कहानी // घोंसला // हरि भटनागर

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हरि भटनागर

हरि भटनागर

घोंसला

वैसे तो कौवे कहीं दिखते नहीं, भूले-भटके दिख गए तो मैं असहज हो जाता हूँ। यह असहजता इतनी बढ़ जाती है कि लगता हृदय की धड़कन पर इसका असर हो रहा है। और किसी भी वक़्त दिल का दौरा पड़ सकता है। मैं बचाव के प्रयास करता हूँ, लेकिन अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाता।

ऐसा ही उस वक़्त हुआ जब मैं अपने बहुत ही क़रीबी दोस्त के साथ, शहर से काफ़ी दूर ढाबे में बैठा चाय पी रहा था। शाम का झुटपुटा था, आसमान सुर्ख़ था, खेतों से आती हुई ठण्डी हवा बहुत ही सुखदाई थी। और हम इसी की चर्चा कर रहे थे कि सड़क के पास बिजली के तार पर एक कौवा बैठा दिखा जो काँव-काँव करता तार पर चोंच मार रहा था।

मैंने कौवे को देखा और असहज हो गया। हृदय की धड़कन बढ़ गई। हाथ से भजिए का टुकड़ा गिर पड़ा। मैं खाट से उठ खड़ा हुआ और तकरीबन दौड़ता हुआ- सा ढाबे के अंदर घुसा मानों छिपने की जगह ढूँढ रहा होऊँ। छिपने की जगह ढाबे के पीछे थी। मैं वहाँ आ खड़ा हुआ।

दोस्त ने पूछा- क्या हुआ भाई! इतने बेचैन क्यों हो गए?

सहज होने पर मैंने दोस्त को अपने साथ घटा एक वाक़या सुनाया।

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चालीस साल पुरानी बात है।

उन दिनों मैं नाना-नानी के घर गर्मी की छुट्टियाँ बिताने गया था। वे शाजापुर में रहते थे। उन दोनों के सिवाय घर में दूसरा व्यक्ति न था। एक माली था जो बग़ीचे में बनी फूस की झोपड़ी में रहता था। नाना के सिर्फ़ एक ही औलाद थी जो मेरी माँ थी। हम भोपाल में रहते थे। एक छोटे से फ्लैट में। बाप भेल में सुपरवाइज़र थे। माँ घरेलू महिला। उनका मैं इकलौता बेटा जो गर्मी की छुट्टी लगते ही नाना-नानी के घर की ओर, मुहावरे में कहें तो खूँटा तोड़ा के भागता था। पता नहीं, नाना-नानी के यहाँ मुझे भारी सुकून मिलता। क्या तो घर था उनका! घर तो खपरैल का था लेकिन इंतहा ख़ूबसूरत। काफ़ी ऊँचा। दीवारें एकदम उजली। कई सारे कमरे, दालान और बड़ा-सा आँगन। घर के आगे फुटबाल के मैदान जैसी जगह थी कँटीले तारों से घिरी।

ऐसी ही जगह पिछवाड़े भी थी। हर तरफ आँवले, नीम, जामुन, पीपल, शहतूत, कबीट, चिंरौजी, बरगद, सतपत्ता, पाकर, बबूल और बेल के असंख्य पेड़ थे जिनकी चितकबरी धूप-छाँव में मुझे दौड़ना-खेलना बहुत भाता था। नाना फॉरेस्ट विभाग से रिटायर हुए थे और पेड़-पौधों और ख़ासकर पंछियों से उन्हें इंतहा लगाव था। उनके रख-रखाव और संरक्षण की जानिब हर वक़्त तत्पर रहते थे। यही वजह भी कि लोग उन्हें सालिम अली कहकर पुकारते। नाना को यह संबोधन अच्छा लगता- ख़ुशी देता था। ख़ैर, आगे की तरफ़ पेड़ों के बीच में तालाबनुमा गढ़ा था जिसमें ज़्यादातर प्रवासी पंछियों का जमघट रहता! क्या तो सुन्दर पंछी थे वहाँ! मैं तो उन्हें देखता ही रह जाता था। किसी पंछी को मैं पकड़ना चाहता तो नाना मना करते थे। कहते, एक तो तुम उसे पकड़ नहीं पाओगे, दूसरे पकड़ोगे तो चोट खा जाओगे, इसलिए पंछियों को दूर से देखो। ये तरह-तरह के फूल हैं। इन्हें अपनी तरह से जीने दो। नाना सत्तर पार के थे। दुबले-पतले, हल्के नीले रंग का चश्मा पहनते थे। पैंट, कमीज़ और खद्दर की जाकिट उनकी पोशाक थी। चमड़े के पट्टेवाली घड़ी वे दाएँ हाथ में पहनते। सिर में घने बाल थे। एकदम सन जैसे सफ़ेद। दाँत दूध की तरह चमकते थे। पूरे बत्तीस दाँत थे नाना के। ऐसे ही नानी के भी थे। नाना जहाँ चुस्त-दुरुस्त थे, नानी ढीली थीं, साँस के रोग की वजह सुस्त, लेकिन कामकाज घर-गृहस्थी का वो ख़ुद करती थीं। नाना को किसी काम में हाथ न लगाने देती थीं। ख़ैर, घर के पीछे, आगे जैसा ही नज़ारा था, लेकिन मुझे घर के आगे ही खेलने-कूदने में मज़ा आता था।

उन दिनों मैं ग्यारहवीं का छात्र था। पढ़ने में ज़रा भी मन न लगता। दिन भर कैरम-लूडो खेलता रहता, अपने कई सारे दोस्तों के साथ। माँ हर समय घर-गृहस्थी के काम में भिड़ी रहतीं। उन्हें ज़रा भी फुर्सत न मिलती कि कुछ पल ख़ाली बैठ जाएँ। हर वक़्त काम में भिड़े रहना उन्हें अच्छा लगता। ख़ैर, मैं उबाऊ इम्तहान के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहा था। किसी तरह दिन गिन-गिन कर इम्तहान ख़त्म हुए और मैंने शाजापुर की ट्रेन पकड़ी। और सीधे नाना के घर के सामने था। यहाँ मैं एक बात बताता चाहता हूँ, वह यह कि मेरे पिता मेरे इम्तहान के छः माह पहले पता नहीं किस बीमारी की गिरफ़्त में आ गए कि उन्होंने खाट पकड़ ली। हाथ-पैर कहें समूचा शरीर सुन्न! इस बीमारी का कहीं इलाज न था। हर जगह दिखलाया गया, मगर बेकार। वे टुकुर-टुकुर हम सबको देखते -बोल न पाते। सारे काम उनके खाट पर होते। माँ हर वक़्त उनकी सेवा-टहल में थीं। अब वह और भी व्यस्त हो गई थीं। नाना-नानी चाहते थे कि हम शाजापुर में शिफ्ट हो जाएँ लेकिन इलाज के चलते ऐसा संभव न था। पिता जी की बीमारी के चलते मेरा नाना के यहां जाना टल सकता था। मैं हिचकिचा भी रहा था लेकिन माँ ने मुझे रोका नहीं, उत्साहित किया। ख़ैर, नाना-नानी मुझे देखकर भारी ख़ुश हुए। लम्बे समय से वे मेरे आने के इंतज़ार में थे। माँ-बाप तो किसी भी तरह निकल नहीं सकते थे, मैं निकल सकता था, सो- जैसा कि पहले कहा, खूँटा तोड़ा के भागा... सच कहूँ, मुझे भोपाल ज़रा भी अच्छा न लगता। मेरा मन शाजापुर में, नाना-नानी के घर में रमता था।

नाना के घर आए मुझे एक सप्ताह ही गुज़रा था कि एक घटना घट गई और मुझे भोपाल भागना पड़ा। भारी मन से। फिर मैं शाजापुर आ न पाया। नाना की मौत पर भी नहीं। आया भी तो स्टेशन से मुझे लौटना पड़ा था, मुँह छिपाकर....

बात यों थी कि हाल ही में हुए ज़िगरी दोस्त गुन्नू के साथ मैं, बाहर पेड़ों की चितकबरी धूप-छाँव में फुटबाल खेल रहा था। नाना हमारे रेफरी थे। सहसा नानी के आवाज़ देने पर नाना खेल के बीच में अंदर चले गए यह कहकर कि खेल अभी बंद रहेगा, मेरे लौटने पर शुरू होगा - लेकिन हम माने नहीं, खेल जारी रखा। मैं हार रहा था, गुन्नू जीत। मुझे हारना सहन नहीं हो रहा था, वह भी अपने घर, नाना के घर में! मैं बेतरह चिड़चिड़ा उठा था। और आख़िर में गुन्नू से लड़ पड़ा। एक-दो गोल होते तो कोई बात न थी, पूरे बीस गोल!!! मैं गुन्नू को मार बैठा। गुन्नू ने पहले इसे मज़ाक़ में लिया लेकिन दूसरे फैट पर वह गुस्से में आ गया। जवाब में उसने मुझे कई करारे फैट मारे। इस बीच नाना आ गए और हमें परे किया। गुस्से में मैं वहीं पीपल के पेड़ के नीचे ज़मीन में पसर कर बैठ गया। गुन्नू भुनभुनाता अपने घर भाग गया, नाराज़ होकर कभी न आने की कहकर। नाना मुझे समझाने लगे कि खेल में कभी लड़ना नहीं चाहिए। वे समझाते हुए घड़ीवाला हाथ उठा-उठाकर बोल रहे थे। नाना इंतहा गोरे थे। हाथ उनका बहुत ही सुन्दर लग रहा था।

यकायक मैं मुस्कुरा उठा। नाना समझे कि मैं उनकी समझाइश पर मुस्कुराया, इसलिए वे भी मुस्कुरा उठे और उस गढ़े की ओर बढ़ गए जिसके गिर्द बहुत सारे पंछी चहचहा रहे थे।

मैं नाना को पेड़ों के बीच से जाता देख रहा था। पेड़ों के बीच टॉर्च जैसी सैकड़ों लाइट की बौछार में वे छाया जैसे डोलते दीख रहे थे। एक जगह ठहर कर छाया ज़मीन पर गिरी सूखी लकड़ियाँ उठाने लगी और एक तरफ़ जमाने लग गई। छाया से नज़र हटाकर मैंने घर की ओर देखा जिसके खपरैल पर पता नहीं कहाँ से एक जंगली कबूतर आ बैठा और गला फुला-फुलाकर ज़ोर-ज़ोर से गुटुर गूँ-गुटुर गूँ करने लगा। एक टिटहरी सिर के ऊपर से आवाज़ करती पंखों की हवा मारती गुज़री। मेरे सामने एक गिलहरी थी जो अँजुरी में कुछ लिए खा रही थी- मुझे देखते हुए। सहसा वह तेज़ गति से पीपल के पेड़ पर सर्रा के चढ़ी तो मैं पीपल के पेड़ को ग़ौर से देखने लगा। पेड़ में हर तरफ़ हरे-हरे, छोटे-छोटे निहायत ही चिकने पत्ते थे, ठण्डी हवा में थरथरा रहे थे। सहसा मुझे पता नहीं क्या सूझा, मैं उठा और पेड़ पर चढ़ने लगा। मैं बहुत ही सम्हल कर चढ़ा और चढ़ता-चढ़ता पुलुई तक आ गया। यहाँ से नीचे का नज़ारा बहुत ही सुंदर था। पुलुई पर ही एक घोंसला था- बहुत ही सुंदर और मज़बूत। ऐसा था जैसे लोहे के बारीक़-बारीक़ तारों से गूँथकर बनाया गया हो। घोंसले की शक्ल मशालनुमा थी। उस वक़्त उसमें कोई पंछी नज़र नहीं आ रहा था। आस-पास भी नहीं। किसी बड़े पंछी का घोंसला लगता था वह। शायद उस कौवे का था जो आँगन की मुड़ेर पर सुबह-शाम खाने की डौल में दीखता। सहसा, पता नहीं गुन्नू से हार की चिढ़ थी। मैंने घोंसले को हिला डाला। जैसे गुन्नू को मार रहा होऊँ। घोंसला न हिला। ज़ोरों का मुक्का मारा तब भी नहीं। पता नहीं फिर क्या फितूर चढ़ा कि उसे उखाड़ फेंकना चाहा। कोशिश की लेकिन ऐसा कुछ हो न सका। इतना ज़रूर हुआ कि घोंसला अस्त-व्यस्त हो गया। मैंने एक टहनी तोड़ी और ज़ोर-ज़ोर से उस पर वार करने लगा। वार का असर हुआ। घोंसले की मज़बूरी ढीली पड़ गई और वह अपनी जगह से हिल गया। नुच-सा गया और उसके अंदर से दो चूजे चीं-चीं करते मुँह खोले फड़फड़ाने लगे कि तभी वह कौवा आ गया जिसका घोंसला था। फिर क्या था, घोंसले की हालत देख कौवे की आँखों में जैसे आग भर गई हो। उसका समूचा शरीर क्रोध से काँप-सा उठा और उसी के बहाव में वह ऐसा चिल्लाया, ऐसा चिल्लाया कि क्षण भर में सैकड़ों की तादाद में कौवों का हुजूम इकट्ठा हो गया।

नाना नीचे खड़े थे। भारी नाराज़। हाथ के दोनों पंजों से वे मुझे सम्हल कर नीचे उतर आने का इशारा कर रहे थे। नानी भी उनके पीछे आ खड़ी हुई थीं- सिर का आँचल सम्हालतीं।

मैं नीचे उतरने को हुआ कि इस बीच उस कौवे ने भारी चिल्लाहट के बीच मेरे मुँह पर दोनों पंजे मारे और पंख फड़फड़ाते हुए दोनों पंजों में सिर के बाल पकड़ लिए। दोनों पंजों में बाल भरे थे, सिर पर बैठना संभव नहीं था, इसलिए बेतरह पंख फड़फड़ाता वह सिर पर चोंच मारने लगा। जैसे रोते हुए ग़ुस्से में कह रहा हो-हाय! हाय!! मेरा ठीहा चौपट कर डाला! मुझे कहीं का न छोड़ा! तेरा सत्यानाश हो जाए कमीन! अब मैं तुझे कहीं का न छोडूँगा! वो गत बनाऊँगा कि ज़िन्दगी भर याद रखेगा कि किसी का घर उजाड़ने, उनके बच्चों को मारने का नतीजा क्या होता

है...

नीचे से नाना के चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं। वे कौवे को डराना चाह रहे थे। ईंटे की झूठी मार-सी करते हवा में हाथ लहरा रहे थे। अब मैं बहुत सारे कौवों से घिरा था जो भयंकर रोर करते मुझ पर झपटते हुए पंजों और चोंचों से घायल करना चाहते थे। घोंसलेवाला कौवा चमगादड़ की तरह अब मेरे चेहरे पर झूल गया था, बावजूद इसके वह मेरी आँखों पर चोंच से मारने का कोई मौक़ा गवांना नहीं चाहता था। मुझे काटों तो ख़ून नहीं। लग रहा था कि यह कौवा चोंचों की मार से सिर छेद डालेगा। आँखें फोड़ डालेगा और तब मैं नीचे ज़मीन पर गिर पडूँगा और...

इस बीच कौवे ने मुझ पर इतनी चोंचें मारीं कि सिर में ठण्डा-ठण्डा-सा एहसास हुआ। कुछ गीला-गीला सा लगा। यह ठण्डा-गीला एहसास होंठों के कोरों तक था। सहसा होंठों के कोरों पर खारापन-सा लगा। हथेली लगाई तो ख़ून था जो सिर से होता हुआ माथे, आँखों, गाल के रास्ते मुँह के कोरों से सरकता छाती पर टपक रहा था।

थोड़ी देर बाद मैं बेहोश था। और नाना की खाट पर पड़ा था। नानी रो रही थीं सिर पर पंखा झलते हुए। नाना सिरहाने खड़े थे- अफ़सोस में। उनकी आँखों में रोष था। घोंसला नोंचने से वे नाराज़-से थे और अंदर ही अंदर इस बात से ख़ुश कि किसी के घर उजाड़ने की सज़ा लाजमी थी। मैं शर्मिंदगी में था और नाना से आँखें नहीं मिला पा रहा था। वहीं नानी थीं जिनकी आँखों में ग़ुस्सा था कौवे के लिए नहीं वरन् नाना के लिए जिनके पंछी-प्रेम ने नाती की दुर्गति करवा दी। और अब अंदर ही अंदर ख़ुश हैं।

मैं पुलुई से नीचे आ गिरा था। आश्चर्य था कि इतने ऊपर से गिरने के बाद भी मुझे कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी। नाना की सफ़ेद बरौनियों के पीछे चमकती अनुभवी आँखों ने स्पष्ट कर दिया था कि घबराने और डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं। ऊपरी चोट है, घर में इलाज हो जाएगा।

***

एक माह लग गया मुझे ठीक होने में।

चोट की वजह मैं घर में ही कै़द था। बाहर नहीं निकल पाया। ज़्यादातर मैं खाट पर पड़ा रहता। उठा ही न जाता था। नाना-नानी बहुतेरी औषधियों का मेरे शरीर पर दिन में कई बार लेप करते। बफर्‍ और गर्म पानी से सिकाई करते। तीमारदारी करते नाना को देखकर लगता, जैसे अफ़सोस में हों। कुछ कुछ दुःखी- से। जैसे सोच रहे हों कि मुझे कुछ ज़्यादा ही सज़ा मिल गयी। जो कुछ घटा, नादानी थी। मैं कराहता। सोने का प्रयास करता, लेकिन सो नहीं पाता। रोशनदान और काँच की खिड़कियों पर अक्सर रह-रह किसी परिंदे के फड़फड़ाने और चोंच मारने की आवाज़ें आती रहतीं। एक दिन नाना ने बताया कि वह कौवा है जो तुम्हारी टोह में बेचैन इधर-उधर डोलता रहता है।

धीरे-धीरे तकलीफ़ कम होती गई और मैं स्वस्थ महसूस करने लगा।

एक दिन जब नाना-नानी पिछवाड़े थे, सब्जियाँ तोड़ रहे थे, मैं खाट से उठा और धीरे-धीरे चलता बाहर के दरवाज़े तक आ पहुँचा। जालीदार दरवाज़े से बाहर का दृश्य हल्के नीले मर्तबान में होने का सा एहसास दिला रहा था। मैं अपने को रोक न सका और धीरे से सिटकनी नीचे सरकाई और बाहर आ खड़ा हुआ।

बाहर खड़े होते ही जैसे मुझ में जान-सी आ गई हो। मैं प्रफुल्लता से भर उठा। अंदर की तुलना में बाहर ठण्डक थी। बहुत ही सुंदर ठण्ठी हवा बह रही थी जिसमें फूलों की भीनी सुगंध बसी थी। मैंने ज़ोरों की सांस ली और पीपल की उस पुलुई की ओर देखा जिस पर मैं चढ़ा था। वहाँ मुझे काली पन्नी-सा हिलता कुछ दिखा। वह पन्नी नहीं, कौवा था।

इस बीच पता नहीं क्या हुआ, कौवा यकायक ज़ोरों से चिल्लाया मानो सभी कौवों से इकट्ठा होने के लिए हाँक लगा रहा हो, फिर तीर की तरह सन्नाता मेरी ओर उड़ता आया- भयंकर गुहार के बीच अनचित्ते में उसने अपने दोनों पंजों से मेरे सिर के बाल पकड़ लिए और सिर पर ज़ोर-ज़ोर से चोंच मारने लगा बेतरह चिल्लाता, पंख फड़फड़ाता।

जब तक नाना-नानी पीछे से दौड़े आते- सैकड़ों कौवे इकट्ठा थे और मैं पीपल के नीचे घायल पड़ा था...

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भारी मुश्किल के दिन थे।

नाना-नानी परेशान। आस-पास के लोग ख़ासकर गुन्नू भी ऐसे ही परेशान। कुछ भी करने में असमर्थ। अवाक और लाचार। गुन्नू मेरे पास अक्सर आ बैठता और एक ही बात दोहराता कि कौवा सृजन से ही चिढ़ा है- मुझे देखता है, लेकिन कुछ नहीं बोलता।

अब मैं किसी भी सूरत में घर से बाहर नहीं निकल सकता था। कौवा ताक में बैठा था। कहीं छिपा हुआ। कह सकते हैं, कौवे ने मेरा जीना मुहाल कर दिया था। मैं उससे माफ़ी माँगना चाहता था- वह किसी भी सूरत में मुझे माफ करने को तैयार न था! सैकड़ों कौवे उसके पीछे थे-मरने-मारने को तैयार।

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छुट्टियाँ ख़त्म हुईं और स्कूल खुल गए थे।

अब मेरा यहाँ से निकलना लाज़िमी था। निकलें कैसे? यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। नाना ने एक रास्ता निकाला। पड़ोसी गिरधर की बंद जीप बुलवाई गई। गिरधर ख़ुद चला रहे थे। फटाफट तैयार होकर मैं उसमें बंद हो गया। आश्चर्य ही किया जा सकता है, मेरे जाने की भनक कौवे को लग गई थी और वह अपने बहुत सारे साथियों के साथ भयंकर शोर मचाता जीप का पीछा करता रहा। यही नहीं जिस ट्रेन के डिब्बे में मैं बैठा, वहाँ भी कौवा आ पहुँचा था और आक्रामक मुद्रा में था। साथी कौवे भी उसके साथ थे।

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दो महीने गुज़रे होंगे कि घर में एक दुःखद ख़बर आई। नाना गुज़र गए।

बड़ा संकट था। बाप को छोड़कर माँ शाजापुर जाने में लाचार थी। रोकर रह गई। मुझे ही नाना के क्रिया-कर्म की सारी रस्में पूरी करनी थीं। मैं कौवे से डरा हुआ जरूर था, लेकिन यह बात अंदर से बलवती थी कि काफी समय गुज़र गया है- कौवा भूल-भाल गया होगा। कौन इतने दिनों तक रार पाले रहेगा... इसलिए मैं निश्चिंत था। बात मन से निकल गई थी।

मैं ट्रेन में बैठा और शाजापुर स्टेशन पर उतरा कि पता नहीं कहाँ से वह कौवा आ गया। सोचता हूँ, नाना के मौत की ख़बर कौवे को थी और उसे इस बात की भी चेतना थी कि मैं नाना का क़रीबी हूँ। जिस रास्ते गया हूँ, उसी रास्ते लौटूँगा- मौत पर तो ज़रूर ही आऊँगा, सो वह स्टेशन पर पहले से आ डटा था। मेरा इंतज़ार-सा करता। फिर क्या था, मुझे देखते ही वह ऐसा चिल्लाया कि सैकड़ों कौवे पलक झपकते स्टेशन पर आ गए।

कौवों का जबरदस्त शोर और मोर्चाबंदी।

मैं बेतरह डरा हुआ। काँपता-बेहाल।

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नाना का शव अंतिम संस्कार के लिए मेरा इंतज़ार कर रहा था और मैं था इतना डरा, भयभीत कि इतनी हिम्मत न जुटा पाया कि स्टेशन-मास्टर के काँचवाले केबिन से बाहर निकल सकूँ।

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