संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 प्रविष्टि क्रमांक 118 : संस्मरण - हास्य सम्राट रामरिख मनहर // डॉ॰ हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 प्रविष्टि क्रमांक 118

संस्मरण

हास्य सम्राट रामरिख मनहर

डॉ॰ हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

सन् 1989 में मैंने मैनपुरी की वयोवृद्ध कवयित्री श्रीमती चन्द्रकला मिश्र के घर पर श्मंगल दीप’ पत्रिका के कुछ अंक देखें। पत्रिका सजधज और आकार में इतनी सुन्दर थी कि मैं उसे देखता ही रह गया और अनायास ही मेरे दिमाग में एक फिल्मी गीत श्जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा’ गूँजने लगा। मैंने जिज्ञासावश चन्द्रकला जी से पूछ लिया कि इतनी अच्छी और विशाल पत्रिका से आप कैसे जुड़ गयीं। उन्होंने बताया कि मेरे पतिदेव एटा में नौकरी करते थे और मैं भी वहाँ उनके साथ रहती थी। एटा जिले के तमाम साहित्यकारों का मेरे घर आना-जाना रहता था। उन्हीं दिनों वहाँ महेश पंडित नाम का एक लड़का जो कविता करता था मेरे घर आता था। शायद वह इस पत्रिका में छपता था। उसी ने मुझे इस पत्रिका का पता देकर इसमें छपने के लिए अपनी रचनाएँ भेजने का आग्रह किया। चन्द्रकला जी ने बताया कि फिर वे पत्रिका के सम्पादक श्री रामरिख मनहर जी को अपनी रचनाएँ प्रेषित करने लगीं जिन्हें ‘मंगलदीप’ में प्रकाशित कर मनहर जी उनका उत्साहवर्धन करने लगे।

चन्द्रकला जी ने मुझे ‘मंगलदीप’ का पता देकर वहाँ रचनाएँ भेजने के लिए मुझे भी प्रेरित किया। मैं और मेरा छोटा भाई अजय शाक्य दोनों ही हिन्दी के रचनाकार हैं। हम दोनों ने ही मनहर जी को सन् 1992 में अपनी-अपनी रचनाएँ प्रकाशनार्थ प्रेषित कर दीं। जब मेरे और अजय के नाम से रजिस्टर्ड डाक से पत्रिकाएँ आयीं तो सचमुच ही हम लोगों के हर्ष की सीमा नहीं रही। हम लोगों ने इतनी विशाल पत्रिका में छपी हुई अपनी रचनाएँ पहली बार ही देखी थीं। मैंने अपने जिले के अन्य रचनाकारों को भी ‘मंगल दीप’ से जुड़ने और उसमें प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने के लिए प्रेरित किया। सभी को मनहर जी ने प्रमुखता से छापा। किसी को निराश करना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था।

‘मंगल दीप’ से मनहर जी के बारे में काफी कुछ जानकर मुझे उनसे श्रद्धा हो गयी थी और मैं उनसे मिलने को आतुर होने लगा था। हमारे जिले के एक प्रख्यात नोटेरी वकील श्री रमेश चन्द्र वर्मा बहुत अच्छे साहित्यकार थे। उनके घर पर मेरा आना जाना होता ही रहता था। एक दिन उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र आलोक वर्मा से मेरा परिचय कराया और बताया कि आलोक बहुत अच्छा गायक है। मैं भी बचपन से फिल्म कलाकार बनना चाहता था। सन् 1980 में 18 वर्ष की अल्पायु में आगरा के एक फिल्म निर्माता निर्देशक डॉ0 आर0 श्याम की कल्चरल फिल्मस डिवीजन के बैनर तले बन रही फिल्म ‘जलतरंग’ में मुझे एक प्रमुख भूमिका मिल भी गयी थी। मथुरा वृन्दावन में मेरी उस फिल्म की शूटिंग हुई थी। मैंने बड़ी तल्लीनता से उस फिल्म में काम किया था किन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि वह फिल्म कभी पूर्ण न हो सकी। आर0 श्याम जी इससे पहले नये कलाकारों के लेकर एक फिल्म ‘महामिलन’ बना चुके थे जिसे वे उत्तर प्रदेश में बनी पहली फिल्म कहते थे। ‘महामिलन’ मात्र आगरा में रिलीज हुई थी और मात्र आठ दिन ही चल पाई थी। आर0 श्याम जी नये कलाकारों से सहयोग राशि लेकर फिल्में बनाते थे। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था। मुझसे भी उन्होंने एक बड़ी रकम लेकर मुझे ‘जलतरंग’ फिल्म में काम दिया था। बाद में डॉ0 आर0 श्याम जी से कुछ भी वापस नहीं मिला और मैं जिन्दगी के लक्ष्य से भटक कर बरबाद हो गया। फिल्मों से जुड़े किसी भी व्यक्ति से मिलने पर मुझे बेहद सुखानुभूति होती थी। मुझे ऐसा लगने लगता था कि शायद उसके माध्यम से फिर कहीं आशा की किरण कौंध जाये और मुझे फिल्मों में काम मिल जाये। इसी जिज्ञासा से मैंने आलोक वर्मा के बारे में गहराई से जानने का प्रयास किया। आलोक वर्मा ने मुझे बताया कि उन्होंने आज की जानी मानी पार्श्व गायिका अनुराधा पौडवाल के साथ सन् 1977 में श्ईद मुबारक’ फिल्म में गाया है। आलोक ने अपनी बात को सत्यापित करने के लिए फिल्म ‘ईद मुबारक’ की रिकार्डिंग के अवसर पर खींचे गये अपने फोटो दिखाये और फिल्म का ई0पी0 ग्रामोफोन रिकार्ड दिखाया। रिकार्ड के रैपर पर पढ़कर मैंने यह जानना चाहा कि इस फिल्म के गीतकार कौन थे। मेरे हर्ष की उस समय सीमा न रहीं जब मैंने उस फिल्म के ग्रामोफोन रिकार्ड के रैपर पर दादा मनहर जी का नाम गीतकार के रूप में छपा देखा। ‘ईद मुबारक’ फिल्म भी कोई खास नहीं चल पायी थी और आलोक वर्मा को भी फिर आगे कोई अवसर नहीं मिल पाया था।

‘मंगल दीप’ में राजश्री प्रोडक्शन के विज्ञापन प्रमुखता से छपते थे और प्रोडक्शन के संस्थापक श्री ताराचंद बड़जात्या जी का परिचय बड़े आदर से छपता था। यह देखकर मैं समझ गया था कि राजश्री प्रोडक्शन से मनहर दादा जी खूब अच्छी तरह जुड़े हुए हैं। मैं यह भी समझ गया था कि मनहर दादा जी का सम्बन्ध बड़ी-बड़ी फिल्मी हस्तियों से है। किसी दिन जब मुम्बई पहुँचना होगा तो मनहर दादा जी से एक न एक दिन मुलाकात करके मुझे फिल्मों में काम मिल जायेगा ऐसी आशा मन में घर कर गयी थी।

मुझे कविता करने का भी शौक था। अनेक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के मंचों पर मुझे भी काव्य पाठ करने का सौभाग्य मिला। तमाम मंचीय कवियों से मेरा परिचय हुआ। मैंने अनेक कवियों से मनहर दादा जी के बारे में पूछा तो यह जानकारी मिली कि दादा बहुत ही नेकदिल इंसान हैं और आर्थिक रूप से पिछड़े कवियों और साहित्यकारों की भी आप खूब मदद करते हैं।

विभिन्न स्रोतों से मुझे ज्ञात हो गया था कि दादा रामरिख मनहर जी हास्य सम्राट थे और ‘ठहाका किंग’ के नाम से भी विख्यात थे। विविध भारती के एक प्रायोजित कार्यक्रम में मुझे एक बार दादा मनहर जी की आवाज सुनाई पड़ी। उनका ठहाका इतना जोरदार था कि मैं भी उनके साथ हँसने लगा था। फिर मुझे विविध भारती का वह प्रायोजित साप्ताहिक कार्यक्रम प्रति हफ्ते सुनने की आदत हो गयी। दादा मनहर जी इस कार्यक्रम में श्रोताओं के पत्रों का हास्यमय उत्तर ठहाका लगाते हुए दिया करते थे। मैंने सोचा कि मनहर जी जब रेडियो के इस जरा से कार्यक्रम में इतना हँसाते हैं तो कवि सम्मेलन के मंच पर न जाने कितना हँसाते होंगे। मैं मंच पर काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, अशोक चक्रधर, हुल्लड़ मुरादाबादी, प्रेम किशोर पटाखा, प्रदीप चौबे, ओमप्रकाश आदित्य, सत्यदेव शास्त्री ‘भौंपू’ आदि तमाम हास्य सम्राटों को सुन चुका था किन्तु दादा मनहर जी को सुनने या उनका दर्शन करने का कभी अवसर नहीं मिल पाया था।

मैनपुरी के श्री देवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी में एक बार मेरे एक मित्र श्री गिरीश भदौरिया अखिल भारतीय विराट कवि सम्मेलन के संयोजक चुने गये। उन्होंने मुझसे हास्य के किसी ऐसे हस्ताक्षर का पता माँगा जिसने मैनपुरी में काव्य पाठ न किया हो। मुझे चूँकि मनहर दादा जी को सुनने का कोई मौका नहीं मिला था इसलिए मैं चाहता था कि मनहर दादा मैनपुरी आयें और मैं सारी रात उनको सुनता रहूँ। मैंने भदौरिया जी को उनका नाम प्रस्तावित कर दिया। भदौरिया जी ने मनहर जी से संपर्क किया मगर वे उतना पारिश्रमिक नहीं जुटा पाये जितना मनहर जी को दिया जाता था और फिर उन्होंने मनहर जी के स्थान पर निर्भय हाथरसी को बुला लिया और मैं ही क्या मैनपुरी जिले की सारी जनसंख्या मनहर जी को सुनने से वंचित रह गयी।

एक बार राजश्री प्रोडक्शन की प्रख्यात फिल्म नदिया के पार के निर्देशक दादा गोविन्द मूनिस जी मैनपुरी में श्री देवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी में आयोजित अखिल भारतीय विराट कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करने आये तो मैं उनसे मिला। मैंने सोचा था कि मूनिस जी मनहर जी को अच्छी तरह जानते होंगे। दुर्भाग्य यह रहा कि मूनिस जी से मेरी क्षणिक मुलाकात ही हो सकी और मैं उनसे मनहर जी के बारे में कुछ भी न पूछ सका।

मेरा अनुज अजय शाक्य अपनी शिक्षा पूरी करने के उपरान्त फिल्मों में भाग्य आजमाने हेतु मुम्बई चला गया और काफी संघर्ष के उपरान्त उसे फिल्मों में काम मिलने भी लगा। उसने फिल्म फूल बनी फूलन में पटकथा लेखक तथा चीफ असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में, चामूण्डा फिल्म में असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में तथा स्कूल गर्लमहान योगीराज फिल्मों में भी असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में काम किया है। मेरे एक मित्र श्री देवेन्द्र कुमार वर्मा को मुँह का कैंसर हुआ तो मैं उनका इलाज कराने हेतु टाटा मेमोरियल हॉस्पीटल मुम्बई ले गया। छोटा भाई तब वहाँ दहिसर में रहता था। उसी के पास हम लोग ठहरे। मेरा बहुत मन था वहाँ मनहर जी से मिलने का। 5 दिसम्बर 1997 को मैं मुम्बई पहुँचा था और लगभग एक माह वहाँ रहा किन्तु मरीज के साथ होने के कारण और मुम्बई के भागमभाग के वातावरण में कभी इतना मौका नहीं मिला कि मैं मनहर जी से मिल भी पाता। टाटा मेमोरियल अस्पताल में मेरे मित्र को लाइलाज घोषित कर दिया गया और फिर दो महीने जीवित रहने के बाद मेरा मित्र स्वर्गवासी हो गया।

सन् 1998 में जब मुझे यह इन्तजार था कि मनहर जी द्वारा भेजी हुई पत्रिका ‘मंगलदीप’ का 1998 अंक आता ही होगा तभी मेरे एक कवि मित्र श्री जगदीश त्रिपाठी को मुम्बई के एक साहित्यकार श्री कपिल पाण्डेय का पत्र मिला जिसमें यह दुखद सूचना थी कि मनहर जी नहीं रहे। यह बुरी खबर पाकर मेरा दिल बैठ गया। मैं अपने श्रद्धेय से कभी नहीं मिल सका जिसका खेद मुझे उम्र भर सालेगा। मंगल दीप का 1998 अंक आया। इसी अंक में छपे श्री राधास्वामी जी के स्व0 मनहर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में छपे लेख से विस्तृत जानकारी मिली। इसी लेख से मुझे पता चला कि मनहर जी राजस्थान की शौर्य्य भूमि शेखावटी क्षेत्र के चिड़ावा नगर में जन्मे थे। वर्ष 1998 में मैं दिसम्बर में भारतीय जनभाषाओं की विशिष्ट पत्रिका ‘कंचन लता’ के सम्पादक श्री भरत मिश्र ‘प्राची’ द्वारा शेखावटी क्षेत्र के खेतड़ीनगर में आयोजित अ0भा0 साहित्यकार सम्मेलन में गया था। वहाँ चिड़ावा के साहित्यकार एवं ‘रसमुग्धा’ पत्रिका के सम्पादक डॉ0 ओमप्रकाश पचरंगिया जी से मुलाकात हुई थी। वहाँ प्रख्यात पत्रिका ‘कादम्बिनी’ के उप सम्पादक डॉ0 धनंजय सिंह मुख्य अतिथि के रूप में पधारे हुए थे। मंगलदीप पत्रिका चूँकि देरी से मिल पायी थी इसलिए मुझे उस समय तक यह ज्ञात नहीं था कि मनहर जी की जन्म भूमि चिड़ावा है अन्यथा मैं डॉ0 ओम प्रकाश पचरंगिया जी के साथ चिड़ावा नगर में अवश्य जाता। चिड़ावा खेतड़ी नगर से ज्यादा दूर नहीं था। पूज्य मनहर जी आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनकी स्मृति हमें उनके बताये गये मार्ग पर चलने को प्रेरित करती रहेगी ऐसा मेरा विश्वास है। 28 नवम्बर 1998 को मनहर जी हमारे बीच से सदा-सदा के लिए गये। यह दिन हमें हमेशा याद रहेगा।

- डॉ॰ हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत

स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर

जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत


ईमेल- harishchandrashakya11@gmail.com

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