भूले बिसरे व्यंग्यकार - तुम मुझे यों भुला न पाओगे अशोक शुक्ल – याने बामुलाहिजा होशियार // यशवंत कोठारी

अशोक शुक्ल से मैं कभी नहीं मिला एक बार अलवर अपने दोस्त की बेटी कि शादी में गया था तो पता चला की अशोक शुक्ल जी पास ही में रहते हैं लेकिन मुलाकात नहीं लिखी थी , सो नहीं हुईं. एक लेखक के रूप में उनकी रचनाओं से परिचय हुआ धर्मयुग में प्रकाशित कालेज –सूत्र से. फिर एक और रचना पढ़ी- मेरा पैंतीसवा जन्म दिन . एक व्यंग्यकार के रूप में वे थोडा और चुनिन्दा लिख रहे थे. इन रचनाओं में विट है ह्यूमर है, आइरनी कटाक्ष,,पंच आदि सब है. रचनाओं का कलेवर विशाल नहीं है, लेकिन एकाग्रता के साथ लिखे गए हैं. यह लेखन एक सिटिंग का लेखन नहीं है. कई बार का ड्राफ्ट है. इन रचनाओं में अनुभव भी झलकता है. ये वे दिन थे जब रचना लिफाफे में आती जाती थी, फेस बुक, ट्विटर , मोबाइल का जन्म नहीं हुआ था . हवा में व्यंग्य का व्याकरण, काव्यशास्त्र , सौन्दर्य शास्त्र , सपाट बयानी जैसे भारी भरकम शब्द तारी नहीं हुए थे . ये नहीं है की टीवी के सामने बैठ जाओ और घटना के घटते ही तीन सो शब्द लिखो, सम्पादक को फोन कर भेज दो. एक सम्पादक न छापे तो दूसरे को फोन करो. वो जमाना ऐसा था भी नहीं. कुछ ही दिनों के बाद उनका एक उपन्यास छप कर आया - प्रोफेसर पुराण, फिर हड़ताल हरी कथा और बाद में सारिका में सेवा मीटर . मेरे पैतींसवें जन्मदिन पर उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हेया लाल सहल पुरस्कार मिला.

अशोक शुक्ल

कुछ वर्षों का अन्तराल हो गया . कन्हैया लाल नंदन ने सन्डे मेल निकाला तो अशोक शुक्ल फिर नमूदार हुए इस बार उनका साप्ताहिक कालम –बामुलाहिजा होशियार आया . खूब पढ़ा गया . शायद ये कालम पुस्तकाकार नहीं आ सका. उनकी रचनाएँ रंग चकल्ल्स में भी छपीं. तब धर्मयुग में सुरेश कान्त का ब से बैंक छपा था तो लोग नया पढ़ना चाहते थे. इन दिनों तो व्यंग्य उपन्यासों की बहार आई हुयी है जिसे एक समीक्षक ने तथाकथित व्यंग्य उपन्यास कह दिया . बात उपन्यासों के कथ्य शिल्प और भाषा की भी होनी चाहिए. कथ्य की स्थिति ये है कि आप यदि सरकार के किसी विभाग में हैं तो उस विभाग की विसंगतियों पर उपन्यास लिख सकते हैं. ऐसे काफी प्रयोग हुए हैं. शिल्प के नाम पर प्रतीक, बिम्ब , आदि का सहारा लिया जा सकता है. भाषा का चयन सावधानी से किये जाने की जरूरत है, यहीं मेरे जैसा लेखक गलती करता है.

बड़े लेखकों को जाने दीजिये वे तो जो करेंगे अच्छा ही कहलायेगा, कालिदास व्याकरण की चिंता नहीं करता , उनके लिखे के अनुसार साहित्य की भाषा व् व्याकरण बनते बिगड़ते हैं. शुक्ल जी ने गलतियां नहीं कीं, काफी सोच समझ के लिखा , मगर समीक्षकों व् मठाधीशों को ये नागवार लगा. उन्होंने उपेक्षा का छाता तान दिया , शंकर पुणताम्बेकर , बालेन्दु शेखर तिवारी के साथ भी यहीं हुआ ..कालेज शिक्षा के पानू खोलिया के साथ भी यहीं हुआ , वैसे भी राजस्थान के लेखकों को बाहर कौन पूछता है? देथा , मणि मधुकर, रांगेय राघव व् यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र के बाद तो सब कुछ बिला गया . यही सब शुक्ल व् अन्य लोगों के साथ हुआ ,नहीं तो अगर शुक्ल उत्तर प्रदेश का झंडा ही थाम लेते तो सफल हो जाते.

वैसे अशोक शुक्ल का जनम ९ दिसम्बर १९४० को ओसरी खेर जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश में हुआ. आगरा विश्व विद्यालय से एम. ए. हिंदी के बाद वे कालेज शिक्षा विभाग राजस्थान सरकार में आ गये. काफी समय से अलवर में ही सपरिवार रहते हैं.

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उनके व्यंग्य उपन्यास समय से पहले हिंदी में आ गये सो लोगों को पचे नहीं . विलक्षण उपमाओं के सहारे शुक्ल ने व्यव्स्था व् समाज के दिवालियेपन को पूरी शिद्दत के साथ उभारा है. सपाट बयानी को गालियों से ढकने वाले लेखकों को इन रचनाओं को पढ़ना चाहिए. प्रोफेसर पुराण हो या हड़ताल हरी कथा या सेवा मीटर वे समाज व् व्यवस्था के दोगले पन को सब के सामने नंगा कर देते हैं . वे हड़ताल हरी कथा की भूमिका में लिखते हैं-

जो गलत या अटपटा , उस पर फ़ोकस डालते चलना कर्तव्य है- युग धर्म का .

अशोक जी इस युग धर्म का पालन करते हैं. वे युग धर्म का निर्वाह करने को सब कुछ दांव पर लगाने से भी नहीं चूकते .

उन्हें रामावतार चेतन व् कन्हैलाल नंदन का मार्ग दर्शन मिला इन दोनों ने शुक्ल की कलम को पहचाना और लोगों तक पहुँचाया बाकी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में कौन किसको पहचानता है?

हिंदी व्यंग्य में उपमाओं ,प्रतीकों, बिंबों का जो प्रयोग शुक्ल ने किया उससे नयी पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है ,मगर नयी पीढ़ी के पास इतना समय कहाँ है ? हड़ताल हरी कथा को १८ खण्डों में बाँट कर कथा कही गयी है. सेवा मीटर में व्यवस्था के नकारे पन को उकेरा गया है. प्रोफेसर पुराण एक अध्यापक की जिन्दगी का दस्तावेज़ है, जो आज भी प्रासंगिक है.

शुक्ल ने जल्दी लेखन बंद कर दिया उनको दूसरी पारी खेलनी चाहिए . कामना है कि वे शतायु हों और हिंदी व्यंग्य को समृद्ध करें. हिंदी व्यंग्य में ऐसा लेखन विरल है , उनको व् उनके लेखन को भूलना मुश्किल हैं . क्या चहेतों को करोडो के इनाम बाँटने वाली संस्थाओं का ध्यान भूले बिसरे लोगों की और भी जायगा ?

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यशवंत कोठारी ,८६,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर -२

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