लघुकथा: कलयुग के श्रवण कुमार // डॉ नन्द लाल भारती

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डॉ नन्द लाल भारती

मुंशीजी बहुत दर्द में हो। क्या बात है क्यूं घुट रहे हो ? इंजीनियर बेटा, उच्च शिक्षित बहू,ऐसा क्या गम है कि घुट घुट कर जी रहे हो दशरथ बोले।

बहू घास नहीं डाल रही होगी क्यों काका चंकी झट से बोला।

कुछ तो शर्म करता बदमिजाज, मानता हूँ जादूगर की बेटी का दिया हुआ दर्द हम ढो रहे हैं, तू ऐसे कैसे भूल गया कि बहू बेटी समान भी होती है।

माफ करो काका  सच उगलवाने का यही तरीका था।

मुंशीजी बेटा बहू का दिया दर्द रहे हो जमाने को खबर नहीं।

दशरथ जब बेटा ही जादूगर सास ससुर और उनकी बेटी का गुलामी हो गया तो असहाय मां बाप का दर्द कौन सुनेगा। हो सकता है बेटा की परवरिश में हम से ही कोई चूक हो गई हो।

काका आपसे कैसे चूक हो सकती है, आपने तो बच्चों के भविष्य के लिए जीवन पूँजी स्वाहा कर दिया, आप तो गाँव के आदर्श हो चंकी बोला।

बेटा वो हमारा फर्ज था।

जादूगर सास ससुर और उनकी बेटी के गुलाम का माँ बाप घर परिवार के प्रति कोई फर्ज नहीं चंकी बोला।

दशरथ बोले वाह रे कलयुग के श्रवण कुमार  जादूगर सास ससुर और उनकी बेटी के गुलाम तुमसे अच्छे तो अनपढ़ औलादें हैं जो माँ बाप के दुख में साथ तो हैं।

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