होली विशेष : रंगा-रंग काव्य आयोजन

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मंजुल भटनागर

१. "होली का आना "
 
होली का आना
गाँव में ढोल ,
खेत में मंजीरें, ,
खड़ ताल बजना
शगुन की भाँग घुटना
गलियां रंगेंगी आज ,
मुहल्लों में अमन हो जाना
पायल खनकाती फिरे ,
ख़ुशी से लाडो बहना

होली का आना
तो मिलन का एक बहाना है
फाग संग ग्वालों का हुड़दंग मचाना
कृष्ण रंग की प्रीत जगी ,
उधौ देख दंग है
झाँक रही चूनरियों में ,
ढाई आखर प्रसंग है
गोपियों संग रास खेल ,
प्रेममय हो जाना

होली का आना
प्रेम प्रीत का मन्त्र फैलाना
कोयल संग आम्र वृक्ष पर बैठ ,
मीठे राग सुनाना
होली का मौसम आये तो ,
नफरत छोड़ विश्व बंधु त्व में रंग जाना .



फागुन आयो

बसंत को कहो विदा
अब फागुन आयो है
रंग बिरंगे फूल पलाश
गहन सूर्य का दर्प
बढ़ायो है
हाँ सखि फागुन  आयो है

टेसू फूले हैं
अमृत सा रंग घोले हैं
कुदरत ने प्रेम रंग को
बृज पर बरसायो है
हाँ सखि फागुन आयो है

अबीर घुलेगा बादल सा
ढोल मृदंग बजेंगे
पकवान बनेगे
लठ मार फ़िज़ा में घूम घूम कर
हुड़दंग मचायो है
हाँ सखि फागुन आयो है

होली का उत्सव है
कृष्ण की पीर है
रंग और नीर है
अधर्म पर प्रहार है
बैर विषाद मिट गए सब
चहुँ ओर हर्ष बिखरायो है
हाँ सखि फागुन आयो है

हरि की है रीत प्रीत
ख़ुशी के रंगों की पिचकारी है
राधा से मोहन का अभिसार
अनंत प्रेम रंग बरसायो है
हाँ सखि फागुन आयो है।
 
मंजुल भटनागर मुंबई
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कमलेश सवि ध्रुवे

तुम प्यार में ऐसे रंजीत हो
तुम्हें रंग सके कोई रंग नहीं।
गालों में कौन सा गुलाल मलूं
मन सराबोर बचा कोई अंग नहीं।।

कंपित होंठ तेरी बोझिल पलकें
मादक भरे तेरे अंग अंग महके।
झुमके पायल झांझ मंजीरा
दिल तासे बन क्यों न धड़के।।

तुम जिस गली से गुजरो
कैसे भला होली न हो।
कामिनी के चरण कमलों में
दीवानों की टोली न हो।।

छायी है शर्म से गालों में लाली
फंस गया बालों की काली घटा में।
लिख दिया होठों पर प्रेम संदेश
डूबकर नीली आंखों की छटा में।।

बौराया है बासंती सा यौवन
कुक रही पल-पल कोयल सी।
मदहोश हुआ महुआ भी
झुकती चली डाली फूलों की।।

जवानी की भारी बोझ लिये
मदहोश चली अलसाई सी।
बिछती ही गयी राहों पर
लाखों नजरें ललचाई सी।।

बरस रहा है रंग फिजा में
कोई अबीर न पिचकारी है।
गर्म सांसों से निकलती
मादक कैसी सिसकारी है।।

हाय रंगीली चुनरी भी
हवा संग होली खेल रही है
उड़-उड़ जाये लट माथे पर
रूप-यौवन का मेल सही है।।

जब कलाई मरोड़ी थी मैंने
चूड़ियां खनककर टूट गयीं
गुस्से से मुस्काई थी बस
जैसे मुझसे रूठ गई।।

क्या दिल में छुपाए जा रही हो
हिरनी सी कुलांचे भरकर।
नहीं छूटेगा पहला प्रेम रंग
देख लेना दुसरा रंगकर।।

तुम हो जब जीवन में साथी
हर रोज होली मनाते हैं
बदरंग से न डर मर कर
जीवन बगिया सिरजाते हैं।।

सुख में दुख में रंग बरसे
न जीवन कभी गमगीन रहे
अभावों में भारी भाव भरे
गैरों का भी जीवन रंगीन रहे।।

(कमलेश सवि ध्रुवे,राजनांदगांव)
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नवनीता कुमारी

सुन लो! आज सब होली के गल,
मिटा के नफरत दिलो से, भुलेगे ना अब खुशियों के पल |
होली में अबके बरस फिर से जमके रंग-गुलाल उड़ायेंगे,
होके होली के रंग में मदमस्त हर रंजोगम को भुलायेंगे,
और अब आने वाली है होली ,जमके रंगो की बारिश में फिर से भींग जाए,
सपनों के संतरंगी जाल से फिर से मुक्त हो जाए!
होली है भक्त प्रहलाद की भक्ति का प्रमाण,
जिसने होलिका के गोद में बैठकर अग्निदेव को दिया अपनी भक्ति का प्रमाण!
और खुश होकर देवगण ने भी भक्त प्रहलाद का किया गुणगान,
देखकर ये सुखद घटना देशवाशियों में खुशी की लहर छा गई,
इस तरह होली मनाने की प्रथा सदियों से चलती आ गई!
उड़े रंग-गुलाल अब आसमानों में,
कि अब  पिचकारियाँ भी सजने लगी है दुकानों में,
कि अब आ जाओ होली खेलने दोस्तों के संग,वक्त ना गंवाओ अब शरमाने में |
कि चारों तरफ खुशियाँ ही छलकी है वक्त के पैमाने में,
यही है दास्तां होली के गल,
हर दुःख टल जाए, मिले सबको खुशियों के पल!!

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सुशील शर्मा


होली


होली के हुड़दंग का,बड़ा अजब है हाल।
हर चेहरा खुश रंग है,जीवन बना गुलाल।

गालों पर साजन मलें,प्यारे प्यारे रंग।
गोरी इठलाती चले,चढ़ी प्रेम की भंग।

टेसू फूले डाल पर,ले होली के गीत।
सरसों पीले बिछ गए, अब तो मिलो मनमीत।

होली में तुम न मिले, छूटा मन का धीर।
साजन तुम कब आओगे,मलने मुझे अबीर।

बरसाने की गोपियाँ,ये गोकुल के लाल।
होली में ऐसे मिले, फागुन हुआ गुलाल।

कृष्ण पिया बच कर भगे, पीछे राधा नारि।
दोनों हाथों रंग है,कैसे बचें मुरारि।

होली की यादें मिली, अमराई की छांव।
जब से साजन तुम गए सूने सूने गांव।

चुनरी धानी पहनकर,निकली गोरी आज।
न जाने किस पर गिरे ,इन नयनन की गाज।

गोरी पर चढ़ता गया,प्रेम पिया का रंग।
जीवन खिलता पुष्प है,मन में भरी उमंग।

रंगों के इस पर्व में,करो मधुर व्यवहार।
जीवन को सुरभित करे,होली का त्यौहार।

फगुनाहट चढ़ने लगी ,मन में उठे तरंग।
बासंती मौसम हुआ,प्रिय उल्लास उमंग।

सरहद पर साजन लड़े,रखें देश का मान।
होली में इन सभी का, देश करे सम्मान।

फागुन पिचकारी भरे, मौसम खिला बसंत।
पिया संग होली खेलती, मन उल्लास अनंत।


नवगीत
होली


नवल किशोरी खेलत होरी।
प्रीत कुसुम संग बंधी है डोरी।
कान्हा ने जब बांह मरोरी।
सखियां करती जोराजोरी।
रंग दो पिया चुनरिया कोरी।

टूट गए हैं आज सारे बंध।
रस में भीगे है सब छंद।
थिरक उठे गोरी के अंग।
रसिक भये रति संग अनंग।
जीवन बना नया अनुबंध।

नाच उठा सारा आकाश।
उदित रंग से सना पलाश।
सांस सांस में तेरी आस।
मन में है बासंती विश्वास।
चलो मिले अमराई पास।

राधे रूठी श्याम मनावें।
मन में प्रीत के रंग लगावें।
श्याम सखा को अंग लगावें।
वृंदावन में रास रचावें।
देख युगल छवि मन हरसावें।

मुंह पर मलें अबीर गुलाल।
कान्हा की देखो ये चाल।
खुद बच कर भागे नंदलाल।
फेंक सभी पर प्रेम गुलाल।
कान्हा बिन है मन बेहाल।

देखो होली के हुड़दंग।
मन बाजे जैसे मृदंग।
गोरी बनी बड़ी दबंग।
बच्चे बूढ़े सब एक रंग।
लहराते सब पीकर भंग।
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अनुश्री दुबे

कि होली आई रे

मस्ती में खेलैं अबीर गुलाल कि होली आई रे।
कि बस्ती में मचे बवाल कि होली आई रे।
अब फागुन के दिन ये संग नई खुशियां लाये;
कि ना रहा कोई सवाल  कि होली आई रे।
सब दीवाने हैं होली के कि होली आई रे।
सब रंग फेंके पिचकारी से कि होली आई रे।
भांग पी पीकर अब सब झूम झूम के झूमे;
बच्चे मन मोहें पिचकारी से कि होली आई रे।
मिट गई है सब तन्हाई कि होली आई रे।
बढ़ गई है अब महगांई कि होली आई रे।
कि धुल गई है अब सबके मन से बुराई;
घर की हुई खूब सफाई कि होली आई रे।
रंगों ने कर दिया कमाल कि होली आई रे।
कि खेल खेल हुए बेहाल कि होली आई रे।
बच्चे तो बच्चे रह गये बूढ़े भी हुए जवान;
बूढ़े कर रहे हैं धमाल कि होली आई रे।
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  जानती हूं मैं भी और तुझको पता है

तूने जो कही बात वो अच्छी लगी है।
तूं ही है वो जो सच्ची लगी है।
दुनिया क्या कहती वो तो दुनिया ही जाने;
रे औरों की दोस्ती कच्ची लगी है।
जानती हूं मैं भी और तुझको पता है ।
तू ही मेरी दोस्त है इतना पता है।
सोचा था हमने जिंदगी भर ये दोस्ती निभाएंगे;
दोस्ती न निभ पाई किस की खता है।
तेरी दोस्ती में ही तो वो जन्नत है।
तू ही तो मेरी हर एक मन्नत है।
जन्नत ही जन्नत है ये दुनिया कहती है;
कैसे समझाऊं मैं कि दोस्ती ही जन्नत है।
रे मिलने का वादा हम दोनों करते हैं।
दुख में कंधों पर सिर दोनों रखते हैं।
ये दुनिया क्या कहती क्या कहें हम;
एक दूजे की याद में दोनों रोते हैं।

              
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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"

काव्य मंच पर होली


काव्य मंच पर चढ़ी जो होली, कवि सारे हुरियाय गये,

एक मात्र जो कवयित्री थी, उसे देख बौराय गये,

एक कवि जो टुन्न था थोडा, ज्यादा ही बौराया था,

जाने कहाँ से  मुंह अपना, काला करवा के आया था,

रस श्रृंगार का कवि, कवयित्री की जुल्फों में झूल गया,

देख गोरी के गाल-गोरे, वह अपनी कविता भूल गया,

हास्य रस का कवि, गोरी को खूब हसानो चाह रहो,

हँसी  तो फंसी  के चक्कर में, उसे फसानो चाह रहो,

व्यंग्य रस के कवि की नजरे, शुरू से ही कुछ तिरछी थी,

गोरी के कारे - कजरारे, नैनों में ही उलझी थी,

करुण रस के कवि ने भी, घडियाली अश्रु बहाए,

टूटे दिल के टुकड़े, गोरी को खूब दिखाए,

वीर रस का कवि भी उस दिन, ज्यादा ही गरमाया था,

गोरी के सम्मुख वह भी, गला फाड़ चिल्लाया था,

रौद्र रूप को देख के उसके, सब श्रोता घबडाय गये,

छोड़ बीच में सम्मेलन, आधे तो घर को धाय गए,

बहुत देर के बाद में फिर, कवयित्री  की बारी आई,

हाथ जोड़के बोली वो, प्रिय संयोजक और कवि "भाई",

"भाई" का सुन संबोधन, कवियों की उतरी ठंडाई,

संयोजक के मन -सागर में भी, सुनामी सी आई,

अपना पत्ता  कटा देख, संयोजक भी गुस्साय गया,

सारे लिफाफे लेकर वो तो, अपने घर को धाय गया,

बिना लिफाफा मिले कवि के, तन-मन में ज्वाला धधकी,
घर की खटिया टूटी तब ही, नींद खुल गई उनकी||

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206, टाइप-2,
आई.आई.टी.,कानपुर-208016,
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मुस्कान चाँदनी


  एक दूजे के लिए

तेरी तन्हाई मेरी रूसवाई
दोनो मिलकर लिखेगी
एक नयी कहानी
किस कदर मजबूर हुए हम
दुनिया से बेखबर हुए तुम
जाये कहाँ जख्मों को लेकर
छिपता नहीं छिपाने से
नासूर की तरह चुभकर
याद दिला ही देता है वह पल
खून से लिपटे हुए मेरे अरमान
दर्द में डुबी हुई तेरी आवाज
तुम कुछ कह न सके
मैं यह सह न सकी
सरे आम हुए हम बदनाम
जाना था तुम्हें जिधर
मंजिल थी मेरी उधर
रास्ते थे पर अलग-अलग
पहुँच कर हम एक जगह
सहारा ढूंढ़े एक दूजे में
बाँटकर अपना अपना दर्द
लगता है ऐसा मुझे
हम बने है एक दूजे के लिए
आखिर दर्द का रिश्ता,
है हमारे बीच
तेरी तन्हाई मेरी रूसवाई
मिलकर जरूर हो जायेगी खत्म
हमारे जीवन से।

प्यासा जीवन

बुझ न सकी प्यास मछली की
पानी के बीच रहकर भी
कैसी थी ये प्यास
क्या लगी थी दिल में
वर्षों से ये आग
घुट घुट कर जीने की
मिली थी उसको श्राप
टूटा था क्या कहर
जो कर न सके
लोग उसकी कदर
घिरी रही तन्हाईयो में
फिर भी क्यों न आयी
किसी को रास
क्या चाहा उसने दुनिया से
आखिर क्यों मिला
ऐसी अपमान जिंदगी में
मिलने लगी असफलता
हर कदम पर
लगी तो सिर्फ मायूसी,
उसके हाथों में
खुशी चली गयी
उसके जीवन से
रह कर समंदर में वर्षों से
तरसती रही कतरे कतरे को
प्यासी ही रह गयी
आखिरी घड़ी में भी
हो गया इस कदर
जीवन का अंत
बुझ न सकी कभी
प्यास मछली की ।

बिहारशरीफ, नालंदा
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विन्ध्य प्रकाश मिश्र "विप्र "


गिरने का देखो जमाना है आया।
शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा है ।
समझता था ऊपर चढे वो है गिरते
मगर जो है नीचे वही  गिर रहे हैं ।
                  क्या बात है सच का साथी रहा जो
                  वही घिर रहा है सही घिर रहा है ।
                 गिराने की ख्वाहिश रही दिल में जिसके
                 मुझे तो गिराने में खुद गिर रहे हैं ।
गिरने का देखो जमाना है आया।
शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा है ।
               कहीं पर चढ़ा भाव आलू के देखो
              कहीं प्याज उछली नभ छू रही है ।
              मगर यह भी देखा भाव भारी है जिसका
              उसकी नियति दर कदम गिर रहा है ।
गिरने का देखो जमाना है आया।
शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा है ।
             साधु का गुण है समभाव रहते
             मन था सदा खुश और थिर रहा है ।
             बढती जब लालच का मुख बढ गया है ।
             गिरने की सीमा तक वह गिर गया है ।
गिरने का देखो जमाना है आया।
शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा है ।
              गिरने की कोई न सीमा रही है ।
             सबसे हि ज्यादा नियति गिर रहा है     ।
             कहते भी कैसे किसी को बुरा यूँ
             जब पल पल लोगों कि मति गिर रहा है ।
कीमत तो गिरती है  फिर उठ सकी हैं
पर मति का गिरा न कभी कभी उठ सका है ।
नजर से गिरा फिर न उठता है जन में
बड़ी गांठ गहरी जो पड़ती है मन में ।
           
            
            
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सीमा असीम


लिखा तुम्हारा नाम
फिराया शब्दों पर हाथ चूम लिया
देर तक निहारती रही प्रेम से
सूखे होठों पर तिर आई प्यारी मुस्कान
टूटती हुई अकड़ी देह की छाती पर
धड़कन तेज तेज धड़कती रही
बेकाबू सी
गालों पर उतर आई भोर की लालिमा
अरे देखो छूते ही कैसे मुस्कुरा उठी कविता
शरमा कर कर ली बंद ख्वाबों भरी पलकें
जैसे तैरती हैं तालाब में मछलियाँ
बाग़ में खिल आये हो फूल
तितलियों ने खोल दिए हो रेशमी रंगीन पंख
बहती रहती नदी अपनी रफ़्तार से
चलो गमले के पौधों को पानी डालते हैं
संग संग
आओ बात करते हैं बैठ कर 
मुस्कुराते हैं साथ साथ 
कल रात देखा एक सपना
अनमने उदास
आओ संवार दूँ
चूम लूँ प्यार से
कैसे समीकरण हैं जो उलझा रहे हैं
सहमा देते हैं कदम 
हर आँख में सवाली घुसुर पुसुर
मन में घबराहट  
कोमल नाजुक कविता
टूट कर लहूलुहान न हो जाए
देश या समाज का क्या जायेगा
बस यही सोच कर मेरी कविता की आँख नम हैं
सच कह रही हूँ अभी बहुत उदास है
पथराई सी आँख पर इंतजार है
पर दिल में ढेर सारा प्यार है !!

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अमित मिश्र 'मौन'


नग़मे इश्क़ के कोई गाये तो तेरी याद आये
जिक्र मोहब्बत का जो आये तो तेरी याद आये

यूँ तो हर पेड़ पे डालें हज़ारों है निकली
टूट के कोई पत्ता जो गिर जाये तो तेरी याद आये

कितने फूलों से गुलशन है ये बगिया मेरी
भंवरा इनपे जो कोई मंडराये तो तेरी याद आये

चन्दन सी महक रहे इस बहती पुरवाई में
झोंका हवा का मुझसे टकराये तो तेरी याद आये

शीतल सी धारा बहे अपनी ही मस्ती में यहाँ
मोड़ पे बल खाये जो ये नदिया तो तेरी याद आये

शांत जो ये है सागर कितनी गहराई लिये
शोर करती लहरें जो गोते लगाये तो तेरी याद आये

सुबह का सूरज जो निकला है रौशनी लिये
ये किरणें हर ओर बिखर जाये तो तेरी याद आये

'मौन' बैठा है ये चाँद दामन में सितारे लिये
टूटता कोई तारा जो दिख जाये तो तेरी याद आये

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मिहिर


ईमेल -  mrityunjaymihir@gmail.com

मत यार मेरे बारिशों में
इस तरह फिर याद आना।
ये दिशाएं, कब हवाओं का रूख बदल देंगी, न जाना।
भीगकर, इनकी कशिश से -
कब ज़िगर का चैन छिन जाए पुराना। 
इसलिए मत यार मेरे बारिशों में याद आना।
 
 
याद आएंगे बहुत ऐ यार ! तेरे वो निशां
ग़र कहीं बाक़ी रही जो इक महक उस प्यार की
उस साँस की जिसने कभी तुझसे जुदा होना न जाना।
फिर जुदाई में मिलेगा कब महकने का बहाना
इसलिए मत यार मेरे बारिशों में याद आना।
 
जब हवाओं की लहर झकझोर देगी बाज़ुओं को
या उसी बीते समय की याद बनती शाख को
मोतियों के मोल तब पानी झरेगा यार कितना !
लोग समझेंगे फसाने पर किसी मगरिब का नाम आया
पर मेरा ये टूटना, बेवक्त उसके काम आया।
फिर कहीं इन बारिशों में -
बिजलियों को मिल न जाए इक बहाना
 
 
हर नया स्वर टपकने का वेदना का स्वर न हो ले
एक हल्की सी तपन ही,  उम्र भर का ज्वर न हो ले।
 
बारिशों में भीगती इन शोख कलियों की तरह
अब विसाले-यार की ख्वाहिश नहीं बाकी मगर
कल तेरी आमद का देखो मिले गर कोई बहाना
तो महज इक स्वप्न बनकर आँख में चुपके से आना।
 
वो नज़र भी थी कि जो गुलज़ार होती थी कभी
वो अदाऐं थी कि जो सुकुमार होती थी कभी
हर बात पर हँसना , ज़रा सी बात पर ही रूठ जाना
फिर बिना कुछ बात के ही बोल देना, मान जाना
ग़र कभी फिर आ सको तो इन्हें अपने साथ लाना
ख्वाहिशों पर यार मेरी इस तरह फिर मुस्कराना
याद आ जाए तस्सवुर-तारीखों का वो जमाना



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अशोक सिंह

मन मन्दिर में जिसकी मूरत
उसको दुनिया कहती माँ है
माँ ममता की सच्ची मूरत
जग में दुख को सहती माँ है ।।

पुत्र नही तो दुख का मंजर
पुत्र प्राप्ति पर भी दुख ऊपर
सुख दुःख के संघर्ष है फिर भी
प्यार से आंचल फेरे माँ है ।।

पुत्र दुखी होता है जब भी
माँ दुख का संज्ञान करे
मेरा पुत्र है रुठा सायद
बात का माँ सन्धान करे ।।

वो तो ममता की है मूरत
सारा दुख हर लेती है
कमी हमें हो जो जीवन में
हमको लाकर देती है ।।

जन्म लेकर अन्तिम तक वो
पुत्र का ही संज्ञान करें
मेरा पुत्र है मेरी ममता
ममता का गुणगान करें ।।

पुत्र नहीं समझे ममता को
समय के साथ बदलता है
भूल वो जाता है ममता को
"अलक" प्यार किसी से करता है।।

अशोक सिंह आज़मगढ़

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राज कुमार यादव

मेरा एक तरफा सफर

मुझे प्यार है उस लड़की से ,और मेरा प्यार बेवजह है..
मैं प्यार का वजह नहीं ढूंढ़ता हूं..
मगर मेरा प्यार एक तरफा हैं..
मुझे खुद पे विश्वास ही नहीं हैं
और मैं नहीं कह पाता हूं उससे अपनी दिल की बात

सोचता हूं कहूं वो इंकार न कर दें. .
कहीं उसे मेरी शख्सियत पसंद ना आये..
और मेरे प्यार को बेवकूफी करार दें दे..
मैं डर जाता हूं सोच कर ये सब ,
मगर मुझे उससे इश्क है ,इसमें कोई शक नहीं....

एकबार हिम्मत जुटाया भी
लेकिन मात खा गई मेरी हिम्मत
दिल की बातें जुबां पे अटक कर रह गई..
बस उसे दूर से देखकर ही खुश हो जाता हूं..
आज भी उसे देखा
तो ऐसा लगा जैसे वक्त Slow motion में गतिमान हैं
वो जब मेरे पास से गुजरी तो
मेरी धड़कन रूक गई
सांसें मेरी थम गई
वो ही वो रम गई मेरी उस वक्त की दुनिया में...

अब तो वो दिखाई भी कम देती हैं
शायद साल में एक या दो बार..
लेकिन मैं उसे कल भी प्यार करता था
मैं उसे अब भी प्यार करता हूं....
न जाने कब तक चलता रहेगा
ऐ मेरा एक तरफा सफर.

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सतीश यदु

सोच रही हूँ !
क्या लिखूं ? किस पर लिखूं ?
लेखनी के आविष्कार पर लिखूं,
देश,दुनिया,सरकार पर लिखूं!
शिक्षा, साहित्य या संस्कार पर लिखूं,
या अचार,विचार या भ्रष्टाचार पर लिखूं!!
सोच रही हूँ !
क्या लिखूं ? किस पर लिखूं ?
आम जान के दरकार पर लिखूं,
बेगार, किसान, कामगार पर लिखूं!
शिक्षाधिकार या  शिक्षा-व्यापार  पर लिखूं,
लिंग-संचेतना,या ब्याभिचार पर लिखूं!!
सोच रही हूँ !
क्या लिखूं ? किस पर लिखूं ?
सेना के ललकार पर लिखूं,
या पाक मंसूबों के वार पर लिखूं!
जल, जमीन या जंगलवार पर लिखूं ,
या फिर रोटी-कपड़ा, घर-द्वार पर लिखूं !!
सोच रही हूँ !
क्या लिखूं ? किस पर लिखूं ?

कवर्धा (छ.ग.)

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