वजन घटकर 200 कैरेट रह गया। 1739 में दिल्‍ली में हुई लूटपाट में यह हीरा भारत की सीमाएं लांघकर एमस्‍टरडम पहुंचा। जहां एक रूसी राजदूत ने इसे खरीदकर रूस की महारानी कैथरीन को भेंट में दे दिया। अब यह हीरा रूस की राजधानी मास्‍को में सरकारी खजाने की अमानत है।

मुगल महान- ‘ग्रेट मुगल‘ के नाम से पहचाना जाने वाला यह हीरा 17वीं शताब्‍दी में भारत की कुलूर खान से प्राप्‍त किया गया था। मुगल बादशाहों की मयूर सिंहासन में भी यह अलंकृत रहा। गुलाब की कली के स्‍वरूप का यह हीरा पहले 793 कैरेट का था। जिसे तराशकर 280 कैरेट का कर दिया गया। मुगलों से इस हीरे को नादिरशाह ने छीन लिया और नादिरशाह से यह अंग्रेजों के पास पहुंचा। अभी भी यह हीरा लंदन में है।

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समुद्र में समाई हीरों की संपदा

हीरा खानों से ही नहीं निकाला जा रहा, आजकल समुद्र से भी निकाला जा रहा है। समुद्र विज्ञान ने जब से जल के भीतर सांस लेने के उपकरण एक्‍वालंग के निर्माण में उपलब्‍धि हासिल की है, तब से समुद्र में सैकड़ों साल पहले डूबे जहाजों की पड़ताल कर उन्‍हें समुद्र की सतह पर लाने में कामयाबी मिलने लगी है। इन जहाजों में हीरे-जवाहरातों के बेशकीमती खजानें मिल रहे है। गोताखोर एक्‍वालंग पहनकर समुद्र में छलांग लगाकर इन जहाजों का पता लगाते हैं।

1885 में गोताखोरों ने 1622 में समुद्र में डूबे एक स्‍पेनी जहाज का पता लगाया। इस जहाज के मलबे से तीस करोड़ डॉलर के हीरे-जवाहरात प्राप्‍त हुए। 1553 में 16 स्‍पेनी जहाजों का एक पूरा बेड़ा समुद्र में तूफान आ जाने के कारण डूब गया था। इन जहाजों में से दो जहाजों का मलबा प्राप्‍त हुआ। इस मलबे में निकले हीरे-जवाहरातों की कीमत है 1.8 मिलियन डॉलर ! अभी भी समुद्र में करोड़ों-अरबों के हीरे-जवाहरात समाएं हैं, जिनकी तलाश जारी है। विश्‍व प्रसिद्ध टाइटैनिक जहाज जो 1914 में समुद्र में डूबा था, उसका पता भी गोताखोरों ने लगाया और उसी जहाज की प्रतिकृति तैयार कर ‘टाइटैनिक‘ फिल्‍म भी बनाई। इस जहाज में भी हीरे मिले हैं।


हीरों की किस्‍में

हीरों की किस्‍में इसकी शुद्धता व चमक पर तय की जाती हैं। प्रमुख रूप से हीरे की तीन किस्‍में हैं, जैम हीरा, पीला हीरा और औद्योगिक हीरा। लेकिन जैसे-जैसे हीरे के व्‍यापार विस्‍तार और इसको तराशे जाने की तकनीकियों में विकास होता जा रहा है, वैसे-वैसे इसकी किस्‍में भी बढ़ती जा रही हैं। अब बाजारों में हीरे की 6 किस्‍में आसानी से सुलभ है, नीला-सफेद, सफेद, हलकाकेप, गहराकेप, हलका भूरा शेड और गहरा भूरा। हीरे के इन रंगों को परखने व असली-नकली हीरे की जांच करने का काम मानव पारखियों के अलावा मशीनें भी करने लगी हैं।

शुद्ध हीरा पीलापन लिए चमकदार व पारदर्शी होता है। सबसे मूल्‍यवान हीरा लगभग रंगहीन, सुस्‍पष्‍ट लाल या नीलापन लिए हुए होता है। यदि हीरे में पीलेपन की चमक अधिक है तो जनिए, उसमें अशुद्धता की मात्रा भी अधिक है। हालांकि हीरे के पारखियों का दावा है कि शत-प्रतिशत शुद्ध हीरा दुर्लभ ही है। प्राचीन भारत में हीरों के चार प्रकार प्रचलित थे। इनमें सफेद वर्ण का ब्राह्मण, लाल वर्ण का क्षत्रिय, पीले वर्ण का वैश्‍य और काले रंग का हीरा शूद्र माना जाता था। ब्राह्मण हीरा रसायन के काम एवं सर्व सिद्धिदायक, क्षत्रिय - रोग नाशक, वैश्‍य - धन देने वाला और शूद्र - हीरा ब्‍याधियों को नष्‍ट करने वाला माना जाता था। हीरे का आयुर्वेद में भी बड़ा महत्‍व है।


प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224, 09981061100

फोन 07492 404524

लेखक, साहित्‍यकार एवं वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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