राजेश माहेश्वरी की कविताएँ

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सच्‍चा लोकतंत्र 

पहले था राजतंत्र
अब आ गया है लोकतंत्र।
पहले राजा शोषण कर रहा था
अब नेता शोषण कर रहा है।
जनता पहले भी गरीब थी
आज भी गरीब है।
कोई ईमान बेचकर,
कोई खून बेचकर
और कोई तन बेचकर
कमा रहा है धन।
तब भर पा रहा है
अपना और अपने परिवार का पेट।
कोई नहीं है
गरीब के साथ,
गरीबी करवा रही है
प्रतिदिन नए-नए अपराध और पाप।
खोजना पड़ेगा कोई ऐसा मंत्र
जिससे आ पाये सच्‍चा लोकतंत्र।
मिटे गरीब और अमीर की खाई।
क्‍या तुम्‍हारे पास है कोई
ऐसा इलाज मेरे भाई।



        अनुभव

अनुभव
अनमोल हैं
इनमें छुपे हैं
सफलता के सूत्र
इनमें हैं
अगली पीढ़ी के लिये
नया जीवन।

बुजुर्गों के अनुभव
और
नई पीढ़ी की रचनात्‍मकता से
रखना है
देश के विकास की नींव।

इस पर बनी इमारत
होगी इतनी मजबूत
कि उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे
ठण्‍ड-गर्मी-बरसात
आंधी या भूकम्‍प।

अनुभवों को अतीत समझकर
मत करो तिरस्‍कृत
ये अनमोल हैं
इन्‍हें अंगीकार करो
इनसे मिलेगी
राष्‍ट्र को नई दिशा
समाज को सुखमय जीवन।



प्रेरणा के स्‍त्रोत

अपनी व्‍यथा को
कथा मत बनाइये
इसे दुनिया को मत दिखाइये
कोई नहीं बांटेगा आपकी पीड़ा
स्‍वयं को मजबूर नहीं
मजबूत बनाइये
संचित कीजिये
आत्‍म शक्‍ति व आत्‍म विश्‍वास
कीजिये आत्‍म मंथन
पहचानिये समय को
हो जाइये कर्मरत
बीत जाएगी व्‍यथा की निशा
उदय होगा सफलता का सूर्य
समाज दुहरायेगा
आपकी सफलता की कथा
आप बन जाएंगे
प्रेरणा के स्‍त्रोत।




    जय हनुमान

ऐसा कोई स्‍थान बता दो 
जहाँ प्रभु का वास ना हो
ऐसा कोई समय बता दो
जब हनुमान प्रभु के साथ ना हो
प्रभु को कभी कोई कष्‍ट ना हो
इसके लिए समर्पित हैं हनुमान
राम उनके बिना रह नहीं सकते
चलता नहीं हैं उनका काम
प्रभु के हृदय में रहती हैं सीता माता
उनके पुत्र के समान है हनुमान
माता की सेवा में भी समर्पित रहकर
करते हैं उन्‍हें सादर प्रणाम
दिन रात उनके मुख से निकलता है
एक ही नाम, जय श्री राम, जय श्री राम
दोनोx हाथ उठाकर देश के युवाओं को
मानो दे रहे हैं आर्शीवाद बाहुबली हनुमान
बनो शौर्यवीर, ऊर्जावान और बलवान
जिससे देश का हो उत्‍थान
जीवन में अपना लक्ष्‍य व ध्‍येय निर्धारित कर
नित्‍य नये सृजन करो
देश में नयी क्रांति लाकर
मँहगाई, भ्रष्‍टाचार और अनैतिकता को खत्‍म करो
राष्‍ट्रहित व राष्‍ट्रभक्‍ति के लिये
सदा समर्पित रहो देश के नौजवान
विश्‍व में यशकीर्ति की पताका फैलाकर
भारत को बनाओ महान
ऐसी अपेक्षा और प्रतीक्षा
कर रहें हैं श्री हनुमान



प्रभु दर्शन


मन प्रभु दर्शन को तरसे
विरह वियोग श्‍याम सुंदर के
झर-झर आँसू बरसे।
इन अँसुवन से चरण तुम्‍हारे
धोने को मन तरसे ।
काल का पहिया चलता जाए
तू कब मुझे बुलाए।
नाम तुम्‍हारा रटते रटते
ही यह जीवन जाए।
मीरा को नवजीवन दीनो
केवट को आशीष।
शबरी के बेरों को खाकर
तृप्‍त हुए जगदीश।
जीवन में बस यही कामना
दरस तुम्‍हारे पाऊँ।
गाते गाते भजन तुम्‍हारे
तुम में ही खो जाऊँ।




कवि की कथा


संवेदना हुई घनीभूत
होने लगी अभिव्‍यक्‍त
और वह कवि हो गया।
धन कमाता, पर उसे
अपनी आवश्‍यकता से अधिक
आवश्‍यक लगती
औरों की आवश्‍यकता
और वह अपना धन बाँटकर
हो जाता फक्‍कड।
जहाँ कुछ नहीं होता
वहाँ होती है कविता
और फिर वह
अपने आप से कहता
अपने आप से सुनता
और उसी में करता रमण
देता उसे सार्थकता
अगर मिल जाता श्रोता
मिल जाती वाह वाह तो
जैसे उसे मिल जाती
संसार की सारी दौलत
धन आता और चला जाता
वह रहता फक्‍कड़ का फक्‍कड़
कविता का सृजन
चलता निरंतर
सृजन की संतुष्‍टि
श्रोता की वाह वाह में
सार्थकता का आनंद
यही है उसकी सुबह
यही है उसकी शाम
यही हैं उसके जीवन का प्रवाह।




अहिंसा परमो धर्मः

अहिंसा परमो धर्मः
कभी थी हमारी पहचान
आज गरीबी और मँहगाई में
पिस रह इंसान
जैसे कर्म करो
वैसा फल देता है भगवान।
पर कब, कहाँ और कैसे
नहीं समझ पाता इंसान।
मंदिर, मस्‍जिद, गुरूद्वारा, चर्च
सभी बन रहे हैं आलीशान।
कैसे रहें यहाँ पर
प्रभु स्‍वयं है परेशान
वे तो बसते हैं
दरिद्र नारायण के पास।
हम उन्‍हें खोजते है वहाँ
जहाँ है धन का निवास।
पूजा, भक्‍ति और श्रद्धा तो
साधन है
हम इन्‍ही में भटकते है।
परहित, जनसेवा और
स्‍वार्थरहित कर्म की ओर
कभी नहीं फटकते है।
काल का चक्र
चलता जा रहा है।
समय निरंतर गुजरता जा रहा है।
दीन दुखियों की सेवा
प्‍यासे को पानी
भूखे को रोटी
समर्पण की भावना
घमंड से रहित जीवन से होता है
परमात्‍मा से मिलन
अपनी ही अंतर्रात्‍मा में
होते है उसके दर्शन।
जीवन होगा धन्‍य तुम्‍हारा
प्रभु की ऐसी कृपा पाओगे
हँसते हँसते अनंत में विलीन हो जाओगे।


जीवन ऐसा हो


गंगा, यमुना, सरस्‍वती  से पवित्र हों
हमारे आचार और विचार।
हिम्‍मत हो
हमसफर और हमराज़।
सागर से गहरी हो
प्रेम व त्‍याग की प्‍यास।
श्रम व कर्म के प्रति
हो हमारा समर्पण।
यह इतना आसान नहीं
पर असम्‍भव भी नहीं।
सत्‍य और ईमानदारी की राह पर
रहो संघर्षशील
इसे समझो अपना कर्तव्‍य,
मन में हो धैर्य,
सफलता की चाह
तो राहें भी होंगी आसान
तुम्‍हें मिलेगा
जीवन में असीम उत्‍साह का भाव
और प्राप्‍त करोगे
सुखद परिणाम
जल की लहरों के समान
सुख और दुख का ज्‍वार - भाटा
जीवन में आता रहेगा
पर विजय श्री प्राप्‍त कर
आत्‍म संतोष का होगा दिव्‍य दर्शन।
ऐसा शान्‍तिप्रिय को हमारा जीवन।



युवा

युवा हो तुम
शक्‍ति, शौर्य,वीरता ,सभ्‍यता,
संस्‍कृति और संस्‍कारों के प्रतीक
राष्‍ट्र की प्रगति और विकास का
भार तुम्‍हारे कंधों पर
देश को है तुम पर गर्व और नाज़
आज तुम्‍हारे मुख पर प्रसन्‍नता और
संतुष्‍टि का भाव नहीं
युवा मनन, चिंतन और
मंथन में हो गया व्‍यस्‍त
देश में मँहगाई, अनैतिकता, भ्रष्‍टाचार
को देखकर हो गया त्रस्‍त
उसने लिया संकल्‍प कि
अब इन्‍हें मिटाना होगा
मजबूर नहीं मजबूत होकर
जनता में क्रांति का शंखनाद करना होगा
तभी देश में होगा परिवर्तन और
बुराइयों का होगा निर्गमन
राम राज्‍य की कल्‍पना साकार होकर
राष्‍ट्र को एक नई दिशा देगी
और हमारे देश को महान राष्‍ट्र
की श्रेणी में लाकर खडा कर देगी।



पत्रकारिता

पत्रकारिता
समाज की दिशा दर्शक
सभ्‍यता और संस्‍कृति की प्रहरी।
प्रतिदिन की घटनाओं को
संसार के उन्‍नयन और पतन को
समय की प्रतिबद्धता के साथ
समाज के सामने रखता
सुबह का अखबार
समाज का आईना था।
पत्रकार
स्‍वतंत्र और निष्‍पक्ष था।

अर्थ तंत्र ने
दोनों पर किया प्रहार
पत्रकारिता और पत्रकार
हानि-लाभ के गणित में उलझे
व्‍यवसायी हो गए।

अभी भी समय है
सरकार आगे आए
पत्रकार को
आर्थिक रूप से सक्षम बनाए
पत्रकारिता को
व्‍यवसायिकता से मुक्‍त कराए
तभी समाचार पत्र
समाज का
आईना बन पाएगा
पत्रकार अपनी
सच्‍ची भूमिका निभा पाएगा।





भविष्‍य का निर्माण

अंधेरे को परिवर्तित करना है
प्रकाश में
कठिनाइर्यों का करना है
समाधान
समय और भाग्‍य पर है
जिनका विश्‍वास
निदान है उनके पास
किन सपनों में खो गए
सपने है कल्‍पनाओं की महक
इन्‍हें हकीकत में बदलने के लिए
चाहिए प्रतिभा
यदि हो यह क्षमता
तो चरणों में है सफलता
अंधेरा बदलेगा उजाले में
काली रात की जगह होगा
सुनहरा दिन
जीवन गतिमान होकर
रचेगा एक इतिहास
यही देगा नई पीढी को
जीवन जीने का संदेश।


JABALPUR, 482008 [ M.P.]

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1 टिप्पणी "राजेश माहेश्वरी की कविताएँ"

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