व्यंग्य // बेइज़्ज़ती सर्वत्र अर्जयेत // अमित शर्मा (CA)

                

पहले मैं इस भ्रम में जीता था कि हर इंसान अपना जीवन सम्मानित तरीके से व्यतीत करना चाहता है लेकिन कालांतर में मेरी इस सोच में अंतर तब आया जब मुझे स्वनेत्रों से बेइज़्ज़ती के साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाली विभूतियों का दर्शन लाभ मिला।

भारत की खोज, बड़े ही मौज के साथ वास्को डि गामा ने की थी लेकिन बेइज़्ज़ती के बोझ की खोज, किस रोज़ और किसने की थी ये बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आम आदमी के लिए बिना रिचार्ज किए, स्मार्ट फ़ोन की बैटरी को पूरा दिन चलाना।

कुछ लोग नियमित रूप से बेइज़्ज़त होने को अपना जन्मसिद्ध  अधिकार मानते हैं और इसे पाने के लिए लगातार अपनी इज़्ज़त को तार तार करते हुए संघर्षरत रहते हैं। "बेइज़्ज़ती पिपासु" व्यक्तियों को अपनी पूरी आयु , इज़्ज़त की प्राणवायु हज़म नहीं होती है। सम्मान और इज़्ज़त भरे ज़ीवन की कामना से ही "बेइज़्ज़ती-प्रिय" लोग सहम जाते है और सम्मान जैसी हानिकारक और प्राणघातक वस्तु से सुरक्षित दूरी बनाकर चलते है। बेइज़्ज़त होना इनके लिए रोटी-कपड़ा-मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों में शुमार होता है।

बेइज़्ज़ती के नशेड़ी, विषम परिस्थितियों में भी बेइज़्ज़ती का हरण कर उसका वरण करने में सफल हो जाते हैं। आम का सीजन हो या केले का है ये लोग सदैव ही सरेआम बेइज़्ज़ती से गले मिलना पसंद करते हैं ताकि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बनी रहे। इसी पारदर्शिता और ईमानदारी के चलते , ये जल्द ही बेइज़्ज़ती के वामन स्वरूप से विराट रूप धारण कर लेते हैं। हर देश, काल और परिस्थिति में "बेइज़्ज़ती उपासक" अपनी निष्ठा और निष्ठुरता से बेइज़्ज़ती अर्जित कर ही लेते हैं।

बेइज़्ज़ती के धंधे में कभी मंदी नहीं आती है क्योंकि बेइज़्ज़ती में हमेशा नकद से ही आपका कद बढ़ता रहता है और उधार से बेइज़्ज़ती की धार कुंद होती चली जाती है। विजय माल्या और नीरव मोदी ने भले ही बैंक से ऋण लेकर, बैंक को चूना लगा दिया हो लेकिन देश से भागकर, बेइज़्ज़त होने की दौड़ में सबको पछाड़कर "बेइज़्ज़ती उद्योग" को चार चांद लगा दिए हैं।

कुछ लोगो मे बेइज़्ज़त होने का ज़ुनून ही, उनके सुकून हेतु उत्तरदायी होता है। बेइज़्ज़ती का घूँट ,वो कहीं से भी लूट लेते हैं। दुर्घटनावश प्रकट हुई सम्मान की वाह भी,  इनकी धमनियों में होने वाले बेइज़्ज़ती के नियमित प्रवाह को नहीं रोक पाती है।

बेइज़्ज़ती प्रदेश के मूल निवासी, चाहे अपने निवास पर हो या अन्य किसी स्थान के प्रवास पर,  वो बेइज़्ज़ती की लॉजिंग-बोर्डिंग हमेशा अपने शरीर पर धारण किए रहते हैं। इस प्रदेश के मूल निवासी हमेशा बेइज़्ज़त होने के नए-नए अवसर और तरीके खोजने के लिए प्रयासरत रहते हैं ताकि बेइज़्ज़ती को बोरियत से बचाकर इसे भी समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके।

लगातार बेइज़्ज़त होना भी एक उपेक्षित हुई कला है जिसे सामान्य व्यक्ति के लिए अंजाम देना कठिन होता है। बेइज़्ज़ती के फील्ड में पेशेवर फील्डिंग करने वालों की कमी महसूस की जाती रही है, माँग के मुकाबले आपूर्ति ना होने से संतुलन गड़बड़ा रहा है। लेकिन फिर भी देखकर संतोष और कुछ-कुछ होता है कि कुछ लोगों ने बेइज़्ज़त होने को अपने जीवन का मिशन और सहारा बना लिया है और वे बेइज़्ज़ती पथ के समर्पित पथिक की तरह ट्रैफिक के नियमों का पालन-पोषण कर, इस मार्ग पर दांडी यात्रा रहे हैं। इन्हीं लोगों द्वारा उत्पादित क्वालिटी के कारण क्वांटिटी की कमी महसूस नहीं हो पाती है और क्वांटिटी की कमी के ख़िलाफ़ उठने वाली संगठित आवाज़, बेइज़्ज़ती के बोझ के नीचे दब जाती है।

बेइज़्ज़ती उद्योग में अभी बहुत संभावनाएं हैं जिन पर बेइज़्ज़त होकर, गंभीरतापूर्वक विचार करना ज़रूरी है। व्यापक समाजहित में इस क्षेत्र में लोगों को प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है क्योंकि आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धी युग में जहाँ लोगों को सम्मान और यश के लिए दर बदर भटकने के बाद भी अंततः अपयश और बेइज़्ज़ती ही हाथ लगती है, वहीं अगर उन्हें सीधे ही बेइज़्ज़त होने के लिए प्रेरित किया जाए तो उनका यह भटकाव काफ़ी हद तक कम होगा और परिणामस्वरूप समाज में सम्मान पाने की अंधी दौड़ में भागने वाले, उसेन बोल्ट जैसे धावक की आवक भी कम हो जाएगी।

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