विषादेश्वरी - भाग 10 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------



भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8 भाग 9

आश्चर्य चकित होकर अल्बर्टो उसकी तरफ देखता रहा और कहने लगा,
" भारतीय लोग बहुत भावुक होते हैं? "
"और क्या पुर्तगाली लोग भावुक नहीं होते हैं?"
"नहीं, ऐसा नहीं है, हम कभी भी अपनी इच्छा-अनिच्छा दूसरों पर नहीं थोपते है। मेरा देश पूरे पश्चिमी यूरोप का सबसे रूढ़िवादी देश है, लेकिन किसी भी व्यक्ति की पसंद-नापसंद, गोपनीयता रक्षा में सभी को पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त है। "

विभिन्न मुद्दों पर दोनों के बीच में भारी बहस होती थी और फिर वे एक-दूसरे से विदा लेते थे। ऑटो वाले की आवाज से हर्षा यादों की दुनिया से लौट आई। अपार्टमेंट गेट के पास वह उतर गई। अगर वृंदावन मौसा ने पूछ लिया “ इतनी सुबह-सुबह?” तो वह क्या जवाब देगी? रविवार होता तो वह बहाना भी बना सकती थी। सीढ़ियों पर चढ़ते समय उसने सोच लिया था, जो होगा सो देखा जाएगा। इतनी दूर आई है तो और नहीं लौटेगी। यदि मौसी उसे मिलेगी तो वह अपनी डायरी से अपनी कविताएं सुनाएगी। कविताएं पुरानी है और किसी भी संदर्भहीन भी, लेकिन कम से कम कुछ समय तो कट जाएगा।
कॉलिंग बेल की आवाज सुनकर मौसा ने दरवाजा खोला। वह उसे देखकर आश्चर्यचकित होकर पूछने लगे, “तुम यहाँ ? डॉक्टर बाबू चले गए ?”

"तुम्हारे पिताजी ने कल मुझे फोन किया कि डॉक्टर बाबू यहाँ आए हुए है। "
मौसा की बात सुनकर हर्षा का चेहरा अचानक काला पड़ गया। वह स्तंभित रह गई। उसे लगा कि पूरी दिल्ली पर एक बड़ा जाल फैला दिया गया है। वह जिस दिशा में भी दौड़ेगी, उस जाल के भीतर फँसेगी ही फँसेगी।
11
मौसा के घर जाना उसकी गलती थी। कुछ समय बाद मौसा ने पिताजी को संदेहवश फोन किया था। पता नहीं कि उनकी क्या बातचीत हुई, मौसा ने उससे पूछा कि क्या तुमने अपना मोबाइल बंद कर दिया है? तुम्हारे पिताजी और डॉक्टर बाबू फोन करते-करते थक गए है?
हर्षा ने झूठ बोला, "मैं सुबह मोबाइल स्विच-ऑन करना भूल गई थी”, और वह मोबाइल चालू रखने के लिए मजबूर हो गई थी। कहीं वह आदमी मौसा के घर न आ जाए, सोचकर हर्षा ने मोबाइल पर बातचीत करने का नाटक किया और फिर कहने लगी: "मौसी, मैं जा रही हूँ, वे मुझे बुला रहे हैं। "
उस समय मौसी अपनी कविता वाली डायरी लेकर बैठी हुई थी। कहने लगी, "तुम डॉक्टर बाबू को यहाँ क्यों नहीं बुलाती हो ?"

"नहीं, मौसी, वे मुझे अपने दोस्तों के घर ले जाना चाहते हैं। "
"सच कह रही हो? नहीं फोन लगाओ, मुझे उनसे बात करनी है। वे हमारे घर क्यों नहीं आए?”
"मैं उनको दोपहर को यहां लाऊंगी। " यह कहकर वह मौसा के घर से निकल गई। वापस जाते समय रास्ते में अल्बर्टो का फोन आया: "हाना, मैं वापस आ गया हूँ। हम आज कहां मिल सकते हैं? "
"हे, अल्बर्टो, तुम अब तक कहां थे? मैं तुम्हें खोजते-खोजते पागल हो गई हूँ। तुम्हें कहीं जाने से पहले मुझे बताकर नहीं जाना चाहिए ? "
"क्या तुम मेरे लिए चिंतित थी? पर क्यों?"

हर्षा ने अपने प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। बल्कि उसने पूछा: "क्या तुम अभी खाली हो ? अगर तुम्हारा कोई अन्य कार्यक्रम नहीं है, तो मैं तुम्हारे पास आ रही हूँ। "
"हां, आओ, हाना। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं; मुझे बहुत कुछ कहना है। "
मन-ही-मन हर्षा बहुत उत्साहित हो गई। वे लंबे समय से नहीं मिले थे, जिस दिन से अल्बर्टो ने एसएमएस भेजा था, "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है, मैं तुम्हें चाहता हूं", और हर्षा ने उस एसएमएस का जवाब नहीं दिया, तब से अभी तक उनकी मुलाक़ात नहीं हुई थी। उसे राहत महसूस होने लगी थी कि कम से कम उसे सिर छिपाने की जगह तो मिल गई।

वह सीधे अपने मौसा के घर से अल्बर्टो के पास पहुंची। उसने कहा: "क्या तुम्हें पता है, आज सुबह मैं यहाँ आई थी ?"
"हां, मुझे लेटर-बॉक्स से तुम्हारा कागज मिला है। हाना, मुझे इन दिनों बहुत मज़ा आया। "
हर्षा ने मन-ही-मन कहा, 'हां, तुम्हारे लिए अच्छा समय था, लेकिन यहां मैं बहुत दुखी हूं। '
"ठीक है, मुझे बताओ, तुम कहाँ गए थे? अचानक तुम कहाँ गायब हो गए? "
"मैं बहुत व्यस्त था। मुझे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भाषण देना था, उसके लिए तैयारी कर रहा था। "
"ठीक है, मगर मुझे तो कह सकते थे। "
"नहीं कहकर जाना क्या गलती थी ?"
अल्बर्टो कितनी सहजता से बोल रहा था जैसे कि कुछ नहीं हुआ हो। हर्षा ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
"तुमने यह नहीं पूछा कि मेरा कार्यक्रम कैसा रहा ?"
" कैसा था?" उसने निरुत्साहित होकर पूछा।

"बहुत अच्छा था। तुम्हें पता है, हाना, मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरी उससे मुलाकात हुई। ओह, वह अद्भुत थी। मैं उसके ज्ञान से मोहित हो गया था, " अल्बर्टो ने गदगद होकर कहा था "बनारस को वह जितना जानती है, मेरे हिसाब से किसी भी किताब में ऐसा नहीं मिलेगा। कितनी प्रकांड पंडित! शंकरचार्य से लेकर अघोरी साधक तक , किसे नहीं जानती है वह? उसने मुझे एक दिन 'अघोरी साधक' के पास ले जाने का वादा किया है। ”
हर्षा का दम घुटने लगा। उसने यह नहीं पूछा कि वह कौन थी? क्या वह यह सब सुनने के लिए आई थी ?
"यू आर वंडरफूल" – कितनी बार अल्बर्टो ने कहा होगा उसके लिए। अब वह कहता है, "शी इज वंडरफूल। "

इसका मतलब अल्बर्टो कभी भी उसका नहीं हुआ था। आज तक वह भ्रम में रह रही थी। उसकी पूछने की इच्छा हो रही थी: "तुम तो अक्सर कहा करते थे कि हम दोनों एकमात्र सपने देखने वाले हैं। हम केवल सपने देखते हैं एक- दूसरे के लिए। मगर अब मुझे अकेला छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? अल्बर्टो, किसी और की बार-बार मेरे सामने प्रशंसा न करें। मैं आहत हूं। मैं केवल तुम्हें चाहती हूँ। मुझे पता है कि तुम्हारे देश में तुम्हारी सुंदर पत्नी है। उसका तुम्हारे ऊपर हक हैं। मैं कभी भी उसका हिस्सा नहीं लूँगी। लेकिन जब तक तुम मेरे देश में हो, मैं चाहती हूं कि तुम मेरे साथ रहो। इस तरह कहते जाओ : 'यू आर वंडरफूल, हाना; आई नीड़ यू, आई मिस यू। ' क्या तुम जानते हो, अभी मैं बहुत बुरे समय से गुजर रही हूं? वह आदमी पागलों की तरह मुझे खोज रहा है। ऐसे समय तुम मुझे कह रहे हो कि शी इज वंडरफूल? क्या तुम किसी नारी के मन को नहीं पढ़ सकते हो? क्या तुम उसकी ईर्ष्या को नहीं जानते हो? क्या तुम एक महिला के प्यार का अंदाज नहीं लगा सकते हो ? "
अल्बर्टो ने कहा “ मैं सारनाथ गया था। अब मैं बनारस जाना चाहता हूँ। तुम जानती हो हाना, वहाँ बहुत कुछ खुराक है। भारतीय दर्शन और संस्कृति जानने के लिए। सच कह रहा हूँ, अगर मैं बनारस नहीं गया होता तो बहुत बड़ा अवसर हाथ से निकल जाता। ”

हर्षा उस आदमी के बारे में और कुछ नहीं कह सकी। न ही वह उसे किसी जगह पर ले जाने के लिए कह पाई। वह उसे अपने शरीर पर चोट के निशान भी नहीं दिखा पाई। वह यह नहीं बता पाई कि हम किसी अज्ञात जगह पर चले जाएँ। उसे लग रहा था कि अल्बर्टों किसी का नहीं है। न उसका और न ही बनारस में मिली महिला का। वह स्वार्थी है, अपने दर्शन-पिपासा की तृप्ति के लिए।
" क्या हुआ हाना, तुम उदास लग रही हो। "
“नहीं, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। "

अपने निचले होंठ को दबाते हुए अल्बर्टो ने कहा: " मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ सकता हूं कि मैं तुम्हें बताए बिना चला गया, इसलिए तुम दुखी हो। हाना, नाराज होने की कोई बात नहीं है। तुम बहुत अच्छी तरह से जानती हो कि भारत मेरी कमजोरी है। इसलिए जब भी मुझे मौका मिलता है, मैं इसे खोना नहीं चाहता। "
हर्षा ने अब जाकर अपनी चुप्पी तोड़ी: "नहीं, अल्बर्टो, तुम वास्तव में भारत को प्रेम नहीं करते हो, बल्कि एक जिज्ञासा और रोमांटिक आकर्षण के कारण तुम्हारा लगाव है। पता है, भारत के शहरी लोगों का गांवों के बारे में रोमांटिक आइडिया है। वे गांव पर कविताएं लिखते हैं और उन पर फिल्मों का निर्माण करते हैं। अपने ड्राइंग रूम में बैठकर वे गांव की प्राकृतिक सुंदरता और उसके जीवन पर आधारित फिल्मों का आनंद लेते हैं। ग्रामीण लोग सरल होते हैं; शहरी लोग ग्रामीण जीवन की सराहना करते हैं क्योंकि वे जीवन के तनाव से मुक्ति चाहते है। लेकिन विडंबना है, क्या उनमें से कोई भी गांव में रहना पसंद करता है? तुम पश्चिमी लोग भी ठीक उसी तरह हो। तुम भारत को साँपों का देश, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, बहुत से देवी-देवताओं का देश मानते हो। तुम उसकी मिट्टी और कीचड़, उसकी गरीबी और निरक्षरता पर चर्चा करना चाहते हो। तुम यहाँ के मिथकों पर, दार्शनिक शिक्षाओं और प्राचीन इतिहास पर गहन अध्ययन और शोध करना चाहते हो, लेकिन क्या तुम वास्तव में इस मिट्टी से प्यार करते हो? पूर्व हमेशा पूर्व होता है, और पश्चिम हमेशा पश्चिम होता है। तुम हमारी भावनाओं और दुःखों को गहराई से कभी नहीं समझ सकते हो, न ही तुम्हारी ऐसा करने में कोई रुचि हैं।

तुम्हें याद है कि एक बार हम उत्तर-आधुनिकता पर चर्चा कर रहे थे? यदि मानव के सारे विभव का व्यावसायीकरण किया जाता हैं तो क्या-क्या समस्याएं पैदा होंगी, इस पर तुमने प्रकाश डाला था। आखिरकार, तुम दर्शन के शोधार्थी हो, लेकिन यह मामूली बात कैसे नहीं समझ पाए कि मनुष्य की संवेदना और अनुभूति की खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती है?

आज मैं बहुत अच्छी तरह से समझ गई हूँ कि तुम्हारी मानसिकता झूठी है। तुमने हमेशा इस देश को अपने दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है। यही कारण है कि तर्क-वितर्क के दौरान तुमने कहा था, भगवद् गीता हिंसा में विश्वास करती है। प्रेम में अंधी होने के कारण मैंने उस दिन तर्क में हार मान ली। भगवद् गीता का सार तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखता है, अल्बर्टो, इसकी नई व्याख्या करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्या तुम्हें याद हैं, एक बार मैंने श्रीमद भगवद गीता की तुलना अस्तित्ववाद के साथ की थी ? मैंने कहा था कि काम्यू का ‘मिथ ऑफ़ सिसिफस’ और भगवद गीता दोनों एक ही विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करते है। काम्यू ने ‘मिथ ऑफ़ सिसिफस’ में सवाल उठाया है: 'अगर चारो तरफ दर्द की धूल उड़ती हो तो मनुष्य आत्महत्या क्यों नहीं करेगा ? 'अर्जुन का गीता में सवाल है:' अगर मनुष्य इच्छा की पूर्ति होने पर भी शांति नहीं है तो उसे जीवित रहने से क्या फायदा ? ' दोनों अलग-अलग तरीकों से जवाब खोज रहे थे। मेरे तर्क को तुम स्वीकार नहीं कर पाए। तुमने तिलक और गांधी के निबंधों का हवाला देते हुए कहा था कि वास्तव में भगवद गीता ब्राह्मणों के लिए वर्णवाद में आस्था जगाने और क्षत्रिय को युद्ध के लिए प्रेरित करने की शास्त्रीय व्याख्या है। उस समय मैं नहीं समझ सकी। अब मुझे एहसास हुआ है कि अस्तित्ववाद को तुम अपनी संपति मानते हो। इसमें पूर्व की दखल तुम्हें पसंद नहीं है। तुम पूर्वी दर्शन की कहानियों में आश्चर्य के तत्व और अंधविश्वास के तत्व को खोजना चाहते हैं, लेकिन आधुनिकता नहीं। तुम्हारी धारणा यह है कि हम लोग आधुनिकता से बहुत दूर हैं। तुम हमें प्रागैतिहासिक काल के मानव मानते हो। तुम्हें याद है, अल्बर्टों, एक दिन तुमने कहा था कि “उद्यान” संस्कृति हमारे लिए अंग्रेजों की देन है? मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हो सकी। मैंने ऋषि कन्व के आश्रम के सुंदर उद्यान का उदाहरण दिया था। तुम सहमत नहीं थे। तुमने तर्क दिया था कि 'आश्रम' के उद्यान और ये उद्यान समान नहीं हैं। असल में तुम यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हो कि पूर्व को पश्चिम से किसी भी तरह से आगे हो जाए। तुम हमेशा पूर्व को पश्चिम का ऋणी मानते हो।

कल तुम मुझे 'वंडरफूल' कह रहे थे, लेकिन आज किसी और को। यदि कल कोई तुम्हें दक्षिण के मंदिरों के इतिहास के बारे में बताता है, तो तुम उसके पीछे चले जाओगे। तब तुम उसे भी ' वंडरफूल' कहोगे। तुम्हारे लिए ‘वंडरफूल' शब्द केवल वर्णमाला के कुछ अक्षरों का एक समूह है। क्या तुम्हें कभी इस शब्द की संवेदना और अनुभूति का अहसास हुआ ? "
हर्षा को अब लगने लगा था कि वह केवल गहरे लगाव के कारण उसके पीछे दौड़ रही थी। जबकि उस आदमी और अल्बर्टो में कोई खास अंतर नहीं है। हर्षा उस आदमी के लिए चावल की थाली है, जिसे वह गोग्रास की तरह खाता है, और अल्बर्टो के लिए, वह एक ऐसी पुस्तक है जिसमें वह इसके प्रत्येक पृष्ठ को रेखांकित करता है। दोनों ही अपने तरीके से उसे इस्तेमाल करते हैं। वह आदमी खाना खाने के बाद झूठी प्लेट छोड़कर चला जाएगा और अल्बर्टो उस किताब को फेंक देगा। लेकिन क्यों ?

हर्षा की आँखों से आँसू बहने लगे। अल्बर्टो हर्षा के आरोपों से जड़वत हो गया था। जैसे कि उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। हर्षा उठकर खड़ी हो गई, उसका वहां पर और कुछ काम नहीं था। अल्बर्टो ने भी उसे नहीं रोका। पीछे से भी नहीं पुकारा, "हाना, आई नीड़ यू। आई वांट यू। "
हर्षा को सभी रास्ते खाली लगने लगे। विदेशी कभी युधिष्ठिर नहीं बन सकते। कम से कम अल्बर्टो को तो यह बात याद दिला दी जानी चाहिए थी।
12.
क्या इस तरह चला आना हर्षा के लिए उचित था ? क्या अल्बर्टों को कहने का मौका देना सही नहीं था? कुछ दिन पहले उससे मिलने के लिए बहुत उत्सुक अल्बर्टों की वर्तमान उदासीनता के पीछे कुछ छिपा हुआ रहस्य हो सकता है। या हो सकता है कि उसने 'शी इज वंडरफूल' सिर्फ उसे चिढ़ाने के लिए कहा हो। या फिर उसने जानबूझकर पहले से कुछ नहीं बताया था। शुरू-शुरू में उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि पश्चिमी होने के कारण उसके व्यवहार में निश्चित रूप से एक भिन्नता होगी, जिसे तुम सहन करोगी। तीन वरदान मांगने के बहाने उसने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। हो सकता है कि बनारस में कोई भी न हो। या शायद उसके जीवन में भी बनारस न हो। सब कुछ झूठा-खेल रहा हो।

हर्षा का मन हो रहा था कि वह ऑटोरिक्शा से नीचे उतरकर दौड़कर उसके पास चली जाए। मन हो रहा था फिर से वह अल्बर्टो के पास लौट जाए। और कहेगी, हम फिर से लौट जाएंगे अपने पुराने दिनों में। भारत में असंख्य पौराणिक कहानियां हैं। मैं तुम्हें प्रतिदिन कहानी सुनाने के लिए तैयार हूं। चलो, हम अपने बीच के सारे संदेह दूर कर देते हैं। हम पूर्व और पश्चिम का अंतर खत्म कर देते हैं। नीले गगन के नीचे दो पवित्र इंसानों की तरह हम बैठे रहेंगे।
बादलों में यहां-वहां बादल तैर रहे होंगे, जैसे सदियों से वे तैर रहे हैं। धीरे-धीरे शाम होने लगी, जैसे सदियों से हो रही थी। हम दोनों अपनी पहचान खोकर आदि मानव बन जाएंगे। एक-दूसरे को जानने के लिए, एक-दूसरे को पाने के लिए, हम जमीन पर बैठकर दूब-घास के साथ खेलते-खेलते इंतजार करेंगे युगों-युगों तक। हमारा इंतज़ार कभी खत्म नहीं होगा।

हम दोनों बैठे रहेंगे चुपचाप
दिन बीतेगा, शाम होगी
शाम बीतेगी, रात होगी
पंछी लौटेंगे अपने-अपने घोंसलों में
चाँद निकलते-निकलते ,
हमें पता तक न चलेगा
शुक्लपक्ष था या कृष्णपक्ष .
हम दोनों बैठे रहेंगे चुपचाप
चारों तरफ सरीसृप,
कीड़े-मकोड़े घेरे होंगे हमें
लता-गुल्मों की तरह
उधर हमारा ध्यान न होगा
अँधेरा गहराता जाएगा
एक-दूसरे को देखना तक असंभव
फिर भी दोनों बैठे रहेंगे चुपचाप
क्योंकि एक की साँस दूसरे की धड़कन होगी
हम बैठे रहेंगे
ओंस भिगोती जाएगी,
कुहासा ढंकता जाएगा,
पाँव सुन्न होते जाएंगे,
पूरी तरह से बर्फ बनने से पहले,
मेरी शीतल हथेली पर कोई उसका हाथ रख देगा.

हर्षा ने आटो रिक्शा रोका। उसकी आश्चर्य चकित आँखों की तरफ ध्यान दिए बगैर उसने मीटर देखकर अपने पर्स से पैसे निकालकर भुगतान कर दिया। उसने रूमाल निकालकर अपना चेहरा साफ किया और बस स्टॉप के टिन शेड के नीचे खड़ी हो गई। क्या वह फिर से अल्बर्टो के पास लौट जाएगी? उसे मालूम नहीं कौनसे नंबर वाली बस उसे अपने सपनों की दुनिया में ले जाएगी। क्या वह अल्बर्टो को एसएमएस कर देगी? उसने अपना मोबाइल बाहर निकाला, लेकिन सभी शब्द, अक्षर और वाक्य जैसे उसके दिमाग से अचानक गायब हो गए हो।
अल्बर्टो ने उसे हाथ पकड़कर कम से कम एक बार रोक लिया होता? कह देता:"हे मेरी प्रकृति, मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूं। " नहीं, वह पुरूष और प्रकृति की अवधारणा पर विश्वास नहीं करता है। वह एक बौद्ध था। क्या निवृति के दर्शन में विश्वास करने वाला आदमी कभी किसी महिला के चारों ओर घूमेगा? सिर्फ दर्शन शास्त्र पढ़ लेने से कभी भी आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता है। अनुभवसिद्ध साधना आध्यात्मिक जागरूकता का एक कदम है। क्या ऐसी निष्ठा या साधना अल्बर्टो के पास मिलेगी ? क्या अल्बर्टों ने कभी हर्षा को प्यार किया था ? क्या उसने पार्सीमनी लव नहीं कहा था ? क्या उसने यह नहीं कहा कि जब सहभागिता का सवाल उठता है तो वह उदास हो जाता है ? जबकि उसने ही फ्रीडा के जीवन की कहानी सुनाई थी। लेकिन उस समय क्यों उसकी निवृत्ति या उसकी उदासीनता उसे रोक नहीं पाई ? हर्षा दुविधा में थी: किस अल्बर्टो से उसकी पहचान हुई थी ? वह अल्बी जो कह रहा था कि उसकी मृत्यु के बाद गंगा में उसकी हड्डियों का विसर्जन कर दिया जाए? या वह अल्बी जो यह दावा करता था कि पश्चिम की सभ्यता पूर्व की तुलना में अधिक विकसित हुई है? कौनसा अल्बर्टो उसका दोस्त था? जो उदारीकरण को प्राकृतिक प्रक्रिया मानता है, जो कहता है कि पश्चिमी लोगों के लिए भारतीय आईटी स्नातक कम वेतन वाले शिक्षित श्रमिक हैं, या जिसने अपना नाम युधिष्ठिर रखा था ?
अब हर्षा क्या करेगी ? क्या वह फिर से अल्बर्टों के पास जाकर पुर्तगाली खेल के लिए आमंत्रित करेगी ? अभी भी अनुत्तरित बहुत सारे प्रश्न हैं। हम अभी तक एक दूसरे को अच्छी तरह से नहीं जानते हैं। हे अल्बी, तुम्हारा सबसे प्रिय इंसान कौन है?

अल्बी: तुम अपने दुर्भाग्य के लिए किसे दोषी ठहराते हो?
: तुम्हारा पसंदीदा संगीत क्या है?
: तुम्हारी पसंदीदा किताब?
: तुम्हारा पसंदीदा फूल ?
बेहतर था कि वे विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछकर छोटे बच्चों की तरह खेलते रहते। उसने एक बोरी में अपने सारे दुःख बांध दिए। उसने अल्बर्टो से क्या उम्मीद की थी, उसने कहा कि 'शी इज वंडरफूल' और उसे ईर्ष्या हो गई ? इतनी ईर्ष्या करने का कारण क्या था? क्या पता क्यों 'शी इज वंडरफूल' शब्दों ने उसके दिल को खाली कर दिया था। उसका मन बेहद अकेला था। वह खुद को पूरी तरह से अकेली महसूस कर रही थी।

अब मुझे लौटना होगा उस राह पर,
जिस राह में साल भर हुए, मैं चल रही थी
कई परिचित घर,
कुछ पेड़-पौधे
न जाने अब अपनी जगह होंगे कि नहीं.
पहले की तरह अब मेरी प्रतीक्षा नहीं रही
आग्रह नहीं रहा
यह कैसी बिडम्बना
कि सिर्फ साल भर में
सिर्फ साल भर एक के साथ परिभ्रमण किया
और थक गयी?
साल भर हुआ,
राह कष्टों से उबरने के लिए
हम साथ-साथ चले
मैं अपनी कही
और कहानी के राजकुमार की तरह तुम
बिन बातों में सिर हिलाते रहे,
तुम साथ थे, इसलिए रास्ते में मैंने पीले पंछी नहीं देखें
आकाश का इन्द्रधनुष नहीं देखा.
पर राजकुमार की तरह तुम सिर हिलाते गए.
अपनी एक भी न कही.
यह कैसी यात्रा थी?
अंहकार तुम्हारे पाँव की चप्पल,
अंग के कपडे,
आँखों की ऐनक,
कलाई की घडी,
और चेहरे का प्रलेप.
अपना अहं तुम्हे हर बार निगलता रहा
उगलता भी हर बार.
हर बार तुम उदास हुए,
और कुछ बोलने से पहले
हर बार पुनर्जन्म लेते रहे.
इतने दिन हम साथ-साथ चले
तुम सिर हिलाते रहे और मैं अपना दुःख बोलती गई.
अगर मुझे मालूम रहता,
तुम्हारे हिलते सिर के पीछे दूसरा कोई छुपा है,
कबसे मैं देखना शुरू कर देती पीले पंछी,
रंग भरे इन्द्रधनुष या कीचड़ सने बच्चे.
तुम एक राह चलते बटोही हो,
ईर्ष्या से सराबोर और लोगों की तरह
तुम भी नाखूनों से खरोंचकर
खून से लथपथ लाशों की सुखद कल्पना से
परे नहीं हो.
मुझे मालूम हुआ, आस्था और विश्वासों का बीमा कर डालने के बाद
मालूम हुआ तुम्हारी जेबों में है,
आगे के शहरों, सरायों और वेश्यालयों के पते.
जानती हूँ मैं,
नजदीक आ रहा है तुम्हारा शहर,
अब तुम खो जाओगे भीड़ में
पर क्या साथ में फिर भी रह जाएगी
रास्ते भर कही हुई मेरी अपनी कहानी?

हर्षा अपने कमरे में लौट आई। उसे खूब रोना आ रहा था। आज वह एकांत कमरे में मन भरकर रोएगी। जीवन से बंधकर बड़ा जादूगर कौन हो सकता है, जो आपको हँसाते-हँसाते रुलाना शुरू कर देता है ? अल्बर्टो के कुछ दिन का साथ उपहार देकर क्या जीवन ने उसे आत्महत्या करने से बचाया ?
कमरे का दरवाजा उस असमय पर भी खुला हुआ था? क्या भैरवी आज विभाग नहीं गई ? इस दुनिया में उसके लिए कोई एकांत स्थान नहीं है, जहां वह राहत की सांस ले सके। लंबे समय से वह दुख पा रही है।
पर्दे को हटाकर जब वह कमरे में घुसी तो उसने देखा उस आदमी की लाल आँखें और उसके होठों पर व्यंग्य भरी मुस्कान। पिछली रात की सारी यंत्रणा उसे याद आने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे दुर्भाग्य उसके खाट पर कुंडली मारकर बैठ गया हो। जिससे वह बच नहीं सकती थी। क्या अब उसे अपने मोबाइल से अल्बर्टो का नंबर हटाना होगा ?

नहीं, रहने दो।

(समाप्त)

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "विषादेश्वरी - भाग 10 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.