संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 115 : खेतों से दूर जीवन // प्रशांत कुमार

खेती-किसानी सदैव ही मेरे अंतर्मन को आकर्षित करती रही है। शरीर भले ही खेतों से मीलों दूर हो परन्तु दिल और चंचल मन तो दिनभर में कई चक्कर लगा आता है खेतों व खलिहानों में। सरसों और गेहूँ के खेत, छोटा ही सही पर गांव का वो आम का बाग़, तन्मयता से कलकल बहती नदी और नदी किनारे चरते पशु -ये दृश्य मन को बेचैन कर देता है। इस बेचैनी से पार नहीं पाया जा सकता।  सिवाय उन्हीं ख्यालों में डूबने के और कोई चारा नहीं बचता है मेरे पास। खेतों में लहलहाती फसलों में जो कला है वो दुनिया का कोई भी कलाकार नहीं बना सकता है। उस कला का आनंद लेना है तो वहीँ आना होगा जहाँ मेरा मन और हृदय हरपल घूमना चाहता है। घास चरति गायों और भैसों को देख मन ठहर सा जाता है, एक-एक विचार जो आदमी को दुनियादारी में फसाये रखती है वो अचानक ही कहीं लुप्त हो जाता है। चिलचिलाती धूप में भी ऐसा लगता है मानों शीतल पवन सारी परेशानियों को बहते चला जा रहा है। नथुनों में गोबर की सुगंध जब पड़ती है तो लगता है कि मुझे जरुरत ही क्या है मोटी-मोटी किताबें पढ़ने की। 

कभी-कभी सोचता हूँ , वो गांव की मिटटी, खेत-खलिहान, वह अहरा और पाईन केवल मुझे ही तो नहीं बुलाती होगी। वह तो हर उस बच्चे को अपने पास बुलाती होगी जो किसी क्षणिक लालच के फेर में फंसकर घर छोड़ गया हो। यह सोच ही मुझे प्रेरित करती है कि मैं उठूं और चिल्लाकर कहूँ -

     ओ घर छोड़कर बाहर रहने वालों

     अरे भाई ! गांव तुम्हारा रो रहा है

     एक बार तो जाकर मिल आओ

      शायद बहुत दिनों से तुम्हें कोई खोज रहा है। 

मैं कह नहीं पाता हूँ और यह बात मन के अनगिनत विचारों में एक हो जाता है, इस आशा के साथ की कभी न कभी इस विचार को सत्य साबित करने की कोशिश जरूर करूँगा। तब शायद फिर से मेरा गांव गुलजार हो उठेगा। सब साथ मिलकर खलिहान से अनाज की बोरियां घर लेकर आएंगे और हर्षित हो गीत गायेंगे।

आम के पेड़ से अमौरी तोड़ने का मन करता है, पेड़ के नीचे बैठ कोयल की कुक सुनने को हृदय बेचैन है ,अपने हाथों से गैया को घास खिलने का मन है। एक प्रश्न मन में आता है, क्या सोचते रहने से ये सब सच हो जायेगा? उत्तर जानता हूँ पर शायद वह लालच सबको पीछे ढकेल मेरे आँखों के सामने नाचने लगता है इसलिए इतने महीनों तक या कहूं सालों तक मैं अपने खेतों की और जा नहीं पाता हूँ।

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