लघुकथा // ........छोटी छोटी खुशियाँ......... // अनघा जोगलेकर

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            "इस वेलेंटाइन डे पर तुम्हें जो तोहफा चाहिए हो, पहले ही बता देना। कल ऑफिस से आते समय लेते आऊँगा।" पलाश की बात सुन, मीनू मुस्कुराते हुए रसोई में चली गई।

पलाश भी पीछे पीछे आ गया, "बताओ न मीनू, क्या चाहिए तुम्हें।"

       "आज बड़े रोमेंटिक मूड में हैं ज़नाब।" मीनू ने हंसते हुए कहा।

           "क्या करें यार। हफ्ते में 6 दिन सुबह 8 बजे ऑफिस जाओ तो रात 9 बजे ही घर लौटो। और रविवार को तो लगता है बस आराम ही करो। कहीं जाने का मन ही नहीं करता।"

          "अच्छा सुनो, चलो न सब्जी लेकर आते हैं।"

           "अरे यार। अब रविवार खराब न करो। ये सब्जी-वब्जी लाना, मुझसे न होगा। मुझे तो माफ ही करो।"

         "चलो न प्लीज़। प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़।"

आखिर मन मारकर पलाश को मीनू के साथ सब्जी लेने जाना ही पड़ा।

वापस आकर उसने फिर वही पूछा, "मीनू अब तक तुमने बताया नहीं है कि तुम्हें वेलेंटाइन डे पर क्या चाहिए। फिर न कहना कि मैंने पूछा नहीं।"

        "मुझे तो मेरा तोहफा मिल भी गया।"

        "मिल भी गया? कब...."

      "अभी"

"अभी?"

       "हाँ। अभी हम दोनों सब्जी लेने गए थे न, बस वहीं मुझे मेरा तोहफा मिल गया।"

       "तुम्हारा मतलब.....वो..वो सब्जियां तुम्हे तोहफे में चाहिए थीं?"

          "नहीं बाबा। अच्छा तुम्हें याद है जब हमारी नई-नई शादी हुई थी। हम साथ बाजार जाया करते थे और सब्जीवाले से तुम्हें औरतों जैसे मोलभाव करते देख, मैं खिलखिलाकर हँस पड़ती थी। आज फिर तुमने मुझे वैसे ही खिलखिलाने का मौका दे दिया। थैंक्स।"

पलाश मुस्कुराया फिर हौले से बोला, "आज लाई हुई ये सब्जियां कितने दिनों में खत्म हो जाएंगी?"

@अनघा जोगलेकर

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