कहानी -साँसों का सफ़र // अर्चना अग्रवाल

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“हँस  कर बोली अलविदा उस सड़क की धूल
सन्नाटा बुनने लगे गुलमोहर के फूल "

वाह , वाह की गूँज और तालियों से हॉल गूँज उठा ।  सौम्य अपनी धुन में सुनाए जा  रहा था  और लोग  भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे  थे ।

प्रोग्राम खत्म होने के बाद अपने छोटे से  दो कमरों के फ्लैट में आकर लेट गया  वो ।

यही होता है हर बार भीड़ , शोर  और वाह वाही से जब वो  अपने सूने घर में अकेला आता है तो मन जाने कैसा - कैसा  होने लगता है I एक ही  अभिन्न  साथी है उसका यहाँ गुलमोहर  का पेड़ ।

पढ़ने आया था वो दिल्ली जैसे शहर में बारहवीं के बाद , माँ बाप  उत्तर प्रदेश के एक साधन विहीन गाँव में थे ।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलना और अपनी  मनपसंद हिन्दी  ऑनर्स की डिग्री  लेना जैसे उसके  सपनों का पूरा होना था ।

कॉलिज में टॉप करने की  खुशी में जब मिठाई का डिब्बा लेकर पहुँचा घर तो मालूम नहीं था उसे कि  अब वो  अपने माँ बाप की अंतिम विदाई  ही करके आएगा ।

कुलदेवी के दर्शन कर वापिस आ रही पूरी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी और बना गई थी सौम्य को अनाथ  और अकेला  ॥

आँसू बहे नहीं पलकों की कोरों में जम से गए थे उसके । दोनों चिताओं को एक साथ अग्नि  दे  घर की चाबी  दूर के रिश्ते की  सुधा चाची को सौंप आया था वो ।

पिता पोस्ट ऑफिस में क्लर्क रहे थे , जो भी थोड़ी बहुत भविष्य निधि छोड़ गए थे  बस वही विरासत थी सौम्य  की ।

दिल्ली जैसे महानगर में एम० ए० की पढ़ाई करना , शाम को ट्यूशन पढ़ाना , नेट की तैयारी करना और फिर रात में हृदय के  जलते अलावों को कागज़ पर अंकित करना , यही दिनचर्या  थी उसकी ।

जब बहुत मन उदास हो जाता तो  चला जाता अपने गुलमोहर साथी के पास ।

उसकी पत्तियों , फूलों यहाँ तक कि उस पर कूदने वाली किट्टो गिलहरी से भी बातें करता था वो  ।
वक्त बीता , नेट की परीक्षा  पास कर  असिस्टेंट प्रोफेसर  के रूप में नियुक्ति हुई  और  बस तेईस वर्ष की अवस्था में  ही  आत्मनिर्भर और  प्रसिद्ध कवि बन गया सौम्य  ।

पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगा वो , कवि सम्मेलनों  के न्यौते भी मिलने लगे ।
उसकी कविताओं में  दर्द की  खूबसूरत  अभिव्यक्ति थी जो पाठकों और श्रोताओं के मर्म को सहज ही छू  लेती थी ।

अब उसने अपना उपनाम ही  'अकेला ' रख  लिया था ।


सौम्य 'अकेला ' , सच है  ये जीवन है ही संघर्ष , जिससे   हम अकेले ही  जूझते हैं , अपने  - अपने स्तर पर  ।
शामें अक्सर  चाय की टपरी पर कटती जहाँ  कविता सुनने के शौकीन दो चार  मिल ही जाते , फिर चाय की चुस्कियाँ , और  सुनने सुनाने का सिलसिला ।
कुछ दिनों से मन बहुत विरक्त था उसका , सुधा चाची भी कई बार बुलावा भेज चुकी  थी  I
आखिर दिसबंर की छुट्टियों में  पहुँच ही गया सौम्य चाची के घर I

वो भी उत्तर प्रदेश के ही एक कस्बे में रहती थीं ,चाचा जी की छोटी सी किराने की दुकान थी और एक ब्याहता बेटी जो पास के गाँव में ही रहती  थी ।

बहुत मुदित हुई  निर्मल स्वभाव की सुधा चाची उसे देखकर I खूब लाड़ प्यार से ठूस ठूस  कर खिलाती उसे ।  आलू के परांठे , आम का अचार , पोदीने की चटनी ,सच पेट भर जाता  पर  मन  नहीं ।

अरे , करौंदे का अचार खत्म हो गया , चाची  बड़बड़ा रही थी  रसोई में ।

मौसी , लीजिए माँ ने करौंदे का अचार बनाया है आज ही , एक पतली आवाज आई , सिर उठाकर देखा सौम्य ने , लगभग 18 वर्ष की लड़की , दो चोटी , सिम्पल सूट , गेहुँआ  रंग , दरम्याना कद I

एक  अजनबी को अपनी ओर ताकते देख कुछ लजा सी गई वो , कानों की लवों तक  सुर्खियाँ फैल गईं ।

आ , सुमि , बड़े सही वक्त पर आई , इस समय भगवान से कुछ और भी माँगती तो  वो भी मिल  जाता "सुधा चाची पुलकित हो आई ।

फिर उसे यूँ चुपचाप खड़ा देख बोली , अरे ये  मेरा भतीजा है दिल्ली से आया है , बहुत बड़ा प्रोफेसर है  ये  वहाँ ।

चाची  को कांच की कटोरी देते  हुए  सुमि की  उँगली  अचार से छू गई  तो वो चाट गई उस  उंगली को  ।

सौम्य बच्चों जैसी हरकत  देखकर  मुस्कुरा दिया ।

उसे मुस्कुराते  हुए  देखकर  वो एकदम  सिटपिटा गई  और जल्दी से चली गई ।
छोटे कस्बों में आज भी शांति की ज़िंदगी है , ट्रैफिक के शोर से परे , आपाधापी से दूर  सर्दियों की गुनगुनी  धूप में , छत पर चारपाई डालकर मनपसंद किताब पढ़ना , मूली , गाज़र  खाना  और अलसाते हुए  सो जाना , अहा सारे  सुख इसके आगे फीके हैं , सच्ची ।

सुमि का घर चाची के घर से कुछ ही मकान आगे था , छत पर बाल बनाती , अचार ,मंगोड़ी और कपड़े सुखाती दिख जाती वो सौम्य को , शुरु - शुरू में तो ज़्यादा ध्यान नहीं दिया सौम्य ने , एक अलसाती सी दोपहर को जब नज़रे मिलीं तो कुछ झिझक गई वो ।


‘'अरे सौम्य , तू दिन भर खाली रहता है , ज़रा सुमि को ही पढ़ा दिया कर . बारहवीं के बोर्ड के पेपर हैं उसके , “ चाची अचानक बोली एक दिन ।

सौम्य कुछ कह पाता इससे पहले ही सुमि अपनी किताबें उठा कर घर में खड़ी थी । कुछ असमंजस के साथ वो पढ़ाने लगा उसे , आर्टस विषय थे इसलिए सौम्य को ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई पढ़ाने में , उसने महसूस किया ज़हनी तौर पर सुमि प्रतिभावान है पर अक्ल अभी कच्ची है , ज़्यादातर बातों के ज़वाब वो सिर हिलाकर ही देती थी कभी दाएं से बाएं कभी ऊपर से नीचे ।
उसे पढ़ाते-पढ़ाते कुछ लगाव सा होने लगा था सौम्य को ।
पर सुमि अधिकतर नज़रें ही झुकाए रहती । एक दिन वहीं स्टडी टेबल पर पड़ी उसकी डायरी देख कविताएँ पढ़ने लगी वो तभी सौम्य बाहर से कमरे में दाखिल हुआ , हड़बड़ा कर हाथ से छूट गई डायरी उससे ।
अपनी आँखें गोल-गोल कर बोली , " आप इत्ती सारी और अच्छी कविताएँ कैसे लिख लेते हैं ?

मुस्कुरा भर दिया सौम्य जवाब में I
उस दिन के बाद सुमि उसको अत्यंत आदर देने लगी ।
छुट्टियों के अंत में किताबों के बीच एक लिफ़ाफा छुपाकर लाई वो , उसे देकर बोली इसे स्वीकार कर लीजिए , मुझे खुशी होगी । किसी को बताइएगा नहीं।
उसके जाने के बाद खोलकर देखा तो उसमें एक आसमानी रंग का खूबसूरत पुलोवर था उसके लिए ।
बहुत सूखी सी थी ये मन की धरती , वर्षा की हल्की बौछार से ही सौंधी महक देने लगी I
स्नेह की उष्मा से आँखें गीलीं हो गईं सौम्य की ।
छुट्टियाँ खत्म होते ही वो वापिस दिल्ली आ गया कुछ खोकर कुछ पाकर अनजाना सा ।


फिर वही रोज़मर्रा की दिनचर्या और गुलमोहर से बातचीत शुरू हो गई थी सौम्य की । पर अब कुछ अंतर था , जाने कहाँ से उसके और गुलमोहर के बीच अब सुमि भी आने लगी थी , उसकी दो चोटी ,सिर यूँ हिलाना , कभी-कभी बड़ी-बड़ी मासूम आंखों से बिन बोले ही सब कह जाना , सब याद आने लगता ,शुरू में बड़ी कोफ़्त होती उसे फिर धीरे - धीरे उसने और शायद गुलमोहर ने भी सुमि को अपनी मंडली में शामिल कर लिया था । नितांत निजी क्षणों में भी अब सौम्य अकेला नहीं रह गया था । कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में अचानक सैलाब की तरह आते हैं और भिगो जाते हैं तन , मन और उन अनछुए एहसासों को जो शायद हमें भी पता नहीं होते I
देखते ही देखते अप्रैल का महीना आ गया खूबसूरत आरेंज कलर के फूलों से भर गया गुलमोहर , धूप में तो ऐसे लगता जैसे दहक रहा हो ।
जून में सुधा चाची का ख़त आया , सुमि ने फर्स्ट डिवीज़न से बारहवीं उत्तीर्ण की थी और स्कूल में टॉप भी । खुश हो गया सौम्य भी , जल्दी ही गर्मी की छुट्टियों में आने को लिखा था चाची ने । एक अनजानी सी डोर खींच रही थी कुछ दिन उधेड़बुन में बीते फिर जा पहुँचा सौम्य चाची के घर । अब कि बार तो सभी ने उसका विशेष स्वागत किया ,सुमि की माताजी खोए के पेड़ो से उसका मुंह मीठा कराने आई , बातों-बातों में सुमि के आगे पढ़ने की बात चली तो पता चला कि वो लोग उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में कतई नहीं है , एक तो कॉलिज की कस्बे से दूरी और दूसरा घर की आर्थिक स्थिति । सौम्य ने आगे पढ़ाई की वकालत की तो सुमि की मां ने एकदम असमर्थता जता दी। बहुत दुख हुआ उसे , इतनी प्रतिभावान लड़की यहाँ के माहौल के कारण आगे पढ़ भी नहीं पाएगी । शाम को सुमि चाची के पास आई तो उसकी आँखें लाल थीं लगातार रोने के कारण । कुछ पिघल सा गया मन सौम्य का । धीरे से पूछा उसने , "कैसी हो ?
ठीक , भारी पलकें उठा कर उसने कहा , आज भी सिर हिल ही गया जवाब देते हुए उसका ।
मुस्कुरा दिया सौम्य ।
उदासी के बादल ज्यों छंट से गए अब ।
अब सौम्य ने एक  निर्णय ले लिया मन ही मन 

सौम्य ने चाची को बताई दिल की बात  । लाख बलाएँ लेने लगीं चाची । तुरत फुरत सब इंतजाम किए गए , सुमि ने तो सिर हिलाकर हामी भर ही दी । शादी की सब तैयारियाँ कर ही चैन लिया चाची ने । पंद्रह दिन में सब निपटाकर सौम्य और सुमि दिल्ली आ गए । दिल्ली जैसे महानगर में आलीशान मॉल , चमचमाती गाडियाँ कभी ना खाली होने वाली सड़कें ,मैट्रो देखकर हक्की बक्की रह गई सुमि । नादानी अभी भी थी सुमि में । अक्सर पंजाबी बाग फ्लाईओवर पर वो गाड़ियाँ देखने जाती । घर को भी संभाल लिया उसने , कॉलिज में उसका एडमिशन करवा सौम्य को सुखद तृप्ति हुई |
वीरान रसोई में सुमि की चूड़ियों की खनक गूँजने लगी I दोनों समय भरपेट खाना मिलने लगा सौम्य को बस एक बात नहीं बदली गुलमोहर का पेड़ अब तो सुमि की भी दोस्ती हो गई थी उससे , दोनो अक्सर शाम को घूमते हुए पहुँच जाते उसकी छाँव में , सच बड़ा सुकून मिलता I
सुमि अब खुले बालों में क्लचर लगा फिटिंग के सूट में कॉलिज जाती , लावण्य और भी बढ़ गया था उसके चेहरे पर । लोगों की निगाहें प्रशंसा से उठ ही जातीं उसकी ओर । सौम्य के छात्रों में भी चर्चे होने लगे थे उसके । यदाकदा महसूस किया सौम्य ने कि यूनिवर्सिटी के लोग मिलने तो उससे आते पर दिलचस्पी सुमि में ज़्यादा लेने लगते। अखरता था ये सौम्य को , पर क्या करें ? अब सुमि के कदम तो नहीं रोक सकता था । प्रतिभाशाली सुमि ने प्रथम वर्ष में ही कॉलिज में टॉप किया ,बधाई देने वालों के बुके पूरे घर में छा गए , खुशी हुई सौम्य को पर कहीं अंदर से कुछ दरक सा गया ।

ऐसा होता है ना कभी-कभी कि कृतिकार स्वयं अपनी कृति से ईर्ष्या कर बैठता है , बस वैसे ही कुछ - कुछ ।
मर्द कितना भी आधुनिक हो जाए , औरत पर स्वामित्व की भावना रहती है कहीं न कहीं उसके मन में , यही सच है ।
एक दिन सुमि के कॉलिज में एयर होस्टेस एकेडमी द्वारा सेमिनार आयोजित किया गया , सुमि चुनी गई पाँच लड़कियों में से एक थी।
सौम्य को बताते हुए खुशी से चहक रही थी वो पर सौम्य चुप था , अकेला था । वो सुमि की खुशी में खुश था पर कहीं कुछ कचोट रहा था उसे ।


दरअसल सौम्य के मन का अथाह प्यार ही उसे सुमि के प्रति ईर्ष्यालु बनाता था कहते हैं ना आशिक सब गवारा कर सकते हैं पर इश्क का बंटवारा नहीं।
उसे लगता कोई छीन लेगा सुमि को उससे ।
इसी बीच अचानक एक दिन सुमि ने बहुत उदास मन से अपने प्रेग्नेंट होने की खबर दी सौम्य हर्ष से नाचने लगा  पर सुमि . . अपने सपनों को टूटता देख नहीं चाहती थी इस बच्चे को जन्म देना । वो जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी,कुछ करना चाहती थी जिस रास्ते में ये बच्चा सिर्फ रूकावट है और कुछ नहीं ।
धीरे से अबोर्शन की बात कही  तो सौम्य के अंदर का मर्द जाग उठा
“ऐसा कभी सोचना भी मत”
सौम्य को अंगारों सा दहकता देख सहम गई सुमि ।
तो क्या वो अपने सपने यूँ ही अधूरे छोड़ दे ?
क्या पत्नी होने के कारण उसे हक नहीं कि वो निर्णय ले सके अपने विषय में ?

क्यूँ हमेशा एक औरत ही बलिवेदी पर चढ़े ?
सौम्य अब उसके खाने. पीने का खूब ध्यान रखता , कॉलिज में भी छुट्टी की एप्लीकेशन दे दी गई थी ।
फल , जूस , दूध हमेशा भरे रहते घर की फ्रिज में ।
पर सुमि कुछ वीरान सी आँखों से कहीं दूर शून्य में ताकती रहती।
माँ बनने से उसे एतराज़ नहीं था पर वो कतई तैयार नहीं थी अभी इस सब के लिए। उसे ये बच्चा बोझ सा लगता और घर कैदखाना।
कहते हैं ना दिल में खुशी ना हो तो खाया - पिया भी नहीं लगता ।
डा० लगातार सुमि के कमजोर होने की चेतावनी देती , मल्टीविटामिन लिखती पर सुमि की आँखों के काले घेरे कम ना होते।
आखिर उसका ध्यान रखने के लिए चाची को भी बुलाया सौम्य ने
पर कुछ खास लाभ ना हुआ !
आखिर सातवें महीने में ही सुमि की तबीयत बिगड़ने के कारण ऑपरेशन करना पड़ा , लाख कोशिशों के बाद नवजात बच्ची तो बच गई पर सुमि नहीं .. । घर की अल्मारी से पैसे निकालते हुए सौम्य को सुमि का खत मिला, लिखा था .. सौम्य, शायद मैं इस दुनिया में ना रहूँ पर तुम मेरी परी को ज़रूर पढ़ाना , लिखाना इसके सारे सपने पूरे करना , मुझे पता है बिटिया ही होगी , मैं देख चुकी हूँ उसे सपने में ।
टूटकर रह गया सौम्य ‘ अकेला ‘


* मौलिक एवं अप्रकाशित


अर्चना अग्रवाल
शिक्षा - एम.ए. बी.एड 
दिल्ली विश्वविद्यालय में दो बार सर्वश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार विजेता
ई बुक प्रकाशित - आँसू और दिल

ई बुक प्रकाशित - मन के धागे @juggernaut.in
ई बुक प्रकाशित - मोरपंख pothi.com


हृदय के अनकहे भावों को कलम द्वारा अंकित करने का प्रयास करती हूँ । कहाँ तक सफल होती हूँ इसकी गणना पाठकगण स्वयं करें I

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7 टिप्पणियाँ "कहानी -साँसों का सफ़र // अर्चना अग्रवाल"

  1. वाह दिल को छू गयी

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  2. अर्चना जी
    बहुत उम्दा कहानी
    कहानीकार को प्रणाम दिल से

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  3. बहुत उम्दा लिखी

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रशंसा प्रोत्साहन देती है :)

      हटाएं
  4. मैं आपकी 3 रचनाओं को पढ़ चुका हूं अभी तक भीगा मन, मन के धागे और ये. मुझे अपकी सभी कहानियाँ दिलचस्प लगी और मैं चाहता हूं और पढ़ना अपकी रचनाओं को. पहली दो कहानीओ के बाद बहुत ढूंढने के पश्चात मिली मुझे यह। मेरी इच्छा है कि मैं आपकी और रचनाओं को भी पढूं।
    Email id manishcirino@gmail.com

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