व्यंग्य // बेर-केर कुसंग // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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कहु कबीर कैसे निभे बेर केर को संग

वे डोलत रस आपने, उनके फाटे अंग।

अभी तक मुझे अच्छी तरह याद है कि वर्षों पहले जब मैंने हाई-स्कूल की परीक्षा दी थी हिन्दी के प्रश्न-पत्र में इसी दोहे का ससंदर्भ अर्थ परीक्षार्थियों से पूछा गया था। ‘बेर’ तो मैंने खाया था किन्तु ‘केर’ क्या वस्तु होती है, मुझे पता ही नहीं था। मैंने अंदाज़ लगाया, हो सकता है केर ‘केरी’ (अमिया) के लिए इस्तेमाल किया गया हो। अत: मैंने बेर और केरी की तुलना कर डाली। सन्दर्भ तो कबीर का मिल ही गया था। सो मेरा उत्तर कुछ इस प्रकार था – कबीर कहते हैं कि बेर और केरी, अर्थात अमियाँ, दो अलग अलग फल हैं। केरी जब पक जाती है तो उसमें रस आ जाता है, उसे खाने में बड़ा मज़ा आता है। लेकिन बेर अमिया की तरह खट्टा तो होता है किन्तु उसके तोड़ने में बड़ी मुश्किल आती है, तोड़ते समय अक्सर हाथ में काँटा लग जाता है। इसलिए केरी के संग बेर की संगत बैठाना ठीक नहीं है। ज़ाहिर है इस अर्थ को लेकर मेरे नंबर तो ज़रूर कट ही गए होंगे।

बाद में जब मुझे पता चला कि केर का मतलब इस दोहे में केले के पेड़ से है। बड़ा गुस्सा आया। ये कवि लोग भी तुक भिड़ाने के लिए कितनी तोड़ मरोड़ कर बात करते हैं। आम आदमी तो केले को कभी केर कहता नहीं। यह तो सिर्फ कवि ही कह सकता है, और कबीर की कविताई में भला कौन शक कर सकता है ?

दोहों के लिए प्रसिद्ध है कि इनमें सामाजिक संदर्भ होता है। प्राय: इनमें नैतिक और आध्यात्मिक सन्दर्भ भी देखा जा सकता है। किन्तु क्या इनका उपयोग राजनैतिक सन्दर्भ में भी किया जा सकता है? दोहों को राजनैतिक सन्दर्भ से जोड़ने का काम सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ ने कर दिखाया। सामान्यत: एक योगी से हम यह उम्मीद करते हैं कि वह दोहों आदि में आध्यात्मिक सन्दर्भ ढूँढ़ निकालेगा। लेकिन योगी जी की बात ही अलग है। वे योगी ही नहीं राजनीतिज्ञ भी हैं। पहले योगी हैं फिर राजनीतिज्ञ हैं या पहले राजनीतिज्ञ हैं और बाद में योगी हैं, यह कहना और भी कठिन है। बहरहाल एक पत्रकार वार्ता में जब उनसे सपा और बसपा के नज़दीक आने की बात बताई गई तो उन्होंने तड़ से जवाब दिया, यह तो बेर-केर का कुसंग है। कबीर ने ठीक ही कहा है, केले के पास यदि बेर का पेड़ हो तो बेर तो अपनी मस्ती में डोले बिना रहेगा नहीं, और बेचारे केले के मुलायम पत्ते उसके काँटों से निश्चित ही फट जावेंगे। विपरीत स्वभाव वाले एक साथ रह ही नहीं सकते। रहते हैं तो उनमें से कम से कम एक की हानि होना निश्चित है, और हानि उसीकी होगी जो सज्जन है। जो दुर्जन है, जिसके पास कांटे हैं वह तो उन्हें बिना चुभाए रह ही नहीं सकता। जब योगी जी से पूछा गया सपा और बसपा में कौन बेर है और कौन केर, तो स्पष्ट: तो उन्होंने नहीं बताया लेकिन उनका इशारा साफ़ था।

योगी जी को बेर-केर वाला कबीर का दोहा लगता है बड़ा पसंद है। आपको याद होगा, पिछली बार जब बिहार में लालू और नीतीश का बेमेल गठबंधन हुआ था तब भी योगी जी ने कबीर के इसी दोहे का उद्धरण दिया था और उनका अंदाज़ सही बैठा। कितना ही अच्छा हो यदि राजनीति में दोहों के ज़रिए बात की जाए ! फिर तो निश्चित ही राजनीति साफ़-सुथरी हो जाएगी। राजनीति में गाली-गलौज और गाली गलौज सरीखे जुमलों पर अपने आप विराम लग जाएगा।

लेकिन राजनीति के साथ एक बड़ी मुश्किल है। इसमें बेर–केर के संग-साथ के बिना काम ही नहीं चलता। गठबंधन के लिए बेर-केर का साथ होना ज़रूरी है। जम्मू-कश्मीर में भी तो बेर-केर का साथ है। इस तरह के गठबंधन से राजनीति, भले ही हिचकोले खाकर चले, चल निकलती है। सो बेर-केर का साथ ज़रूरी नहीं कि हमेशा कुसंग ही हो। विरोधी तत्वों के मेल से समन्वय भी संभव है। आखिर वाद-विवाद ही संवाद को जन्म देता हैं। गठबंधन की राजनीति इसी उम्मीद पर टिकी होती हैं। कबीर जी अपने दोहे में पूछते हैं, कहु कबीर कैसे निभे बेर-केर को संग ? इसका उत्तर वे नहीं देते। इसे आपको खोजना है। राजनीति इसी असंभव को संभव बनाने की चतुराई है। कबीर, लगता है, कोई कम राजनीतिज्ञ नहीं थे। पर आप यदि बड़े राजनीतिज्ञ बनने का दावा करते हैं तो उत्तर आपको ही खोजना है। गठबंधन सरकारें आखिर आपको ही तो चलाना है !

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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2 टिप्पणियाँ "व्यंग्य // बेर-केर कुसंग // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. केर एक फल होता है जो केवल राजस्थान और राजस्थान से सटे हरियाणा में होता है !

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  2. आदरणीय
    बहुत सटीक और सारगर्भित।बधाई।

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