पर्यावरण प्रदूषण के प्रति हिन्दी हाइकुकारों की चिन्ता - डॉ॰ हरिश्चन्द्र शाक्य, डी॰लिट्॰

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     विज्ञान के चमत्कारों और बढ़ती जनसंख्या के कारण मानव प्रकृति के साथ निरंतर छेड़छाड़ कर रहा है और अपनी मूलभूत सुविधाएँ जुटा रहा है। प्रकृति के अत्यधिक उपयोग के कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो गया है जिसके कारण अनेक जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों का जीवन संकट में पड़ गया है। मानव जीवन भी प्रदूषण का दंश झेलता हुआ संकटग्रस्त है।


     पर्यावरण क्या है यह जानने के लिए हम जर्मन वैज्ञानिक अरनेस्ट हैकल की परिभाषा को लेते हैं जो इस प्रकार है- ''किसी भी जीव-जन्तु से समस्त कार्बनिक व अकार्बनिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को पारिस्थिकी या पर्यावरण कहेंगे।’’ वेदमूर्ति पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपनी पुस्तक ''पर्यावरण असंतुलन जिम्मेदार कौन?’’ में लिखा है, ''वैज्ञानिक शब्दावली में कहना हो तो चारों ओर की भूमि, जल, वायु और इसके भीतर ऊपर के सजीव निर्जीव सब पदार्थ मिलकर बायोस्फियर यानी जीव मंडल है। इस जीव मंडल और मनुष्य के बीच परस्परावलंबी संबन्ध का नाम पर्यावरण है।’’ कोई जीव, प्राणी, वनस्पति उपयुक्त पर्यावरण के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि मानव की संस्कृति और उसके जीवन के विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान पर्यावरण का ही रहता है।


     पर्यावरण के प्रदूषित होने के कारण ग्लोबल वार्मिंग, भूकम्प, सुनामी लहरें, चक्रवती तूफान जैसी प्रलयंकारी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है जो धन-जन की हानि का कारण बन रही हैं और मानव जीवन के साथ-साथ संपूर्ण जीव-जगत(जन्तु व वनस्पति) को त्रस्त कर रही हैं। विभिन्न बीमारियाँ भी प्रदूषण के कारण उत्पन्न हो रही हैं जो महामारियों का रूप धारण कर रही हैं।


     बिगड़ते पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या पर हमारे देश के विभिन्न हिन्दी हाइकुकार कवियों ने अपनी कलम चलाई है और समाज को इस समस्या से निपटने हेतु जागरूक किया है। बाह्य प्रदूषण में मुख्यतः वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण हैं। बाह्य प्रदूषण का दंश झेलता हुआ मानव जीवन मानसिक प्रदूषण से भी ग्रस्त है जिसके कारण समाज में तनाव, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्या, लूट तथा फौजदारी तथा आतंक आदि तमाम समस्याएँ आये दिन उसे सताती रहती हैं।


     हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो गया है इस सम्बन्ध में हिन्दी हाइकुकारों को जो चिन्ता हुई है वह समस्त मानव समाज की चिन्ता है। और यह चिन्ता संपूर्ण प्रकृति व जीव जगत के लिए हितकारी साबित हो सकती है। पर्यावरण प्रदूषण पर विभिन्न हिन्दी हाइकुकारों के कतिपय हिन्दी हाइकु प्रस्तुत हैं-
''कैसा वातास
प्रकृति का विनाश
घुटती साँस।’’
                             -डॉ0 रमाकान्त श्रीवास्तव
''खड़ा विनाश
छेड़ता प्रकृति को
आस ही पास।’’
                             -डॉ0 बिन्दू जी महाराज
''प्रकृति हारी
प्रदूषण का जोर
संकट भारी।’’
                             -लाल बिहारी गुप्त ‘लाल’
''पर्यावरण
है उथल-पुथल
महाविनाश।’’
                             -राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
''प्रकृति कोप
भूकम्प वर्षा सूखा
आँधी तूफान।’’
''कैसा आवरण
प्रदूषित हो गया
पर्यावरण।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
''ये प्रदूषण
बने खर दूषण
जलवायु के।’’
                             - डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनन्द’


     प्रकृति के बिना जीवन संभव ही नहीं है किन्तु प्रकृति का अत्यधिक दोहन पर्यावरण की एक जटिल समस्या है जो अन्य समस्याओं को जन्म देती है। बढ़ती जनसंख्या और वैज्ञानिक संसाधनों की होड़ के कारण प्रकृति से निरन्तर छेड़छाड़ हो रही है और उसके शाश्वत नियमों की घोर उपेक्षा हो रही है। हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में प्रकृति के अत्यधिक दोहन की समस्या और प्रकृति के नियमों की घोर उपेक्षा पर कतिपय हिन्दी हाइकु देंखे-


''है अभिशाप
प्रकृति का दोहन
देता संताप।’’
                             -डॉ0 महाश्वेता चतुर्वेदी
''कैसा जीवन
प्रकृति का दोहन
मृत्युवरण।’’
                             -डॉ0 ललित फरक्या ‘पार्थ’
''नाश कराती
प्रकृति नियम की
घोर उपेक्षा।’’
                             -डॉ० मिथिलेश दीक्षित


     प्रकृति शब्द का नाम मन में आते ही नदी, पहाड़, पठार, वन, झरना, ऋतुएँ, मौसम, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, पानी, बर्फ, बादल आदि के चित्र अपने आप हृदय पटल पर उभरने लगते हैं। इन्हीं सब से मिलकर पर्यावरण का निर्माण होता है। इनकी प्राकृतिक आभा को देखकर हृदय में आह्लाद उत्पन्न होता है। प्रदूषण ने इनके प्राकृतिक स्वरूप को ग्रस लिया है जिसके कारण तमाम समस्याओं ने स्वतः ही जन्म ले लिया है। पेड़-पौधे पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं जिससे वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न नहीं हो पाती है और पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को जकड़े रहती हैं जिससे मिट्टी का कटाव नहीं होता। पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई पर हिन्दी हाइकुकारों ने गहरा दुख प्रकट किया है। कतिपय हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में यह व्यथा देखें-


''कटे जंगल
गँवार बेदखल
उगे महल।’’
                             - कमला निखुर्पा
''वृक्ष कटते
जंगल हैं घटते
जीव तड़पे।’’
                             - कुन्दन पाटिल
''वृक्ष की व्यथा
चररर चीखे या
चेतावनी दे।’’
                             - डॉ0 भगवत शरण अग्रवाल
''हरे पेड़ थे
सड़क ने खा लिये
यह क्या हुआ।’’
                             -कृष्ण शलभ
''ऋतु विधवा
गायब हुये पेड़
जो थे दवा।’’
''सड़क आई
हरे कुछ दरख्त
खूब चबाई।’’
                             -डॉ0 मनोज सोनकर
''वन अरण्य
जलें रुई मानिन्द
लपटें धुँआँ।’’
                             -डॉ0 सुधा गुप्ता
''वृक्षों को नहीं
बेटे काट आया है
ओ अहंकारी।’’
                             -आर0पी0 शुक्ला
''कटते पेड़
फैलता रेगिस्तान
जीवन त्रस्त।’’
                             -कृष्ण कुमार यादव
''कटे बिरिछ
गाँव की दुपहर
खोजती छाँव।’’
                             -डॉ0 रमाकान्त श्रीवास्तव
''ये पेड़ पौधे
बोल नहीं पाते क्यों
हैं मौन साधे।’’
''बिना जीवन
न छाया दे सकेंगे
वृक्ष ये सूखे।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
''कहते पेड़
काटो नहीं हमको
छोड़ो भी होड़।’’
                             -डॉ0 घमण्डी लाल अग्रवाल
''वृक्ष हैं मौन
आत्मा करे चीत्कार
काटे श्ौतान।’’
                             -डॉ0 गीता ‘मीत’
''विटप रोये
कट रहा है बाग
हम न सोये।’’
                             -डॉ0 पल्लवी दीक्षित
''वृक्ष देवता
देते हैं प्राण वायु
इन्हें न काटो।’’
                             -रमाकान्त शाक्य
''जंगल कटे
धरा कँपकँपाये
सुनामी लाये।’’
                             -सुभाष नीरव
''पाप हरते
वृक्ष स्वयं जरते
छाया करते।’’
                             -शिव कुमार पाण्डेय ‘विराट’
''क्या ये विकास
मत काटो पेड़ों को
होगा विनाश।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनन्द’
''कोयल आई
बैठे किस डाल पे
वृक्ष गायब।’’
                             -सदाशिव कौतुक


     वृक्षों के अन्धाधुन्ध कटान से वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ गयी है जिसके कारण भूमंडलीय ताप बढ़ गया है और सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से पृथ्वी के जीव जगत की रक्षा करने वाले ओजोन के आवरण में छेद हो गये हैं। इन समस्याओं को कतिपय हिन्दी हाइकुकारों की वाणी में देखें-


''जो बढ़ गया
भूमंडलीय ताप
है अभिशाप।’’
''सूर्य का कोप
मजबूत कर लो
ओजोनी टोप।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य
''मानव चेत
ओजोन परत में
बढ़ता छेद।’’
                             -डॉ0 सुधा गुप्ता
''नष्ट करेगी
धुँआँ, धूल व गैस
ओजोन पर्त।’’
''यदि न रुका
ओजोन का क्षरण
होगा मरण।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनंद’


     भूमण्डलीय ताप बढ़ जाने के कारण ऋतु चक्र में भी परिवर्तन आया है। ऋतुचक्र का बदलना भी हमारे पर्यावरण के लिए एक समस्या हैं कतिपय हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में देखें-
''जंगल कटे
ठिकाना ढँूढ़ती हैं
ऋतुएँ अब।’’
                             -डॉ0 निर्मल एमा
''बदला मन
बदला है मौसम
काल चक्र में।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित


     वायु प्रदूषण के लिए मिलों की चिमनियों से निकला धुँआँ व वाहनों से निकला धुँआँ, कूड़े कचरे के सड़ने से निकली गैसें तथा रेडियो एक्टिव पदार्थों का विकिरण उत्तरदायी हैं। धुँआँ और कार्बन डाई आक्साइड भूमंडलीय ताप को तो बढ़ाते ही हैं साथ ही साथ विभिन्न तमाम बीमारियाँ, आँखों में जलन, घुटन तथा मानसिक तनाव आदि इसी धुएँ एवं जहरीली गैसों के कारण उत्पन्न होती हैं। कतिपय हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में इन समस्याओं को देखें-

''धुँआँ ही धुँआँ
बढ़ते जाते रोग
प्रदूषण से।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र
''धुँआँ ही धुँआँ
उगलती मीनारें
जीना दूभर।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनंद’
''पर्यावरण
धूल धुँआँ धूल से
करे हरण।’’
                             - रामेश्वर प्रसाद गुप्त ‘इन्दु’
''खिले फूल की
उखड़गयी श्वांस
प्रदूषण में।’’
                             -डॉ0 रेशमी पांडा मुखर्जी
''प्रदूषण से
वातावरण रोया
रोग ही बोया।’’
                             -डॉ0 शारदा प्रसाद सुमन
''नाक में घुसे
दूषित वायु डसे
प्राण तड़पें।’’
                             -शिव कुमार पाण्डेय ‘विराट’


     जल प्रदूषण के लिए मिलों से निकला गंदा पानी तथा शहर के नालों से निकला वह पानी उत्तरदायी है जो बड़ी-बड़ी नदियों या तालाबों में डाल दिया जाता है। जल में किसी भी प्रकार की गंदगी जल प्रदूषण का कारण बनती है। जल प्रदूषण मानव जीव व तमाम जलीय जन्तुओं व वनस्पतियों के जीवन के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो रहा है। जल में घुले हानिकारक रसायन जलीय जन्तुओं की मृत्यु का कारण बनते हैं। हिन्दी हाइकुकारों ने भी जल प्रदूषण के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त की है। कतिपय हाइकु द्रष्टव्य हैं-


''गँदला पानी
रोगों को आमन्त्रण
मरती नानी।’’
''पानी बचायें
करें न प्रदूषित
जीवन पायें।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य
''नष्ट जंगल
नदियाँ प्रदूषित
कैसे मंगल।’’
                             -राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’

''गंगा का जल
नहाते मलमल
कहाँ निर्मल।’’
                             -डॉ0 पल्लवी दीक्षित
''गंदा हो रहा
पावन गंगाजल
आज रो रहा।’’


''कितना गंदा
आज का गंगाजल
तरेंगे कैसे।’’
                             -अनामिका शाक्य
''यमुना मैली
गुम हुई बाँसुरी
बदबू फैली।’’


''ताल गड़हा
गहरा हरा पानी
सड़े पगहा।’’
                             -डॉ0 मनोज सोनकर
''पावन गंगा
मैली हो गयी है क्यों
क्या हम चेते।’’


''गंगा मैली है
यमुना बदरंग
बदलो ढंग।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनंद’
''है मनमानी
मिलों ने गंदा किया
गंगा का पानी।’’


''गंगा को दिये
एक दिन तो दिये
फिर कचरे।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
''प्यासे उदास
नदी कुएँ झरने
मैले निराश।’’
                             -शिव कुमार पाण्डेय ‘विराट’
     जल प्रदूषण तो एक समस्या है ही साथ ही साथ ग्लोबल बार्मिंग के कारण ऋतुओं की प्रकृति में भी परिवर्तन आया है। जिसके कारण बरसा ऋतु में भी सूखे जैसी स्थिति रहती है। इन सभी समस्याओं और प्रदूषण के कारण पेयजल संकट गहराता जा रहा है। शुद्ध पेयजल के नाम पर आज पानी बोतलों में बन्द होकर बिकने लगा है जो इतना महँगा है कि आम आदमी की पहुँच से दूर है। इन सभी समस्याओं को हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में देखा जा सकता है-


''हे कोलम्बस
ढूँढ़ो नई दुनिया
जहाँ हो पानी।’’
                             -डंडा लखनवी
''हवा हो जाता
सीमा जब लाँघता
पानी का ताप।’’
                             -राजेन्द्र वर्मा


     मृदा प्रदूषण भी एक जटिल समस्या हो गयी है। कृत्रिम रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग करने से तथा कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों के प्रयोग से उपजाऊ मिट्टी का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है जिसके कारण मिट्टी का उपजाऊपन कम हो रहा है। प्लास्टिक उत्पादों और पॉलीथीन का अत्यधिक प्रयोग भी मिट्टी के प्राकृतिक स्वरूप को बदल रहा है। वृक्षों के कटने व बाढ़ों के आने से भूमि अपरदन की समस्या भी आ रही है। हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में मृदा प्रदूषण की समस्या देखें-


''मानव से ही
प्रकृति का आँगन
होता मलिन।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
''गाजर घास
लूटती है खेतों को
करे विनाश।’’
''गन्दगी फैली
मच्छरों का साम्राज्य
गली भी मैली।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य
''हम मगन
करते प्रदूषित
धरा गगन।’’
                             -डॉ0 पल्लवी दीक्षित


     ध्वनि प्रदूषण के कारण मानव तनावग्रस्त रहता है तथा बहरापन जैसी बीमारियाँ भी हो रही हैं। इस समस्या पर भी कतिपय हिन्दी हाइकु प्रस्तुत हैं-
''शोर ही शोर
बाहर दुनिया का
भीतर मेरा।’’
                             -श्याम खरे
''खोया संगीत
बढ़ रहा है शोर
देता तनाव।’’
                             - हरिश्चन्द्र शाक्य
''ध्वनि तारत्व
पनपाये अनिद्रा
करे बहरा।’’


''घुला जहर
ध्वनि प्रदूषण से
बना क़हर।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनन्द’

    कतिपय हिन्दी हाइकुकारों के शब्दों में मानसिक प्रदूषण भी देखा जा सकता है-
''प्रभावित है
मन वाणी कर्म से
पर्यावरण।’’


''पर्यावरण
प्रदूषित दूषित
कुविचारों से।’’
                             -डॉ0 मिथिलेश दीक्षित
''झगड़े झंटे
क्रोध व अहंकार
दे रहे मार।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य


     हर समस्या का समाधान भी होता है। पर्यावरण में प्रदूषण की समस्या का समाधान भी हो सकता है यदि हम तन, मन, धन से इसके उन्मूलन हेतु सक्रिय भूमिका अदा करें। साहित्यकार समाज को दर्पण दिखाता है और हर समस्या का समाधान भी जुटाता है। कतिपय हिन्दी हाइकुकारों में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के समाधान भी देखे जा सकते हैं-


''पेड़ बचाना है
खुद को बचाना है
क्या सकुचाना।’’
                             -डॉ0 राजकुमारी शर्मा ‘राज’
''प्रदूषण से
जीवन को बचाओ
वृक्ष लगाओ।’’
                             -यतीश चतुर्वेदी ‘राज’
''हैं आभूषण
धरती माँ के पेड़
इन्हें बचाओ।’’


''पेड़ लगाओ
हरियाली फैलाओ
धरा सजाओ।’’
                             -अनामिका शाक्य
''पेड़ लगाओ
आने वाली पीढ़ी को
साँस दे जाओ।’’
                             -पवन कुमार जैन
''वृक्ष न काटें
प्रकृति मनुज में
अन्तर पाटें।’’
                             -शिवचरण सिंह चौहान ‘‘अंशुमाली’’
''पेड़ लगाओ
प्रकृति को बचाओ
खुशियाँ लाओ।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य

''जहाँ भी जाओ
हरियाली को लाओ
पेड़ लगाओ।’’
                             -अनमोल शाक्य
''काटिये नहीं
हरे भरे वृक्ष को
जीवन देंगे।’’
                             -कृष्ण कुमार यादव
''तोड़ दो टैम्पो
प्रदूषण फैलाते
गंदगी गाते।’’


''द्वेष जलाओ
हिंसा शिला गला के
वृक्ष बचाओ।’’
                             -शिव कुमार पाण्डेय ‘विराट’


     प्रदूषण का कुप्रभाव मानवेतर अन्य प्राणियों पर भी देखा जा सकता है। मोबाइल कंपनियों के टाबरों से निकले विकिरण से हमारे घर आँगन में प्रतिदिन फुदकने वाली गौरैया निरंतर घट रही है और विलुप्ति के कगार पर है। जहरीली दवाओं का सेवन करने वाले मृत पशुओं का माँस खाकर प्रकृति की सफाई करने वाले गिद्ध लगभग विलुप्त हो गये हैं। तमाम जीवों का जीवन संकट में है। हिन्दी हाइकुकारों की इनके प्रति चिन्ता देखें-
''कुछुए रोयें
हम नहीं सुरक्षित
अँखियाँ खोयें।’’
                             -डॉ0 मनोज सोनकर
''ताल किनारे
हैं अधमरे डरे
जल के जीव।’’
                             - अनिरुद्ध सिंह सेंगर
''कहाँ हैं गिद्ध
प्रकृति सफाई में
जो थे प्रसिद्ध।’’
                             -हरिश्चन्द्र शाक्य
''गायब हुई
आँगन की चिड़िया
कहाँ जा बसी।’’


''सहमे पंक्षी
वन, वानर, गैया
कौआ गौरैया।’’
                             -डॉ0 आनन्द प्रकाश शाक्य ‘आनन्द’


     अन्त में हम कह सकते हैं। कि बिगड़ते पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या के प्रति हिन्दी हाइकुकारों ने जो चिन्ता व्यक्त की है वह सारे जगत व समाज की समस्या है जिससे वसुधैव कुटुम्बकम की भावना धारण करते हुए सामूहिक रूप से निपटा जा सकता है। हिन्दी हाइकुकारों ने उक्त समस्या से निपटने हेतु जो समाधान सुझाये हैं उन्हें आत्मसात करने की आवश्यकता है। पर्यावरण और जीव जगत का आपस में ऐसा नाता है जिसके बिना दोनों अधूरे हैं और उनके अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं। आओ हम सब विश्ववासी मिलकर इस भूमण्डलीय समस्या से मुक्ति पायें।

- डॉ॰ हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0
शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक
क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत
स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर
जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत

ईमेल- harishchandrashakya11@ gmail.com

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