दोहे : हेमंत से बसंत तक // राकेश सुमन

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  हेमंत

शरद विदाई ले चुका , अब आया हेमंत ।
  कब आये परदेश से , सरल सजीला कंत।

पाती जो पाती प्रिये , सब कुछ जाती भूल ।
पछुआ शूल चुभा रही , हर पाती हर फूल।

ओस दुशाला ओढ़ कर , वसुधा तकती भोर ।
होगी शीतल धूप कब , हर कोना हर छोर ।

चाँद सिहरता रात भर , ऐसी चले बयार I
शीतल तन को ढाँकता , छत पर बारम्बार ।


शिशिर

बरस रहा नभ ओस बन , दिखे ना कोई छोर ।
शिशिर आ गया देख लो , धवल दिशा हर ओर I

ओढ चादर कुहरे की , ठिठुरे हर एक ताल।
उस पर शीतल चन्द्रिका , करती है बेहाल।

ओस झरे है रात भर , जैसे हरसिंगार।
चुनने ऊषा आएगी, पीत चुनरिया डार।

भोर गुनगुनी फेकती , रवि किरणों का जाल ।
बँधने को तैयार जग, शिशिर करे बेहाल I


बसंत

कोयल बोली बाग में ,आ गया है बसंत ।
नव कोंपल हर शाख पर, हुआ शिशिर का अंत ।

प्रीत पराग भरे उर में , खिलने को बेचैन I
हुयी बावरी हर कली , सुन भँवरों के बैन।

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     राकेश सुमन
                     (बोईसर, जिला पालघर)

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