त्रेता : एक सम्यक मूल्यांकन - उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल - भाग 2 // दिनेश कुमार माली

भाग 1


उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल

भाग 2

दिनेश कुमार माली

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दूसरा सर्ग

रेणुका की त्रासदी

त्रेता महाकाव्य का द्वितीय सर्ग है ‘रेणुका’, जिसके अंतर्गत कवि उद्भ्रांत ने तत्कालीन समाज में रेणुका के माध्यम से नारी की स्थिति का अवलोकन करते हुए उनके सतीत्व की महत्ता पर प्रकाश डाला है। इस प्रसंग में रेणुका अपने जीवन के प्रसंगों को आत्म कथात्मक रूप से प्रकट करती है। जैसे:- सूर्यवंशी राजा कि नटखट किरणपुत्री/राजकुमारी के रूप में/जन्म लिया मैंने। और रेणुका नाम के पीछे छुपे रहस्य को प्रकट करते हुए वह कहती है कि उसका निर्मल सौन्दर्य प्रातः की किरण की तरह था इसलिए ज्योतिषियों ने उसका नाम “रेणुका” रखा। बचपन की चपलता, चंचलता, लाड़-प्यार में पली होने के कारण उसका बचपन शैतानियों से भरा हुआ होता था। एक बार जब उसने देखा कि उसके पिताजी किसी ऋषि के सामने उनके चरणों में गिर कर क्षमा याचना कर रहे थे तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने ऊँची आवाज में पिता से इस बारे में सवाल पूछा कि ऐसा आपने क्या अपराध किया,जो उनके सामने गिड़गिड़ा रहे हो। मगर उसके पिता ने रेणुका को समझाने के बजाय उस ऋषि जमदग्नि के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। यहाँ पर यह बात उठती है कि तत्कालीन समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व इस कदर ज्यादा था कि राजा-महाराजा भी उनसे थरथर काँपते थे और अपनी बेटियों तक को उनके समक्ष शादी के लिए प्रस्तुत कर देते थे। यही नहीं, उसमें अपने गर्व कि अनुभूति महसूस करते थे तभी तो कवि उद्भ्रांत लिखते हैं- यदि मेरी प्रार्थना स्वीकारने की/अनुकंपा हुई तो/पुत्री का धन्य होगा जीवन/सूर्यवंशी कन्या को/मिलेंगे ब्राह्मणों के/उच्चतम संस्कार भी। साथ ही साथ, कवि उस बालिका के मन में उठ रहे अंतर्द्वन्द्व को प्रस्तुत करने में पीछे नहीं रहते हैं कि बिना उसकी अनुमति के इस तरह का प्रस्ताव रखना क्या पिता के लिए उचित था/ अगर यह उचित था तो क्या ऋषि जमदग्नि द्वारा इस प्रस्ताव को मान लेना शोभनीय कार्य था/ इस कविता में भृगु ऋषि का भी जिक्र किया गया है कि उनके प्रतापी वंशज जमदग्नि थे। सवाल यह उठता कि क्षत्रिय संस्कार क्या इतने नीचे गिर चुके थे कि वर्ण-व्यवस्था का पालन किए बिना विवाह कर सकते थे। रेणुका आगे कहती है कि उसके चार पुत्र हैं। सबसे छोटा पुत्र जिसे वह राम कहती थी, पिता की तरह संस्कारवान, वेदवेत्ता, शास्त्रज्ञ, तपस्वी, वाक्पटु, गंभीर होने के बावजूद भी रक्त में क्षत्रिय संस्कार होने के कारण उसके चेहरे पर भयानक क्रोध दमदमाता था। उसका सबसे प्रिय शस्त्र था परशु और वह महादेव का परम भक्त था और उसकी माता-पिता के प्रति अगाध श्रद्धा भी थी। जब ब्राह्मण समाज उसे भगवान राम के नाम से संबोधित करता था तो उसे उसकी माँ रेणुका को अत्यंत ही हर्ष होता था। बचपन में एक क्षत्रिय राजा ने उसके पिता का अपमान किया तब उसने अपने परशु से धड़ अलग करने की शपथ ली थी। वह इतना जिद्दी हो चुका था कि लाख बार रोकने के बाद भी लगातार इक्कीस हत्याएँ कर दी थी। रेणुका को इस बात की कल्पना न थी कि क्षत्रियों के प्रति उसकी यह नफरत जानलेवा साबित हो सकती है। उसे क्या पता था कि पास की किसी नदी में अप्सराओं के साथ गंधर्वों को वस्त्र रहित स्नान करते देखने का दंड उसे अपनी गर्दन कटा कर चुकाना होगा। जब ऋषि को यह पता चला कि उसकी पत्नी गंधर्वों की कामलीला देख रही है तो वह अपना आपा खो कर उस पर दुराचरण का आरोप लगाए हुए अपने सभी बेटों से एक-एक कर उसका वध करने का आदेश देते हैं। मगर बड़े तीन भाइयों के भयाक्रांत होने के बाद उनकी आज्ञा मानने से इंकार करने पर पर्शुराम पितृ भक्ति में अंधे हो कर, उचित-अनुचित का भेद जाने बिना अपनी माता का वध कर देते हैं। उसे तो यह भी पता नहीं कि उस स्त्री ने उसे इस धरती पर लाने के लिए अपनी कोख में नौ महीने रखकर अपने रक्त-मज्जा से पोषित किया था। आप कल्पना कर सकते हैं कि अपना अंतिम क्षण जानकर भी रेणुका ने उसे चिरंजीवी रहने का असीम आशीर्वाद दिया। यह था त्रेता का प्रथम चरण जहाँ इतिहास अधोन्मुख हो जाता है, मनु संहिता लागू होने लगती है। मगर सृष्टि के गर्भ में समाए हुए अनेक रहस्य धीरे-धीरे हजारों सवाल हमारी वर्तमान पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करते है, उदाहरण के तौर पर:-

1) क्या नारी को काम संबंधित अपनी भावनाओं को प्रकट करने का या अनुभव करने का लेश मात्र भी अधिकार नहीं होना चाहिए?सरोजिनी साहू की कहानी ‘रेप’ में नायिका अपने पति को सपने में किसी दूसरे आदमी से यौन संबंध बनाने के बारे में कहती है तो वह उसके साथ ऐसा व्यवहार करने लगता है मानो किसी ने उसके साथ ‘रेप’ किया हो।

2) क्या वही वर्ग-व्यवस्था तत्कालीन समाज को नाश कर रही थी,जो आज भी विनाश का मुख्य कारण है? एक ब्राह्मण तथा क्षत्रिय से उत्पन्न संतान वर्ण संकर बनकर समाज संहारक बन सकती है? गीता का श्लोक “चातुर्वर्णय मया सृष्टि...” इस बात की पुष्टि नहीं करती?

3) क्या तत्कालीन समाज में एक राजा अपने स्वार्थ की खातिर अपनी बेटी को किसी बूढ़े आदमी को दान कर अपने संस्कारी होने की दुहाई देता है?मनुसंहिता के अनुसार राजा को भगवान मानना उचित था?

कवि उद्भ्रांत इस कविता के माध्यम से यह साबित कर देते हैं कि जो समस्याएँ कलियुग में हैं, वे सारी समस्याएँ त्रेता युग में भी थीं, शायद कुछ ज्यादा ही। देवदत्त अपनी पुस्तक “इंडियन माइथोलोजी” में रेणुका के संदर्भ में एक कहानी के माध्यम से ऐसे ही कुछ विचार प्रस्तुत करते है। जब पर्शुराम अपनी माँ को कुल्हाड़ी लेकर मारने के लिए दौड़ रहा था तो वह अपने को बचाने के लिए एक निम्न जाति के परिवार में शरण लेती है। यह सोचकर कि उसका ब्राहमण बेटा वहाँ प्रवेश नहीं करेगा, मगर ऐसा नहीं होता है, उसने न केवल रेणुका का सिर काटा वरन् उसको बचाने आई एक निम्न जाति की महिला का भी सिर काट लिया। जब पर्शुराम ने अपनी माँ को जिंदा करने के लिए अपने पिता से वर मांगा तो उन्होंने अभिमंत्रित जल दिया,मगर उत्तेजनावश पर्शुराम ने निम्न जाति की महिला का सिर अपनी मां के धड़ से जोड़ दिया और अपनी मां का सिर दूसरी महिला के धड़ से जोड़ दिया। जमदग्नि ऋषि ने पहले वाले शरीर को स्वीकार किया और दूसरे शरीर को निम्न जाति के लोगों के पूजा-पाठ के लिए छोड़ दिया। जिसे ‘येलम्मा’ के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रा के गांवों में किसान ऊँची जाति वाले रेणुका के सिर की पूजा करते है। रेणुका और येलम्मा दोनों अपने पति द्वारा प्रताड़ना को प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त, उद्भ्रांत के दूसरे सर्ग की यह कविता तत्कालीन समाज में व्यभिचारिणी पत्नी पर अविश्वास, अपराध पर दंड की क्रूरता, उच्च जाति के हिंदुओं की कठोरता, निम्न जाति के हिंदुओं की नम्रता, संवेदनाओं और नैतिकता के उतार-चढ़ाव को प्रस्तुत करती है। यद्यपि यह कहानी संस्कृत साहित्य में नहीं दी गई है, मगर मनोविज्ञानियों द्वारा इसे अभी जोड़ दिया गया है। क्योंकि अधिकतर शक्तिशाली कथानक एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में मौखिक रूप से जाते हैं न कि शास्त्रों के द्वारा। रेणुका के सिर और धड़ की पूजा येलम्मा, एकवे और हुलिगम्मा के रूप में की जाती है। यह तीर्थ कुख्यात है और आजकल अवैध भी, क्योंकि यहाँ पर देवदासी के नाम से जवान लड़कियों को वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य किया जाता है। पर्शुराम का यह संदर्भ तत्कालीन मनुष्यों में लूटपाट, चोरी जैसी लोक-प्रवृति को उजागर करता है। उदाहरण के तौर पर त्रेता में रावण ने सोने के हिरण के माध्यम से सीता को प्राप्त करना चाहा, कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए अयोध्या का राजसिंहासन तथा कार्तवीर्य ने पर्शुराम के पिता जमदग्नि से नंदिनी गाय को प्राप्त करना चाहा। दूसरी बात, पर्शुराम की यह कहानी पितृसत्ता का बोध करती है जिसमें स्त्रियों तथा मवेशियों को संपत्ति के रूप में गिना जाता था। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में राजाओं और साधुओं के बीच में संघर्ष चला आ रहा था। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पर्शुराम विष्णु का उग्र अवतार है जो नियम बनाता है, वह राम तथा कृष्ण से भिन्न है क्योंकि राम नियमों का पालन करते हैं तथा कृष्ण नियमों को तोड़ते हैं। पर्शुराम की कोई पत्नी नहीं थी, राम की एक पत्नी थी और कृष्ण की अनेक पत्नियाँ। पर्शुराम की माँ रेणुका, राम की पत्नी सीता तथा कृष्ण की सखी द्रोपदी को देवी के रूप में माना जाता है। इस तरह दोनों अवतारों में क्रमशः विकास हुआ है।

मगर महात्मा ज्योतिबा फूले ने अपनी पुस्तक “गुलामगिरि(1873)” में परशुराम को एक ब्राह्मण पुरोहित वर्ग का मुखिया तथा क्रूर क्षत्रिय बताया है जिसने इक्कीस बार क्षत्रियों को पराजित करके उनका सर्वनाश किया तथा उनकी अभागी नारियों के अबोध मासूम बच्चों का कत्ल किया, इतने कत्ल तो हिटलर ने भी नहीं किए होंगे। ब्राह्मणों ने चालाकी से अपने पूर्वजों के मान में कमी नहीं आने के लिए अवतार जैसा मिथ्या पात्र खड़ा किया है।

सारांश यह है कि उद्भ्रांत जी की इस काव्यमयी रामकथा की हर नारी ऐसे नए अध्याय की रचना करती जाती है,जो न केवल अतीत वरन वर्तमान समाज में उन मूल्यों पर गहरी बहस पैदा कर नए रास्ते का प्रतिपादन करने में समर्थ है।

तीसरा सर्ग

भवानी का संशयग्रस्त मन

त्रेता के तीसरे सर्ग में नारी के रूप में माँ भवानी का वर्णन आया है कि किस तरह उनके मन में कैलाश के शिखर पर ध्यान-मग्न महादेव को देखकर स्वतः यह जानने की इच्छा हो जाती है कि वह किसका ध्यान कर रहे हैं। उस समय भगवान शिव गंभीर स्वर में यह कहते हैं कि विष्णु भगवान दशरथ के पुत्र बनकर लक्ष्मी सहित पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं और मेरा परम भक्त मुझसे प्राप्त अनुपम शक्तियों के द्वारा पृथ्वी पर अत्याचार कर रहा है। उसका विनाश करने के लिए भगवान राम ने जन्म लिया है। मेरे लिए दुविधा की बात यह है कि मेरा सर्वोच्च भक्त पुलस्त्य का नाती अत्यंत ही संस्कारवान तथा समर्पित था। यहाँ तक कि उसने अपने अहंकार रूपी दस-दस सिर काटकर मुझे यज्ञ की समिधा के रूप में चढ़ाये थे। इसलिए वह दशानन के नाम से जाना जाता है। यहाँ कवि उद्भ्रांत ने दशानन जैसे मिथक की व्याख्या करने के लिए जो दस सिर वाले रावण के प्रतिरूप में सिर की तुलना अहंकार रूपी मस्तक से कर एक नवीन प्रयोग किया है। उसके आगे रावण के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का वर्णन करते हुए यह कहते हैं कि दंडक अरण्य में सीता हरण कर रावण ने अपने सर्वनाश को बुला दिया है। इस विषय में माँ भवानी का एक नया रूप सामने आया है कि वह सीता जी का वेश धरण कर राम लक्ष्मण के समक्ष प्रकट हो जाती है,जिसे राम पहचान जाते हैं और उन्हें मन ही मन प्रणाम करते हैं। इस प्रकार से महादेव और महादेवी के माध्यम से कवि ने स्त्री के मन का चित्रांकन करते हुए निर्बल, असहाय, दलित स्त्री के पक्ष में खड़ा होने का आह्वान करते हुए नारी के गुण-अवगुण का अच्छा खासा चित्रण किया है कि किस तरह एक नारी मायावी भी हो सकती है और उसकी कौन-सी कमियाँ और नारी सुलभ जिज्ञासा जनित आकांक्षाएँ किसी युद्ध अथवा सर्वनाश को आमंत्रित करती हैं। भवानी का यह अध्याय रखने के पीछे शायद उद्भ्रांत जी का यह उद्देश्य रहा होगा कि राम कथा का सत्य बना रहे या एक कथा वाचक के तौर पर शिव के मुख से राम कथा का वाचन भी हो।

भवानी के माध्यम से कवि मन, वचन, कर्म द्वारा पति के चरणों में सेवा करना ही पत्नी का धर्म है, शायद इस उक्ति को यहाँ चरितार्थ करना चाहते हैं, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस में कहा है-

पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥

चौथा सर्ग

अनुसूया ने शाप दिया महालक्ष्मी को

अनुसूया सर्ग में कवि उद्भ्रांत ने सती अनुसूया के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए सिद्ध करने का प्रयास किया है कि स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहुति तथा ब्रह्मर्षि कर्दम के गर्भ से जन्म लेने वाली अनुसूया में अपने वंश के अनुरूप सत्य, धर्म, शील, सदाचार, विनय, लज्जा, क्षमा, सहिष्णुता तथा तपस्या आदि सद्गुणों का स्वाभाविक रूप से विकास हुआ था। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि को उन्होंने पति के रूप में प्राप्त किया था। इस प्रसंग में अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा करने आए तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अपने संकल्प बल द्वारा नवजात शिशुओं में बदल कर उनकी विवस्त्र होकर ‘भिक्षाम देही, भिक्षाम देही’ की शर्त को पूरा करती है। कवि उद्भ्रांत लिखते हैं ‘यदि मेरे अन्तर्मन में/कभी किसी भी क्षण/किसी अन्य पुरुष का/आया नहीं ध्यान हो तो/ये तीनों मुनिवर/नवजात शिशु बनकर/लगाएँ वक्ष से’। मगर दलित समीक्षक कंवल भारती के अनुसार उद्भ्रांत की अनुसूया का जीवन चरित्र तथ्यों से मेल नहीं खाता। उन्होंने अपनी पुस्तक “त्रेता-विमर्श और दलित चिन्तन” के अध्याय चार(पतिव्रत धर्म की कसौटी) में उसे अपने समय की सबसे बड़ी मूर्ख, कर्तव्यविमूढ़ और चेतना-शून्य स्त्री बतलाया है जिसके अनुसार न केवल उसने अपने चरित्र को स्वयं दूषित किया है, वरन् उस पर तरस भी नहीं खाया जा सकता है। रामायण की इस कहानी पर कंवल भारती ने निम्न शंकाएँ जाहिर की है। जब सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती को असलियत का पता चला तो उन्होंने जाकर अनुसुइया से क्षमा मांगी और अपने-अपने पतियों को छुड़ा कर लायी। दलित आलोचक के अनुसार ब्रह्मा,विष्णु और महेश के शिशु बनने वाली बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यदि अनुसूया के सत्य में इतनी ही ताकत थी, तो उन्होंने उन तीनों व्यभिचारी देवताओं को भस्म क्यों नहीं कर दिया? उन्हें शिशु बनवाकर उनसे अपनी छातियाँ क्यों चुसवायी? इस कहानी में दो बड़े सवाल यह है कि तीनों देवता अपनी पत्नियों के कहने पर अनुसूया के साथ सम्भोग करने के लिए तैयार क्यों हो गये? स्पष्ट है कि वे तीनों अनुसूया से सम्भोग के लिये इसलिए तैयार हो गए, क्योंकि वे पहले से ही व्यभिचारी और कामान्ध थे। उनकी चरित्र भ्रष्टता के अनेक प्रमाण शास्त्रों में मौजूद हैं। ब्रह्मा अपनी ही पुत्री के साथ सम्भोग रत हो चुके थे। (कुछ आध्यात्मिक संस्थाएँ सरस्वती को ब्रह्मा की मानस-पुत्री मानते हैं। किन्तु सृष्टि का पालन व ज्ञानदान करने के कर्त्तव्य निर्वाह करने के कारण ब्रह्मा को जगतपिता और सरस्वती को जगतमाता माना हैं। उनके अनुसार ब्रह्म देव एवं सरस्वती के मध्य किसी प्रकार का शारीरिक संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। क्योंकि वे निरंकारी आत्मस्वरूप में स्थित हैं। ) विष्णु जलंधर की पत्नी वृंदा का शील भंग कर चुके थे, और महेश इतने ज्यादा कामान्ध थे कि मोहिनी के पीछे कहाँ-कहाँ नहीं भागे। वे तीनों व्यभिचारी थे और सुंदर स्त्रियों को भोगने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते थे। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि अनुसूया ने देवताओं की विवस्त्र हो कर भोजन परोसने की शर्त क्यों स्वीकार की? यदि यह पतिव्रता स्त्री थी, तो उसको यह शर्त बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी, प्रत्युत ऐसी शर्त सुनकर उन तीनों की एक मोटे डंडे से पिटाई करनी चाहिए थी। उसने विरोध क्यों नहीं किया और वह उनके सामने निर्वस्त्र हो गई? इससे यही कहा जा सकता है कि वह मूर्ख थी या स्वयं व्यभिचारिणी थी।

डॉ॰ आनंदप्रकाश दीक्षित ने अपनी पुस्तक “त्रेता:एक अंतर्यात्रा” में इस प्रसंग को दूसरे ढंग से लिया है कि शायद कवि उद्भ्रांत इसके माध्यम से न केवल राम अवतार की पुष्टि करना चाहते है वरन साथ ही साथ सीता की त्रासदी की भूमिका भी तैयार करता हुआ नजर आते हैं।

मैंने कहा, “क्षमा योग्य

नहीं है अपराध यह,

किन्तु क्षमा करती हूँ

स्त्री की

अपनी प्रकृति के अनुरूप।

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“तीनों से सर्वाधिक पाप

महालक्ष्मी का,

क्योंकि उसने ही किया

सूत्रपात ऐसी कुटिल मंत्रणा का;

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“अतएव पृथ्वी पर विष्णु के रामवातार के समय

अपमानित उसे ही होना होगा

सामने समाज के,

पति से बिछोह का भी

सामना करना होगा;

मगर कंवल भारती उपरोक्त प्रसंगों का विरोध करते हैं कि अनुसूया ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अभिशाप न देकर केवल विष्णु की पत्नी महालक्ष्मी को अभिशाप देने का क्या तुक था। कवि ने एक स्त्री के विरोध में दूसरी स्त्री को खड़ा कर दिया, जबकि पुरुष वर्ग को क्लीन चिट दे दी। उनकी शंका निम्न प्रश्नों के रूप में प्रकट होती हैं:-

प्र.(1)- क्या अनुसूया को रामवातार की जानकारी थी? अगर हाँ, तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश उसके साथ क्या षड्यंत्र करने जा रहे हैं इस चीज की जानकारी क्यों नहीं हुई?

प्र.(2)- अनुसूया ने लक्ष्मी को सीता बनाने के लिए अपहरण, पति बिछोह, पातिव्रत धर्म की पूर्ति हेतु अग्नि परीक्षा के लिए अभिशाप दिया, मगर सवाल अभी भी जिंदा है कि सीता ने अग्नि परीक्षा निर्वस्त्र हो कर क्यों नहीं दी? जबकि अनुसूया ने अपनी परीक्षा पर पुरुषों के समक्ष निर्वस्त्र होकर दी।

प्र.(3)- क्या अनुसूया को अपने किए पर पश्चाताप हुआ? वह अपने को दोषी मानने के बजाय देवताओं को ही व्यभिचारी मान रही है।

प्र.(4)- क्या उसे अपनी परीक्षा में स्त्री की इज्जत से जुड़ा हुआ मुद्दा नजर नहीं आया?

प्र.(5)- भिक्षा के लिए ऐसी कोई भी अनैतिक प्रथा रामायण काल में प्रचलित नहीं थी। जैन दिगंबर साधुओं में यह प्रथा जरूर थी, जो आज भी मौजूद है, कि भिक्षा के लिए निकलते समय वे मन में जो भी संकल्प बनाते है, वे वही भोजन लेते हैं, जहाँ उनका चित्त संकल्प पूरा होगा। मगर वे लोग भी ऐसा घृणित और अनैतिक संकल्प नहीं लेते कि कोई स्त्री उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन परोसे। फिर त्रिदेवों ने ऐसी अनैतिक शर्त क्यों रखी?

प्र.(6)- आज तक ऐसा कोई विज्ञान विकसित नहीं हुआ है जो ध्यान करते ही आदमी को नवजात शिशु बना दे। वस्तुतः अनुसूया त्रिदेव की काम-वासना को शांत करने के लिए ही निर्वस्त्र हुई थी। नवजात शिशु की कपोल-कल्पित अवैज्ञानिक कथा त्रिदेवों और अनुसूया के यौन-सम्बन्धों पर पर्दा डालने के लिए गढ़ी गयी थी।

प्र.(7)- डॉ.आनंदप्रकाश दीक्षित के अनुसार रामवातार के लिए अनुसूया के शाप का कारण अनुचित है क्योंकि कर्म-बंधन से मुक्त मानी जाने वाली आत्माओं के इस वजह से पृथ्वी पर अवतरण तथा अवतारवाद की गरिमा क्षीण हो जाती है। फिर “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति...” की सार्थकता क्या रह जाती है?

प्र.(8)- इस सर्ग में कवि ने सीता-अनुसूया संवाद को नहीं दिखाया है, शायद महाकाव्य का आकार बढ़ न जाए या फिर गोस्वामी तुलसी दास द्वारा प्रत्येक स्त्री को सदा स्मरण रखने योग्य सरल, सुबोध एवं सरस पद्यमय उपदेशों के वर्णन का औचित्य कवि को उचित प्रतीत नहीं हुआ, जो यह दर्शाता हो।

वृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध, वधिर क्रोधी अति दीना॥

ऐसेहु पति कर किए अपमाना। नारी पाव जमपुर दुख नाना॥

जग पतिब्रता चारी बिधि अहहिं। वेद पुराण संत सब कहहिं॥

उत्तम के आस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं॥

क्योंकि संत कवि तुलसी के आत्मघाती सामाजिक विचारों, ब्राह्मणवाद, नारी विमर्श तथा अनेक असंगत प्रसंगों से परिचित थे। श्री विश्वनाथ द्वारा संपादित पुस्तक “हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास” के आलेखों में उन सारी तमाम भ्रामक धारणाओं पर से पर्दा उठाने के लिए प्रस्तुत विश्लेषण और विवेचना आँखें खोलनेवाली हैं कि अंधविश्वास, मायाजाल, वर्णाश्रम-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, आज भी आधुनिक हिन्दू समाज को रसातल में धकेलता जा रहा है।

डॉ. देवदत्त पटनायक ने अपनी पुस्तक “मिथक=मिथ्या” (हिन्दू मिथकों का विश्व कोश) में मिथकों को झूठा दर्शाया है अर्थात् उन्हें काल्पनिक कहकर सत्य से अलग रखा है। उनके अनुसार पुनर्जन्म, स्वर्ग, नर्क, देवदूत,दानव,स्वेच्छा,पाप,शैतान और मोक्ष जैसे विषय धार्मिक मिथकों के दायरे में आते हैं, जबकि संप्रभुता, राष्ट्र राज्य, मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार, जानवरों के अधिकार, समलैंगिक अधिकार जैसे विचार पंथ-निरपेक्ष मिथक है। उन्होंने “विष्णु और लक्ष्मी के वर्ग” में प्राकृतिक क़ानूनों से सांस्कृतिक संहिता को अलग कर के देखा है। उनके अनुसार विष्णु प्रकृति की लय से परिचित करता है ताकि ब्रहमाण्ड में होनेवाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान किया जा सके और उसके बाद उसका प्रबंधन भी किया जा सके। विष्णु के लिए लक्ष्मी के दो प्रकार हैं। लक्ष्मी वांछित-स्वरूप (प्रकृति का उपजाऊपन,शुभ तरंग,दैनंदिन-बढ़ता हुआ चाँद,बसंत,बारिश,फसल), दूसरी ओर अलक्ष्मी अवांछित स्वरूप-(प्रकृति का बंजरपन, अशुभ पक्ष, रात, घटता चाँद, निम्न तरंगे, गर्मी,भयंकर सर्दी)।

अनुसूया के प्रसंग के बारे में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त ओड़िआ लेखिका सरोजिनी साहू की टिप्पणी का उल्लेख किए बिना यह अध्याय अधूरा रह जाएगा। उनके अनुसार न केवल भारत में वरन् पूरे विश्व में स्त्री जाति को दबा कर रखने के लिए मिथकीय यौन-राजनीति पुरुष लेखकों द्वारा लिखी गई है। तभी तो क्रिस्टोफर पेनसाक ने अपनी किताब ‘गे विच क्राफ्ट: एम्पावरिंग दि ट्राइब’ में पॉर्ननिज़्म और जादुई विद्या का समावेश करके विश्लेषण किया है, उनके अनुसार देवी-देवताओं ने मिलकर अपनी यौन-फंतांसियों की पूर्ति हेतु इन मिथकों का सृजन किया था। उदाहरण के लिए ग्रीक राजा इडिपस ने पिता की हत्या के बाद माँ से शादी की और यह बात मालूम पड़ने पर उसने अपनी आँखें फोड़ दीं। कंडम्बिल के देवता ओरुगन ने अपनी माँ येमाज्ना पर जबरदस्ती की, तद्पश्चात सूर्य व चंद्र सहित बारह बच्चों का जन्म हुआ। आस्टेक मिथक के एक विवरण के अनुसार वहाँ की माँ-देवी कोयाल्लिक को पति से तब तक दैहिक उत्पीड़न सहना पड़ता है जब तक उसके शत पुत्रों में से एक आकर प्रतिकार करता है, वह अपनी पिता की हत्या करके माँ का प्रेमी बन जाता है। जब सूर्य और उसकी बेटी चाँद के बीच में यौन-संबंध होता है तभी पूर्णग्रहण होता है। सियस संदर्भ पाकर, पुरुषों को अपनी यौन विकृतियों से रिझाकर उनके साथ संबंध रख लेती है। यौनानन्द को यहाँ पर ‘तपिश’ से सूचित किया जाता है। ग्रीक सागर देवता पोसीडोन भी यौन-प्रवृतियाँ में सियूस के कुछ पीछे नहीं है। उसने डेमेटीर देवी सहित कई स्त्रियों को अपने वश में किया था। उसने अमिल्टाइट का बलात्कार किया, बाद में ब्याह किया।

हिन्दू मिथकों में स्रष्टा की परिकल्पना ‘अर्धनारीश्वर’ के रूप में मिलती है जिसकी तुलना आस्टिक देवता ओमेटेचुहली के साथ की जाती है। यूनाइटेड किंगडम की सपना-विशेषज्ञ सारा डेनिंग ने यौनाचारों को सामाजिक प्रवृतियों का परिणाम माना और अपनी किताब ‘दि मिथोलोजी ऑफ सेक्स’ में मिथकों के आधार पर उनका विश्लेषण किया।

इसी संदर्भ में सिमोन दि बोउआ के अनुसार पुरुष दुनिया ने स्त्री-संबंधी मिथकों को निर्मित किया है और ये मिथक (जैसा कि माता, यौनशुचिता, मातृराज्य, मातृ-प्रकृति) स्त्रियों के शोषण के लिए बनाये हैं, इसलिए ये विभिन्न प्रकार के स्त्री व्यक्तित्वों के विकास पर रोक लगानेवाले हैं। सिमोन मातृत्व और विवाह के विरोध में थी। इसमें शंका नहीं कि काफी समय पहले ही नारीवाद, मार्क्सवाद से प्रभावित रहा है। नारीवाद के विकास में सिमोन, क्रीड़न, ग्रीक और लिंडा हिरशमेन जैसी पाश्चात्य नारीवादियों ने नारीवाद को पितृसत्तात्मकता के समान स्तर पर निरूपित करने का प्रयास किया था। लिंगभेद की समस्या पर विचार करें तो यह विरजीनिया वुल्फ़ की ‘ओरियान्डों’, रोड़क्लीफ़ की ‘दि वेल ऑफ लोनलीनेस’ में वर्णित है और इनके बहुत पहले जूडिथ बटलकर ने भी इसकी चर्चा की है। जोयस की ‘उलिसस’ या थामस हार्डी के उपन्यासों में यौनता एक विषय बनी है। ‘सेकेंड सेक्स’ लिखने से पहले सिमोन ने दो कहानियाँ लिखी थीं- ‘शी केयूम टुस्टे’ और दि वर्ल्ड ऑफ आदर्श’, जिसमें यौनता का प्रतिपादन है। पर यह तो शंकातीत है कि ‘दि सेकेंड सेक्स’ के पहले किसी ने यौन-देह पर घटना वैज्ञानिक अन्वेषण नहीं किया था। सिमोन ने इसकी दिशा बदल डाली। यौन-समानता पर उनका तर्क द्वि-आयामी है। सबसे पहले वे यह सिद्ध करती है कि पितृसत्तात्मकता यौन-भेद के शोषण का कारण बनती है इस तरह वे असमान सामाजिक व्यवस्था तथा यौन राजनीति को खेल के रूप में रखती हैं। नतीजतन पुंसवर्चस्व को निपटाने के लिए नारीवाद जन्म लेता है।

“ कोई विषय बहुत विवादास्पद है और अगर वह यौनता संबंधी है तो कोई सच नहीं बताता है। बस इतना बताता है कि उस पर खुद के क्या विचार है, बाकी सुनने वाले को, उनके अपने विवेक,आत्मसीमा,पूर्वधारणा तथा स्वभाव के अनुकूल निष्कर्ष तक पहुँचने का मार्गदर्शन ही करता है। ” -विराजीनिया वुल्फ।

कुरान बहुपत्नीत्व की अनुमति देता है, पर नारी को बहुपतित्व का अधिकार नहीं देता है। ईसाई विश्वासों के अनुसार पुरुष व स्त्री, दोनों एकाधिक विवाह नहीं कर सकते। हिन्दू, इत्यादि दूसरे धर्मों में भी स्त्री के यौनाधिकारों पर सुनिश्चित रोक है। सभी समाजों में यही विश्वास बना हुआ है कि स्त्री की यौन शुचिता बनी रहनी चाहिए।

सारलादास कृत ‘ओड़िया महाभारत’ के अनुसार द्रौपदी को कृष्ण और कर्ण पर प्रेमकुंठा थी। कर्ण कौरवों का नाजायाज भाई था। द्रौपदी पाँचों पांडवों के साथ यौन-संबंध रखती थी, फिर भी उसके मन में कृष्ण व कर्ण का स्थान था।

संस्कृत की पौराणिक लिपियों में प्रसिद्ध उक्ति है : "अहिल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती, मंदोदरी तथा, पंच कन्या स्मरेनित्यम महापातक नाशनम्। " मिथकों के अनुसार अहिल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती और मंदोदरी प्रशस्त पंचकन्याएँ (पुण्यवतियाँ) हैं। पर मजेदार बात है कि इनमें सभी के एकाधिक पति थे। पाँचों का स्थान सती सावित्री जैसा था, जो अनुसूया से कमतर नहीं है।

ऋषिपत्नी अनुसूया उपदेश दे रही हैं- वह विस्तृत है-
मातु, पिता, भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमितदानि भर्त्ता वैदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥

- रामचरितमानस, अरण्य कांड

(अर्थ- हे राजकिशोरी सीता, सुनो, माता, पिता, भाई हितैषी सब एक सीमा तक सुख देने वाले हैं-किन्तु हे वैदेही, पति अपार सुख देने वाला, वह स्त्री अधम है जो पति की सेवा न करे। )

अपने आर्थिक स्वार्थ को भी न समझकर जो स्त्री पति सेवा न करे, उसे चाहे मूर्ख भले ही कह लें, किन्तु अधम न जाने क्यों कहा गया है।

अनुसूया का उपदेश है-

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिये चारी॥
बृद्ध रोग बस जड़ धन हीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥
ऐसेहु पति कर किए अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा
, काय बचन मन पतिपद प्रेमा॥

-रामचरितमानस, अरण्य कांड

(हे सीता, धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री इन चारों की परीक्षा आपद काल में ही लेनी चाहिए। बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, धनहीन, अंधा, बहरा, क्रोधी, अत्यंत दीन- ऐसे पति का भी अपमान करने से स्त्री यमपुरी में दुख पाती है। )

कहने का अर्थ उद्भ्रांत जी यह सर्ग भी आधुनिक संदर्भ में ऐसे बहस को जन्म देती है,जिसमें फ्रायड का मनोविश्लेषण,पुरातन व आधुनिक नारीवादी दृष्टिकोण,एकाधिक यौन संबंध,यौन शुचिता सभी विषयों पर पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है।

पाँचवाँ सर्ग

कौशल्या का अंतर्द्वंद्व

महाकाव्य के पाँचवें सर्ग में कवि ने राम की माता कौशल्या के जीवन की घटनाओं के प्रसंग का आत्मपरक विश्लेषण करते हुए तत्कालीन समसामायिक स्त्री-विमर्श के फलस्वरूप परिलक्षित की जाने वाली नारी जीवन की समस्याओं, उनकी आकांक्षाओं, बहुपत्नीत्व के कारण उत्पन्न सौतिया डाह, राजनीति के कुटिल दाँव-पेंच के खेल, ‘त्रेता’ के नारी पात्रों में आसानी से देखे जा सकते हैं। परंतु अनमेल विवाह, अनिच्छा-विवाह, कन्या के साथ पण्यवस्तु जैसे व्यवहार, पुरुष और स्त्री की शिक्षा में योग्यता का अंतर मानना, पुत्री को शिक्षा से वंचित रखना, पुत्री के जन्म को नारी का अपराध मानना और इसके लिए उसको दंडित करना, नवजात बालिका का केवल लड़की होने के कारण परित्याग करना, नारी का सीमाशुल्क अधिकारी होना आदि बहुत से ऐसे कार्य हैं जो त्रेता युग की चिंता के परिचित भाग नहीं हैं, उस काल की समस्याएँ नहीं हैं। कवि ने समसामयिकता से प्रभावित होकर उस काल के पात्रों और घटना-प्रसंगों पर उन्हें आरोपित किया है।

कौशल्या नामकरण के मामले में कवि उद्भ्रांत ने मौलिकता दिखाते हुए यह लिखा है कि पाक कला में कुशल होने के कारण अथवा कुश की तरह, भले ही साधारण, मगर नुकीली दृष्टि, अडिग और अविचल विचार रखने के कारण उनका नाम कौशल्या रखा गया, मगर गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित बाइसवें वर्ष का विशेषांक “नारी-अंक” में उन्हें दक्षिण के कौशल राज्य की राजकुमारी बताया है, जिसका अपहरण रावण ने झंझावात पैदा करके किया और उन्हें काष्ठ पेटिका में बंद करके समुद्र में फेंक दिया। बाद में उनकी मुलाक़ात हिन्दी फिल्मी तरीके से राजा दशरथ से हो जाती है जो आगे जा कर परिणय सूत्र में बंध जाते हैं। इस अध्याय में कवि ने स्त्रीयोचित ईर्ष्या के भाव कैकेयी के प्रति दिखाए हैं। उनका दुख यह है कि राजा दशरथ हमेशा उसके साथ रहते है, और कैकेयी ने उन्हें अपने वश में कर लिया है। तभी तो ‘त्रेता’ में कवि ने लिखा है-

दुर्दिन तब सचमुच मुझे
अपने आते दिखे-
जब कैकेय नरेश की
अनिंद्य रूपवती कन्या कैकेयी
अयोध्या के राजमहल में आयी।

अनिंद्य सुंदरी होने के साथ

परम निष्णात थी वह

वार्तालाप करने में

बड़ी बहन का आदर-सम्मान
उससे सदैव मैंने

प्राप्त किया प्रकटतः। “

मगर इसी अध्याय में आगे जाकर कवि उद्भ्रांत कैकेयी की वीरगाथा के बारे में अपनी आशंका जताने के साथ-साथ मनुस्मृति की संहिताओं को मानने की व्यवस्था पर खेद प्रकट किया है। वे कहते है-

“हम सबने सुनी जो कथा
यह दरबार में
वह थी कितनी सत्य
इसे जानने की कोई
विधि न थी हमारे पास,
और यद्यपि थी पूरी कथा ही अविश्वसनीय
किन्तु हमारे
महान पुरखे मनु महाराज द्वारा
निर्मित संहिता के अनुसार
राजा ईश्वर है
जनता के लिए और
स्त्री के लिए ईश्वर, पति है। ”

राम और सीता को चौदह वर्ष वनवास देने के आदेश के दारुण दुख से महाराज दशरथ के प्राण निकल जाते हैं, कैकेयी को यह सबसे बड़ा दंड प्राप्त होता है वैधव्य के रूप में तथा सुमित्रा पश्चाताप करने लगती है, मगर कौशल्या के दुखों की मात्र दोगुनी-तिगुनी घनीभूत वृद्धि होने के बावजूद भी वह साधारण मनुष्य के दुख की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती है। कवि की पंक्तियाँ....

और मुझे देते हुए-
दोहरा-तिहरा दुःख घनीभूत
अनुमति व्यक्त होने की नहीं।
जननी राम की थी माँ।
मानव का साधारण दुःख भला
क्यों स्पर्श करता मुझे। ”

इस प्रसंग पर आलोचक कंवल भारती अपनी राय रखते है कि कौशल्या को यह मालूम था कि विष्णु अवतार के रूप में राम उसकी कोख से जन्म लेंगे, दशरथ की मृत्यु, चौदह वर्ष राम का वन निष्कासन, सीता अपहरण, अगर सब विधि के विधान के तहत पूर्व निर्धारित घटनाएँ हैं तो कैकेयी को लेकर उनके मन में अंतर्द्वंद्व क्यों पैदा हुआ? क्या कवि कैकेयी के चित्रण में कहीं पक्षपात तो नहीं कर रहे हैं। जैसा कि भगवान राम के वन जाते समय माता कौशल्या ने अपनी मनस्थिति को इस तरह प्रस्तुत किया था। स्त्रियों के लिये सौतेली पत्नी द्वारा किये गए अपमान से बढ़कर कोई कष्ट नहीं। मैं तो कैकेयी की दासी की भाँति हूँ। मेरे सेवक-सेविकाएँ कैकेयी से सदा भीत रहती हैं और कैकेयी के सेवक भी मुझे कष्ट देते हैं।

एक बात और यहाँ उल्लेखनीय है कि कवि ने पूरी ईमानदारी के साथ तत्कालीन राजा महाराजाओं की देह-आसक्ति को उभारने के साथ-साथ मानवीय धरातल पर स्त्रियों के चरित्र-चित्रण का अच्छा-खासा मनोविश्लेषण किया है। उन्होंने सत्य को सामने लाया है कि देह-लोलुप राजा-महाराजा और सामंत नारी के सौंदर्य के सामने किस तरह अपने राज्य की उपेक्षा करते थे।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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