डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य के सात नवगीत

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         (1)
अन्दर-अन्दर शीत युद्ध है
बाहर मेल मिलाप।

अपनेपन की
परिभाषा ही
बिल्कुल गयी बदल।
नागफनी सी
चुभती तन में
पीड़ा गयी मचल।

बिखर गये परिवार आजकल
कष्टों में माँ-बाप।

अपनी ढपली
आप बजाकर
कितने हुए मगन।
अलग्योझा की
तान सुनी जब
रोये धरा-गगन।

रोज-रोज अजगर सा निगले
रिश्तों को अभिशाप।

पालक घर
कट-कट कर रोया
क्या कर सके जतन।
चूल्हे जितने बढ़े कि
उतना
उसका हुआ पतन।

किससे कहे व्यथा वह अपनी
बैठ गया चुपचाप।


        (2)
बदमाशों के हाथ आ गयी
राष्ट्र-अश्व की डोर।

आम आदमी
सहमा-सहमा
झेल रहा संत्रास।
भ्रष्टाचारी दैत्य
बनाता
उसको अपना ग्रास।

कोयल की गुम तान हो गयी
अब कौओं का शोर।

जगह-जगह पर
बादल फटते
आते हैं भूकंप।
नंगे, भूखे, भिखमंगों में
मचा हुआ हड़कंप।

जीभ लपलपाती है बिजली
बरसा है घनघोर।

बर्बर आँखों
का फैला है
घर-घर में आतंक।
बिच्छू और ततैया मारें
जन-जन के
अब डंक।

सूर्य चन्द्र को ग्रहण लगा है
कहाँ सुहानी भोर।

(3)
बोझिल-बोझिल
से तन-मन हैं
शिथिल-शिथिल से पाँव
कहाँ खो गया गाँव।

अगिहाने सब
लुप्त हो गये
खोई किस्सागोई।
बचपन के
सब खेल तमाशे
लील गया है कोई।

कजरी और मल्हारें खोईं
मिले न बरगद-छाँव
कहाँ खो गया गाँव।

फागुन की मस्ती है गायब
फीकी-फीकी होली।
रँगते अब भाभी की देवर
कहीं न चूनर-चोली।

प्रेम-प्यार के मिलते देखो
कहीं नहीं अब ठाँव
कहाँ खो गया गाँव।

कहीं खो गया
अपनापन है
गायब भाईचारा।
घर-घर में अब फूट
पड़ गयी
किसका कौन सहारा।

इक दूजे को नीचा करने
के चलते सब दाँव
कहाँ खो गया गाँव।

(4)
गाँव में कैसी घुटन भरी।

रिश्ते नातों
में खटास है।
लगता
कोई नहीं खास है।

घृणा अब घर-घर में पसरी।

भाईचारा
अब उदास है।
अपनापन भी
नहीं पास है।

हवा भी सहमी और डरी।

सिमट गये
परिवार आज हैं।
अपने-अपने
राज काज हैं।

सुनाते खोटी और खरी।




(5)
आँगन-आँगन
में उग आई
कितनी ऩागफनी।

पंथ हुए सारे
पथरीले।
पेड़ हुए सारे
झँकरीले।
गूँज रहे हैं राग बेसुरे
गायब सारे गीत सुरीले।

जलता जीवन किसे बताये
व्यथा-कथा अपनी।

कितने ज्वालामुखी
फट रहे।
राम नाम अब
चोर रट रहे।
बजा बुराई
का ही डंका
भ्रष्टाचारी
कहाँ घट रहे।

आम आदमी के अंतस में
पीड़ा हुई घनी।

दहशत में
हर कीर यहाँ है।
घात लगाये बाज
जहाँ है।
नूतन पीढ़ी कितनी बदली
अपनापन अब जहाँ-तहाँ है।

रिश्ते नातों में भी अब तो
रहती तनातनी।
(6)
कड़वाहट से
भरी ज़िन्दगी
कितनी हुई उदास।
पीते-पीते गरल
थक गयी
अमरित रही तलाश।

जन-जन में
समता लाने का
सपना टूट रहा।
धनी आज निर्धन को देखो
कितना लूट रहा।

भ्रष्टाचारी का ही होता
हरदम यहाँ विकास।

भूख, गरीबी,
महँगाई भी
कमर तोड़ रहीं।
आम आदमी की
किस्मत को
सचमुच फोड़ रहीं।

भूखे, नंगे भिखमंगों को
कौन डालता घास।

बिना कर्म के
भोग रहे फल
मोटे लोग यहाँ।
श्रम के छालों वाले
सुख को
पाते भोग कहाँ।

मलिन बस्तियों
को मिलता कब
नूतन-नया प्रकाश।


(7)
सहमी-सहमी
सी पुरवा
हो गयी किनारे है।
सारे ही आँगन में
पछुआ
पाँव पसारे है।

भौतिकता की
होड़ लगी है
नैतिकता
नीलाम हो गयी।
कपड़े पहनें
फिर भी नंगे
ऐसी फैशन
आम हो गयी।

टाँगे-वक्ष दिखाती
बाला
देह उघारे है।

युवकों के तो
आज देख लो
कैनवास ही
सीस हो गये।
और अजंता
ऐलोरा के
चित्रों से वे
बीस हो गये।

आनन पर गुण्डों सी
दाढ़ी
लड़का धारे है।


प्रेमी और प्रेमिका
का युग
भूतकाल में
कहीं खो 
बॉय फ्रैण्ड औ'
गर्ल फ्रैण्ड का
नया जमाना आज हो गया।

पीहु-पीहु अब नहीं पपीहा
हलो पुकारे है।


-डॉ० हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0
शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक
क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत
स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर
जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत

harishchandrashakya11@gmail.com

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2 टिप्पणियाँ "डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य के सात नवगीत"

  1. अच्छी कवितायेँ हैं | डा. शाक्य को बधाई | सुरेन्द्र वर्मा |

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  2. गांव,श्रम,पारिवारिक विघटन, लोकजीवन के मूल्य-प्रतिमानों का अवमूल्यन-और सत्ता- सियासत के बदलते अर्थ-अभिप्रायों से छले जा रहे बहुसंख्यकों की त्रासदी और हताशा, विक्षोभ का पारदर्शी चित्रण,सुबोधगम्य बोली- बानी में आपने किया है.

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